रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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गीता बहुत उदास है सहमाकुरआन है

हैं मौन मंत्र-आरती बोझिल अज़ान है

 

कानून औ, व्यवस्था का मत हाल पूछिये

अंधा है न्याय, मूक-बधिर संविधान है

 

इस मुल्क में जो जितना गिरा है ज़मीर से

उतनी बुलंद उसकी यहाँ आन-बान है

 

फिसलन भरी है राह सियासत की दोस्तों

हर सम्त खाईयाँ हैं या गहरी ढलान है

 

चूना लगा रहे हैं सरे आम देश को

हाथों में जिनके देश की आला कमान है

 

चल तो रहा है साथ मगर फिर भी ऐसपन

इक फासला सा उसके-मेरे दरम्यान है

-सुरेश सपन

 

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ना ईश्वर ना शर्म हया कुछ रही हमारी आँख में

मन्दिर मस्जिद तैर रहे हैं आज हमारी आँख में

 

ज़ख्मी घंटों का सुर है और घायल हुई अजान है

राम रहीमन खूँ में डूबे आज हमारी आँख में

 

शैतानों का मक़सद मज़हब मां ममता को तोड़ना

टूट रहे हैं इनके दम पर ख्वाब हमारी आँख में

 

एक खून के छींटे फैले टूट गये दिल शीशे से

पहली बार मरा है पानी आज हमारी आँख में

 

भूखे को रोटी देते या पीते रोते के आँसू

ऐसा होता हँसते अल्ला राम हमारी आँख में

 

दिल पर सीवन करे प्यार की सूई बनाई जाये

दर्द छंटेगा प्यार बँटेगा अनिल हमारी आँख में

-अनिल वशिष्ठ

 

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अनहोनी सी बात हो गयी

बिन बादल बरसात हो गयी

 

हम अपने दुश्मन बन बैठे

जाने कैसी घात हो गयी

 

रात कटी कुछ अपनी ऐसी

नींद न आयी प्रात हो गयी

 

उजले दिन ने क्या कर डाला

जिससे काली रात हो गयी

 

इतना बरसा खून यहाँ पर

शर्मिंदा बरसात हो गयी

 

दैरो-हरम के इस झगड़े में

जंग शुरु दिन-रात हो गयी

 

रोज़ रोज़ शह देते देते

आख़िर इक दिन मात हो गयी

 

आजा़द विचारों की दुनिया में

ज़ाहिर अब हर बात हो गयी

-आज़ाद कानपुरी

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सुनहली सुबहें सुहागन शाम को ले जायेंगे

वक़्त के ताज़िर सुकूँ आराम को ले जायेंगे

 

मज़हबी फतवे तुम्हारे, धर्म के जलते चिराग

नफरतों की हद तलक आवाम को ले जायेंगे

 

सोचता हूँ वेदो-कुरआँ की हकीक़त कर हलाक

ये कहाँ अल्लाह प्यारे राम को ले जायेंगे

 

इनकी फितरत पर भरोसा अब मुनासिब है नहीं

अपने ख्वाबं की हसीं गुलफाम को ले जायेंगे

 

रहबराने-मुल्क अब भी होश में आये न जो

मैकदा, मीना, सुराही, जाम को ले जायेंगे

 

पूछता आलम जहाँ से ये हविश के सिलसिले

कोई बतलाये कहाँ सद्दाम को ले जायेंगे

-मुनीर बख्श आलम

  

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सुना,देखा, पढ़ा जो कुछ भी या रब क्यों नहीं होता

हमारी आहों का प्याला लबालब क्यों नहीं होता

 

हजारों पीढ़ियों से बेहतर पीढ़ी के मालिक हम

हमारा दिल ही थोड़ा बेहतर तब क्यों नहीं होता

 

कि जिस से भूल जाएँ  हादसे इतिहास के सारे

कोई एजाद ऐसी,कोई करतब क्यों नहीं होता

 

बुझाते आ रहे रो-रोके जिसको आँसुओं से हम

वही शोला जरा नफरत का गायब क्यों नहीं होता

 

सियासत को गुनाहों की है इतनी छूट हासिल क्यों

करे पाबंद उन को भी वो मकतब क्यों नहीं होता

 

हुआ हर आइना बदशक्ल, शीशे में चटक सौ-सौ

कि उनका चेहरा इस पे भी बेढब क्यों नहीं होता

 

कि घर में आ गयी दुनिया, कि दुनिया चाँद पर पहुँची

जरूरी मिशरा जो अबसे, वही सब क्यों नहीं होता

-शिवशंकर मिश्र

 

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मज़बूरो, मोहताज ! सियासत चलने दो

कल की खातिर आज सियासत चलने दो

 

मंदिर मस्जिद गिरते हैं गिर जाने दो

तुमको कैसी लाज, सियासत चलने दो

 

भूखे नंगे लोग तुम्हारी जय बोलें

तुम बोलो महाराज, सियासत चलने दो

 

घर के बाहर  बोर्ड लगाओ सेवा का

अन्दर गुण्डाराज, सियासत चलने दो

 

अपने अपने नाखूनों को तौले सब

मिटे सभी की खाज, सियासत चलने दो

 

रहे सलामत आपकी टोपी नेताजी

गिरे अजन्ता, ताज, सियासत चलने दो

-सलीम अख्तर

  

000 

आदमी जब नहीं आदमी के लिये

अब खुशी क्या बचेगी किसी के लिये

 

देखिये मजहबों का चलन देखिये

आँख ही फोड़ ली, रोशनी के लिये

 

आप तो राम हैं, आपको है पता ?

कौन रावण बना, इस सदी के लिये

 

यह क्या हो गया, यह क्या कर लिया

बात विष बन गई, ज़िंदगी के लिये

 

चाँद चाचा गृहस्थी से कमजोर हैं

खोज पाये न वर, चांदनी के लिये

 

हर तरफ आग है, आग ही आग है

लोग मज़बूर हैं, खुदकुशी के लिये

 

शाख से फूल को मत जुदा कीजिए

ये खइले अम्न की रहबरी के लिये

 

रशल फासलों की नदी के लिये

एक पुल चाहिए, दोस्ती के लिये

-रशल विश्वमित्र

  

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इन दायरों से निकलो बाहर तो आओ घर से

कुछ हालचाल जानो परिचय तो हो शहर से

 

समझो तो आदमी है समझो तो है अजूबा

वो जो खड़ा हुआ है, टूटी हुई कमर से

 

आतंक को पढ़ाया अपनी तरह से सबने

हर देश में खुले हैं इस तरह के मदरसे

 

ये खेत तो मुकम्मल पहले ही समन्दर था

इन बादलों को देखो बरसे तो कहाँ बरसे

 

जब से हवा को देखो हाथों में लिए खंजर

कुथ लोग तो तभी से समझो गए हैं मर से

-अश्वघोष

  

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जब भी अहम सवाल हो, कुछ होना चाहिये

जीना अगर मुहाल हो कुछ होना चाहिये

 

दंगे, फसाद, कत्ल, लूट हर मुकाम पर

ऐसा अगर कमाल हो, कुछ होना चाहिये

 

सड़कों की खुले आम गवाही के बावजूद

खूनी अगर बहाल हो कुछ होना चाहिये

 

झूठा  बयान दे नहीं सकता कभी लहू

इन्सानियत हलाल हो कुछ होना चाहिये

 

यह मुखबिरी नहीं है हकीकत है दोस्तों

इस पर अगर मलात हो कुछ होना चाहिये

 

सदियाँ गुज़र गई हैं सुलगते हुये हमें

हाथों में जब मशाल हो कुछ होना चाहिये

-राजकुमार रश्मि

 

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स्पप्न निर्मित मत हवाई घर बनो

हो सके तो नींव का पत्थर बनो

 

जो बढ़ा दे चाल हर इक पाँव की

प्रेरणामय एक नव निर्झर बनो

 

जो दिशा निर्देश सदियों तक करे

राजपथ पर मील का पत्थर बनो

 

गा सके हर एक मिल कर प्यार से

वह अनोखा एकता का स्वर बनो

 

जो तिमिर के पंथ को दीपित करे

ज्योतिरथ आरूढ़ वह दिनकर बनो

-डॉ. रोहिताश्व अस्थाना

 

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