रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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ज्ञानप्रकाश विवेक रोहिताश्व धनन्जय नूर जगदलपुरी सलाम कैफ़ी ज़हीर कुरैशी डॉ. गणेश दत्त सारस्वत

शिवओम अम्बर शंकर प्रसाद करगेती महेश अनध डॉ. रोहिताश्व अस्थाना

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लड़ाई अब हमारी ठन रही है

कि अब दिल्ली शिकागो बन रही है

 

तुम्हारी ऐशगाहों से गलाज़त

बड़ी बेशर्म होकर छन रही है

 

ग़रीबों की खुशी भी दरहकीकत-

नगर के सेठ की उतरन रही है

 

ये मेरी देह को क्या हो रहा है

किसी तलवार जैसी बन रही है

 

गज़ब किरदार है उस झोपड़ी का

जो आँधी के मुकाबिल तन रही है

 

लहू  से चित्रकारी कर रहे हैं

ये बस्ती खूबसूरत बन रही है

-ज्ञानप्रकाश विवेक

 

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लाशें देखी सिहर गया था

रक्त भरा हर पहर गया था

 

यों आँखों में द्वेष भाव थे

देवालय से ज़हर गया था

 

अपने घर में आग लगाकर

ज़श्नेमय में शहर गया था

 

देश दशा पे साँस भरी यों

कहीं धनन्ज्य बिखर गया था

-रोहिताश्व धनन्जय

 

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लुट गये शहरे-मसर्रत, बे अमाँ ख्वाहिश हुई

मुल्के-दिल में रंजो-ग़म की इस कदर यूरिश हुई

 

पहले अपना राज़दाँ करने की हर कोशिश हुई

फिर रक़ीबों में हमारे कत्ल की साज़िश हुई

 

अके-दहकां से तो शाही ने लिये सामाने-ऐश

और उनके खून से महलों की आराईश हुई

 

जिंदगी का क्या भरोसा इस जहाँ में दोस्तों

मौत पीछे लग गई, जिस दिन से पैदाईश हुई

 

वादा-ए-दर्द-जहाँ पीकर भी खाली ही रहा

जब हमारे दिल के पैमाने की पैमाईश हुई

 

रात भर उलझे रहे लफ़्जों के फेरे में ए नूर

तब कहीं जाकर हमारे शेर की बंदिश हुई

-नूर जगदलपुरी

 

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लोग हक़शनाश हो गए

सब कबीरदास हो गए

 

ऐसा कुछ तो नहीं कहा मैंने

आप क्यों उदास हो गए

 

मुफ़लिसी में ग़रीब के तन पर

चीथड़े लिबास हो गए

 

अब तो हम किसी फ़साने के

जैसे इक़्तिबास हो गए

 

उसने जुल्फ़ों से ढँक लिया चेहरा

आइने उदास हो गए

 

ये तो कैफी सलाम अच्छा है

खुद से रुशनास हो गए

-सलाम कैफ़ी

 

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वे शायरों की कलम  बेज़ुबान कर देंगे

जो मुँह से बोलेगा उसका निदान कर देंगे

 

वे आस्था के सवालों को यूं उठायेंगे

खुदा के नाम तुम्हारा मकान कर देंगे

 

तुम्हारी चुप को समर्थन का नाम दे देंगे

बयान अपना, तुम्हारा बयान कर देंगे

 

तुम उन पे रोक लगाओगे किस तरीके से

वे अपने बाज की बुलबुल में जान कर देंगे

 

कई मुखौटों में मिलते है उनके शुभचिंतक

तुम्हारे दोस्त, उन्हें सावधान कर देंगे

 

वे शेखचिल्ली की शैली में, एक ही पल में

निरस्त अच्छा-भला संविधान कर देंगे

 

तुम्हें पिलायेंगे कुछ इस तरह धरम-घुट्टी

वे चार दिन में तुम्हें बुद्धिमान कर देंगे

ज़हीर कुरैशी

 

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विष घृणा का न घोले निवेदन यही

बोल कड़वे न बोलें, निवेदन यही

 

आग घर में लगी है, बुझाएँ उसे

बन प्रभंजन न डोलें निवेदन यही

 

आपके हैं सभी, गै़र कोई नहीं

निज हृदय को टटोले, निवेदन यही

 

रक्त में हैं सने आपके हाथ जो

स्नेह-पानिप से धोले, निवेदन यही

 

दुःख से हों न गीले किसी के नयन

स्वप्न स्वर्णिम सैंजों लें, निवेदन यही

 

दूसरों को कहें बाद में हम बुरा

पहले अपने को तोलें, निवेदन यही

 

पथ प्रगति सामने हैं, विमुखता तजें

सबके सब साथ हो लें, निवेदन यही

-डॉ. गणेश दत्त सारस्वत

 

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सिसकियों को दबा रही होगी

वो ग़ज़ल गुनगुना रही होगी

 

ओड़कर के सोहाग इक लड़की

खत पुराने जला रही होगी

 

लोग यूं ही खफ़ा नहीं होते

आपकी भी खता रही होगी

 

हादसों से मुझे बचा लाई

वो किसी की दुआ रही होगी

 

खैरियत से कटे सफ़र मेरा

आज माँ, निर्जला रही होगी।

-शिवओम अम्बर

 

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शायद हम को भी अपनों की गैरों की पहचान नहीं

एक रंग के चेहरे पढ़ पाना इतना आसान नहीं

 

मन्दिर ढूंढ़ें, मस्जिद घूमें देखे गुरुद्वारे भी  -

ये निश्चित है इन सब जगहों पर होते भगवान नहीं

 

मेरे ज़ख्म मेरी पीड़ाएँ मेरे आँखों के आँसू

मेरे जीवन साथी हैं कुछ दो पल के मेहमान नहीं

 

दिल्ली के दरबार में कितनी खुशहाली देखी थी

लेकिन गलियों के चेहरों पर मिल पाई मुस्कान नहीं

 

बस इतनी ख्वाहिश है कुछ तो बदल सकूँ दुनियाँ में

अभिनन्दन का पुरस्कार का तो हम को अरमान नहीं

-शंकर प्रसाद करगेती

 

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सदियों तक सोये हम लेकिन सपने मुट्ठी भर आये

उनको भी ले गये महाजन खाली हाथों घर आये

 

हमने महानगर में सुन्दर-सुन्दर चेहरे भेजे थे -

जब आये तो कंकालों के कंधे पर चढ़कर आये

 

कब से सूखी नदियों में, हम जाल बिछाये बैठे हैं-

शायद संन्यासिन मछली ही धरती के ऊपर आये

 

टूट चुका है टुकड़ा-टुकड़ा, उम्मीदों का नाम नहीं -

किस मतलब से उनके घर से, अब इतने पत्थर आये

 

कोई मुझे उठाकर रख दे, बीती हुई उमर के घर -

शायद उसी पते पर मेरी अर्ज़ी का उत्तर आये

 

कितनी देर लगा दी तुमने, अपना नाम बताने में

साँसों की महकी-महकी पहचान कहाँ पर धर आये

 

इतना मैं, इतना मेरा सामान, अकेले हैं दोनों-

द्वार खुला है अब चाहे अनजाना हो अन्दर आये

-महेश अनघ

 

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स्वप्न निर्मित मत हवाई घर बनो

हो सके तो नींव का पत्थर बनो

 

जो बढ़ा दे चाल हर इक पाँव की-

प्रेमणामय एक नव निर्झर बनो

 

जो दिशा निर्देश सदियों तक करे-

राजपथ पर मील का पत्थर बनो

 

गा सको हर एक मिल कर प्यार से-

वह अनोखा एकता का स्वर बनो

 

जो तिमिर के पंथ को दीपित करे-

ज्योतिरथ आरूढ़ वह दिनकर बनो

-डॉ. रोहिताश्व अस्थाना

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