रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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बालस्वरूप राही भवानी शंकर सरोज खान बातिश रामाराव वामनकरडॉ. रमा सिंह जगदीश श्रीवास्तव

  कृष्ण बक्षी संजय मासूम

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हम पर दुख का परबत टूटा तब हमने दो-चार कहे

उस पे भला क्या बीती होगी जिसने शेर हज़ार कहे

 

अपना अपना माल सजाए सब बाजार में आ बैठे

कोई इसे कहे मजबूरी कोई कारोबार कहे

 

लूटमार में सबका यारो एक बराबर हिस्सा है

कोई किसको चोर कहे तो किसको चौकीदार कहे

 

ढूँढ़ रहे हो गाँव गाँव में जाकर किस सच्चाई को

सच तो सिर्फ़ वही होती है जो दिल्ली दरबार कहे

 

जिनकी आँखों में गैरत थी वे कब के बेनूर हुए

उसकी खुद्दारी क्या देखें जो खुद को खुद्दार कहे

 

शेर वही है शेर जो राही लिखे खून या आँसू से

बाक़ी तो सब अल्लमग़ल्लम कहे मगर बेकार कहे ।

-बालस्वरूप राही

 

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दे रहे हैं कुएँ बयान यहाँ

और मुलज़िम है आसमान यहाँ

 

हाथ भर की ज़बान है उनकी

कल जो बैठे थे बेज़बान यहाँ

 

आदमी दिन ब दिन गिरा नीचे

और ऊपर उठे मकान यहाँ

 

कोई पंडित है, कोई मुल्ला है

लोग टुकड़ों में हैं महान यहाँ

 

धूप है, फूल है, किताबें हैं

हमने खोली है इक दुकान यहाँ ।

-भवानी शंकर

 

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यहाँ शीव मरा था जिसके घर अकाल होता है

इसी डिलहौजी में पश्चिमी बँगाल होता है

 

जो दे कर घूस मिल में नौकरी पायी ऐ भाई

खबर क्या पूछते हैं, उसमें अब हड़ताल होता है

 

पखेरू उड़ चलो ये, पेड़ भी दिल्ली से आया है

छुपा कर हर वक़्त इसकी पत्तियों में जाल होता है

 

हमारी खामुशी को बुज़दिली न जानिये साहब

ज़मीं की कोख में सोया हुआ भूचाल होता है

 

जहाँ विस्फोट हो हिरोशिमा होती है और धरती

यहाँ भी गैस रिसता है, वही भोपाल होता  है

 

वहाँ रावण मरा है आज भी यजीदियत बाक़ी

दशहरा और मुहरम तो यहाँ हर साल होता है

 

अमाँ सिद्धांतों को छोड़िए, कुछ कीजिये बातिश

उसूलों पे जो चला है, वही बदहाल होता है।

-सरोज खान बातिश

 

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आइये हम सब इन्हीं हालात की बातें करें

शहर की, कस्बें की, देहात की बातें करें

 

दिल के किसी कोने में ग़र वतन परस्ती की

बाक़ी है तमन्ना तो इसी जज़्बात की बातें करें

 

मुफलिसी और अमीरी पर हो चुकी चर्चा

आदमी क्या है उसकी औकात की बातें करें

 

कौन जीता, कौन मरता, कौन भूखा सोता है

उन्हें क्या, वे तो बस इन्तखाबात की बातें करें

 

दिल भी है दर्द भी, ग़म भी है और आँसू भी

छोड़िए जाने भी दें मुलाकात की बातें करें

-रामाराव वामनकर

 

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जब से उसने माँग में मेरी भरा सिंदूर है

बस, तभी से वो गगन और ये धरा सिंदूर है

 

पंक्तियाँ सब गीत की प्रिय हैं सुहागिन बेटियाँ

शीर्षक बेदी है और हर अंतरा सिंदूर है

 

माँग में फिर क्यों न ये खिलता गुलाबों की तरह

ये कोई खोटा नहीं है ये खरा सिंदूर है

 

हम जिसे कहते रहे अब तक सुबह की लालिमा

वो त उसके सुर्ख होठों से भरा सिंदूर है

 

बात कुछ तो है जिसे अब सोच कर कहती हूँ मैं

लाल है कलियाँ में, पत्ती में हरा सिंदूर है।

-डॉ. रमा सिंह

 

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दोस्ती के आवरण छलने लगे हैं

छाँव में  भी पाँव अब जलने लगे हैं

 

वक़्त की दहलीज़ पर ठहरे हुए हम

आँख में सूरज कई ढलने लगे हैं

 

छू लिया सूरज असर अब ये हुआ है

ग्लेशियर से हाथ अब कलने लगे हैं

 

आदमी हिस्सों में बँट कर रह गया है

गाँव खुशियों के भी अब जलने लगे हैं

 

हमको एहसानों का बदला यूँ मिला

नज़र से अब स्वप्न तक जलने लगे हैं

-जगदीश श्रीवास्तव

 

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पथरीले इलाकों में बोते रहे कचनारें

पेटों में खड़ी करके, हम भूख की मीनारें

 

बाज़ों की नज़र से वो, उड़कर के वहाँ पहुँचे

जहाँ खून से लथपथ थीं, रक्खी हुई तलवारें

 

कब जाके खड़ा होगा, ये पुख्ता मकाँ अपना

तामीर न हो पाई जिसकी अभी दीवारें

 

न छूट सके जिनसे, सत्ताओं के आकर्षण

ऐसी ही मिली शायद, इस मुल्क को सरकारें

-कृष्ण बक्षी

 

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भूख, बेकारी, घुटन, उपवास लिखना,

जब कभी इस दौर का इतिहास लिखना।

 

राजगद्दी सौंप देना फिर भरत को,

राम को इक बार फिर बनवास लिखना।

 

तृप्ति को अपने लिए रखना सुरक्षित,

मेरे अधरों के लिए बस, प्यास लिखना।

 

हम थे जिस युग में, वो युग अंधी गुफा था,

हर नफ़स थी इक नया संत्रास लिखना।

 

किस जगह दीखीं तुम्हें उत्सव की खुशियाँ

किस जगह दीखा तुम्हें उल्लास दिखना

-संजय मासूम

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