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मंजिलों से दिल
को बहला, रहगुज़ारों को न छेड़
जिंदगी यूँ मुस्करा
के ख़ाकसारों को न छेड़
थम गये हैं रिस्ते
रिस्ते ज़ख्मे दिल, ज़ख्मे जिगर
अब खुदारा रहम कर
इन चांद तारों को न छेड़
सरनुंगू हैं
आरज़ूयें और तमन्नायें उदास
ख़िज़ां ना आशना
तश्ना बहारों को न छेड़
थी कभी एक रस्म
लेकिन इस ज़माने में नहीं
भूल जा अब तू वफ़ा
को माहपारों को न छेड़
उड़ते लम्हों में
है खुशबू कितनी यादों की न पूछ
ज़िक्रे मेहर-ऐ-माह
कर के दिल के तारों को न छेड़
बुझ चुकी शमये
तमम्ना, सो चुकी शमये इन
‘उम्मीद’
राह लग अपनी सबा,
अब ग़म के मारों को न छेड़
-डॉ. अली अब्बास
‘उम्मीद’
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मैकदा, साक़ी,
सुराही, जाम की बातें न कर
बात कर सुक़रात
की, खैयाम की बातें न कर
मुझ से अब तू
ग्रर्दिशें-अय्याम की बातें न कर
ज़िक्र कर
सुबहे-हँसी का शाम की बातें न कर
एक ही झटके में
उस को ताईरे-दिल ले उड़ा
ऐ खिरद अपने
बिछाये दाम की बातें न कर
हाँ
!
मयस्सर आयेंगे भी, मगर मरने के बाद
जिंदगी में
राहतों-आराम की बातें न कर
नाम सुनते ही
मेरा, झुँझला के वो बोले ऐ
‘नूर’
मुझ से उस
आवारा-ओ-बदनाम की बातें न कर
-नूर जगदलपुरी
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मौन ओढ़े हैं
सभी तैयारियाँ होंगी ज़रूर
राख के नीते
दबी चिन्गारियाँ होंगी ज़रुर
आज भी आदम की
बेटी हंटरों की ज़द में है
हर गिलहरी के
बदन पर धारियाँ होंगी ज़रूर
नाम था
होठों
पे सागर का, मरुस्थल की हुई
उस नदी की कुछ
न कुछ लाचारियाँ होंगी ज़रूर
तेज माँझे-सी
हवा कितनी पतंगे ले उड़ी
वक्त के हाथों
में पैनी आरियाँ होंगी ज़रूर
हमने ऐसे रंग
फूलों पे कभी देखे न थे
तितलियों के हाथ
में पिचकारियाँ होंगी ज़रुर
एक मौसम आए है
तो एक मौसम जाए है
आज है मातम तो
कल किलकारियाँ होंगी ज़रुर
-राज गोपाल सिंह
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मुद्दत पे मिला
है यह-खोया हुआ घर है
धीरे से दर
खोलना-सोया हुआ घर है
ऐसे न पाँव धर,
जायेंगे ये कुचल
सपनों से हर
कदम यह, बोया हुआ घर है
उस रात वहाँ
ये, इस रात यहाँ हैं
कांधों पे
दर-ब-दर, ले, ढोया हुआ घर है
बरसा है
धार-धार बदरा उमड़-घुमड़
मन भर
हिचक-हिचक, अभी रोया हुआ घर है
मैला न अब करो
उजेरों से तुम इसे
अँधेरों में
नहाया धोया हुआ घर है
प्राणों में
धार कर धड़कन में है जिया
साँसों से
पोर-पोर कि पोया हुआ घर है
-उदय शंकर सिंह
‘उदय’
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