रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

डॉ.कुँवर बेचैन गोपाल दास नीरज घनश्याम द्विजेंद्र द्विज परमानन्द अश्रुज ज्ञानेन्द्र साज

 ● ज्ञानवती सक्सेना माहेश्वर तिवारी रामकुमार गुप्त ●  मयंक श्रीवास्तव

 000 

अब आग के लिबास को ज्यादा न दाबिए।

सुलगी हुई कपास को ज्यादा न दाविए।

 

ऐसा न हो कि उँगलियाँ घायल पड़ी मिलें

चटके हुए गिलास को ज्यादा न दाबिए।

 

चुभकर कहीं बना ही न दे घाव पाँव में

पैरों तले की घास को ज्यादा न दाबिए।

 

मुमकिन है खून आपके दामन पे जा लगे

ज़ख़्मों के आस पास यों ज्यादा न दाबिए।

 

पीने लगे न खून भी आँसू के साथ-साथ

यों आदमी की प्यास को ज्यादा न दाबिए।

                           -डॉ.कुँवर बेचैन

 

 000 

ब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।

जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।

 

जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर

फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।

 

आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी

कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए।

 

प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए

हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।

 

मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा

मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।

 

जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे

मेरा आँसु तेरी पलकों से उठाया जाए।

 

गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी

ऐसे माहौल में नीरज को बालाया जाए।

-गोपाल दास नीरज

 

 000 

अलग तुमसे नहीं मेरी कथा है।

तुम्हारी ही व्यथा मेरी व्यथा है।

 

ये गूँगे और बहरों का शहर है

किसी से कुछ यहाँ कहना वृथा है।

 

हताहत सभ्यताएँ हो रही हैं

हुआ पौरुष पराजित सर्वथा है।

 

तुम्हीं से ज़िंदगी में रोशनी है

चतुर्दिक कालिमा ही अन्यथा है।

 

समय का दोष है या आदमी का

सदा ऐसे सवालों ने मथा है।

       -घनश्याम

 

 000 

अब खून के हैं यारों! मंज़र गली-गली में।

जाकर ये किसने बाँटे खंज़र गली-गली में।

 

यह कौन दे रहा है पहरा गली-गली में

बस मौत नाचती है सर पर गली-गली में।

 

ये अम्न के फ़रिश्ते कैसा पयाम लाए

इक ख़ौफ़ बर गया है घर-घर गली-गली में।

 

मधुमास तो तुम्हारे महलों का हो लिया है

डाले हुए हैं डेरा पतझर, गली-गली में।

 

खेतों में जबसे तुमने हथियार बो दिए हैं

बेकार घूमते हैं हलधर, गली-गली में।

 

हम शेर कह रहे हैं उस शोर के मुक़ाबिल

तुम जिसको बाँटते हो अक़्सर गली-गली में।

                     -द्विजेंद्र द्विज

 

 000 

अब अँधेरी घाटियों को पाट संसद ।

जुल्म की काली घटा को काट सँसद ।

 

यूँ नियम तो थे सभी के वास्ते

हो रही फिर क्यूँ ये बंदर-बाँट संसद।

 

धूप, पानी, रोटियाँ-सब कैद हैं

कर रहे जयघोष फिर भी भाट-संसद।

 

वे जो जंगल सभ्यता के हैं प्रतीक

क्यूँ नहीं देती तू उनको छाँट संसद।

 

 

एक दूजे के लिए गणतन्त्र है तो

अब जो देना है सभी में बाँट-संसद।

 

मुँह पे जिसके लग गया आदम का खूँ

ले तू उसको ही समूचा चाट-संसद।

 

यूँ ही तक़दीरें सँवर जायेंगी अश्रुज

हैं तेरे अंधकार भी विराट संसद।

-परमानन्द अश्रुज

 

 000 

अटकी है कोई फांस सी इस दिल के आस पास ।

कितनी खलिश है इस दिले बिस्मिल के आस पास ।

 

हमसे सफर हयात का मस्ती में कट गया

तकदीर से भटके भी तो मंजिल के आस पास ।

 

हम बिना बुलाए थे मगर इस दिल को क्या कहें

भटका दिया जो यार की महफिल के आस पास।

 

ये दिल है या कमाल कहीं भी लगे नहीं

मरने के लिए घूमता कातिल के आस पास ।

 

करती मुहब्बतों की भंवर में फंसी न साज

अफसोस ये है कि डूबी है साहिल के आस पास ।

              -ज्ञानेन्द्र साज

 

000 

आ गई आराधना अनुराग से आसक्ति तक ।

गीत सीमित हो गए उठकर सभा से व्यक्ति तक ।

 

हर नियम क्रम से लिखूँ ये देह है कागज नहीं

और भी कुछ चाहिए अब साधना से मुक्ति तक ।

 

उम्र भर के व्याकरण का मूल्य मुझको क्या मिला

द्वेष सा रखने लगी है छन्द से लघु पंक्ति तक ।

 

स्वप्न का देखा समर्पण जागरण का योग भी

प्यास के पर्याय ही हैं वासना से भक्ति तक ।

 

साँझ से बैठो अगर तुम भोर तक तो कुछ कहूँ

बात अब आ ही गई अनुभूति से अभिव्यक्ति तक ।

-ज्ञानवती सक्सेना

 

 000 

आज दिन लोगों के पारे की तरह ईमान हैं ।

दर हक़ीक़त लोग वे ही देश के भगवान हैं ।

 

यह बनाया जायेगा अब देवताओं का नगर

और मारे जायेंगे वे लोग जो इंसान हैं।

 

जिनका लेखन एक गाली है ग़रीबों के लिए

वे सुखनवर ऊँची-ऊँची महफ़िलों की शान हैं ।

 

है कहीं संगीन का पहरा, कहीं चाकू का डर

हम घरों में क़ैद या लूटे गये सामान हैं।

-माहेश्वर तिवारी

 

000 

आज का इंसान बौना हो गया है ।

वक्त के हाथों खिलौना हो गया है।

 

रूठ कर मौसम इशारे कर रहा है

आसमां तेरा बिछौना हो गया है।

 

क्या करें हम रंगशालाओं में जाकर

चित्र जब अपना घिनौना हो गया है।

 

रात को चमका था जो माथे पे कुंकुम

भाल का उनके दिठौना हो गया है ।

 

अब करें उन हसरतों की बात ही क्या

कल इसी अर्थी का गौना हो गया है।

-रामकुमार गुप्त

 

 000 

आज जो हस्ती खबर में है

रह रही मेरे शहर में है ।

 

कत्ल का इल्ज़ाम है जिस पर

व्यक्ति सत्ता के शिखर में है ।

 

उम्र भर खोज, नहीं पाया

प्यार जाने किस डगर में है ।

 

ढूँढते हो तुम कहाँ रब को

देखिए मेरे जिगर में है ।

 

शेख से व्याही अमीना बी

फर्क चार गुना उमर में है ।

 

प्यार ही अंधा नहीं होता

धर्म भी अंधे सफर में है ।

 

तृप्ति रहती कुछ घरों में ही

भूख हिन्दुस्तान भर में है ।

             -मयंक श्रीवास्तव

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com