रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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  आलोक यादव  यश खन्ना नीर अनवर बिलासपुरी अदम गोंडवी दिनेश जुगरान

 ●   मुस्तफा हुसैन मुश्फिक विजय रंजन नूर मुहम्मद नूर’   ●  नईम रवीन्द्र प्रभात

 

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कभी बने सुकरात कभी हम बने अमर खैय्याम।

लेकिन बुझी न प्यास हो गई उम्र तमाम।

 

लोकतंत्र क्या? राजतन्त्र क्या? क्या तानाशाही?

परिभाषाएँ बदल गयीं बस शेष रह गये नाम।

 

पश्चिम से आए कुहरे ने ऐसा जाल रचा

सभी घिर गए अँधियारे में जितने थे आयाम।

 

करता रहा समीक्षा प्यासा मन निज किस्मत की

पीना पड़ा प्रदूषण बेबस न बरसे घनश्याम।

 

पहले हम थे बिखरे-बिखरे शून्य-पूर्ण अम्बर

अब दुबके बैठे हैं चिपकाए अनगिन उपनाम।

                     -आलोक यादव

 

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कहो न धूप से कुछ, सायबाँ तलाश को ।

पराया दैश है इस हमजुबाँ तलाश करो ।।

 

नहीं ये दश्त कि क़ानून लापता होगा-

कली ही चाहिए तो बागवाँ तलाश करो ।

 

कहाँ है वक़्त छतों को नसीब हों खंभे-

अभी से अपने लिए आसमाँ तलाश करो ।

 

बिके हैं हाथ, उठे हैं किराए के पत्थर-

जुदा हो शीशों से ऐसा मकाँ तलाश करो ।।

 

तुम अपने दर्द को तूफ़ा बनाए बैठे हो-

उठो, जहाँ में कोई शादमाँ तलाश करो ।

 

जिसे भी देखिए बर क़त्ल पर उतारू है-

तो ज़िंदगी के निशाँ अब कहाँ तलाश करो।

 

खुदा को भी न मिली नीर दौलते-तस्कीं-

जहाँ खुदा न गया हो वहाँ तलाश करो।

-यश खन्ना नीर

 

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कामज़र्फों से मत माँगो दिल है उनका छोटा सा।

जितने ऊँचे पेड़ मिलेंगे होगा साया छोटा सा।

 

नीलगगन में उड़ने वालो भूल न जाना याद रहे

तुम को इक दिन तय करना है कब्र का रस्ता छोटा सा।

 

इक बच्चा अपने बाप को अक्सर खत में लिखता रहता है

तुम आ जाओ चाहे न लाओ एक खिलौना छोटा सा।

 

चाहे जितना दूध पिलाओ चाहे जितना प्यार करो

होके बड़ा ये काट ही लेगा साँप का बच्चा छोटा सा।

 

नए दौर के नए नए वक्त में ये तालीम का जादू है

खेल रहा है बारूदों से गाँव का बच्चा बच्चा छोटा सा।

-अनवर बिलासपुरी

 

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काजू भुनी प्लेट में ह्विस्की गिलास में।

उतरा है रामराज विधायक निवास में।

 

पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत

इतना असर है खादी के उजले लिबास में।

 

आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह

जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में।

 

पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें

संसद बदल गयी है यहाँ की नखास में।

 

जनता के पास एक ही चारा है बगावत

यह बात कह रहा हूँ मैं होशोहवास में ।

-अदम गोंडवी

 

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कि उसके होंठ न कुछ भी जुबानी कहते हैं।

पीठ के जख़्म मगर एक कहानी कहते हैं ।

 

मैं सोचता हूँ, इस शहर में हुए मातम पर,

यहाँ भी दोस्ती को मेहरबानी कहते हैं।

 

ये उनका हुक्म था-बाज़ार आज बंद रखें,

हमारी बेबसी को ना-फ़रमानी कहते हैं।

 

समझ रहे हैं जो क़ानून को फ़क़त जेवर,

हमारे ख़्वाब को वे आसमानी कहते हैं।

-दिनेश जुगरान

 

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कितने अफसाने बनेंगे मेरे अफसाने के बाद।

गर्दिशें ढूँढा करेंगी खा़क हो जाने के बाद।

 

आ गये आँखों में आँसू जब्ते ग़म को क्या कहें

अपने रुदादे ग़में दौराँ को दोहराने के बाद।

 

मुन्तज़िर हैं हम कभी इस राह से लौटेंगे आप

एक ज़माना जा चुका है आपके जाने के बाद।

 

साँस का क्या है कहीं एक पल में ही रुक जाएगी

ज़िंदगी रुसवा करेगी हमको याराने के बाद।

 

गर्क थे हम अपने फिक्रोफन में ही आठों पहर

लोग दीवाने हुए हैं हमको समझाने के बाद।

 

वलवले हैं हलचले हैं मशगले हैं रात दिन

ज़िंदगी मीठी लगे है पेट भर जाने के बाद

 

क्यूँ हिरासाँ है तु मुश्फिक सर ज़मीने हिन्द में

ज़िंदगी पाए सुखनवर जान से जाने के बाद

 -मुस्तफा हुसैन मुश्फिक

 

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किसी के दुख दर्द में जब तू शामिल नहीं।

लगता है तुम्हारे पास मुकम्मल दिल नहीं।

 

जब भी मौसम बदला, परिंदा आ के पूछा

क्यों उसे टूटा घरौंदा भी हासिल नहीं।

 

चिनगारी से घर उसका भी जल जायेगा

ये उस सिरफिरे को समझाना मुश्किल नहीं।

 

देख लेना इक दिन वो कुछ कर दिखाएगा

दीखता कमजोर है पर वो बुज़दिल नहीं।

 

सच कहूँ हैरान हूँ तो बस ये जानकर

वह क़ाबिल तो है पर मुल्क के क़ाबिल नहीं।

-विजय रंजन

 

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किन सज़ाओं तक मुझे मेरी ख़ता ले जायेगी।

मुझको आखिर दूर तक कितनी वफा ले जायेगी।

 

मुझको अपने रास्ते का इल्म है अच्छी तरह

क्यों कहीं मुझको कोई पागल हवा ले जायेगी।

 

तमतमा उठ्ठेगा जब सूरज, तो पानी, दोस्तों

प्यास के मारों तलक काली घटा ले जायेगी।

 

मैं तो अपनी कोशिशों से जाऊँगा जंगल के पार

अपको उस पार क्या कोई दुआ ले जायेगी।

 

ज़िंदगी जब-जब भी आयेगी मेरी दहलीज़ पर

माँग कर मुझसे वो थोड़ा हौसला ले जायेगी।

 

नुर इस अल्हड़ पवन को इस तरह से साध तू

दूर तक दुनिया में वो तेरा कहा ले जायेगी।

-नूर मुहम्मद नूर

 

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कुछ तो कहिये कि सुने हम भी माजरा क्या है।

जीना दुश्वार तो मरने का आसरा क्या है।

 

लाखों तूफान आँधियों में जो महफूज रही

बता आये खाके वतन तेरा फलसफा क्या है।

 

न कोई लब्ज न जुमला जुबाने दिल है वो

कोई हस्सास ही पूछे वाहवा क्या है।

 

जिन्हें नजीर से निस्वत न है राघव से लगाव

हमीं बतायें क्या उनको किआगरा क्या है।

 

चला जो गाँवों-जवारों से हुआवेगम का

हमीं बतायें क्या उनको कि दादरा क्या है ।

-नईम

 

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कुछ सुखे जलपान हमारी बस्ती में।

सुपली भर है धान हमारी बस्ती में।

 

हवा देखकर आज यहाँ शर्मिंदा है

टूटे छप्पर छान हमारी बस्ती में।

 

मूँह में राम बगल में छुरी जो रखते वे

पाते हैं सम्मान हमारी बस्ती में।

 

पुतले रोज जलाते लेकिन डरते भी

रावण से भगवान हमारी बस्ती में।

 

फैशन में गुमराह हुए थे बच्चे भी

मुँह में दाबे पान हमारी बस्ती में।

 

क्या क्या जुल्म न ढाये खादी वालों ने

सस्ती कितनी जान हमारी बस्ती में

 

सैर सपाटे को आये थे जो प्रभात

उनकी बड़ी दूकान हमारी बस्ती में

-रवीन्द्र प्रभात

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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