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एक साग़र भी
इनायत न हुआ याद रहे ।
साक़िया जाते हैं,
महफ़िल तेरी आबाद रहे ।।
बाग़बाँ दिल से वतन
को यह दुआ देता है,
मैं रहूँ या न रहूँ
यह चमन आबाद रहे ।
मुझको मिल जाय
चहकने के लिए शाख़ मेरी,
कौन कहता है कि
गुलशन में न सय्याद रहे ।
बाग़ में लेके जनम
हमने असीरी झेली,
हमसे अच्छे रहे
जंगल में जो आज़ाद रहे ।
-पं ब्रजनारायण चकबस्त
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कभी ऐ हक़ीक़ते
मुंतजर नज़र आ लिबासे-मजाज़ में ।
कि हजारों सज़दे
तड़प रहे हैं मरी जबीने-नयाज़ में ।।
न वो इश्क में रही
गर्मियाँ न वो हुस्न में रहीं शोखियाँ,
न वो ग़जनवी में
तड़प रही न वो ख़म है जुल्फ़े-अयाज में ।
तू बचा बचा के न रख
इसे तेरा आईना है वो आईना,
जो शकस्ता हो तो
अज़ीज़तर है निगाहे-आईनासाज़ में ।
तुझे क्या बतायें
कि हमनसीं हमें मौत में जो मज़ा मिला,
न मिला मसीहाओ
ख़जिर को वो निशाते उम्रे दराज़ में ।
न कहीं जहाँ में
अमाँ मिजी जो अमाँ मिली तो कहाँ मिली,
मेरे
जुर्म-हाय-सियाह को मेरे अफ़वे-बंदानवाज़ में ।
-मुहम्मद
इक़बाल
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दिल गया रौनके हयात
गई ।
ग़म गया सारी
कायनात गई ।।
दिल धड़कते ही फिर
गई वो नज़र,
लब तक आई न थी के
बात गई ।
उनके बहलाए भी न
बहला दिल,
गएगां सइये
इल्तफ़ात गई ।
मर्गे आशिक़ तो कुछ
नहीं लेकिन,
इक मसीहा-नफ़स की
बात गई ।
हाए सरशरायां जवानी
की,
आँख झपकी ही थी के
रात गई ।
नहीं मिलता
मिज़ाजे-दिल हमसे,
ग़ालिबन दूर तक ये
बात गई ।
क़ैदे-हस्ती से कब
नजात
‘जिगर’
मौत आई अगर हयात गई
।
-जिगर मुरादाबादी
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सोजे-ग़म देके उसने
ये इर्शाद किया ।
जा तुझे
कश्मकशे-दहर से आज़ाद किया ।।
वो करें भी तो किन
अल्फ़ाज में तिरा शिकवा,
जिनको तिरी
निगाहे-लुत्फ़ ने बर्बाद किया ।
दिल की चोटों ने
कभी चैन से रहने न दिया,
जब चली सर्द हवा
मैंने तुझे याद किया ।
इसका रोना नहीं
क्यों तुमने किया दिल बर्बाद,
इसका ग़म है कि
बहुत देर में बर्बाद किया ।
मुझको तो होश नहीं
तुमको ख़बर हो शायद,
लोग कहते हैं कि
तुमने मुझे बरबाद किया ।
-‘जोश’
मलीहाबादी
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निगाहें नाज़ ने
पर्दे उठाए हैं क्या-क्या ।
हिजाब अहले मुहब्बत
को आए हैं क्या-क्या ।।
जहाँ में थी बस इक
अफ़वाह तेरे जलवों की,
चराग़े दैरो-हरम
झिलमिलाए है क्या-क्या ।
कहीं चराग़, कहीं
गुल, कहीं दिल बरबाद,
ख़ेरामें नाज़ ने
कितने उठाए हैं क्या-क्या ।
पयामें हुस्न,
पयामे जुनूँ, पयामें फ़ना,
तेरी निगाह ने
फसाने सुनाए हैं क्या-क्या ।
‘फिराक़’
राहे वफ़ा
में सबक रवी तेरी,
बड़े बड़ों के क़दम
डगमगाए हैं क्या-क्या ।
-रघुपति सहाय
‘फिराक़’
गोरखपुरी
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भेद कुल खुल जाए वह
सूरत हमारे दिल में है ।
देश को मिल जाए जो
पूँजी तुम्हारी मिल में है ।।
हार होंगे हृदय के
खुलकर तभी गाने नये,
हाथ में आ जायेगा,
वह राज सो महफिल में है ।
तर्स है ये देर से
आँखे गड़ी श्रृंगार में,
और दिखलाई पड़ेगी
जो गुराई तिल में है ।
पेड़ टूटेंगे,
हिलेंगे, जोर से आँधी चली,
हाथ मत डालो, हटाओ
पैर, बिच्छू बिल में है ।
ताक पर है नमक
मिर्चा लोग बिगड़े या बनें,
सीख क्या होगी पराई
जब पसाई सिल में है ।
-सूर्यकांत
त्रिपाठी
‘निराला’ |