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दुश्मन लिये हैं
तीरोकमां जागते रहो
खूरंज़ आज का है जहां जागते रहो
मल्लते गुलिस्तां में लगाई गई है आग
उट्ठा मुनाफ़िरत का धुआं जागते रहो
बोते हैं बीज आग का अब किश्तग़ार में
दहकां है बहरे-शोजो-जहां जागते रहो
मीठी ज़बां से पास बुलाते हैं जो तुम्हें
उनकी ग़िजा तुम्हारी है जां, जागते रहो
होती रहेगी खून की बारिश तो खून से
भर
जाएगा हर एक कुआं जागते रहो
सोओ न गहरी नींद में किरताशए-अर्ज़ पर
रखना है बाकी नामो-निशां जागते रहो ।
-असलम हाफिज़
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मज़हब में सियासत का ज़हर घोल रहे हैं
ये
लोग जो संसद में खड़े बोल रहे हैं
निर्दोष आत्माओं की चीरफाड़ करते
नफ़रत के मकानों के भूगोल रहे हैं
हर
बार बरगलाते मासूम वोटरों को
जम्हूरियत के जख्मों को खोल रहे हैं
साज़िश खरीदते हैं षड्यंत्र बेचते हैं
ये
लोग घोषणाओं के महज ढोल रहे हैं
मज़हब की दुकानों से ईमान खरीद ,
संसद के बाजारों में इसे तौल रहे हैं।
-दिनेश दुबे
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शहर में कर्फ़्यू लगा है और सूनी है सड़क
इस
कदर सुनसान पहली बार देखी है सड़क
कोई राही, कोई मोटरकार, रिक्शा, कुछ नहीं
आज
इक विधवा की सूनी मांग जैसी है सड़क
इसके सीने पर से गुजरे उग्र लोगों के जुलूस
साक्षी सब क्रूर घटनाओं को देती हैं सड़क
वास्तव में जाने वाले लोग जाते हैं मगर
सब
यह कहते हैं अमुक मंजिल को जाती है सड़क
जिनका अपना घर ठिकाना कुछ नहीं होता कहीं
ऐसे बेचारों को पहलू में सुलाती है सड़क
पेड़ छायेदार हैं जिस पर न संगे-मील है
मेरी हस्ती की सड़क
‘राणा’
कुछ ऐसी है सड़क ।
-डॉ. राणाप्रताप गन्नोरी
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बहुत ही खौफ़ के मंज़र हवा में उड़ते हैं,
हरेक सिम्र नुचे पर हवा में उड़ते हैं
मेरे चमन पे कोई हादसा न गुज़रा हो,
लहूलुहान कबूतर हवा में उड़ते हैं
जमीं पे रहने की आदत नहीं इन्हें शायद,
यहाँ के लोग जो अक्सर हवा में उड़ते हैं
बतायें आपको क्या अपने शहर की हालत,
ज़रा सी बात पे खंजर हवा में उड़ते हैं
पतंग और कबूतर का अब नहीं है चलन,
छतों से शाम को पत्थर हवा में उड़ते हैं
-संजय मासूम
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न
कहीं मस्जिद गिरी है, न कहीं मंदीर गिरा
जलजले में, आज बरसों से खड़ा एक घर गिरा
कल
तलक तो मैं था, तुम थी, और
नग्में प्यार के,
आज
अपने दरम्याँ क्यों अलसुबह खंजर गिरा
देखता था मुल्क जिसमें रोज़ अपना चेहरा,
क्यों भला उस आईने पर यक-ब-यक पत्थर गिरा
आजकल छप्पर के नीचे सर कहाँ महफ़ूज़ है,
कल
तो बस बैठे-बिठाए सर पे ही छप्पर गिरा
दर्ज हों तारीख-दर-तारीख सारे हादसे,
आदमी का आदमीपन कब, कहाँ आकर गिरा।
फिर से एक पौधा
वहाँ पर रोंप दे मज़हब के नाम,
कल
कबूतर खून से होकर जहाँ पर तर गिरा।
-जीवन यदु |