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निगाहों दिल का
अफसाना करीबे इख्तिताम आया ।
हमें अब इससे
क्या आया शहर या वक्तेशाम आया ।।
ज़बाने इश्क़
पर एक चीख़ बनकर तेरा नाम आया,
ख़िरद की
मंजिलें तय हो चुकी दिल का मुकाम आया ।
न जाने कितनी
शम्मेगुल हुई कितने बुझे तारे,
तब एक खुर्शीद
इतराता हुआ बालाये बाम आया ।
इसे आँसू न कह
एक याद अय्यामें गुलिश्ताँ है,
मेरी उम्रे खाँ
को उम्रे रफ़्ता का सलाम आया ।
बेरहमन आबे
गंगा शैख कौशर ले उड़ा उससे,
तेरे होठों को
जब छूता हुआ मुल्ला का जाम आया .
-पंडित आनंद नारायण मुल्ला
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नज़र मिला न
सके उससे उस निगाह के बाद ।
वही है हाल
हमारा जो हो गुनाह के बाद ।।
मैं कैसे और
किस सिम्त मोड़ता ख़ुद को,
किसी की चाह न
थी दिल में, तिरी चाह के बाद ।
ज़मीर काँप तो
जाता है, आप कुछ भी कहें,
वो हो गुनाह से
पहले, कि हो गुनाह के बाद ।
कहीं हुई थीं
तनाबें तमाम रिश्तों की,
छुपात सर मैं
कहाँ तुम से रस्म-ओ-राह के बाद ।
गवाह चाह रहे
थे, वो मिरी बेगुनाही का,
जुबाँ से कह न
सका कुछ,
‘ख़ुदा
गवाह’
के बाद
।
-कृष्ण बिहारी
‘नूर’
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वो बुतों ने
डाले हैं वसबसे, कि दिलों से खौफ़े-ख़ुदा गया ।
वो पड़ी है
रोज़ क़यामतें कि ख्याले-रोज़े-जज़ा गया ।।
जो नफस था
ख़ारे-गुलू बना, जो उठे थे हाथ लहू हुए,
वो
निशाते-आहे-सहर गई, वो विकारे-दस्त-दुआ गया .
न वो रंग
फ़स्ले-बहार का, न रबिश वो अब्रे-बहार की,
जिस अदा से यार
थे आश्ना, वो मिजाजे-वादे-सबा गया ।
जो तलब पे
अहदे-वफ़ा किया, तो वो क़द्रे-रस्मे-वफ़ा गई,
सरे आम जब हुए
मुद्दई तो सबाबे-सिद्क-ओ-सफ़ा गया ।
अभी बादबान को
तह रखो, अभी मुज़्तरिब है रुख़े-हवा,
किसी रास्ते
में है मुंतजिर वो सुकूँ जो आके चला गया ।
-फ़ैज अहमद फ़ैज
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ग़म न हो पास
इसी से उदास मेरा मन ।
साँस चलती है,
चिहुँक चेतता नहीं है तन ।।
नींद ऐसी न
किसी और को आई होगी,
जाग कर ढूँढती
धरती कहाँ है मेरा गगन ।
मौसमी गुल हो
निछावर, बहार तुम पर ही,
क़ाबिले दीद
ख़िजाँ में खिला है मेरा चमन ।
भूलकर कूल
ग़र्क़ कश्तियाँ हुईं कितनी,
लौट मझधार से
आया चिरायु ख़ुद मरण ।
बुलबुलों ने
दिया दुहरा कलाम ग़ंचों का,
गंध बर मौन रहा
आह!
एक मेरा
सुमन ।
-जानकीबल्लभ शास्त्री
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जमाना आ गया
रुसवाइयों तक तुम नहीं आये ।
जवानी आ गई
तनहाइयों तक तुम नहीं आये ।।
धरा पर थम गई
आँधी, गगन में काँपती बिजली,
घटाएँ आ गईं
अमराइयों तक तुम नहीं आये ।
नदी के हाथ
निर्झर की मिली पाती समंदर को,
सतह भी आ गई
गहराइयों तक तुम नहीं आये ।
किसी को देखते
ही आपका आभास होता है,
निगाहें आ गई
परछाइयों तक तुम नहीं आये ।
समापन हो गया
नभ में सितारों की सभाओं का,
उदासी आ गई
अंगड़ाइयों तक तुम नहीं आये ।
न शमादा हैं न
परवाने ये क्या
‘रंग’
है महफ़िल,
कि मातम आ गया
शहनाइयों तक तुम नहीं आये ।
-बलबीर सिंह
‘रंग’
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ग़मे-आशिक़ी से
कह दो रहे
– आम तक
न पहुँचे ।
मुझे ख़ौफ़ है
ये तोहमत मिरे नाम तक न पहुँचे ।।
मैं नज़र से पी
रहा था कि ये दिन ने बद्दूआ दी
–
तेरा हाथ
ज़िंदगी-भर कभी जाम तक न पहुँचे ।
नयी सुब्ह पर
नज़र है मगर आह ये भी डर है,
ये सहर भी
रफ़्ता-रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे ।
ये
अदा-ए-वेनियाजी तुझे बेवफ़ा मुबारिक,
मगर ऐसी
बेरुख़ी क्या कि सलाम तक न पहुँचे ।
जो निक़ाबे-रुख
उठी दी तो ये क़ैद भी लगा दी,
उठे हर निगाह
लेकिन कोई बाम तक न पहुँचे ।
-शकील बदायूनी