रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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ख्वाजा हैदर अली आतिशमिर्जा असदुल्लाह खाँ गालिबहकीम मोमिन खाँ मोमिनबहादुर शाह जफ़रभारतेन्दु हरिश्चन्द्र

पं ब्रजनारायण चकबस्तमुहम्मद इक़बालजिगर मुरादाबादीजोश मलीहाबादीघुपति सहाय फिराक़ गोरखपुरी

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

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दोस्त हो जब दुश्मने-जाँ होतो क्या मालूम हो ।

आदमी को किस तरह अपनी कज़ा मालूम हो ।।

 

आशिक़ों से पूछिये खूबी लबे-जाँ बख्श की,

जौहरी को क़द्रे-लाले-बेबहा मालूम हो ।

 

दाम में लाया है आतिश सब्जये-ख़ते-बुतां

सच है क्या इंसा को किस्मत का लिखा मालूम हो ।

-ख्वाजा हैदर अली आतिश

 

000

ये न थी हमारी क़िस्मत के निसाले यार होता ।

अगर और जीते रहते यही इन्तजार होता ।।

 

तेरे वादे पे जिये हम तो ये जान झूठ जाना,

के ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता ।

 

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे-नीय कश को,

ये खालिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता ।

 

ये कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह,

कोई चारा-साज होता कोई ग़मगुसार होता ।

 

रंगे-संग से टपकता वो लहू के फिर न थमता,

जिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार होता ।

 

कहूँ किससे मैं के क्या है शबे-ग़म बुरी बला है,

मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता ।

 

हुए हम जो मर के रुसवा हुए क्यूँ न ग़रक़े दरिया,

न कभी ज़नाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता ।

 

ये मसाईले-तसव्वुफ़ ये तेरा बयान ग़ालिब

तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख्वार होता ।

-मिर्जा असदुल्लाह खाँ गालिब

 

000

असर उसको ज़रा नहीं होता ।

रंज राहत-फिज़ा नहीं होता ।।

 

बेवफा कहने की शिकायत है,

तो भी वादा वफा नहीं होता ।

 

जिक़्रे-अग़ियार से हुआ मालूम,

हर्फ़े-नासेह बुरा नहीं होता ।

 

तुम हमारे किसी तरह न हुए,

वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता ।

 

उसने क्या जाने क्या किया लेकर,

दिल किसी काम का नहीं होता ।

 

नारसाई से दम रुके तो रुके,

मैं किसी से खफ़ा नहीं होता ।

 

तुम मेरे पास होते तो गोया,

जब कोई दूसरा नहीं होता ।

 

हाले-दिल यार को लिखूँ क्यूँकर,

हाथ दिल से जुदा नहीं होता ।

 

क्यूं सुने अर्ज़े-मुज़तर ऐ मोमिन

सनम आख़िर ख़ुदा नहीं होता ।

-हकीम मोमिन खाँ मोमिन

 

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पसे-मर्ग मेरे मजार पर जो दिया किसी ने जला दिया ।

उसे आह! दामने-बाद ने सरेशाम ही से बुझा दिया ।।

 

मुझे दफ़्न करना तू जिस घड़ी, तो ये उससे कहना कि ए परी,

वो जो तेरा आशिक़े-जार था, तहे ख़ाक उसको दबा दिया ।

 

दमे-ग़ुस्ल से मेरे पेशतर उसे हमदमों ने ये सोचकर,

कहीं जावे उसका दिल दहल, मेरी लाश पर से हटा दिया ।

 

मेरी आँख झपकी थी एक पल, मेरे दिल ने चाहा कि उसके चल,

दिले बेक़रार ने ओ मियाँ! वहीं चुटकी लेके जगा दिया ।

 

मैंने दिल दिया, मैंने जान दी, मगर आह तूने न क़द्र की,

किसी बात को जो कभी कहा, उसे चुटकियों से उड़ा दिया ।

-बहादुर शाह जफ़र

 

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गले मुझको लगा लो ए दिलदार होली में ।

बुझे दिल की लगी भी तो ए याए होली में ।।

 

नहीं यह है गुलाले सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे,

य आशिक ही है उमड़ी आहें आतिशबार होली में ।

 

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझको भी जमाने दो,

मनाने दो मुझे भी जानेमन त्योहार होली में ।

 

है रंगत जाफ़रानी रुख अबीरी कुमकुम कुच है,

बने हो ख़ुद ही होली तुम ए दिलदार होली में ।

 

रसा गर जामे-मय गैरों को देते हो तो मुझको भी,

नशीली आँख दिखाकर करो सरशार होली में ।

-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

 

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एक साग़र भी इनायत न हुआ याद रहे ।

साक़िया जाते हैं, महफ़िल तेरी आबाद रहे ।।

 

बाग़बाँ दिल से वतन को यह दुआ देता है,

मैं रहूँ या न रहूँ यह चमन आबाद रहे ।

 

मुझको मिल जाय चहकने के लिए शाख़ मेरी,

कौन कहता है कि गुलशन में न सय्याद रहे ।

 

बाग़ में लेके जनम हमने असीरी झेली,

हमसे अच्छे रहे जंगल में जो आज़ाद रहे ।

-पं ब्रजनारायण चकबस्त

 

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कभी ऐ हक़ीक़ते मुंतजर नज़र आ लिबासे-मजाज़ में ।

कि हजारों सज़दे तड़प रहे हैं मरी जबीने-नयाज़ में ।।

 

न वो इश्क में रही गर्मियाँ न वो हुस्न में रहीं शोखियाँ,

न वो ग़जनवी में तड़प रही न वो ख़म है जुल्फ़े-अयाज में ।

 

तू बचा बचा के न रख इसे तेरा आईना है वो आईना,

जो शकस्ता हो तो अज़ीज़तर है निगाहे-आईनासाज़ में ।

 

तुझे क्या बतायें कि हमनसीं हमें मौत में जो मज़ा मिला,

न मिला मसीहाओ ख़जिर को वो निशाते उम्रे दराज़ में ।

 

न कहीं जहाँ में अमाँ मिजी जो अमाँ मिली तो कहाँ मिली,

मेरे जुर्म-हाय-सियाह को मेरे अफ़वे-बंदानवाज़ में ।

-मुहम्मद इक़बाल

 

000

दिल गया रौनके हयात गई ।

ग़म गया सारी कायनात गई ।।

 

दिल धड़कते ही फिर गई वो नज़र,

लब तक आई न थी के बात गई ।

 

उनके बहलाए भी न बहला दिल,

गएगां सइये इल्तफ़ात गई ।

 

मर्गे आशिक़ तो कुछ नहीं लेकिन,

इक मसीहा-नफ़स की बात गई ।

 

हाए सरशरायां जवानी की,

आँख झपकी ही थी के रात गई ।

 

नहीं मिलता मिज़ाजे-दिल हमसे,

ग़ालिबन दूर तक ये बात गई ।

 

क़ैदे-हस्ती से कब नजात जिगर

मौत आई अगर हयात गई ।

-जिगर मुरादाबादी

 

000

सोजे-ग़म देके उसने ये इर्शाद किया ।

जा तुझे कश्मकशे-दहर से आज़ाद किया ।।

 

वो करें भी तो किन अल्फ़ाज में तिरा शिकवा,

जिनको तिरी निगाहे-लुत्फ़ ने बर्बाद किया ।

 

दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया,

जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया ।

 

इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बर्बाद,

इसका ग़म है कि बहुत देर में बर्बाद किया ।

 

मुझको तो होश नहीं तुमको ख़बर हो शायद,

लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बरबाद किया ।

-जोश मलीहाबादी

 

000

निगाहें नाज़ ने पर्दे उठाए हैं क्या-क्या ।

हिजाब अहले मुहब्बत को आए हैं क्या-क्या ।।

 

जहाँ में थी बस इक अफ़वाह तेरे जलवों की,

चराग़े दैरो-हरम झिलमिलाए है क्या-क्या ।

 

कहीं चराग़, कहीं गुल, कहीं दिल बरबाद,

ख़ेरामें नाज़ ने कितने उठाए हैं क्या-क्या ।

 

पयामें हुस्न, पयामे जुनूँ, पयामें फ़ना,

तेरी निगाह ने फसाने सुनाए हैं क्या-क्या ।

 

फिराक़राहे वफ़ा में सबक रवी तेरी,

बड़े बड़ों के क़दम डगमगाए हैं क्या-क्या ।

-रघुपति सहाय फिराक़ गोरखपुरी

 

000

भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है ।

देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है ।।

 

हार होंगे हृदय के खुलकर तभी गाने नये,

हाथ में आ जायेगा, वह राज सो महफिल में है ।

 

तर्स है ये देर से आँखे गड़ी श्रृंगार में,

और दिखलाई पड़ेगी जो गुराई तिल में है ।

 

पेड़ टूटेंगे, हिलेंगे, जोर से आँधी चली,

हाथ मत डालो, हटाओ पैर, बिच्छू बिल में है ।

 

ताक पर है नमक मिर्चा लोग बिगड़े या बनें,

सीख क्या होगी पराई जब पसाई सिल में  है ।

 -सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

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