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अब आग के लिबास
को ज्यादा न दाबिए।
सुलगी हुई कपास
को ज्यादा न दाविए।
ऐसा न हो कि
उँगलियाँ घायल पड़ी मिलें
चटके हुए गिलास
को ज्यादा न दाबिए।
चुभकर कहीं बना
ही न दे घाव पाँव में
पैरों तले की
घास को ज्यादा न दाबिए।
मुमकिन है खून
आपके दामन पे जा लगे
ज़ख़्मों के आस
पास यों ज्यादा न दाबिए।
पीने लगे न खून
भी आँसू के साथ-साथ
यों आदमी की
प्यास को ज्यादा न दाबिए।
-डॉ.कुँवर बेचैन
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अब तो मज़हब
कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान
को इंसान बनाया जाए।
जिसकी ख़ुशबू
से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म
का हर सिम्त खिलाया जाए।
आग बहती है
यहाँ गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहाँ
जाके नहाया जाए।
प्यार का ख़ून
हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अँधेरे को
उजाले में बुलाया जाए।
मेरे दुख-दर्द
का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो
तुझसे भी न खाया जाए।
जिस्म दो होके
भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसु तेरी
पलकों से उठाया जाए।
गीत उन्मन है,
ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी
ऐसे माहौल में
‘नीरज’
को बालाया जाए।
-गोपाल दास नीरज
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अलग तुमसे नहीं
मेरी कथा है।
तुम्हारी ही
व्यथा मेरी व्यथा है।
ये गूँगे और
बहरों का शहर है
किसी से कुछ
यहाँ कहना वृथा है।
हताहत सभ्यताएँ
हो रही हैं
हुआ पौरुष
पराजित सर्वथा है।
तुम्हीं से
ज़िंदगी में रोशनी है
चतुर्दिक
कालिमा ही अन्यथा है।
समय का दोष है
या आदमी का
सदा ऐसे
सवालों
ने मथा है।
-घनश्याम
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अब खून के हैं यारों!
मंज़र गली-गली में।
जाकर ये किसने बाँटे खंज़र गली-गली में।
यह कौन दे रहा है पहरा गली-गली में
बस मौत नाचती है सर पर गली-गली में।
ये अम्न के फ़रिश्ते कैसा पयाम लाए
इक ख़ौफ़ बर गया है घर-घर गली-गली में।
मधुमास तो तुम्हारे महलों का हो लिया है
डाले हुए हैं डेरा पतझर, गली-गली में।
खेतों में जबसे तुमने हथियार बो दिए हैं
बेकार घूमते हैं हलधर, गली-गली में।
हम शेर कह रहे हैं उस शोर के मुक़ाबिल
तुम जिसको बाँटते हो अक़्सर गली-गली में।
-द्विजेंद्र
‘द्विज’
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अब अँधेरी घाटियों को पाट संसद ।
जुल्म की काली घटा को काट सँसद ।
यूँ नियम तो थे सभी के वास्ते
हो रही फिर क्यूँ ये बंदर-बाँट संसद।
धूप, पानी, रोटियाँ-सब कैद हैं
कर रहे जयघोष फिर भी भाट-संसद।
वे जो जंगल सभ्यता के हैं प्रतीक
क्यूँ नहीं देती तू उनको छाँट संसद।
एक दूजे के लिए गणतन्त्र है तो
अब जो देना है सभी में बाँट-संसद।
मुँह पे जिसके लग गया आदम का खूँ
ले तू उसको ही समूचा चाट-संसद।
यूँ ही तक़दीरें सँवर जायेंगी अश्रुज
हैं तेरे अंधकार भी विराट संसद।
-परमानन्द
‘अश्रुज’