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नवगीत-
छविनाथ मिश्र
।
नईम
।
कुमार
रवीन्द्र ।
डॉ. इसाक अश्क ।
डॉ. शरद सिंह |
बंधु, कैसी त्रासदी है
देश भूखा
दृष्टि प्यासी
सोंच की सूखी नदी है
भूख सत्ता की मगर सौ फ़ीसदी है
बंधु, कैसी त्रासदी है ।
शब्द बेचारे करें क्या
अर्थ के मारे वरें क्या
समय असमय ही बुढ़ाया
और सर पर
स्वप्न की गठरी लदी है
सामने नंगी-निगोड़ी
एक पगलायी सदी है
बंधु, कैसी त्रासदी है ।
छविनाथ
मिश्र
100,
रवीन्द्र सरणी, 36, गवर्नमेंट क्वाटर
साहब बागा,
महानगर, लिलुहा, हावड़ा-711203
मौसम गये
जिन्हें चढ़ाओं पर मिलना था
आज मिले हैं वो उतार पर
मौसम गये गुलाबों वाले
लौटेंगे अब क्या बहार पर ।
गये दिनों में बोली जिनकी खुलकर तूती
ख़्वाब रेशमी गये आज आते हैं सूती
वो भी हथकरघे खादी के
मौटे-झौटे
साख गिरी उनकी जो कल तक
छाये थे पूरी बाजार पर ।
रहे न हम मालिक मकबूजा, जोतदार हैं
होना था कप्तान मगर अब कोटवार हैं
सुन्दर के प्रतिमान भले हों
होते रहे ज़माने भर में
संभव नहीं अंगेज सकूँ मैं
खड़ा हुआ बिल्कुल कगार पर ।
इन्द्रिय बोध, अनुभव के भाई हैं मौसेरे
मांसल के व्यामोह आज तक मुझको घेरे
हीन चरित्र मान लेते तो
माना करिये
हुआ विमोहित समय-समय पर
वर्तुल चक्रों औ उभार पर ।
नईम
राधागंज,
देवास
मध्यप्रदेश
- 455001
बहुत मुमकिन है
बहुत मुमकिन है
ये जंगल हरे हो जायें फिर ।
लग रहा है
ठूँठ के नीचे जड़ें
जिंदा अभी भी
सुनो, इनमें कोपलें
फिर फूट आयेंगी कभी भी
बहुत मुमकिन
शहद के छत्ते भरे हो जायें फिर ।
हाँ, नदी को
ढूँढ़ कर लाना यहाँ
होगा जरुरी
और यह भी देखना होगा
धुओं से रहे दूरी
बहुत मुमकिन
भोर के सपने खरे हो जायें फिर ।
सींचना होगा जरुरी
आसुँओं से भी
इन्हें कल
अभी तो बस दिख रहा है
राख में डूबा वनांचल
बहुत मुमकिन
ढाई आखर बावरे हो जायें फिर ।
कुमार
रवीन्द्र
'क्षितिज'
310, अर्बन एस्टेट-2
हिसार,
हरियाणा - 125005
सस्ती कलायें
एक हम हैं
और चौतरफा हमारे
विष बुझा वातावरण है ।
रौशनी को गालियाँ बकता अंधेरा
न्याय पत्थर सा खड़ा खामोश, बहरा
इस तरह की
हर विसंगति
इस सदी का आचरण है ।
कौडियों जैसी हुई सस्ती कलायें
है बड़ा दलदल, कहाँ किस ओर जायें
भोगना यह सब
हमें अब
रोज यों ही आमरण है ।
डॉ. इसाक
अश्क
संपादक,
समांतर,
तराना,
जिला-उज्जैन, मध्यप्रदेश
रेत देती है गवाही
रेत देती है गवाही
उस नदी की
गर्मियों के पूर्व जो बहती यहाँ थी ।
चाँद भी अब दूर
बेहद दूर दिखता
ताप से अब रात का
हर याम सिंकता
लोग कहते हैं
कहानी की तरह अब
एक शीतलता सदा रहती यहाँ थी ।
भोर अकुलायी हुई
झुलसी हुयी है
काल-कवलित सूखकर
तुलसी हुई है
दीप की बाती
निखरती, शोक हरती
आस्था की बाँह जो गहती यहाँ थी ।
कल करेगा कौन
बातें आज की
कौन जानेगा कथा
छाँह के अवसाद की
एक बारिश बाद
किसको याद होगा
यह धरा भी सूर्य को सहती यहाँ थी ।
डॉ. सुश्री
शरद सिंह
एम. 111,
शांति विहार, रजा खेड़ी
सागर,
मध्यप्रदेश - 470004
