रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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हाइकु
कुछ हाइकु -----मनोज सोनकर
ठूँठ है खड़ा
वसंत बदमाश
बताते अड़ा ।
मारे न मरे
भ्रष्ट्राचार, आत्मा
जारे न जरे ।
तुम्हारा साथ
मिली छिनी पदवी
उन्नत माथ ।
तुम क्या छूटे
पदवी छिनी भारी
हाथ ही टूटे ।
चिड़िया बैठे
समूद्र लगे झूला
बहुत ऐंठे ।
अ से कमल
आरक्षण-विरोध
च से धवल ।
धुँआ न भागे
भकभकाता दीया
घुटन लागे ।
धुँध तो घेरे
पहाड़, जवां गर्द
लगाए फेरे ।
राजा तो हटे
एवज में उनकी
वंश आ डटे ।
पकड़ कड़ी
प्रेम तो फेवीकोल
जकड़ बड़ी ।
गर्मी तो रंग
गुलमोहर खिले
छोड़े न संग ।
झोपड़ी टूटे
आज़ादी लगे जुर्म
खोपड़ी फूटे ।
देर से मिले
प्रशंसा, पावडर
चेहरा खिले ।
बादल हारे
इन्द्रधनुष रंगी
कालिमा टारे ।
मनोज सोनकर
59, 9/3, शर्मा निवास
जामेजमशेद रोड, मुंबई
महाराष्ट्र - 400019
तीन हाइकु..... कृष्ण कुमार अजनबी
आई सिमट
औपचारिकताएँ
हैलो-हाय में ।
तुम बिन मैं
जल बिन मीन सा
हूँ तड़पता ।
बनोगे राम
तो मिलेगी जानकी
वर्ना द्रोपदी ।
कृष्ण कुमार अजनबी
मु.पो. देवभोग, रायपुर
छत्तीसगढ़
सत्य ही अमर है - महात्मा गाँधी
आपकी प्रतिक्रिया
संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति
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