रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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शकील बदायूनी मज़रूह सुल्तानपुरी असगर अमजद डॉ. गोविन्द प्रसाद उपाध्याय नासिर बिल्हौरी महावीर अग्रवाल

निदा फाज़ली

000 

निगाहों दिल का अफसाना करीबे इख्तिताम आया ।

हमें अब इससे क्या आया शहर या वक्तेशाम आया ।।

 

ज़बाने इश्क़ पर एक चीख़ बनकर तेरा नाम आया,

ख़िरद की मंजिलें तय हो चुकी दिल का मुकाम आया ।

 

न जाने कितनी शम्मेगुल हुई कितने बुझे तारे,

तब एक खुर्शीद इतराता हुआ बालाये बाम आया ।

 

इसे आँसू न कह एक याद अय्यामें गुलिश्ताँ है,

मेरी उम्रे खाँ को उम्रे रफ़्ता का सलाम आया ।

 

बेरहमन आबे गंगा शैख कौशर ले उड़ा उससे,

तेरे होठों को जब छूता हुआ मुल्ला का जाम आया .

-पंडित आनंद नारायण मुल्ला

 

000 

नज़र मिला न सके उससे उस निगाह के बाद ।

वही है हाल हमारा जो हो गुनाह के बाद ।।

 

मैं कैसे और किस सिम्त मोड़ता ख़ुद को,

किसी की चाह न थी दिल में, तिरी चाह के बाद ।

 

ज़मीर काँप तो जाता है, आप कुछ भी कहें,

वो हो गुनाह से पहले, कि हो गुनाह के बाद ।

 

कहीं हुई थीं तनाबें तमाम रिश्तों की,

छुपात सर मैं कहाँ तुम से रस्म-ओ-राह के बाद ।

 

गवाह चाह रहे थे, वो मिरी बेगुनाही का,

जुबाँ से कह न सका कुछ, ख़ुदा गवाहके बाद ।

-कृष्ण बिहारी नूर

 

000

वो बुतों ने डाले हैं वसबसे, कि दिलों से खौफ़े-ख़ुदा गया ।

वो पड़ी है रोज़ क़यामतें कि ख्याले-रोज़े-जज़ा गया ।।

 

जो नफस था ख़ारे-गुलू बना, जो उठे थे हाथ लहू हुए,

वो निशाते-आहे-सहर गई, वो विकारे-दस्त-दुआ गया .

 

न वो रंग फ़स्ले-बहार का, न रबिश वो अब्रे-बहार की,

जिस अदा से यार थे आश्ना, वो मिजाजे-वादे-सबा गया ।

 

जो तलब पे अहदे-वफ़ा किया, तो वो क़द्रे-रस्मे-वफ़ा गई,

सरे आम जब हुए मुद्दई तो सबाबे-सिद्क-ओ-सफ़ा गया ।

 

अभी बादबान को तह रखो, अभी मुज़्तरिब है रुख़े-हवा,

किसी रास्ते में है मुंतजिर वो सुकूँ जो आके चला गया ।

-फ़ैज अहमद फ़ैज

 

000

ग़म न हो पास इसी से उदास मेरा मन ।

साँस चलती है, चिहुँक चेतता नहीं है तन ।।

 

नींद ऐसी न किसी और को आई होगी,

जाग कर ढूँढती धरती कहाँ है मेरा गगन ।

 

मौसमी गुल हो निछावर, बहार तुम पर ही,

क़ाबिले दीद ख़िजाँ में खिला है मेरा चमन ।

 

भूलकर कूल ग़र्क़ कश्तियाँ हुईं कितनी,

लौट मझधार से आया चिरायु ख़ुद मरण ।

 

बुलबुलों ने दिया दुहरा कलाम ग़ंचों का,

गंध बर मौन रहा आह! एक मेरा सुमन ।

-जानकीबल्लभ शास्त्री

 

 

000

जमाना आ गया रुसवाइयों तक तुम नहीं आये ।

जवानी आ गई तनहाइयों तक तुम नहीं आये ।।

 

धरा पर थम गई आँधी, गगन में काँपती बिजली,

घटाएँ आ गईं अमराइयों तक तुम नहीं आये ।

 

नदी के हाथ निर्झर की मिली पाती समंदर को,

सतह भी आ गई गहराइयों तक तुम नहीं आये ।

 

किसी को देखते ही आपका आभास होता है,

निगाहें आ गई परछाइयों तक तुम नहीं आये ।

 

समापन हो गया नभ में सितारों की सभाओं का,

उदासी आ गई अंगड़ाइयों तक तुम नहीं आये ।

 

न शमादा हैं न परवाने ये क्या रंग है महफ़िल,

कि मातम आ गया शहनाइयों तक तुम नहीं आये ।

-बलबीर सिंह रंग

 

000

ग़मे-आशिक़ी से कह दो रहे आम तक न पहुँचे ।

मुझे ख़ौफ़ है ये तोहमत मिरे नाम तक न पहुँचे ।।

 

मैं नज़र से पी रहा था कि ये दिन ने बद्दूआ दी

तेरा हाथ ज़िंदगी-भर कभी जाम तक न पहुँचे ।

 

नयी सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है,

ये सहर भी रफ़्ता-रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे ।

 

ये अदा-ए-वेनियाजी तुझे बेवफ़ा मुबारिक,

मगर ऐसी बेरुख़ी क्या कि सलाम तक न पहुँचे ।

 

जो निक़ाबे-रुख उठी दी तो ये क़ैद भी लगा दी,

उठे हर निगाह लेकिन कोई बाम तक न पहुँचे ।

-शकील बदायूनी

 

 

000 

मुझे सहल हो गईं मंजिलें वो हवा के रुख भी बदल गये ।

तिरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग राह में जल गये ।।

 

वो लजाये मेरे सवाल पर कि उठा सके न झुका के सर,

उड़ी जुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज मचल गये ।

 

वही बात जो न वो कह सके मिरे शेर-ओ-नज़्मे आ गई,

वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दहे-शराब में ढ़ल गये ।

 

तुझे चश्मे-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज्म है,

तुझे तश्मे-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गये ।

 

उन्हें कब के रास भी आ चुके तिरी बज्मे-नाज़े के हादिसे,

अब उठे कि तेरी नज़र फिरे जो गिरे थे गर के संभल गये ।

 

मिरे काम आ गई आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें,

बढी इस क़दर मिरी मंजिलें कि क़दम के खार निकल गये ।

-मज़रूह सुल्तानपुरी

000

दूर तक मंज़िलों का पता ही नहीं।।

इन्तेहा क्या हो जब इब्तेदा ही नहीं।।

 

जुर्म खुद ही करें और पता ही नहीं

इससे बढ़ कर तो कोई खता ही नहीं।

 

यूँ मिले मुझसे तर्के तउल्लुफ़ के बाद

जैसे पहले कभी कुछ हुआ ही नहीं।

 

ऐसी तम्हीद क्यों पेश करते हैं लोग

जिस कहानी का कुछ सिलसिला ही नहीं।

 

यूँ हो सीना सिपर जुल्म के सामने

कह उठे जुल्म अब हौसला ही नहीं।

 

असगर अमज़द सदायें न दो दश्त में

जब तुम्हारा कोई हमनवा ही नहीं।

-असगर अमजद

 

000

देश का बहतर हालचाल नहीं दिखता है।।

फिर भी उनके चेहरे पर मलाल नहीं दिखता है।।

 

भूखे पेटों की है शाश्वत विहम्बना

दाने दिखते हैं उन्हें जाल नहीं दिखता है।

 

सरकारी कर्ज लेकर चार्वाक बन बैठे सब

मेरे शहर में अब कोई कंगाल नहीं दिखता है।

 

टेका नहीं गया हो सत्ता की देहरी पर

एक भी तो अब ऐसा भाल नहीं दिखता है।

 

कैसी होली है ये कैसा भाईचारा है

कीचड़ तो है हाथ में गुलाल नहीं दिखता है।

 

कहने को तो कह रहे हैं कई लोग गज़ल

जाने क्यों पहले सा कमाल नहीं दिखता है।

 -डॉ. गोविन्द प्रसाद उपाध्याय

 

000

दोस्ती आइनए दिल को जेला देती है।।

दुश्मनी तीरगीए कल्ब बढ़ा देती है।।

 

फूट आपस की दिया करती है नफ़रत को जनम

घर के आँगन में भी दीवार उठा देती है।

 

कितनी बेदर्द है ये भिद्दते अफ़लाख की धूप

रंग चेहरे का सुर्कू दिल का उड़ा देती है।

 

इतना भी सोचा नहीं अम्न के दुश्मन तूने

एक चिंगारी कई घर को जला देती है।

 

छोड़कर देखिए नफ़रत के चलन को नासिर

किस क़दर लुप्फ़ मुहब्बत की फ़िज़ा देती है।

-नासिर बिल्हौरी

 

000

दोस्तों ! कैसा सबेरा है,

दूर तक फैला अँधेरा है।।

 

रूप धर कर आदमी का क्यों-

भेड़ियों ने आज घेरा है ?

 

अब वतन की सरज़मीं पर क्यों-

चमगीदड़ों का खास डेरा है ?

 

बरगदों की कोटरों में भी-

उल्लुओं का क्यों बरेसा है ?

 

आज अँधियारे शहर में हूँ,

कल का सूरज किन्तु मेरा है

-महावीर अग्रवाल

 

000

धूप में निकली घटाओं में नहाकर देखो।।

जिंदगी क्या है किताबों को हटाकर देखो।।

 

वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में

क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो।

 

पत्थरों में भी जुबाँ होती है दिल होते हैं

अपने घर के दरो-दीवार सजा कर देखो।

 

फ़ासला नज़रों का घोखा भी तो हो सकता है

दो मिलें या न मिलें हाथ बढ़ा कर देखो।

-निदा फाज़ली

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