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मज़बूरो, मोहताज
!
सियासत चलने दो
कल
की खातिर आज सियासत चलने दो
मंदिर मस्जिद गिरते हैं गिर जाने दो
तुमको कैसी लाज, सियासत चलने दो
भूखे नंगे लोग तुम्हारी जय बोलें
तुम बोलो महाराज, सियासत चलने दो
घर
के बाहर बोर्ड लगाओ सेवा का
अन्दर गुण्डाराज, सियासत चलने दो
अपने अपने नाखूनों को तौले सब
मिटे सभी की खाज, सियासत चलने दो
रहे सलामत आपकी टोपी नेताजी
गिरे अजन्ता, ताज, सियासत चलने दो
-सलीम अख्तर
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आदमी जब नहीं आदमी के लिये
अब
खुशी क्या बचेगी किसी के लिये
देखिये मजहबों का चलन देखिये
आँख ही फोड़ ली, रोशनी के लिये
आप
तो राम हैं, आपको है पता
?
कौन रावण बना, इस सदी के लिये
यह
क्या हो गया, यह क्या कर लिया
बात विष बन गई, ज़िंदगी के लिये
चाँद चाचा गृहस्थी से कमजोर हैं
खोज पाये न वर, चांदनी के लिये
हर
तरफ आग है, आग ही आग है
लोग मज़बूर हैं, खुदकुशी के लिये
शाख से फूल को मत जुदा कीजिए
ये
खइले अम्न की रहबरी के लिये
ऐ
‘रशल’
फासलों की नदी के लिये
एक
पुल चाहिए, दोस्ती के लिये
-रशल विश्वमित्र
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इन
दायरों से निकलो बाहर तो आओ घर से
कुछ हालचाल जानो परिचय तो हो शहर से
समझो तो आदमी है समझो तो है अजूबा
वो
जो खड़ा हुआ है, टूटी हुई कमर से
आतंक को पढ़ाया अपनी तरह से सबने
हर
देश में खुले हैं इस तरह के मदरसे
ये
खेत तो मुकम्मल पहले ही समन्दर था
इन
बादलों को देखो बरसे तो कहाँ बरसे
जब
से हवा को देखो हाथों में लिए खंजर
कुथ लोग तो तभी से समझो गए हैं मर से
-अश्वघोष
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जब
भी अहम सवाल हो, कुछ होना चाहिये
जीना अगर मुहाल हो कुछ होना चाहिये
दंगे, फसाद, कत्ल, लूट हर मुकाम पर
ऐसा अगर कमाल हो, कुछ होना चाहिये
सड़कों की खुले आम गवाही के बावजूद
खूनी अगर बहाल हो कुछ होना चाहिये
झूठा बयान दे नहीं सकता कभी लहू
इन्सानियत हलाल हो कुछ होना चाहिये
यह
मुखबिरी नहीं है हकीकत है दोस्तों
इस
पर अगर मलात हो कुछ होना चाहिये
सदियाँ गुज़र गई हैं
सुलगते हुये हमें
हाथों में जब मशाल हो कुछ होना चाहिये
-राजकुमार
‘रश्मि’
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स्पप्न निर्मित मत हवाई घर बनो
हो
सके तो नींव का पत्थर
बनो
जो
बढ़ा दे चाल हर इक पाँव की
प्रेरणामय एक नव निर्झर बनो
जो
दिशा निर्देश सदियों तक करे
राजपथ पर मील का पत्थर बनो
गा
सके हर एक मिल कर प्यार से
वह
अनोखा एकता का स्वर बनो
जो
तिमिर के पंथ को दीपित करे
ज्योतिरथ आरूढ़ वह दिनकर बनो
-डॉ. रोहिताश्व अस्थाना
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