000
ठोस लिखना या
तरल लिखना
दोस्त मेरे कुछ
सरल लिखना
आस्था के
सिन्धु मंथन में
नाम पर मेरे
गरल लिखना
भोर में भी एक
सो रहे हैं जो
नींद में उनकी
खलल लिखना
पाँव जब पथ से
भटकते हों
गाँव की कोई
मसल लिखना
झूठ का चेहरा उतर जाए
बात जब लिखना
असल लिखना
पेट की जो आग
है उसको
आग में झुलसी
फसल लिखना
-यश मालवीय
000
यह तमिश्रा का
शिखर गलता नहीं है
शब्द वेधी सर
कोई चलता नहीं है
रोज मरता है एक
अभिमन्यु अगर
ब्यूह का यह
द्वार खुलता नहीं है
हरकतें तूफान की बढ़ने लगी हैं
एक भी पन्ना
मगर हिलता नहीं है
दूर तक खामोशियाँ पसरी हुई हैं
इस सड़क पर अब
कोई चलता नहीं है
तस्करी होती
उजालों की निशा में
क्योंकि सूरज
शाम को ढलता नहीं है
-रासनेही लाल शर्मा
000
यह गज़ब कैसे
हुआ सब वार ढीले पड़ गए
जो तने रहते थे
वो अखबार ढीले पड़ गए
हर बार कुछ और
घट जाता है तेवर जिस्म का
हम फक़त कहते रहे इस बार ढीले पड़ गए
हो न हो हड़ताल
की चर्चा सुनी होगी कहीं
देखते ही देखते
बाजार ढीले पड़ गए
लौट आयी और इक
पतझड़ की रुत पतझड़ के बाद
उनके आने के
सभी आसार ढीले पड़ गए
छंद जीवन का
यहाँ टूटा है यारों बेतरह
बेवज़ह कैसे
कहें अशआर ढीले पड़ गए
दोस्त अब बैठक
की हर कुर्सी को फिर बिनवाइये
देखिए इन
कुर्सियों के तार ढीले पड़ गए
-विनोद कुमार शर्मा
000
यूं तो हमारे
साथ ही वो भी सफर में था
लेकिन न जाने
कौन से अन्जाने डर में था
मातम हरेक फूल
के चेहरे पे लिख गया
धब्बा जो एक
खून का तितली के पर में था
आँखों को चीरता
गया अखबार सुबह का
एक ऐसा खूनी
हादसा पहली खबर में था
अन्जान मैं बना
रहा कुछ बात सोचकर
जो मुझसे छुप
रहा था वो मेरी नज़र में था
ललकारते हो
किसलिए बेबस परिन्द को
जितना भी जोर
उसका था सब
बालों-पर में था
हासिल हुई न
पानी की दो चार बूँद भी
‘माँझी’
तो बस सुराब के तपते भँवर मे था
-देवेन्द्र मांझी
000
ये नहीं कि नाव
की ही ज़िन्दगी खतरे में है
दौर है ऐसा कि
अब पूरी नदी खतरे में है
बच गए मंज़र
सुहाने फर्क क्या पड़ जाएगा
जबकि यारों आँख
की ही रोशनी खतरे में है
अब तो समझो
कौरवों की चाल नादां पाँडवों
होश में आओ
तुम्हारी द्रोपदी खतरे में है
अपने बच्चों को
दिखाओगे कहाँ अगली सदी
जी रहे हो
जिसमें तुम वो ही सदी खतरे में है
मंदिरों और
मस्जिदों को घर के भीतर लो बना
वरना खतरे में
अज़ाने आरती खतरे में है
ना तो नानक ना
ही ईसा, राम ना रहमान ही
पूजता है जो
इन्हें वो आदमी
ख़तरे में है
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी