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हम पर दुख का
परबत टूटा तब हमने दो-चार कहे
उस पे भला क्या
बीती होगी जिसने शेर हज़ार कहे
अपना अपना माल
सजाए सब बाजार में आ बैठे
कोई इसे कहे
मजबूरी कोई कारोबार कहे
लूटमार में
सबका यारो एक बराबर हिस्सा है
कोई किसको चोर
कहे तो किसको चौकीदार कहे
ढूँढ़ रहे हो
गाँव गाँव में जाकर किस सच्चाई को
सच तो सिर्फ़
वही होती है जो दिल्ली दरबार कहे
जिनकी आँखों
में गैरत थी वे कब के बेनूर हुए
उसकी खुद्दारी
क्या देखें जो खुद को खुद्दार कहे
शेर वही है शेर
जो
‘राही’
लिखे खून या आँसू से
बाक़ी तो सब
अल्लम–ग़ल्लम
कहे मगर बेकार कहे ।
-बालस्वरूप राही
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दे रहे हैं
कुएँ बयान यहाँ
और मुलज़िम है
आसमान यहाँ
हाथ भर की
ज़बान है उनकी
कल जो बैठे थे
बेज़बान यहाँ
आदमी दिन
ब दिन
गिरा नीचे
और ऊपर उठे
मकान यहाँ
कोई पंडित है,
कोई मुल्ला है
लोग टुकड़ों
में हैं महान यहाँ
धूप है, फूल
है, किताबें हैं
हमने खोली है
इक दुकान यहाँ ।
-भवानी शंकर
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यहाँ
‘शीव’
मरा था जिसके घर अकाल होता है
इसी
‘डिलहौजी’
में पश्चिमी बँगाल होता है
जो दे कर घूस
मिल में नौकरी पायी ऐ भाई
खबर क्या पूछते
हैं, उसमें अब हड़ताल होता है
पखेरू उड़ चलो
ये, पेड़ भी दिल्ली से आया है
छुपा कर हर
वक़्त इसकी पत्तियों में जाल होता है
हमारी खामुशी
को बुज़दिली न जानिये साहब
ज़मीं की कोख
में सोया हुआ भूचाल होता है
जहाँ विस्फोट
हो हिरोशिमा होती है और धरती
यहाँ भी गैस
रिसता है, वही भोपाल होता है
वहाँ रावण मरा
है आज भी यजीदियत बाक़ी
दशहरा और मुहरम
तो यहाँ हर साल होता है
अमाँ
सिद्धांतों को छोड़िए, कुछ कीजिये
‘बातिश’
उसूलों पे जो
चला है, वही बदहाल होता है।
-सरोज खान
‘बातिश’
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आइये हम सब
इन्हीं हालात की बातें करें
शहर की, कस्बें
की, देहात की बातें करें
दिल के किसी
कोने में ग़र वतन परस्ती की
बाक़ी है
तमन्ना तो इसी जज़्बात की बातें करें
मुफलिसी और
अमीरी पर हो चुकी चर्चा
आदमी क्या है
उसकी औकात की बातें करें
कौन जीता, कौन
मरता, कौन भूखा सोता है
उन्हें क्या,
वे तो बस इन्तखाबात की बातें करें
दिल भी है दर्द
भी, ग़म भी है और आँसू भी
छोड़िए जाने भी
दें मुलाकात की बातें करें
-रामाराव वामनकर