इराक़ी
कविता
मोची
एक हुनरमंद
मोची
अपनी पूरी उम्र
ठोंकता है कील
और चमकाता है
चमड़े को
भांत-भांत के
पैरों के लिए :
पैर जो चलते
हैं
पैर जो मारते
हैं ठोकर
पैर जो लगाते
हैं छलांग
पैर जो करते
हैं अनुसरल
पैर जो दौड़ते
हैं
पैर जो शामिल
होते हैं भगदड़ में
पैर जो भहरा
जाते हैं
पैर जो उछलते
हैं
पैर जो यात्रा
करते हैं
पैर जो शांत
पड़े रहते हैं
पैर जो कांपते
हैं
पैर जो नाचते
हैं
पैर जो लौटते
हैं....
जीवन मोची के
हाथ में पड़ी
कुछ कीलें ही
तो हैं ।
मूलः
दून्या मिख़ाइल
अनुवादः
गीत चतुर्वेदी
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छत्तीसगढ़ी
कविता
लड़ाई
बिना अक्ल का आदमी
कितनों से लड़ेगा
पहले तो जानलो लड़ना
किससे है
क्यों लड़ना है, किस तरह
लड़ना है, कहाँ लड़ना है
बिना जाने जो लड़ेगा
वह अकारथ मारा जायेगा
दुश्मन की ताकत को पहले
तौल लो
मत रहो इस तरह अतिमुग्ध
उकसाये जाने पर जो लड़ेगा
मरेगा जरूर मरेगा वह
वह मुँह चलायेगा तो तुम
भी चलाना
वह हथियार उठायेगा तो
क्या तुम भी उठाओगे
ऐसे कैसे निभेगा
दुनिया ऐसे
कैसे चलेगी ?
मूलः
डॉ.बलदेव
अनुवादः
जयप्रकाश मानस
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संस्कृत
कविता
घोषणा
रात को बारिश हुई गड़गड़ाकर बिजली चमकी
कहीं दूर वह सो न सका
सारी रात
नींद भाग गई उससे कोसों
दूर
बिस्तर पर उलटता रहा
पलटता रहा
लगातार लंबी-लंबी आहें
भरता रहा
अतीत स्मृतियाँ आ-आकर
कहने लगीं कुछ कानों में
कुछ दिन पहले ब्याह कर
लाई गई
दुल्हन का चेहरा
पल-पल पर चमकने लगा
सुनसानों में
वह सिसकता रहा रोता रहा
जोर-जोर से सबेरे तक
आखिर अपनी प्रेयसी से
लिपटकर सोये हुए पड़ोसी
सहते तो कब तक
उसके बाद
ग्रामवासियों ने बना दिया
एक कठोर नियम -
आज के बाद किसी यात्री को
रात्रि विश्राम के लिए न
दिया जाये कोई आसरा
सुनक ये आसमान
और जोरों से उठा थर्रा
जानते हो क्या हुआ उस
बटोही का
वह तो सुनने से पहले ही
हो गया था बहरा ।
मूलः
भर्तृहरि
अनुवादः
संतोष रंजन
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