रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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अमीर खुसरो कबीर प्यारेलाल शोकी वली दकनी किशोरी लालमिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदामीर तक़ी मीर

ख़्वाजा मीर दर्द सैयद मोहम्मद मीर सोज नज़ीर अकबराबादीसैयद इंशा अल्ला खाँ इंशा

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जब यार देखा नैन भर दिल की गई चिंता उतर ।

ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाए कर ।।

 

जब आँख से ओझल भया, तड़पन लगा मेरा जिया

हक्का इलाही क्या किया, आँसू चले भर लाय कर ।

 

तू तो हमारा यार है, तुझ पर हमारा प्यार है

तुझ दोस्ती बिसियार है एक शब मिली तुम आय कर ।

 

जाना तलब तेरी करूँ दीगर तलब किसकी करूँ

तेरी जो चिंता दिल धरूँ, एक दिन मिलो तुम आय कर ।

 

मेरी जो मन तुम ने लिया, तुम उठा गम को दिया

तुमने मुझे ऐसा किया, जैसा पतंगा आग पर ।

 

खुसरो कहै बातों ग़ज़ब, दिल में न लावे कुछ अजब

कुदरत खुदा की है अजब, जब जिव दिया गुल लाय कर ।

                                                           अमीर खुसरो

 

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हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?

रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?

 

जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,

हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?

 

खलक सब नाम अनपे को, बहुत कर सिर पटकता है,

हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?

 

न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,

उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?

 

कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,

जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?

-कबीर

 

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जिन प्रेम रस चाखा नहीं, अमृत पिया तो क्या हुआ ।

जिन इश्क में सर ना दिया, सो जग जिया तो क्या हुआ

 

ताबीज औ तूमार में सारी उमर जाया किसी,

सीखे मगर हीले घने, मुल्ला हुआ तो क्या हुआ ।

 

जोगी न जंगम से बड़ा, रंग लाल कपड़े पहन के,

वाकिफ़ नहीं इस हाल से कपड़ रँगा तो क्या हुआ ।

 

जिउ में नहीं पी का दरद, बैठा मशायख होय कर,

मन का रहत फिरता नहीं सुमिरन किया तो क्या हुआ ।

 

जब इश्क के दरियाव में, होता नहीं गरकाब ते,

गंगा, बनारस, द्वारका पनघट फिरा तो क्या हुआ ।

 

मारम जगत को छोड़कर, दिल तन से ते खिलवत पकड़,

शोकी पियारेलाल बिन, सबसे मिला तो क्या हुआ ।

-प्यारेलाल शोकी

 

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जिसे इश्क़ का तीरे कारी लगे ।

उसे ज़िंदगी क्यों न भारी लगे ।।

 

वली जब कहे तू अगर यक वचन,

रक़ीबाँ के दिल पे कटारी लगे ।

 

न होगा उस जग में हरगिज़ क़रार,

जिसे इश्क़ की बेकरारी लगे ।

-वली दकनी

 

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अदा से देख लो दिलबर, यह फसल बहारी है ।

लगे दिल किस तरह अब तो निहायत बेकरारी है ।।

 

जरा सूरत दिखाने में तुमको शर्म आती है,

मुहब्बत इसको कहते हैं यही क्या शर्ते यारी है ।

 

कहें हम क्या जो दिल पे गुजरती है जुदाई में,

नहीं रोने से फुर्सत लबों पर आहें जारी हैं ।

 

दिलो जाँ दोनों ईमाँ देके हम कुर्वान हो बैठे,

एवज में बस अता हमको हुई यह इंतजारी है ।

 

उमड़ता है दिल तो सिर झुकाकर देख लेते हैं,

किशोरी लालके दिल पर खिंची तस्वीर प्यारी है ।

-किशोरी लाल

 

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टूटे तेरी निगाह से अगर दिल हबाब का ।

पानी भी फिर पिये तो मज़ा हो शराब का ।

 

दोज़ख मुझे कबुल है ऐ मुनकिरो नकीर,

लेकिन नहीं दिमाग सवालो जवाब का ।

 

याँ किसके दिल को कशमकशे इश्क का दिमाग

यारब बुरा हो दीदए खाना खराब का ।

 

सौदा निगाहे-दीदए-तहक़ीक के हुजूर,

जल्वा हर एक ज़र्रे में है आफ़ता का ।

-मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा

 

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हस्ती अपनी होबाब की सी है ।

ये नुमाइश सराब की सी है ।।

 

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए,

पंखुड़ी इस गुलाब की सी है ।

 

चश्मे दिल खोल इस भी आलम पर,

याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है ।

 

बार-बार उस के दर पे जाता हूँ,

हालत अब इज्तेराब की सी है ।

मैं जो बोला कहा के ये आवाज़,

उसी ख़ाना ख़राब की सी है ।

 

मीर उन नीम बाज़ आँखों में,

सारी मस्ती शराब की सी है ।

-मीर तक़ी मीर

 

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तुहमतें चन्द अपने जिम्मे धर चले ।

जिसलिए आये थे हम सो कर चले ।।

 

ज़िंदगी है या कोई तूफान है,

हम तो इस जीने के हाथों मर चले ।

 

शमअ के मानिंद हम इस बज़्म में,

चश्मे-नम छाये थे, दामन तर चले ।

 

साक़िया याँ लग रहा है चल-चलाव,

जब तलक बस चल सके साग़र चले ।

-ख़्वाजा मीर दर्द

 

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हुआ दिल को मैं कहता कहता दिवाना ।

पर उस बेख़बर ने कहा कुछ न माना ।।

 

मुझे तो तुम्हारी खुशी चाहिए है,

तुम्हे गो हो मंजूर मेरा बुढ़ाना ।

 

कहाँ ढूँढूँ है है कहाँ जाऊँ यारब,

कहीं जा का पता नहीं न ठिकाना ।

-सैयद मोहम्मद मीर सोज

 

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दूर से आये थे साक़ी सुनके मयखाने को हम ।

बस तरसते ही चले अफ़सोस पैमाने को हम ।।

 

मय भी है, मीना भी है, साग़र भी है साक़ी नहीं,

दिल में आता है लगा दें, आग मयखाने को हम ।

 

हमको फँसना था क़फ़स, क्या गिला सय्याद का,

बस तरसते ही रहे हैं, आब और दाने को हम ।

 

ताके अबरू में सनम के क्या ख़ुदाई रह गई,

अब तो पूजेंगे उसी काफ़िर के बुतखाने को हम ।

 

क्या हुई तक़्सीर हम से, तू बता दे ए नज़ीर

ताकि शादी-मर्ग समझें, ऐसे मर जाने को हम ।

-नज़ीर अकबराबादी

 

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यह जो महंत बैठे हैं राधा के कुण्ड पर ।

अवतार बन कर गिरते हैं परियों के झुण्ड पर ।।

 

शिव के गले से पार्वती जी लिपट गयीं,

क्या ही बहार आज है ब्रह्म के रुण्ड पर ।

 

राजीजी एक जोगी के चेले पे ग़श हैं आप,

आशिक़ हुए हैं वाह अजब लुण्ड मुण्ड पर ।

 

इंशा ने सुन के क़िस्सए-फरहाद यूँ कहा,

करता है इश्क़ चोट तो ऐसे ही मुण्ड पर ।

-सैयद इंशा अल्ला खाँ इंशा

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