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विष घृणा का न
घोले निवेदन यही
बोल कड़वे न बोलें,
निवेदन यही
आग घर में लगी है,
बुझाएँ उसे
बन प्रभंजन न
डोलें निवेदन यही
आपके हैं सभी, गै़र
कोई नहीं
निज हृदय को टटोले,
निवेदन यही
रक्त में हैं सने
आपके हाथ जो
स्नेह-पानिप से
धोले, निवेदन यही
दुःख से हों न गीले
किसी के नयन
स्वप्न स्वर्णिम
सैंजों लें, निवेदन यही
दूसरों को कहें बाद
में हम बुरा
पहले अपने को
तोलें, निवेदन यही
पथ प्रगति सामने
हैं, विमुखता तजें
सबके सब साथ हो
लें, निवेदन यही
-डॉ. गणेश दत्त सारस्वत
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सिसकियों को दबा
रही होगी
वो ग़ज़ल गुनगुना
रही होगी
ओड़कर के सोहाग इक
लड़की
खत पुराने जला रही
होगी
लोग यूं ही खफ़ा
नहीं होते
आपकी भी खता रही
होगी
हादसों से मुझे बचा
लाई
वो किसी की दुआ रही
होगी
खैरियत से कटे सफ़र
मेरा
आज माँ, निर्जला
रही होगी।
-शिवओम अम्बर
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शायद हम को भी अपनों
की गैरों की पहचान नहीं
एक रंग के चेहरे
पढ़ पाना इतना आसान नहीं
मन्दिर ढूंढ़ें,
मस्जिद घूमें देखे गुरुद्वारे भी -
ये निश्चित है इन
सब जगहों पर होते भगवान नहीं
मेरे ज़ख्म मेरी
पीड़ाएँ मेरे आँखों के आँसू
मेरे जीवन साथी हैं
कुछ दो पल के मेहमान नहीं
दिल्ली के दरबार
में कितनी खुशहाली देखी थी
लेकिन गलियों के
चेहरों पर मिल पाई मुस्कान नहीं
बस इतनी ख्वाहिश है
कुछ तो बदल सकूँ दुनियाँ में
अभिनन्दन का
पुरस्कार का तो हम को अरमान नहीं
-शंकर प्रसाद करगेती
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सदियों तक सोये हम
लेकिन सपने मुट्ठी भर आये
उनको भी ले गये
महाजन खाली हाथों घर आये
हमने महानगर में
सुन्दर-सुन्दर चेहरे भेजे थे -
जब आये तो कंकालों
के कंधे पर चढ़कर आये
कब से सूखी नदियों
में, हम जाल बिछाये बैठे हैं-
शायद संन्यासिन
मछली ही धरती के ऊपर आये
टूट चुका है
टुकड़ा-टुकड़ा, उम्मीदों का नाम नहीं -
किस मतलब से उनके
घर से, अब इतने पत्थर आये
कोई मुझे उठाकर रख
दे, बीती हुई उमर के घर -
शायद उसी
पते पर
मेरी अर्ज़ी का उत्तर आये
कितनी देर लगा दी
तुमने, अपना नाम बताने में
–
साँसों की
महकी-महकी पहचान कहाँ पर धर आये
इतना मैं, इतना
मेरा सामान, अकेले हैं दोनों-
द्वार खुला है अब
चाहे अनजाना हो अन्दर आये
-महेश अनघ
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स्वप्न निर्मित मत
हवाई घर बनो
हो सके तो नींव का
पत्थर बनो
जो बढ़ा दे चाल हर
इक पाँव की-
प्रेमणामय एक नव
निर्झर बनो
जो दिशा निर्देश
सदियों तक करे-
राजपथ पर मील का
पत्थर बनो
गा सको हर एक मिल
कर प्यार से-
वह अनोखा एकता का
स्वर बनो
जो तिमिर के पंथ को
दीपित करे-
ज्योतिरथ आरूढ़ वह
दिनकर बनो
-डॉ. रोहिताश्व अस्थाना |