000
हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए
अपनी कुर्सी के लिए जज़्बात को
मत छेड़िए
हममें कोई हूण, कोई कुशाण, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात,
अब उस बात को मत छेड़िए
गल्तियाँ बाबर की थीं, जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक वक्त में, हालात को मत छेड़िए
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, ज़ार या चंगेडज खाँ
मिट गए सब कौम की औकात को मत छेड़िए
छेड़िए इस जंग मिलजुलकर गरीबी के खिलाफ
दोस्त मेरे मज़हबी नग्मात को मत छेड़िए
-अदम गोंडवी
000
मत चिरागों को हवा दो
बस्तियाँ जल जायेंगी
ये हवन वो है कि जिसमें उँगलियां जल जायेंगी
मानता हूँ आग पानी में लगा सकते हैं आप
पर मगरमच्छों के संग में मछलियाँ जल जायेंगी
रात भर सोया नहीं गुलशन
यही बस सोचकर
वो जला तो साथ उसके
तितलियाँ जल जायेगीं
जानता हूँ बाद मरने के मुझे फूँकेंगे लोग
मैं मगर ज़िंदा रहूँगा लकड़ियाँ जल जायेंगी
उसके बस्ते में रखी जब मैंने मज़हब की किताब
वो ये बोला अब्बा मेरी कापियाँ जल जायेंगी
आग बाबर की लगाओ या लगाओ राम की
लग गई तो आयतें जौपाइयाँ जल जायेंगी
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
000
आओ मंदिर मस्जिद खेलें खूब पदायें मस्जिद को
कल्पित जन्मभूमि को जीतें और हरायें मस्जिद को
सिया-राममय सब जग जानी
सारे जग में राम रमा
फिर भी यह मस्जिद, क्यों मस्जिद चलो हटायें मस्जिद को
तोड़ें दिल के हर मंदिर को पत्थर का मंदिर गढ़ लें
मानवता पैरों की जूती यह जतलायें मस्जिद को
बाबर बर्बर होगा लेकिन हम भी उससे घाट नहीं
वह खाता था कसम खुदा की हम खा जायें मस्जिद को
मध्यकाल की खूँ रेज़ी से वर्तमान को रंगें चलो
अपनी-अपनी कुर्सी का
भवितव्य बनायें मस्जिद को
राम-नाम की लूट मची है मर्यादा को क्यों छोड़ें
लूटपाट करते अब सरहद पार करायें मस्जिद को
देश हमारा है तोंदों तक नस्लवाद तक आज़ादी
इसी मुख्य धारा में आने को धमकायें मस्जिद को
धर्म बहुत कमजोर हुआ है लकवे का डर सता रहा
अपने डर से डरे हुए हम चलो डरायें मस्जिद को
गंगाजली उठायें झूठी सरयू को गंदा कर दें
संग राम को फिर ले डूबें और डूबायें मस्जिद को
-रामकुमार कृषक
000
बस्ती में, दोपहर में ही रात हो गई
दिन डूब क्या गया धुँए में रात हो गई
हाथों में तेज खंज़र, आँखों में गहरी दहशत,
कुछ खास दोस्तों से मुलाका़त हो गई
थे खून के फब्बारे या आँसुओं की बारिश,
सब नाचते थे, जैसे बरसात हो गई
रिश्तों के कौन से ये आयाम हैं नये,
लिखी जो बात खूँ से, जज़्बात हो गई
-दिनेश जुगरान
000
हर तरफ घायल उजाला रात तुफानों की है
आज फिर नीयत बुरी इस घर के दरबानों की है
फिर गिरा मौसम फिसल कर देश का हम क्या कहें
कुछ तो दलदल की है साजिस कुछ तो चट्टानों की है
दर्द की स्याही से चेहरों पर लिखा पढ़ लीजिए
घूंट भर पानी की चाहत पेट भर दानों की है
हर कदम रखने से पहले अब इजाजत चाहिए
एक निर्धन देश में यह सड़क धनवानों की है
आदमी कोई नहीं हम घूम आए हर गली
या तो बस्ती हिन्दुओं की या मुसलमानों की है
फूल का खिलना न रोको, फूल को खिलने तो दो
वक्त की बेहद ज़रूरत आज मुस्कानों की है
-हनुमंत नायडू
000
शक शुब्हा अपनी जगह शिकवा गिला अपनी जगह
मिलने मिलाने का हँसी ये सिलसिला अपनी जगह
यूं तो मिलते हैं गले हम, ईद पर हर साल ही
पर दिलों का फासला, चुभता रहा अपनी जगह
हो रहे खुरदरी सच्चाइयों से रूबरू
पर निगोड़ी आँख में, इक ख्वाब था अपनी जगह
उसका दावा है कि बस, वो ही मेरा हमदर्द है
उसके मेरे दरमियाँ का फासला अपनी जगह
नौकरी अपनी जगह और शायरी अपनी जगह
दिमागों दिल का संतुलन चलता रहा अपनी जगह
-विजय वाते