रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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कमलेश भट्ट कमल वीरेन्द्र कुँवर श्रद्धा मधुकर पराते बेकल अनुरागी प्रेम किरण जयप्रकाश मानस

 

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हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए

अपनी कुर्सी के लिए जज़्बात को मत छेड़िए

 

हममें कोई हूण, कोई कुशाण, कोई मंगोल है

दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए

 

गल्तियाँ बाबर की थीं, जुम्मन का घर फिर क्यों जले

ऐसे नाज़ुक वक्त में, हालात को मत छेड़िए

 

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, ज़ार या चंगेडज खाँ

मिट गए सब कौम की औकात को मत छेड़िए

 

छेड़िए इस जंग मिलजुलकर गरीबी के खिलाफ

दोस्त मेरे मज़हबी नग्मात को मत छेड़िए

-अदम गोंडवी

 

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मत चिरागों को हवा दो बस्तियाँ जल जायेंगी

ये हवन वो है कि जिसमें उँगलियां जल जायेंगी

 

मानता हूँ आग पानी में लगा सकते हैं आप

पर मगरमच्छों के संग में मछलियाँ जल जायेंगी

 

रात भर सोया नहीं गुलशन यही बस सोचकर

वो जला तो साथ उसके तितलियाँ जल जायेगीं

 

जानता हूँ बाद मरने के मुझे फूँकेंगे लोग

मैं मगर ज़िंदा रहूँगा लकड़ियाँ जल जायेंगी

 

उसके बस्ते में रखी जब मैंने मज़हब की किताब

वो ये बोला अब्बा मेरी कापियाँ जल जायेंगी

 

आग बाबर की लगाओ या लगाओ राम की

लग गई तो आयतें जौपाइयाँ जल जायेंगी

-सुरेन्द्र चतुर्वेदी

 

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आओ मंदिर मस्जिद खेलें खूब पदायें मस्जिद को

कल्पित जन्मभूमि को जीतें और हरायें मस्जिद को

 

सिया-राममय सब जग जानी सारे जग में राम रमा

फिर भी यह मस्जिद, क्यों मस्जिद चलो हटायें मस्जिद को

 

तोड़ें दिल के हर मंदिर को पत्थर का मंदिर गढ़ लें

मानवता पैरों की जूती यह जतलायें मस्जिद को

 

बाबर बर्बर होगा लेकिन हम भी उससे घाट नहीं

वह खाता था कसम खुदा की हम खा जायें मस्जिद को

 

मध्यकाल की खूँ रेज़ी से वर्तमान को रंगें चलो

अपनी-अपनी कुर्सी का भवितव्य बनायें मस्जिद को

 

राम-नाम की लूट मची है मर्यादा को क्यों छोड़ें

लूटपाट करते अब सरहद पार करायें मस्जिद को

 

देश हमारा है तोंदों तक नस्लवाद तक आज़ादी

इसी मुख्य धारा में आने को धमकायें मस्जिद को

 

धर्म बहुत कमजोर हुआ है लकवे का डर सता रहा

अपने डर से डरे हुए हम चलो डरायें मस्जिद को

 

गंगाजली उठायें झूठी सरयू को गंदा कर दें

संग राम को फिर ले डूबें और डूबायें मस्जिद को

-रामकुमार कृषक

 

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बस्ती में, दोपहर में ही रात हो गई

दिन डूब क्या गया धुँए में रात हो गई

 

हाथों में तेज खंज़र, आँखों में गहरी दहशत,

कुछ खास दोस्तों से मुलाका़त हो गई

 

थे खून के फब्बारे या आँसुओं की बारिश,

सब नाचते थे, जैसे बरसात हो गई

 

रिश्तों के कौन से ये आयाम हैं नये,

लिखी जो बात खूँ से, जज़्बात हो गई

-दिनेश जुगरान

 

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हर तरफ घायल उजाला रात तुफानों की है

आज फिर नीयत बुरी इस घर के दरबानों की है

 

फिर गिरा मौसम फिसल कर देश का हम क्या कहें

कुछ तो दलदल की है साजिस कुछ तो चट्टानों की है

 

दर्द की स्याही से चेहरों पर लिखा पढ़ लीजिए

घूंट भर पानी की चाहत पेट भर दानों की है

 

हर कदम रखने से पहले अब इजाजत चाहिए

एक निर्धन देश में यह सड़क धनवानों की है

 

आदमी कोई नहीं हम घूम आए हर गली

या तो बस्ती हिन्दुओं की या मुसलमानों की है

 

फूल का खिलना न रोको, फूल को खिलने तो दो

वक्त की बेहद ज़रूरत आज मुस्कानों की है

-हनुमंत नायडू

 

000  

शक शुब्हा अपनी जगह शिकवा गिला अपनी जगह

मिलने मिलाने का हँसी ये सिलसिला अपनी जगह

 

यूं तो मिलते हैं गले हम, ईद पर हर साल ही

पर दिलों का फासला, चुभता रहा अपनी जगह

 

हो रहे खुरदरी सच्चाइयों से रूबरू

पर निगोड़ी आँख में, इक ख्वाब था अपनी जगह

 

उसका दावा है कि बस, वो ही मेरा हमदर्द है

उसके मेरे दरमियाँ का फासला अपनी जगह

 

नौकरी अपनी जगह और शायरी अपनी जगह

दिमागों दिल का संतुलन चलता रहा अपनी जगह

-विजय वाते

 

 

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छीनकर हमसे सभी एतबार मज़हब ने

इस तरह बाँटा हमें इस बार मज़हब ने

 

चन्द दीवारें गिराकर हर किसी दिन में

फिर खड़ी कर दी नई दीवार मज़हब ने

 

कट गये हैं बेगुनाहों के हजारों सर

यूँ चलाये हैं कई हथियार मज़हब ने

 

आँख से गुज़रे वही हिटलर, वही नादिर

फिर किया इतिहास को साकार मज़हब ने

 

भर गये हैं वक्त के तलवे फफोलों से

यूँ बिछाये हर तरफ अंगार मज़हब ने

 

ईद-दीवाली कि होली की खुशी ही हो

हर खुशी पर कर लिया अधिकार मज़हब ने

 

लूट हत्याएँ अमन के जिस्म पर लिखकर

कर दिया हालात को अख़बार मज़हब ने

-कमलेश भट्ट कमल

 

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उसके  सर तक जब मेरे हाथों का खंज़र आ गया

मेरे आगे इक बिलखते घर का मंज़र आ गया

 

ज़िन्दगी भर दूसरों के घर बिखेरा फूल ही

मेरे आँगन में भला फिर किसका पत्थर आ गया

 

हर बरस हम पर उठाँगी अंगुलियाँ पीढ़ियाँ

कह के ये लो फिर तुम्हारा छह दिसम्बर आ गया

 

वक्त रहते हम न चेते ये नहीं अच्छा हुआ

बदगुमां दरिया का पानी सर से ऊपर आ गया

 

थाह इस उतरी नदी की नाप कर खुश था बहुत

कद हुआ मालूम अपना जब समन्दर आ गया

-वीरेन्द्र कुँवर

 

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मस्जिद ढहा रहे हैं मंदिर जला रहे हैं

भगवान या खुदा अब ज़िंदा कहाँ रहे हैं

 

यह एक-सा जहाँ सब एक-सी है फ़ितरत

करतार अपना अपना हम क्यूँ बना रहे हैं

 

माटी में क्या फरक है क्या जिस्म जाँ अलग है

वो खून कब अलग है जिसको बहा रहे हैं

 

मीनारे धर्म भेद की तू  ऐ गिरा दे इंसा

कह दे कि सब जहाँ इक मज़हब बना रहे हैं

 

मस्जिद न तुम ढहाओ मंदिर न वो गिरायें

आँसू में हम नहायें, खूँ में वो नहा रहे हैं

-श्रद्धा मधुकर पराते

 

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दर्द से दोहे सने हैं चोट से चौपाइयाँ

और ज़ख्मों ले लिखी हैं खून से रुबाइयाँ

 

क्यों उठाई जा रहीं नफरत की दीवारें यहाँ

क्यों हमारे बीच में ये खुद रही हैं खाइयाँ

 

बहके बहके से कदम हैं बहकी बहकी मंजिलें

देश के मानस पटल पर लिख रहीं रुसवाइयाँ

 

फूट की फिरका परस्ती टूट की रस्साकशी

जोर अजमाइश सड़क पर ले रही अँगड़ाइयाँ

 

अब ये आलम है व्यवस्था का अमन कानून का

भीड़ में रहते हुए भी डर रही तनहाइयाँ

 

चल रही चालें सियासी स्वार्थी शतरंज पर

मात और शै की परस्पर पड़ रही परछाइयाँ

 

न्याय की सूखी फसल अन्याय की जलवायु में

झूठ निगले जा रहा है सरासर सच्चाइयाँ

 

खौफ दहशत और भय के गर्म बाज़ारों में देख

हर तरफ हिंसा की केवल बज रही शहनाइयाँ

-बेकल अनुरागी

 

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राम और रहमान को इक जा नहीं देखा गया

एक हमसाये से हमसाया नहीं देखा गया

 

बीच सड़कों पर जला लड़का नहीं देखा गया

मुझसे ये मंज़र तबाही का नहीं देखा गया

 

मंदिरों के, मस्जिदों के रास्ते में मुझसे यूँ

खून में डूबा हुआ वो नक्शे-पा नहीं देखा गया

 

कत्ल, ये बम के धमाके और ये दंगा-फसाद

आँख वाला हो गया अंधा नहीं देखा गया

 

चूड़ियाँ टूटीं किसी की गोद सूनी हो गयी

उनको राखी प्यार से बाँधा नहीं देखा गया

 

वो सियासी आदमी है, उसके चेहरे हैं अनेक

खा गये पहचान कर धोका नहीं देखा गया

 

एक टुकड़े के लिये तो सब्र दिल ने कर लिया

मुल्क का नक्शा कभी आधा नहीं देखा गया

-प्रेम किरण

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आदमी ही आदमी पर बस्तियाँ गायब हुईं

इमारतें न जाने कितनी खिड़कियाँ गायब हुई

 

पहुँचे भला उस पार कैसे हर तरफ हैं आधियाँ

बदचलन मल्लाह सारे कश्तियाँ गायब हुईं

 

बंदिशें लगीं हैं शायद प्यार की तालीम पर

पुस्तकों में आती जाती चिट्ठियाँ गायब हुईं

                                      -जयप्रकाश मानस

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

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