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हमारे ग़म भी
तुमसे कुछ नहीं है कम इधर देखो
तुम्हीं को
क्यों बड़े लगते हैं ग़म, इधर देखो
हमारे घर यहाँ
पर धू धू करके जल रहे लेकिन
शहर में फिर भी
क्यों है रोशनी कम, इधर देखो
चलो अच्छा हुआ
अंतिम क्षणों में आप आ पहुँचे
अब हँसते हँसते
निकलेगा हमारा दम, इधर देखो
सभी के मन हुये
कुंठित, यहाँ कुर्सी की चाहत में
संभालेंगे
बगावत का हमीं परचम, इधर देखो
अभी तक तो सभी
यह लोग हँसते खिलखिलाते थे
सभी के नेत्र
अब क्यों हो गये पुरनम, इधर देखो
किसी ने उसपे
निश्चित तोड़े होंगे जुल्म के पर्वत
अचानक बन गई
अंगारा क्यों शबनम, इधर देखो
जहाँ नदियाँ जो
दो मिलतीं वहाँ फिर तीर्थ बन जाता
हुआ है दो
ह्रदयों का यहाँ संगम, इधर देखो
मृत्युंजय
‘दर्द’
है, उसको हरा तुम क्या यहाँ सकते
लिये फिरता है
वह हाथों में सर हरदम, इधर देखो
-‘दर्द’
होशंगाबादी
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हम तो कर लेते
हैं पत्थर से भी अक्सर बातें
जाने क्या बात
है करता नहीं पत्थर बातें
कोई करता नहीं
यूँ हमसे बराबर बातें
जैसे करते हैं
नदी और समन्दर बातें
उनसे करना तो
बहुत सोच समझकर करना
वरना पहुँचेगी
बहुत दूर ये उड़कर बातें
यूँ समझ लीजिये
उतने ही सितम ढाता है
जितने इख़लाफ
से करता है सितम्गर बातें
मैं इन्हें
ख्वाब कहूँ या के हकीकत समझूँ
कर रहे हैं जो
मेरी आँख से मन्जर बातें
कट के भी झुकना
नहीं हमें कैद किया जायेगा
कर रहे हैं यही
आपस में कबूतर बातें
आँख सरगोशियाँ
करती रहीं तन्हाई से
और करता रहा
बिस्तर से महावर बातें
भीनी भीनी सी
महक घर में बिखर जाती है
अब भी आती हैं
तेरे होंठ को छूकर बातें
-अंसार क़ंबरी
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हम चमन के हास
को जब चाहते हैं
वह हमें उतना
अधिक रोता मिला है
दीखते जुगनू
शिखर का मान पाते
सूर्य कारा में
कहीं सोता मिला है
मोतियों के पास
गर्वित काक बैठे
हंस तिनका भार
ही ढोता मिला है
स्वप्न जो देखा
सुनहरा आज मूर्छित
यह समय उसको
तिमिर बोता मिला है
ढुँढने में
व्यस्त हम जिस रास्ते को
मँजिलों में बस
वही खोता मिला है
-डा. महाश्वेता चतुर्वेदी
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हाँ इजाज़त है
अगर कोई कहानी और है
इन कटोरों में
अभी थोड़ा सा पानी और है
मज़हबो मजदूर
सब बैठे हैं इनको काम दो
इक इमारत इस
शहर में काफी पुरानी और है
खामोशी कब चीख
बन जाये किसे मालूम है
जूल्म कर लो जब
तलक ये बेजुबानी और है
बस इसी अहसास
की शिद्दत ने बूढ़ा कर दिया
टूटे-फूटे घर
में एक लड़की सयानी और है
ख़ुश्क पत्ते
आँख में चुभते हैं काँटों की तरह
दश्त में फिरना
अलग है बागबानी और है
-मुनव्वर राना
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हे दइया हे
राम, मुनादी गाँव बजी
मचा हुआ कोहराम
मुनादी गाँव बजी
बुधिया की
इज्जत को कल पंचायत में
पंच करें नीलाम
मुनादी गाँव बजी
चोरी करता चोर
सिपाही पहरे में
कोतवाल बदनाम,
मुनादी गाँव बजी
सास बहु ने
बाँट लिया है परसों से
अपना अपना काम,
मुनादी गाँव बजी
लेखपाल ने की
ले दे सारी परती
जमींदार के
नाम, मुनादी गाँव बजी
पान चबा इकलौते
लाला का लाला
घूमें सुबहो शाम
मुनादी गाँव बजी
साँझ हो गयी चल
‘निरास’
अपने घर को
कर ले भी आराम मुनादी गाँव बजी
-नन्ची लाल निरास