रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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मुद्दत गुज़र गई है अपनो को आज़माने में

हसरत निकल गई है यारों मेरी ज़माने में

 

वे दिल गा रहे हैं या दिल्लगी किये हैं वे

दिल ही जला दिया दिल का दिया जलाने में

 

इस दिल में रौशनी का था इंतजार तेरा ही

क्यों आग लग गई है अपने ही आशियाने में

 

अपना बना बनाकर मारा गली में उनकी

बरबाद हो गए हैं अपना उन्हें बनाने में

 

हासिल न कर सके हम दो शिज़ा हुस्न उनका

सारी उमर बिता दी हमने उसे रिझाने में

 

आख़िर तुझे बतायें क्या ?  इक हादसा हुआ है

दिल ही कहाँ बचा है दिलबर से दिल लगाने में

-डॉ. दयानंद पी. जैन

 

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मुझको बताऊँ कैसी ये दुनिया दिखाई दी

इक तेज़ घूमता हुआ पहिया दिखाई दी

 

भाई लिवाने पहुँचा बहन को तो गाँव के

जोहड़ में तैरती हुई चुटिया दिखाई दी

 

नन्ही सी चिड़िया बाज़ के पंजों में देखकर

सपनों मे रात भर उसे बिटिया दिखाई दी

 

इंसानियत हूँ जाती हूँ ढूँढ़ोगे एक दिन

बस इतना कह के फिर न वो बुढ़िया दिखाई दी

 

कुछ को हयात खुशियों का झरना लगी ‘’नसीम

कुछ को ये सिर्फ दर्द का दरिया दिखाई दी

-मंगल नसीम

 

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मुख्तलिफ़ फूलों से मिलकर गुल्सितां बन जाऊँगा

एक दिन हिन्दोस्ताँ जन्नतनिशाँ बन जाऊँगा

 

जब मुक़म्मिल जिस्म जख्मों से सजा लूँगा तो फिर

इन सितारों की तमक से कहकशाँ बन जाऊँगा

 

तलिखियाँ बढ़ जाएँगी शीरी जबानी से मेरी

रफ़्ता-रफ़्ता एक दिन उर्दू ज़बाँ बन जाऊँगा

 

ग़र्क़ करने को उठेगी जब कोई शफ़्फ़ाक मोज

मैं शिक़स्ता कश्तियों का बादबाँ बन जाऊँगा

 

करवटें जब दिल में लेगा जज़्बा-ए-बेइख्तियार

फैल कर मैं आसमाँ पर आसमाँ बन जाऊँगा

 

इतना लावा पक चुका है मेरे अंदर ए रज़ा

फट पड़ूँगा एक दिन आतिश फशाँ बन जाऊँगा

-काज़ी हसन रज़ा

 

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मुझसे मिलकर आज फिर हलकान होने आए हो

दिन के सपनो ! क्यों मेरी आँखें भिगोने आए हो

 

पाम के लंबे जटाधारी वृक्षों के निकट

किसलिए बीते दिनों की राख ढोने आए हो

 

मंदिरों की घंटियाँ बजने लगीं, पंछी उड़े

तुम कहाँ थे ? इस समय कमरे में सोने आए हो

 

कामना मन में नहीं है, स्वप्न आँखों में नहीं

तुम कहां सूखों नदी में हाथ धोने आए हो

-निश्तर खानक़ाही

 

 

 

 

 

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मंजिलों से दिल को बहला, रहगुज़ारों को न छेड़

जिंदगी यूँ मुस्करा के ख़ाकसारों को न छेड़

 

थम गये हैं रिस्ते रिस्ते ज़ख्मे दिल, ज़ख्मे जिगर

अब खुदारा रहम कर इन चांद तारों को न छेड़

 

सरनुंगू हैं आरज़ूयें और तमन्नायें उदास

ख़िज़ां ना आशना तश्ना बहारों को न छेड़

 

थी कभी एक रस्म लेकिन इस ज़माने में नहीं

भूल जा अब तू वफ़ा को माहपारों को न छेड़

 

उड़ते लम्हों में है खुशबू कितनी यादों की न पूछ

ज़िक्रे मेहर-ऐ-माह कर के दिल के तारों को न छेड़

 

बुझ चुकी शमये तमम्ना, सो चुकी शमये इन उम्मीद

राह लग अपनी सबा, अब ग़म के मारों को न छेड़

-डॉ. अली अब्बास उम्मीद

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मैकदा, साक़ी, सुराही, जाम की बातें न कर

बात कर सुक़रात की, खैयाम की बातें न कर

 

मुझ से अब तू ग्रर्दिशें-अय्याम की बातें न कर

ज़िक्र कर सुबहे-हँसी का शाम की बातें न कर

 

एक ही झटके में उस को ताईरे-दिल ले उड़ा

ऐ खिरद अपने बिछाये दाम की बातें न कर

 

हाँ ! मयस्सर आयेंगे भी, मगर मरने के बाद

जिंदगी में राहतों-आराम की बातें न कर

 

नाम सुनते ही मेरा, झुँझला के वो बोले ऐ नूर

मुझ से उस आवारा-ओ-बदनाम की बातें न कर

-नूर जगदलपुरी

 

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मौन ओढ़े हैं सभी तैयारियाँ होंगी ज़रूर

राख के नीते दबी चिन्गारियाँ होंगी ज़रुर

 

आज भी आदम की बेटी हंटरों की ज़द में है

हर गिलहरी के बदन पर धारियाँ होंगी ज़रूर

 

नाम था होठों पे सागर का, मरुस्थल की हुई

उस नदी की कुछ न कुछ लाचारियाँ होंगी ज़रूर

 

तेज माँझे-सी हवा कितनी पतंगे ले उड़ी

वक्त के हाथों में पैनी आरियाँ होंगी ज़रूर

 

हमने ऐसे रंग फूलों पे कभी देखे न थे

तितलियों के हाथ में पिचकारियाँ होंगी ज़रुर

 

एक मौसम आए है तो एक मौसम जाए है

आज है मातम तो कल किलकारियाँ होंगी ज़रुर

-राज गोपाल सिंह

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मुद्दत पे मिला है यह-खोया हुआ घर है

धीरे से दर खोलना-सोया हुआ घर है

 

ऐसे न पाँव धर, जायेंगे ये कुचल

सपनों से हर कदम यह, बोया हुआ घर है

 

उस रात वहाँ ये, इस रात यहाँ हैं

कांधों पे दर-ब-दर, ले, ढोया हुआ घर है

 

बरसा है धार-धार बदरा उमड़-घुमड़

मन भर हिचक-हिचक, अभी रोया हुआ घर है

 

मैला न अब करो उजेरों से तुम इसे

अँधेरों में नहाया धोया हुआ घर है

 

प्राणों में धार कर धड़कन में है जिया

साँसों से पोर-पोर कि पोया हुआ घर है

-उदय शंकर सिंह उदय

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