रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

यश मालवीय रामसनेही लाल शर्मा विनोद कुमार शर्मा देवेन्द्र मांझी सुरेन्द्र चतुर्वेदी शरद सिंह इन्दिरा गौड़  इरफान सिद्दीक़ी आसी पुरनवी अहमद वसी

000

ठोस लिखना या तरल लिखना

दोस्त मेरे कुछ सरल लिखना

 

आस्था के सिन्धु मंथन में

नाम पर मेरे गरल लिखना

 

भोर में भी एक सो रहे हैं जो

नींद में उनकी खलल लिखना

 

पाँव जब पथ  से भटकते हों

गाँव की  कोई मसल लिखना

 

झूठ  का  चेहरा  उतर जाए

बात जब लिखना असल लिखना

 

पेट  की  जो आग है उसको

आग में झुलसी फसल लिखना

-यश मालवीय

 

000

यह तमिश्रा का शिखर गलता नहीं है

शब्द वेधी सर कोई चलता नहीं है

 

रोज मरता है एक अभिमन्यु अगर

ब्यूह  का  यह द्वार खुलता नहीं है

 

हरकतें  तूफान  की बढ़ने लगी हैं

एक भी पन्ना मगर हिलता नहीं है

 

दूर  तक  खामोशियाँ  पसरी हुई हैं

इस सड़क पर अब कोई चलता नहीं है

 

तस्करी  होती उजालों की निशा में

क्योंकि सूरज शाम को ढलता नहीं है

-रासनेही लाल शर्मा

 

000 

यह गज़ब कैसे हुआ सब वार ढीले पड़ गए

जो तने रहते थे वो अखबार ढीले पड़ गए

 

हर बार कुछ और घट जाता है तेवर जिस्म का

हम  फक़त  कहते  रहे इस बार ढीले पड़ गए

 

हो न हो हड़ताल की चर्चा सुनी होगी कहीं

देखते  ही  देखते बाजार  ढीले  पड़ गए

 

लौट आयी और इक पतझड़ की रुत पतझड़ के बाद

उनके आने के सभी आसार ढीले पड़ गए

 

छंद जीवन का यहाँ टूटा है यारों बेतरह

बेवज़ह कैसे कहें अशआर ढीले पड़ गए

 

दोस्त अब बैठक की हर कुर्सी को फिर बिनवाइये

देखिए इन कुर्सियों के तार ढीले पड़ गए

-विनोद कुमार शर्मा

 

000 

यूं तो हमारे साथ ही वो भी सफर में था

लेकिन न जाने कौन से अन्जाने डर में था

 

मातम हरेक फूल के चेहरे पे लिख गया

धब्बा जो एक खून का तितली के पर में था

 

आँखों को चीरता गया अखबार सुबह का

 एक ऐसा खूनी हादसा पहली खबर में था

 

अन्जान मैं बना रहा कुछ बात सोचकर

जो मुझसे छुप रहा था वो मेरी नज़र में था

 

ललकारते हो किसलिए बेबस परिन्द को

जितना भी जोर उसका था सब बालों-पर में था

 

हासिल हुई न पानी की दो चार बूँद भी

माँझी तो बस सुराब के तपते भँवर मे था

-देवेन्द्र मांझी

 

000 

ये नहीं कि नाव की ही ज़िन्दगी खतरे में है

दौर है ऐसा कि अब पूरी नदी खतरे में है

 

बच गए मंज़र सुहाने फर्क क्या पड़ जाएगा

जबकि यारों आँख की ही रोशनी खतरे में है

 

अब तो समझो कौरवों की चाल नादां पाँडवों

होश में आओ तुम्हारी द्रोपदी खतरे में है

 

अपने बच्चों को दिखाओगे कहाँ अगली सदी

जी रहे हो जिसमें तुम वो ही सदी खतरे में है

 

मंदिरों और मस्जिदों को घर के भीतर लो बना

वरना खतरे में अज़ाने आरती खतरे में है

 

ना तो नानक ना ही ईसा, राम ना रहमान ही

पूजता है जो इन्हें वो आदमी ख़तरे में है

-सुरेन्द्र चतुर्वेदी

 

000

रख लिया है पीठ पर बिस्तर, चलो, चलना कहाँ है ?

कर दिया चुकता किराया हर, चलो, चलना कहाँ है  ?

 

इन पुराने मंदिरों में, देव-प्रतिमा भी नहीं है

पूजना कैसा, बचे प्रस्तर, चलो, चलना कहाँ है  ?

 

फिर हवा के हाथ में हैं शीत के नेजे़ नुकीले

फट गया है ताप का अस्तर, चलो, चलना कहाँ है ?

 

इन वनों की देह पर हैं आरियों के दंश-नीले

आस्तीनों में छुपे विषधर, चलो, चलना कहाँ है  ?

 

हो गई शैवाल जैसी ताकती पथ को शरद अब

छोड़ कर इस द्वार का पोखर चलो, चलना कहाँ है  ?

-शरद सिंह

 

000 

रात भर के ही लिये हैं

हम दीवाली  के दिये हैं

 

जल गए कुटिया महल में

फासले कुछ कम किये हैं

 

जब कहेंगे सच कहेंगे

इसलिये तो लब सिये हैं

 

देखना बचना परखना

हर तरफ बहरूपिये हैं

 

छूटना हर हाल में है

हम अभागे हाशिये हैं

-इन्दिरा गौड़

 

000 

रोशनी में लोग एलाने वफ़ादारी करें

शमा गुल होते ही चलने की तैयारी करें

 

जब हमें बेमोल हाथ आने लगी सच्चाइयाँ

क्या ज़रूरत है कि रुवाबों की खरीदारी करें

 

यह ज़मी फिर पाँव की जंज़ीर हो जाने को है

वहशतें अब कोई फ़रमाने सफ़र जारी करें

 

तू मयस्सर है तो तुझ पर शेर क्यों लिखे कोई

तुझ से फुरसत हो तो हम यह शोग्ले बेकारी करें

-इरफान सिद्दीक़ी

 

000 

रुत बदलने के निशां लेकर चलो

हाथ में कुछ कहकशां लेकर चलो

 

रख न ले बैसाख बादल का भरम

हर अबर, अजों-समां लेकर चलो

 

सर्दियों से, माघ में सिकुड़े हुए -

लामकां हित ला-मकां लेकर चलो

 

फागुनों में खिलखिलाती बस्तियाँ

नीम-उरियां, नीमजाँ लेकर चलो

 

छीन ले न फिर बहारों की हवा

कैद में आसी खिजाँ लेकर चलो

-आसी पुरनवी

 

000 

लम्हा लम्हा जिंदगी का वाकया लिखते रहे

जीते जी हम आप अपना मर्सिया लिखते रहे

 

कहनेवाले अपनी बातों से किताबे भर गये

लिखनेवाले हर वरक़ पर हाशिया लिखते रहे

 

जिनको थी फुरसत वो रखकर अपनी साँसों पे नज़र

अपना हर गम सिलसिला दर सिलसिला लिखते रहे

 

वो हवा की तरह शहरों शहरों लहराती फिरी

घर की दीवारी पे हम उसका पता लिखते रहे

 

उसके दुश्मन उसको फाँसी की तरफ ले भी गये

और जज साहब अधूरा फैसला लिखते रहे

 

सब ने तो दीवान भर डाले मगर अहमद वसी

तुम ही कागज पे रदीफ़- न क़ाफ़िया लिखते रहे

-अहमद वसी

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com