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और एक हुस्ने
दास्तां रख दो ।
उनकी मुटठी में
कहकशां रख दो।
बाद में बेटियाँ
बियाहोगे
पहले गिरवी
हवेलियाँ रख दो।
आज
फिर रावनों की बस्ती में
राम की मीठी बानियाँ रख दो।
फूल किसके लिए सजाओगे
मेज़ पर सुखी पत्तियाँ रख दो।
जिंदगी क्या है जान जाओगे
रेत पर लाके मछलियाँ रख दो।
हक्क़ो इंसाफ चाहते हो अगर
‘नेकि
खंजर पे जिस्मों जां रख दो’।
लिख रहा हूँ हकीकतें
‘गौहर’
काट कर मेरी उँगलियाँ रख दो।
-गौहर शेखपूरवी
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कल
सुबह की शक्ल बेहतरीन होगी, दोस्तों
!
प्रेमिका-सी वह सुबह हसीन होगी, दोस्तों
!
सुर्ख और गर्म चौंच की गरम चहक-सी वह,-
सुर्ख, नर्म, गर्म औ, नवीन होगी, दोस्तों
!
आज
रस्सियों पे पाँव भी पड़े तो डर लगे,
कल
मगर हमारे पास बीन होगी, दोस्तों
!
धूप की कमीज़ होगी, धुप में धुली हुई,
साँप से भी दूर आस्तीन होगी, दोस्तों
!
खिड़कियों से आसमाँ भी आएगा नज़र हमें,
कल
हमारे पास भी ज़मीन होगी, दोस्तों
!
-जीवन यदु
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कहीं भी कूजन नहीं, गर्जन नहीं घनघोर वन में,
कहीं वनपाखी नहीं, पशु-धन
नहीं घनघोर वन में।
पेड़-पौधों, लता-गुल्मों, पान-फूलों के, फलों के,
इन
दिनों होते कहीं दर्शन नहीं घनघोर वन में।
सुरक्षित हैं कन्दराएँ और अजगर सुरक्षित हैं,
शेष कोई सुरक्षित-जीवन नहीं घनघोर वन में।
दृष्टि में वनवास, वनवासी, सभी देते दिखाई,
किन्तु देखो तो कहीं भी वन नहीं घनघोर वन में।
-लाला जगदलपुरी
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कल
तेरे न आने से जो मायूस हुआ हूँ ।
उम्मीद का सूरज लिए फिर आज बैठा हूँ ।
कहने को तो यूँ धूप की तेजी से बचा हूँ
गिरती हुई दीवार के साए में खड़ा हूँ ।
तू
ही इसे ले जाके सरेताक़ सजा दे
चौराहे पे रक्खा हुआ नन्हा सा दिया हूँ।
अपने से जुदा किसलिए तू करता है मुझको
ए
दोस्त मेरे मैं तो तेरा बन्देक़बा हूँ।
मुश्किल है मिलन, चाँद है वो शब का उगेगा
मैं शाम के सूरज की तरह डूब रहा हूँ ।
उसने मुझे फिर नज्म में बुलवाया है
‘काविश’
जाऊँ के न जाऊँ मैं अभी सोच रहा हूँ ।
-कविश हैदरी
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कभी सोचा था हमने ज़िंदगी कितनी हसीं होगी।
किसे मालूम था हर जान मुश्किल में फँसी होगी।।
हमारे पूर्व में हरदम यही तो रीति है प्यारे-
दिवाली तेरे घर होगी तो मेरे घर खुशी होगी।
कि
अपने देश की ही नाव में मत छेद कर साथी-
नदी में तैरती झुग्गी तुम्हारी भी कहीं होगी।
ठिठुरती सर्दियों में सिहर करके मरने से पहले-
बरफ की सिल्लियाँ मासूम को कैसी चुभी होंगी।
नदी, तालाब में डूबेंगे ये लाखों सफेद हाथी-
अगर थोड़ी हया भी पास में उनके बची होगी।
लगे हैं झूमने क्यों फूल बतियाकर इशारों
में-
करौंदे बीनती वह भीलनी फिर हँस पड़ी होगी।।
सबेरे की प्रतीक्षा कर न हो बेचैन ऐ
‘तन्मय’
तेरी अरदास मालिक तक अभी पहुँची नही होगी।।
-प्रवीण
‘तन्मय’
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