रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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  रामविनय सिंह  विनोद भृंग सुल्तान अहमद रऊफ परवेज़ शिव नारायण शिव

 ●  गौहर शेखपूरवी जीवन यदु लाला जगदलपुरी ●  कविश हैदरी प्रवीण तन्मय

 

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उठने लगी है आग बर्फीली ज़मीन से।

क्या क्या हुई है बात ये पूछो अमीन से।

 

सारे शहर में हादसों के अश्क पोंछते

पकड़े गए वो लोग जो लगते कुलीन से ।

 

कल तक चुकायीं कीमतें जिस शख़्स की यहाँ

सोचे नहीं कभी कि ये होंगे कमीन से।

 

दिखते नहीं कोयल, कहीं बुलबुल मधुर खंजन

परदे के इश्तहार ही लगते हसीन से।

 

कैसी ये सियासत है कुछ बयाँ न पूछिए

हालात पूछती है ये पर्दानसीन से।

-रामविनय सिंह

 

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उलझनों में रही या दिवानी रही।

ज़िंदगानी भी क्या ज़िन्दगानी रही।

 

जिसने आकर किनारों पे तोड़ा है दम

याद, बस उस नदी की रवानी रही।

 

जब लिखी तो लिखी, ना लिखी, ना लिखी

यूँ ही आधी-अधूरी कहानी रही।

 

वह रुके तक नहीं मेरे इसरार पर

क्या पता, क्या उन्हें बदगुमानी रही।

 

सुन के मेरी ग़ज़ल वो फक़त चुप रहे

उनकी हम पर यही मेहरबानी रही।

 

वो जो आये तो मौसम बहकने लगा

छूके उनको हवा ज़ाफरानी रही।

              -विनोद भृंग

 

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उनका जादू कहीं जो चल जाये।

बात मुद्दे की फिर से टल जाये।

 

इतनी रफ़्तार है ज़माने में

पाँव कैसे कोई संभल जाये।

 

दुःख जो देखे हमारी बस्ती के

दिल समन्दर का भी दहल जाये।

 

जिनसे जुड़ना था जुड़ नहीं पाये

उम्र यूँ ही कहीं न ढल जाये।

 

फिर से कोशिश करें चलो मिलकर

अब के शायद जहाँ बदल जाये।

 

मैं तो जाऊँगा सिर्फ़ मौत तलक

उससे आगे मेरी ग़ज़ल जाये।

              -सुल्तान अहमद

 

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एक तूफान उमड़ता हुआ भीतर क्यों है ।

एक सैलाब सा बढ़ता हुआ लश्कर क्यों है।

 

एक धनवान को हर चीज़ मयस्सर क्यों है

तंगदस्ती ही ग़रीबों का मुक़द्दर क्यों है।

 

एक एहसास कुरेदे है ज़ेहन को मेरे

चलती फिरती हुई लाशों का ये मन्ज़र क्यों है।

 

क्यों सियह रात के चेहरे पे है सकता तारी

लपलपाता हुआ हर हाथ में खंज़र क्यों है।

 

ऐसा दहशतज़दा माहोल मसल डालेगा

ऐहवा इन दिनों तू इतनी सितमगर क्यों है।

 

सर पटकती हुई हर मौज को शिकवा तुझसे

बेरुखी ऐसी बता तुझ में समुन्दर क्यों है।

 

दिलजले से तो मुनासिब नहीं पूछो परवेज़

दिल सुलगता हुआ क्यों हाथ में पत्थर क्यों है।

-रऊफ परवेज़

 

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एक दो पल ही जो मिले मुस्कुराने के लिए ।

छोड़ देंगे उम्र सारी हम ज़माने के लिए ।

 

गाँव का मुखिया अनुज के नाम पट्टा कर दिया

जो ज़मीं थी बेघरों को घर बनाने के लिए ।

 

फूस की ही झोपड़ी हो, हो मगर सबके लिये

कुछ न कुछ तो चाहिए ही सर छुपाने के लिए।

 

आइए मिल के बुझा दें द्वेष की चिनगारियाँ

एहतियातन है जरूरी आशियाने के लिए ।

 

यार पहली शर्त तनहा ज़िंदगी की मत लगा

कल तुम्हें रह जायेगा क्या अज़माने के लिए।

 

याह पहली शर्त तनहा ज़िंदगी की मत लगा

कल तुम्हें रह जायेंगा क्या आज़माने के लिए ।

 

आज दिल का बोझ तो अपना समझ के बांट लें

कल मिलें भी क्या पता गजलें सुनाने के लिए ।

              -शिव नारायण शिव

 

 

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और एक हुस्ने दास्तां रख दो ।

उनकी मुटठी में कहकशां रख दो।

 

बाद में बेटियाँ बियाहोगे

पहले गिरवी हवेलियाँ रख दो।

 

आज फिर रावनों की बस्ती में

राम की मीठी बानियाँ रख दो।

 

फूल किसके लिए सजाओगे

मेज़ पर सुखी पत्तियाँ रख दो।

 

जिंदगी क्या है जान जाओगे

रेत पर लाके मछलियाँ रख दो।

 

हक्क़ो इंसाफ चाहते हो अगर

नेकि खंजर पे जिस्मों जां रख दो

 

लिख रहा हूँ हकीकतें गौहर

काट कर मेरी उँगलियाँ रख दो।

-गौहर शेखपूरवी

 

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कल सुबह की शक्ल बेहतरीन होगी, दोस्तों !

प्रेमिका-सी वह सुबह हसीन होगी, दोस्तों !

 

सुर्ख और गर्म चौंच की गरम चहक-सी वह,-

सुर्ख, नर्म, गर्म औ, नवीन होगी, दोस्तों !

 

आज रस्सियों पे पाँव भी पड़े तो डर लगे,

कल मगर हमारे पास बीन होगी, दोस्तों  !

 

धूप की कमीज़ होगी, धुप में धुली हुई,

साँप से भी दूर आस्तीन होगी, दोस्तों !

 

खिड़कियों से आसमाँ भी आएगा नज़र हमें,

कल हमारे पास भी ज़मीन होगी, दोस्तों !

-जीवन यदु

 

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कहीं भी कूजन नहीं, गर्जन नहीं घनघोर वन में,

कहीं वनपाखी नहीं, पशु-धन नहीं घनघोर वन में।

 

पेड़-पौधों, लता-गुल्मों, पान-फूलों के, फलों के,

इन दिनों होते कहीं दर्शन नहीं घनघोर वन में।

 

सुरक्षित हैं कन्दराएँ और अजगर सुरक्षित हैं,

शेष कोई सुरक्षित-जीवन नहीं घनघोर वन में।

 

दृष्टि में वनवास, वनवासी, सभी देते दिखाई,

किन्तु देखो तो कहीं भी वन नहीं घनघोर वन में।

-लाला जगदलपुरी

 

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कल तेरे न आने से जो मायूस हुआ हूँ ।

उम्मीद का सूरज लिए फिर आज बैठा हूँ ।

 

कहने को तो यूँ धूप की तेजी से बचा हूँ

गिरती हुई दीवार के साए में खड़ा हूँ ।

 

तू ही इसे ले जाके सरेताक़ सजा दे

चौराहे पे रक्खा हुआ नन्हा सा दिया हूँ।

 

अपने से जुदा किसलिए तू करता है मुझको

ए दोस्त मेरे मैं तो तेरा बन्देक़बा हूँ।

 

मुश्किल है मिलन, चाँद है वो शब का उगेगा

मैं शाम के सूरज की तरह डूब रहा हूँ ।

 

उसने मुझे फिर नज्म में बुलवाया है काविश

जाऊँ के न जाऊँ मैं अभी सोच रहा हूँ ।

-कविश हैदरी

 

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कभी सोचा था हमने ज़िंदगी कितनी हसीं होगी।

किसे मालूम था हर जान मुश्किल में फँसी होगी।।

 

हमारे पूर्व में हरदम यही तो रीति है प्यारे-

दिवाली तेरे घर होगी तो मेरे घर खुशी होगी।

 

कि अपने देश की ही नाव में मत छेद कर साथी-

नदी में तैरती झुग्गी तुम्हारी भी कहीं होगी।

 

ठिठुरती सर्दियों में सिहर करके मरने से पहले-

बरफ की सिल्लियाँ मासूम को कैसी चुभी होंगी।

 

नदी, तालाब में डूबेंगे ये लाखों सफेद हाथी-

अगर थोड़ी हया भी पास में उनके बची होगी।

 

लगे हैं झूमने क्यों फूल बतियाकर इशारों में-

करौंदे बीनती वह भीलनी फिर हँस पड़ी होगी।।

 

सबेरे की प्रतीक्षा कर न हो बेचैन ऐ तन्मय

तेरी अरदास मालिक तक अभी पहुँची नही होगी।।

-प्रवीण तन्मय

 

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