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धमकियाँ हैं-सच
न कहना बोटियाँ कट जायेंगी।।
जो उठाओगे कभी
तो उंगलियाँ कट जायेंगी।।
आरियों को
दोस्तों दावत न दो सम्भलो जरा
वरना आंगन के
ये बरगद इमलियां कट जायेगी।
कुछ काम कर दस
की उमर है बचपना अब छोड़ दे
तेरे हिस्से की
नहीं तो रोटियाँ कट जायेंगी।
दौड़ता है किस
तरफ सिर पर रखे रंगीनियाँ
जिंदगी के पाँव
की यूँ एड़ियाँ कट जायेंगी।
माँ ठहर सकता
नहां अब एक पल भी गाँव में
तेरी बीमारी
में यूँही छुट्टियां कट जायेंगी।
कुर्सियाँ बनती
हैं इनसे चाहे तुम कुछ भी करो
देख लेना
क़ातिलों की बेड़ियाँ कट जायेंगी।
-अशोक अंजुम
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धूप है
जलतीसड़क है नंगे पांव मत चलो।।
तुम अभी कमसिन
हो मेरे साथ गांव मत चलो।।
ओढ़ लो सूरज की
किरनों को रिदाओं की तरह
है अगर मंज़िल
की ख्वाइश छांव छांव मत चलो।
हो सके तो बैठ
जाओ तुम हवा के दोश पर
पांव में छाले
पड़ेंगे पांव पांव मत चलो।
ये बिसाते
ज़िंदगी है फूक कर रख्खो क़दम
घर जाओ जससे
खुद को ऐसा दांव मत चलो।
ज़िंदगी भर धूप
ही में मुझको करना है सफ़र
लेके मेरे साथ
तुम जुल्फ़ों की छांव मत चलो।
मूरिदे इल्ज़ाम
ठहरा देंगे वो तुम को
‘ज़िया’
मैं न कहता था
मेरे हमराह गांव मत चलो।
-ज़िया अंसारी
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न हम हैं, न
तुम हो, न बंदिश जहाँ की।।
महज ज़िन्दगी
का तमाशा बचा है।।
हमारी हक़ीक़त
ज़माने से पूछो
नहीं याद आता
कि क्या क्या बचा है।
यहीं पर संजोये
हैं सपने सुबह के,
मगर रात का एक
खाका बचा है।
ममटा तो तुका
ज़िन्दगी के अँधेरे,
न जाने ये कैसा
कुहासा बचा है।
ये कैसी खामोशी
में डूबा शहर है,
चलो अब यहाँ
से,यहाँ क्या बचा है।
-अवध नारायण
मुद्गल
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नींद में भी
रोशनी की रोज़ ही फ़सलें उगा।।
क्या हुआ यदि
टूटते है रोज तू सपने सजा।।
फूल तितली की
कहानी रोज़ ही सुनते रहे
–
गुनगुनाकर गीत
कोई आज तू पत्थर हिला।।
चाँदनी में हर
कोई चलकर दिखा सकता यहाँ-
चिलचिलाती धूप
में तू रेत पर चलकर दिखा।।
यह नदी वर्षों
हुए सोई हुई है आज भी-
फेंककर पत्थर
कहीँ तो आज तू हलचल मचा ।।
लोग गिरते हैं
तो फिर गिरते चले जाते मगर-
गिर गया यदि तू
यहाँ इस दौर में उठकर दिखा।।
-रमेशचन्द्र पंत
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नीली-पीनी
रेखाओं के जाल हमारी आँखों में।
देख सको तो
देखो, सूखे ताल हमारी आँखों में।।
रोज़ी-रोटी के,
कपड़े-लत्ते के जटिल सवाल लिए-
बैठ गया है फिर
आकर, बैताल हमारी आँखों में।।
विजय-तिलक के
लिए इन्द्र का माथा है, स्वीकार करो-
हम दधीचि के
बंशज हैं, कंकाल हमारी आँखों में ।।
नारों, वादों,
सपनों, सूखे होठों की टकराहट से-
आते रहते हैं
अक्सर भूचाल हमारी आँखों में।।
अबकी फ़सल
हमारी होगी, अब की खेत हमारा है-
कहते-कहते बीच
गया हर साल हमारी आँखों में।।
डायमंड होटल
में होतीं, प्रेमचन्द की बातें हैं
उजड़ी-उजड़ी
लगती है, चौपाल हमारी आँखों में।
सूखा, बाढ़,
अकाल चन्द लोगों के लिए खुशी के दिन-
माफ़ी, राहत
कोष, जाँच-पड़ताल हमारी आँखों में।।
-शिवकुमार पराग
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प्यार की
इंसानियत की ढेर दौलत सामनेन।।
लूट लो इनकी
चुकानी ही न कीमत सामने।।
खौफ के काले
अँधेरे छोड़ पीछे आ गए
और रस्ते में
मिलेगी कितनी दहशत सामने।
घर की दीवारें
सिकुड़ती जा रही हैं क्या करें
जिस पे तलवारें
टँगी हों ऐसी एक छत सामने।
पीठ पीछे तो
मुझे देंगे हज़ारों गालियाँ
एक भी है जो
जुटाए इसकी हिम्मत सामने।
धर्म बिल्ली की
तरह लड़ने लगे जब दोस्तों
न्याय बंदर का
लिए आई पुकूमत सामने।
-दिनेश सिन्दल