रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

कृष्ण कुमार सिंह मयंक मो.मूसा खाँबाराबंकवीं जावेद अख्तर आज़ाद रमेशचन्द्र शर्मा चन्द्र

 डॉ. राजकुमार निजात असलम हाफिज़ दिनेश दुबे डॉ. राणाप्रताप गन्नोरी संजय मासूम जीवन यदु

  000 

फिक्रे-सियासत में जब अहले दैरो-हरम पड़ जायेंगे

घर घर इतनी लाशें होंगी कांधे कम पड़ जायेंगे

 

शंख बजे मसजिद में और मन्दिर से उठे आवाज़े अजाँ

फिर नफ़रत की आग के शोले खुद मध्धम पड़ जायेंगे

 

बढ़ती हुई नफ़रत की आंधी यार मिटाओ तुम वरना

फस्ले मसर्रत के सीने पर ग़म के कदम पड़ जायेंगे

 

किसको पता था सुबहे-हंसीं के ख्वाब का होगा इतना असर

रोशनी देने वाले सितारे भी मध्धम पड़ जायेंगे

 

बादल से शोले बरसेंगे ज़हर हवाएं उगलेंगी

देख के जिसको मौसम के भी दीदे नम पड़ जायेंगे

 

किसे खबर थी खुदसे बिछड़कर किस्मत की जुल्फों का मयंक

जितना चाहेंगे सुलझाना उतने खम पड़ जायेंगे

-कृष्ण कुमार सिंह मयंक

 

  000 

ये बात और वह तुमको अजीब लगता है

मगर वह हमको हमारा नसीब लगता है

 

न हमसे पूछ हमारे शहर का हाल ऐ दोस्त

ये सारा शहर हमें बदनसीब लगता है

 

हम अब के ईद न दीपावली मनायेंगे

हर एक लम्हा यहाँ का सलीब लगता है

 

हमारे घर को जलाने में जिसका हाथ रहा

वही तो आज हमारा रकी़ब बनता है

 

कहानी, गीत, ग़ज़ल, लिखके क्या करे मूसा

हर एक शख्स अब शायर अदीब बनता है

-मो.मूसा खाँबाराबंकवीं

 

  000 

वो इस तरह खुलूस का इजहार कर गया

दो भाइयों के बीच में दीवार कर गया

 

पग-पग हमारी राह में काँटे बिछे हुए

मैं रहे-पुरखतर को भी गुलज़ार कर गया

 

मैं पैकरे-खुलूस का ओढ़े लिबास था

वो दामने अना को मेरे तार कर गया

 

इस दौरे इंतशार ने हर चीज़ छीन ली

एक बच गया था दिल उसे मिसमार कर गया

-जावेद अख्तर आज़ाद

 

  000 

वही सवेरा वही शाम है

जीवन जैसे इक विराम है

 

भीतर मन खाली का खाली

बाहर कितनी धूमधाम है

 

कैद हुआ मंदिर मस्जिद में

कितना छोटा हुआ राम है

 

कैसा हिन्दू कैसा मुस्लिम

आना-जाना एक गाम है

 

मंदिर मस्जिद कभी न तोड़ें

जिसके उर में बसा राम है

-रमेशचन्द्र शर्मा चन्द्र

 

  000 

हादसों के नाम पर कुथ लोग जब मारे गए

ग़मगुसारी के लिए कातिल वहाँ सारे गए

 

अब तलक सुलझी नहीं है एक गुत्थी दोस्तों

मौत के मुँह में न जाने कितने बेचारे गए

 

तू बचाकर कब तलक रख पाएगा ये जिंदगी

बच के उसकी आँख से महफूज हत्यारे गए

 

तुमने फिर अपने असूलों को नया रंग दे दिया

मुफलिसी की पासबानी के कहाँ चारे गए

 

आग लगने का सबब तो था मगर ये भी हुआ

कि बुझाने लोग ले हाथों में अंगारे गए

-डॉ. राजकुमार निजात

 

 

 

 

  000 

दुश्मन लिये हैं तीरोकमां जागते रहो

खूरंज़ आज का है जहां जागते रहो

 

मल्लते गुलिस्तां में लगाई गई है आग

उट्ठा मुनाफ़िरत का धुआं जागते रहो

 

बोते हैं बीज आग का अब किश्तग़ार में

दहकां है बहरे-शोजो-जहां जागते रहो

 

मीठी ज़बां से पास बुलाते हैं जो तुम्हें

उनकी ग़िजा तुम्हारी है जां, जागते रहो

 

होती रहेगी खून की बारिश तो खून से

भर जाएगा हर एक कुआं जागते रहो

 

सोओ न गहरी नींद में किरताशए-अर्ज़ पर

रखना है बाकी नामो-निशां जागते रहो ।

-असलम हाफिज़

 

  000 

मज़हब में सियासत का ज़हर घोल रहे हैं

ये लोग जो संसद में खड़े बोल रहे हैं

 

निर्दोष आत्माओं की चीरफाड़ करते

नफ़रत के मकानों के भूगोल रहे हैं

 

हर बार बरगलाते मासूम वोटरों को

जम्हूरियत के जख्मों को खोल रहे हैं

 

साज़िश खरीदते हैं षड्यंत्र बेचते हैं

ये लोग घोषणाओं के महज ढोल रहे हैं

 

मज़हब की दुकानों से ईमान खरीद ,

संसद के बाजारों में इसे तौल रहे हैं।

-दिनेश दुबे

 

  000 

शहर में कर्फ़्यू लगा है और सूनी है सड़क

इस कदर सुनसान पहली बार देखी है सड़क

 

कोई राही, कोई मोटरकार, रिक्शा, कुछ नहीं

आज इक विधवा की सूनी मांग जैसी है सड़क

 

इसके सीने पर से गुजरे उग्र लोगों के जुलूस

साक्षी सब क्रूर घटनाओं को देती हैं सड़क

      

       वास्तव में जाने वाले लोग जाते हैं मगर

सब यह कहते हैं अमुक मंजिल को जाती है सड़क

 

जिनका अपना घर ठिकाना कुछ नहीं होता कहीं

ऐसे बेचारों को पहलू में सुलाती है सड़क

 

पेड़ छायेदार हैं जिस पर न संगे-मील है

मेरी हस्ती की सड़क राणा कुछ ऐसी है सड़क ।

-डॉ. राणाप्रताप गन्नोरी

 

 000 

बहुत ही खौफ़ के मंज़र हवा में उड़ते हैं,

हरेक सिम्र नुचे पर हवा में उड़ते हैं

 

मेरे चमन पे कोई हादसा न गुज़रा हो,

लहूलुहान कबूतर हवा में उड़ते हैं

 

जमीं पे रहने की आदत नहीं इन्हें शायद,

यहाँ के लोग जो अक्सर हवा में उड़ते हैं

 

बतायें आपको क्या अपने शहर की हालत,

ज़रा सी बात पे खंजर हवा में उड़ते हैं

 

पतंग और कबूतर का अब नहीं है चलन,

छतों से शाम को पत्थर हवा में उड़ते हैं

-संजय मासूम

 

  000 

न कहीं मस्जिद गिरी है, न कहीं मंदीर गिरा

जलजले में, आज बरसों से खड़ा एक घर गिरा

 

कल तलक तो मैं था, तुम थी, और नग्में प्यार के,

आज अपने दरम्याँ क्यों अलसुबह खंजर गिरा

 

देखता था मुल्क जिसमें रोज़ अपना चेहरा,

क्यों भला उस आईने पर यक-ब-यक पत्थर गिरा

 

आजकल छप्पर के नीचे सर कहाँ महफ़ूज़ है,

कल तो बस बैठे-बिठाए सर पे ही छप्पर गिरा

 

दर्ज हों तारीख-दर-तारीख सारे हादसे,

आदमी का आदमीपन कब, कहाँ आकर गिरा।

 

फिर से एक पौधा वहाँ पर रोंप दे मज़हब के नाम,

कल कबूतर खून से होकर जहाँ पर तर गिरा।

-जीवन यदु

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com