रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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अशोक अंजुम ज़िया अंसारी अवध नारायण मुद्गल रमेशचन्द्र पंत शिवकुमार पराग दिनेश सिन्दल

 ज़हीर गाज़ीपुरी उपेन्द्र पाण्डेय आलोक त्यागी नीतीश्वर शर्मा नीरज मधुवेश कमलेश प्रकाश

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धमकियाँ हैं-सच न कहना बोटियाँ कट जायेंगी।।

जो उठाओगे कभी तो उंगलियाँ कट जायेंगी।।

 

आरियों को दोस्तों दावत न दो सम्भलो जरा

वरना आंगन के ये बरगद इमलियां कट जायेगी।

 

कुछ काम कर दस की उमर है बचपना अब छोड़ दे

तेरे हिस्से की नहीं तो रोटियाँ कट जायेंगी।

 

दौड़ता है किस तरफ सिर पर रखे रंगीनियाँ

जिंदगी के पाँव की यूँ एड़ियाँ कट जायेंगी।

 

माँ ठहर सकता नहां अब एक पल भी गाँव में

तेरी बीमारी में यूँही छुट्टियां कट जायेंगी।

 

कुर्सियाँ बनती हैं इनसे चाहे तुम कुछ भी करो

देख लेना क़ातिलों की बेड़ियाँ कट जायेंगी।

-अशोक अंजुम

 

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धूप है जलतीसड़क है नंगे पांव मत चलो।।

तुम अभी कमसिन हो मेरे साथ गांव मत चलो।।

 

ओढ़ लो सूरज की किरनों को रिदाओं की तरह

है अगर मंज़िल की ख्वाइश छांव छांव मत चलो।

 

हो सके तो बैठ जाओ तुम हवा के दोश पर

पांव में छाले पड़ेंगे पांव पांव मत चलो।

 

ये बिसाते ज़िंदगी है फूक कर रख्खो क़दम

घर जाओ जससे खुद को ऐसा दांव मत चलो।

 

ज़िंदगी भर धूप ही में मुझको करना है सफ़र

लेके मेरे साथ तुम जुल्फ़ों की छांव मत चलो।

 

मूरिदे इल्ज़ाम ठहरा देंगे वो तुम को ज़िया

मैं न कहता था मेरे हमराह गांव मत चलो।

-ज़िया अंसारी

 

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न हम हैं, न तुम हो, न बंदिश जहाँ की।।

महज ज़िन्दगी का तमाशा बचा है।।

 

हमारी हक़ीक़त ज़माने से पूछो

नहीं याद आता कि क्या क्या बचा है।

 

यहीं पर संजोये हैं सपने सुबह के,

मगर रात का एक खाका बचा है।

 

ममटा तो तुका ज़िन्दगी के अँधेरे,

न जाने ये कैसा कुहासा बचा है।

 

ये कैसी खामोशी में डूबा शहर है,

चलो अब यहाँ से,यहाँ क्या बचा है।

-अवध नारायण मुद्गल

 

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नींद में भी रोशनी की रोज़ ही फ़सलें उगा।।

क्या हुआ यदि टूटते है रोज तू सपने सजा।।

 

फूल तितली की कहानी रोज़ ही सुनते रहे

गुनगुनाकर गीत कोई आज तू पत्थर हिला।।

 

चाँदनी में हर कोई चलकर दिखा सकता यहाँ-

चिलचिलाती धूप में तू रेत पर चलकर दिखा।।

 

यह नदी वर्षों हुए सोई हुई है आज भी-

फेंककर पत्थर कहीँ तो आज तू हलचल मचा ।।

 

लोग गिरते हैं तो फिर गिरते चले जाते मगर-

गिर गया यदि तू यहाँ इस दौर में उठकर दिखा।।

-रमेशचन्द्र पंत

 

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नीली-पीनी रेखाओं के जाल हमारी आँखों में।

देख सको तो देखो, सूखे ताल हमारी आँखों में।।

 

रोज़ी-रोटी के, कपड़े-लत्ते के जटिल सवाल लिए-

बैठ गया है फिर आकर, बैताल हमारी आँखों में।।

 

विजय-तिलक के लिए इन्द्र का माथा है, स्वीकार करो-

हम दधीचि के बंशज हैं, कंकाल हमारी आँखों में ।।

 

नारों, वादों, सपनों, सूखे होठों की टकराहट से-

आते रहते हैं अक्सर भूचाल हमारी आँखों में।।

 

अबकी फ़सल हमारी होगी, अब की खेत हमारा है-

कहते-कहते बीच गया हर साल हमारी आँखों में।।

 

डायमंड होटल में होतीं, प्रेमचन्द की बातें हैं

उजड़ी-उजड़ी लगती है, चौपाल हमारी आँखों में।

 

सूखा, बाढ़, अकाल चन्द लोगों के लिए खुशी के दिन-

माफ़ी, राहत कोष, जाँच-पड़ताल हमारी आँखों में।।

-शिवकुमार पराग

 

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प्यार की इंसानियत की ढेर दौलत सामनेन।।

लूट लो इनकी चुकानी ही न कीमत सामने।।

 

खौफ के काले अँधेरे छोड़ पीछे आ गए

और रस्ते में मिलेगी कितनी दहशत सामने।

 

घर की दीवारें सिकुड़ती जा रही हैं क्या करें

जिस पे तलवारें टँगी हों ऐसी एक छत सामने।

 

पीठ पीछे तो मुझे देंगे हज़ारों गालियाँ

एक भी है जो जुटाए इसकी हिम्मत सामने।

 

धर्म बिल्ली की तरह लड़ने लगे जब दोस्तों

न्याय बंदर का लिए आई पुकूमत सामने।

-दिनेश सिन्दल 

 

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पहले दानिस्ता मात खाता हूँ।।

फिर ज़माने को आज़माता हूँ।।

 

और तो कोई फ़न नहीं आता

शब्द को आइना बनाता हूँ।

 

यह एज़ाज कम नहीं मुझको

अपने एहसास का विधाता हूँ।

 

हुक्म जब हो गया तो गेहूँ भी

धान के खेत में उगाता हूँ।

 

जिससे होता रहा हूँ मैं शादाब

सब को उस धूप से डराता हूँ।

 

मोम हूँ इतना जानता हूँ मैं

आग़ को फिर भी आज़माता हूँ।

 

शब के नौहे से मुझको क्या लेना

शमा की लौ हूँ जगमगाता हूँ।

-ज़हीर गाज़ीपुरी

 

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पहचान उनकी कर, महज परछाइयाँ न देख।।

चेहरों कीअसलियत परख, रानाइयाँ न देख।।

 

ये आसपास तेरे जो गहरी हैं खाइयाँ

तू इनसे सीख ले सबक ऊँचाइयाँ न देखक।

 

ज़ालिम वो कौन जिसने तेरे होंठ सी दिये

कोयल से पूछ लेक सक अमराइयाँ न देख।

 

अपनो के खून से ही ये, जब तक नहायी है

मरघट सी हो गई सड़क लम्बाइयाँ न देख।

 

ये ज़ख्म तेरे हाथ के मिटते नहीं हैं क्यों

इनसे है खून की छलक, गहराइयाँ न देख।

 

आँगन में टूटी चूड़ियाँ, उजड़ा हुआ सिंदूर

कुम्हलाई मेंहदी की महक, शहनाइयाँ न देख।

-उपेन्द्र पाण्डेय

 

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पूरा जो आदमी हो वो आखिर नहीं मिला।।

धड़ मिल गया आगर तो यहाँ सिर नहीं मिला।।

 

रिश्ते हैं आज के या कि बुत हैं ये काँच के-

साबुत है चूँति सँग या  काफ़िर नहीं मिला।।

 

यारों की दोस्ती का यहाँ जिक्र क्या करें-

उनसे गले मिले तो गला फिर नहीं मिला।।

हर हमसफर पे आज बस मंजिल का जुनूँ है-

हर डग का मज़ा ले वो मुसाफिर नहीं मिला।।

 

अपनी जड़ों से कट के सुकूं एक ख्वाब है-

कुछ जिससे सीखते वो मुहाज़िर नहीं मिला।।

 

बदली हुई हवा मेरी छते से गुज़र गई

हसरत लिए हुए कि मैं बाहिर नहीं मिला।

-आलोक त्यागी

 

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फिर निशाने से वह अपना सर बचाकर ले गया।।

वह तो थाती थी किसी की घर बचाकर ले गया।।

 

हक के दस्तावेज़ की बातें वो झूठी हो गयीं

कोई नक्शे से हमारा घर उठाकर ले गया ।

 

हम लगावट की फ़कत तक़रीर की करते रहे

पर वो ख्वावों के चमन से गुल चुराकर ले गया।

 

यूँ उठा तूफ़ान दशहत का कि सब हैरान हैं

हर बशर की आँख सेनींदें उड़ाकर ले गया।

 

स्वप्न आँखों में लिए मेंहदी रचाती रह गयी

दहेज का दानव फिर उसका वर उठाकर ले गया।

-नीतीश्वर शर्मा नीरज

 

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फूल फूल है, पात-पात है और है डाली-डाली आग।।

फिर भी दाबे हाथ बग़ल में देख रहा है माली आग।।

 

पत्थर लगे हिमालय के हैं उनके घर दीवारों में

क्या चिंता है अगर उगलती, अगला करे दुनाली आग।

 

छप्पर कोई राख हुआ है, छप्पर वाला राख हुआ

कहने वालों का कहना है उसने स्वयं लगाली आग।

 

एक तो वैसे ही गुलशन में फूल हैं सारे क़ागज के

ऊपर से सुनते हैं इनकी करती है रखवाली आग।

 

उधर न जाना भूले से भी पंछी पर जल जाएँगे

बैठा करती है बागों में ओढ़े अब हरियाली आग।

-मधुवेश

 

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बहुत हुआ पर अब भी कम है।।

इसी बात का उसको ग़म है।।

 

उसके बारे में मत पूछो

उसका अपने धरम करम है।

 

अब तो इनकी मर्जी में ही

जिंदा रखने का दम-खम है।

 

नहीं सजाओ अपनी महफ़िल़

अभी ज़लज़लों का मौसम है ।

-कमलेश प्रकाश

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति

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