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कितने अफसाने बनेंगे
मेरे अफसाने के बाद।
गर्दिशें ढूँढा करेंगी खा़क हो जाने के बाद।
आ
गये आँखों में आँसू जब्ते ग़म को क्या कहें
अपने रुदादे ग़में दौराँ को दोहराने के बाद।
मुन्तज़िर हैं हम कभी इस राह से लौटेंगे आप
एक
ज़माना जा चुका है आपके जाने के बाद।
साँस का क्या है कहीं एक पल में ही रुक जाएगी
ज़िंदगी रुसवा करेगी हमको याराने के बाद।
गर्क थे हम अपने फिक्रोफन में ही आठों पहर
लोग दीवाने हुए हैं हमको समझाने के बाद।
वलवले हैं हलचले हैं मशगले हैं रात दिन
ज़िंदगी मीठी लगे है पेट भर जाने के बाद
क्यूँ हिरासाँ है तु
‘मुश्फिक’
सर ज़मीने हिन्द में
ज़िंदगी पाए सुखनवर जान से जाने के बाद
-मुस्तफा
हुसैन
‘मुश्फिक’
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किसी के दुख दर्द में जब तू शामिल नहीं।
लगता है तुम्हारे पास मुकम्मल दिल नहीं।
जब
भी मौसम बदला, परिंदा आ के पूछा
क्यों उसे टूटा घरौंदा भी हासिल नहीं।
चिनगारी से घर उसका भी जल जायेगा
ये
उस सिरफिरे को समझाना मुश्किल नहीं।
देख लेना इक दिन वो कुछ कर दिखाएगा
दीखता कमजोर है पर वो बुज़दिल नहीं।
सच
कहूँ हैरान हूँ तो बस ये जानकर
वह
क़ाबिल तो है पर मुल्क के क़ाबिल नहीं।
-विजय रंजन
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किन सज़ाओं तक मुझे मेरी ख़ता ले जायेगी।
मुझको आखिर दूर तक कितनी वफा ले जायेगी।
मुझको अपने रास्ते का इल्म है अच्छी तरह
क्यों कहीं मुझको कोई पागल हवा ले जायेगी।
तमतमा उठ्ठेगा जब सूरज, तो पानी, दोस्तों
प्यास के मारों तलक काली घटा ले जायेगी।
मैं तो अपनी कोशिशों से जाऊँगा जंगल के पार
अपको उस पार क्या कोई दुआ ले जायेगी।
ज़िंदगी जब-जब भी आयेगी मेरी दहलीज़ पर
माँग कर मुझसे वो थोड़ा हौसला ले जायेगी।
‘नुर’
इस अल्हड़ पवन को इस तरह से साध तू
दूर तक दुनिया में वो तेरा कहा ले जायेगी।
-नूर मुहम्मद
‘नूर’
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कुछ तो कहिये कि सुने हम भी माजरा क्या है।
जीना दुश्वार तो मरने का आसरा क्या है।
लाखों तूफान आँधियों में जो महफूज रही
बता आये खाके वतन तेरा फलसफा क्या है।
न
कोई लब्ज न जुमला जुबाने दिल है वो
कोई हस्सास ही पूछे
‘वाहवा’
क्या है।
जिन्हें नजीर से निस्वत न है
‘राघव’
से लगाव
हमीं बतायें क्या उनको कि
‘आगरा’
क्या है।
चला जो गाँवों-जवारों से हुआ
‘वेगम’
का
हमीं बतायें क्या उनको कि दादरा क्या है ।
-नईम
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कुछ सुखे जलपान हमारी बस्ती में।
सुपली भर है धान हमारी बस्ती में।
हवा देखकर आज यहाँ शर्मिंदा है
टूटे छप्पर छान हमारी बस्ती में।
मूँह में राम बगल में छुरी जो रखते वे
पाते हैं सम्मान हमारी बस्ती में।
पुतले रोज जलाते लेकिन डरते भी
रावण से भगवान हमारी बस्ती में।
फैशन में गुमराह हुए थे बच्चे भी
मुँह में दाबे पान हमारी बस्ती में।
क्या क्या जुल्म न ढाये खादी वालों ने
सस्ती कितनी जान हमारी बस्ती में
सैर सपाटे को आये थे जो
‘प्रभात’
उनकी बड़ी दूकान हमारी बस्ती में
-रवीन्द्र प्रभात |