रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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दर्द होशंगाबादी अंसार क़ंबरी डा. महाश्वेता चतुर्वेदी मुनव्वर राना नन्ची लाल निरास कुलदीप सलिल

 ● वर्षा सिंह एस. नज़ीर दर्द अहद प्रकाश शेरजंग गर्ग

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हमारे ग़म भी तुमसे कुछ नहीं है कम इधर देखो

तुम्हीं को क्यों बड़े लगते हैं ग़म, इधर देखो

 

हमारे घर यहाँ पर धू धू करके जल रहे लेकिन

शहर में फिर भी क्यों है रोशनी  कम, इधर देखो

 

चलो अच्छा हुआ अंतिम क्षणों में आप आ पहुँचे

अब हँसते हँसते निकलेगा हमारा दम, इधर देखो

 

सभी के मन हुये कुंठित, यहाँ कुर्सी की चाहत में

संभालेंगे बगावत का हमीं परचम, इधर देखो

 

अभी तक तो सभी यह लोग हँसते खिलखिलाते थे

सभी के नेत्र अब क्यों हो गये पुरनम, इधर देखो

 

किसी ने उसपे निश्चित तोड़े होंगे जुल्म के पर्वत

अचानक बन गई अंगारा क्यों शबनम, इधर देखो

 

जहाँ नदियाँ जो दो मिलतीं वहाँ फिर तीर्थ बन जाता

हुआ है दो ह्रदयों का यहाँ संगम, इधर देखो

 

मृत्युंजय दर्द है, उसको हरा तुम क्या यहाँ सकते

लिये फिरता है वह हाथों में सर हरदम, इधर देखो

-दर्द होशंगाबादी

 

 000 

हम तो कर लेते हैं पत्थर से भी अक्सर बातें

जाने क्या बात है करता नहीं पत्थर बातें

 

कोई करता नहीं यूँ हमसे बराबर बातें

जैसे करते हैं नदी और समन्दर बातें

 

उनसे करना तो बहुत सोच समझकर करना

वरना पहुँचेगी बहुत दूर ये उड़कर बातें

 

यूँ समझ लीजिये उतने ही सितम ढाता है

जितने इख़लाफ से करता है सितम्गर बातें

 

मैं इन्हें ख्वाब कहूँ या के हकीकत समझूँ

कर रहे हैं जो मेरी आँख से मन्जर बातें

 

कट के भी झुकना नहीं हमें कैद किया जायेगा

कर रहे हैं यही आपस में कबूतर बातें

 

आँख सरगोशियाँ करती रहीं तन्हाई से

और करता रहा बिस्तर से महावर बातें

 

भीनी भीनी सी महक घर में बिखर जाती है

अब भी आती हैं तेरे होंठ को छूकर बातें

-अंसार क़ंबरी

 

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हम चमन के हास को जब चाहते हैं

वह हमें उतना अधिक रोता मिला है

 

दीखते जुगनू शिखर का मान पाते

सूर्य कारा में कहीं सोता मिला है

 

मोतियों के पास गर्वित काक बैठे

हंस तिनका भार ही ढोता मिला है

 

स्वप्न जो देखा सुनहरा आज मूर्छित

यह समय उसको तिमिर बोता मिला है

 

ढुँढने में व्यस्त हम जिस रास्ते को

मँजिलों में बस वही खोता मिला है

-डा. महाश्वेता चतुर्वेदी

 

 000 

हाँ इजाज़त है अगर कोई कहानी और है

इन कटोरों में अभी थोड़ा सा पानी और है

 

मज़हबो मजदूर सब बैठे हैं इनको काम दो

इक इमारत इस शहर में काफी पुरानी और है

 

खामोशी कब चीख बन जाये किसे मालूम है

जूल्म कर लो जब तलक ये बेजुबानी और है

 

बस इसी अहसास की शिद्दत ने बूढ़ा कर दिया

टूटे-फूटे घर में एक लड़की सयानी और है

 

ख़ुश्क पत्ते आँख में चुभते हैं काँटों की तरह

दश्त में फिरना अलग है बागबानी और है

-मुनव्वर राना

 

000 

हे दइया हे राम, मुनादी गाँव बजी

मचा हुआ कोहराम मुनादी गाँव बजी

 

बुधिया की इज्जत को कल पंचायत में

पंच करें नीलाम मुनादी गाँव बजी

 

चोरी करता चोर सिपाही  पहरे में

कोतवाल बदनाम, मुनादी गाँव बजी

 

सास बहु ने बाँट लिया है परसों से

अपना अपना काम, मुनादी गाँव बजी

 

लेखपाल ने की ले दे सारी परती

जमींदार के नाम, मुनादी गाँव बजी

 

पान चबा इकलौते लाला का लाला

घूमें सुबहो शाम मुनादी गाँव बजी

 

साँझ हो गयी चल निरास अपने घर को

कर ले भी आराम मुनादी गाँव बजी

-नन्ची लाल निरास 

 

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है जो कुछ पास अपने सब लिये, सरकार बैठे हैं

जो चाहे आप ले जायें, सरे बाजार बैठे हैं

 

मनाओ जश्न मंजिल पर पहुँच जाने का तुम लेकिन

ख़बर उनकी भी लो यारों जो हिम्मत हार बैठे हैं

 

तू अब उस शहर भी जाकर सुकूँ पायेगा क्या आखिर

वहाँ भी कौन से, ऐ दिल तेरे ग़म्मत हार बैठे हैं

 

रिवायत जिंदा है जिनसे, है बस कुछ एक ही बाकी

बड़ी मुश्किल में है वो भी लाचार बैठे हैं

 

हिसाब उनका ही हमने तो सही पाया है जीवन में

हिसाब अपना बराबर करके जो इक बार बैठे हैं

 

न तू आया न याद आयी तेरी इक लम्बे अरसे से

हजारों काम होने पर भी हम बेकार बैठे हैं

 

किसी भी वक्त आ सकता है अब पैगाम बस उसका

सुना जिस वक्त से हमने  सलिल तैयार बैठे हैं

-कुलदीप सलिल

 

000 

हो गये यदि मौन हम तो, देखना

दौर का यह दर्द होगा दस गुना

 

लेखनी हमने उठायी इसलिए

हाशियों पर भी बनाएँ आइना

 

आँसुओं से बन नहीं पाती कभी

कष्ट के प्रतिकार की प्रस्तावना

 

चाँदनी का ठौर दिखता ही नहीं

दहशतों का कोहरा छाया घना

 

चाटुकारों की जमावट हो जहाँ

सिर उठा पाती नहीं आलोचना

 

राह में वर्षा भला वह क्यों  रुके

स्वच्छ जिसके लक्ष्य की आयोजना

-वर्षा सिंह

 

000 

हँसती गाती झूमती रंगीनियाँ अच्छी लगीं

हर शहर को गाँव की मजबूरियाँ अच्छी लगीं

 

चाहकर भी तोड़ न पाये हम इसको उम्र भर

किस कदर रस्मों की हमको बेड़ियाँ अच्छी लगीं

 

वक्त जब आया वतन में इन्तख्वाबों का जनाव

तो लीडरों को गाँव की पगडंडियाँ अच्छी लगीं

 

यूँ तो आने को हजारों आँधियाँ आईं मगर

हर शहर को धर्म की ही आँधियाँ अच्छी लगीं

 

धूप में जब चलते-चलते थक गये अपने कदम

तो हमको सूखे पेड़ की भी टहनियाँ अच्छी लगीं

 

दर्द ये सच्ची हकीकत है नज़र के सामने

टीना-टप्पर-कोयला चुनती बच्चियाँ अच्छी लगीं ।

-एस. नज़ीर दर्द

 

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जितने भी लोग आए सभी बदगुमान थे

ईमान वाले लोग ही बस बेईमान थे

 

चेहरे सभी लगाये थे खुशरंग दोस्तों

लेकिन अँधेरी रात के सब दरमियान थे

 

लहजा़ बहुत ही खुरदुरा, मियाँ का था

लेकिन खुतूत उनके बड़े आलीशान थे

 

कुछ रुवाब वाले लोग मिले मुझको राह में

वैसे तो कुछ नहीं थे मगर आसमान थे।

-अहद प्रकाश

 

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जब पूछ लिया उनसे कि किस बात का डर है

कहने लगे ऐसे ही सवालात का डर है

 

हर चीज के बिगड़े हुए अनुपात का डर है

फ़ौलाद की औलाद में जज़्बात का डर है

 

यह रास्ता बेवास्ता, वह वास्ता बेवास्ता

रिश्तों में यहाँ खुद से मुलाक़ात का डर है

 

है खास ख़बर आज की हो जाओ ख़बरदार

कागज़ पे सुधरते हुए हालात का डर है

 

हाँ न्याय का विषपान तो करना ही पडे़गा

एथेंस के हजरात को सुकारात का डर है

-शेरजंग गर्ग

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

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