झारखंड की दो लोक कथाएं
कन्हाई
नाम का एक व्यक्ति था उसकी पीठ पर एक बड़ा सा
कूबड़ था। वह बहुत सीधा था। हर-एक के सुख-दुख में साथ रहता
और बीमारी में दवा देकर
मदद करता था। परन्तु कुबड़ा होने के कारण उसे कोई पसंद
नहीं करता था।
कन्हाई की
टोकरियों की दुकान थी। कोई भी उससे अच्छी टोकरी नहीं बुन
सकता था। इसलिए दूसरे
टोकरी वाले उससे जलते थे और उसके नाक पर बेकार की बातें
सबसे कहा करते थे। यह सुनकर
लोग समझते थे कि कन्हाई सचमुच बहुत बुरा आदमी है। उसे
देखकर लोग मुँह मोड़ लेते। उस
बेचारे को बड़ा दुख होता। उतने बड़े कूबड़ के साथ सिर
झुकाकर चलने में कन्हाई को
बहुत तकलीफ होती थी।
एक दिन वह कुछ दूर एक जगह टोकरी बेचने के लिए गया पर शाम
ढलने
के पहले वह घर नहीं लौट पाया। रास्ते में एक पुराने मकान
तक ही वह पहुँच पाया था कि
अंधेरा घिर आया और वह ऐसी थकान महसूस करने लगा कि उससे
चलना कठिन हो गया। वह जगह
अच्छी नहीं थी,
लोग भरसक उस जगह पर आना नहीं चाहते थे क्योंकि कहा जाता था
कि वह
भूतों का घर है। किन्तु कन्हाई इतना थक गया था कि चलने की
उसमें जरा भी ताकत नहीं
थी। इसलिए वह वहीं रास्ते के किनारे पर बैठ गया। वह बहुत
देर तक वहीं बैठा रहा।
बैठे-बैठे अचानक उसे ऐसा लगा जैसे उस पुराने घर के अन्दर
से कोई आवाज़ आ रही है,
कई
लोग सुर मिलाकर बहुत ही मीठा गाना गा रहे हैं। गाना सुनकर
कन्हाई का मन-प्राण खुशी
से भर गया। वह अवाक् होकर केवल गाना सुनता रहा।
गाने का सुर तो बहुत मीठा था पर बोल
बस इतने थे- 'नमक
है,
तेल है,
इमली है,
हींग है।'
गाना सुनते-सुनते कन्हाई एकदम
मस्त हो गया। उसे लगा कि उसे भी गाने के साथ सुर मिलाकर
गाना शुरू कर देना चाहिए।
बस क्या था,
उसने भी गला खखारकर आवाज़ खोलकर उनके साथ-साथ गाना शुरु कर
दिया -'नमक
है,
तेल है,
इमली है,
हींग है।'
इतना गाते ही उसकी बुद्धि जाग गई,
वह और उँची आवाज़
में गाने लगा - 'लहसुन
है,
मिर्च है,
चैंग-बैंग सुटकी है।'
कन्हाई इन्हीं बोलों को
खूब ऊँची आवाज़ में गा रहा था। यह आवाज़ अन्दर गाना गा रहे
लोगों के कानों तक जा
पहुँची। अन्दर गाना-गाने वाले असल में थे भूत। नये बोल
सुनकर वे लोग बहुत प्रसन्न
हुए और दौड़कर बाहर कन्हाई के पास आ गए। बाहर आकर वे
कन्हाई को गोद में लेकर
नाचते-नाचते घर के अंदर ले गए,
वहाँ उसे बहुत प्यार से ढेर सरी मिठाइयाँ खिलाई।
उसके बाद सभी नाचते हुए गोल-गोल घूमकर गाने लगे -
'नमक
है,
तेल है,
इमली है,
हींग
है।' 'लहसुन
है,
मिर्च है,
चैंग-बैंग सुटकी है।'
कन्हाई को भी उन लोगों के साथ
नाच-नाच कर यही गाना गाना पड़ा। तब वह सोचने लगा,
'कितने
आश्चर्य की बात है,
मैं
अपने कूबड़ को लेकर ठीक से चल नहीं पाता और अभी नाच हूँ।'
यह सोचते-सोचते उसके हाथ
अपने आप ही पीठ की ओर चले गये - यह क्या! उसका कूबड़ कैसे
ठीक हो गया! एक भूत उससे
पूछने लगा, 'क्या
देख रहे हो वह अब वहाँ तुम्हारी पीठ पर नहीं,
यहाँ बगल में पड़ा
हुआ है।'
सचमुच वह कूबड़ अब कन्हाई की पीठ पर न होकर उसके बगल में
ही पड़ा हुआ था।
कन्हाई खुशी से नाच उठा। उसे अपने आपको इतना हल्का महसूस
हुआ और आराम लगने लगा कि
वह उसी समय वहीं जमीन पर लेटकर सो गया।
दूसरे दिन जब उसकी नींद खुली तो देखा कि वह
अपने घर के बाहर सड़क के किनारे सोया हुआ है। भूत उसे
अच्छे कपड़े पहना कर वहाँ
छोड़ गए थे। वह चटपट उठा और खुशी-खुशी अपने घर चला आया।
सभी लोग आश्चर्य से उसकी ओर
ताकने लगे,
कोई भी उसे पहचान नहीं पा रहा था। वही उनका कुबड़ा कन्हाई
है और भूतों
ने उसके कूबड़ को ठीक कर उसे ऐसा अच्छा बना दिया है,
यह समझाने में कन्हाई को बहुत
समय लग गया। कन्हाई के कूबड़ ठीक होने की कहानी चारों ओर
फैल गई। जिसने भी यह बात
सुनी,
कहा यह आश्चर्यजनक बात पहले नहीं सुनी थी। अब लोग कन्हाई
को देखकर मुँह नहीं
फेरते थे,
वे उससे मिलने के लिए दौड़ कर आते और उससे हँस-हँस कर
बातें करते। कुछ
लोग तो उसे अपने घरवालों को उसके कूबड़ खत्म होने की कहानी
सुनाने के लिए न्योता
देकर भी ले जाते। कितने लोग तो केवल उसकी कहानी सुनने के
लिए ही उसकी टोकरी खरीदने
आते। इसी तरह टोकरियाँ बेच-बेचकर वह धनवान हो गया।
ऐसे ही दिन गुजर रहे थे। एक दिन
कन्हाई अपने घर के आँगन में बैठकर टोकरी बुन रहा था। उसी
समय एक बुढ़िया वहाँ आई और
उससे पूछा 'केवलहारी
किधर है?'
कन्हाई ने बताया इसी जगह को केवलहारी कहते हैं।
तुम्हें क्या चाहिए?
बुढ़िया ने कहा,'सुना
है तुम्हारे गाँव के कन्हाई नाम का कोई
व्यक्ति है,
भूतों ने उसका कूबड़ ठीक कर दिया है। अगर उसके पास से
कूबड़ ठीक करने
का मंत्र सीख पाती तो हमारे मानिक का कूबड़ भी ठीक हो
जाता।'
कन्हाई ने कहा, 'मैं
ही तो वह कन्हाई हूँ। भूतों ने मेरा ही कुबड़ ठीक किया है।
इसका तो कोई जन्तर-मन्तर
नहीं है। वे लोग रात में जागकर गाना गा रहे थे,
मैं रास्ते के किनारे सोया-सोया
उनके गाने में कुछ नए शब्द जोड़ दिये। बस इतने से ही वे
लोग बहुत खुश हो गये और
मेरा कूबड़ ठीक कर मुझे नये और अच्छे कपड़े पहना दिये।'
बुढ़िया तब उससे छोटी से
छोटी बात भी पूछ-पूछ कर जान ली। फिर उसे आशीर्वाद देती हुई
वहाँ से चली गई।
उस
बुढ़िया का ही बेटा था मानिक। उसके पीठ पर कन्हाई की पीठ
से भी बड़ा कूबड़ था। वह
व्यक्ति इतना बड़ा बदमाश था और हर किसी से जलने वाला था और
मुहल्ले के लोग उससे
परेशान रहते थे। मानिक के घर वाले उसके कूबड़ ठीक करने के
लिए एक रात उसे गाड़ी में
करके वहीं भूतों के घर के बाहर छोड़ गये। वहाँ पड़ा-पड़ा
मानिक सोच रहा था कि कब
भूत गाना गाना शुरु करें और कहाँ वह उसमें नये बोल जोड़कर
अपना कूबड़ ठीक करे। उसके
बाद जैसे ही,
भूतों ने गाना शुरु किया,
'नमक
है,
तेल है,
इमली है'
मानिक बीच में ही
चिल्ला पड़ा,'गुरुचरण
हलवाई की दुकान में कच्चा गुल्ला है।'
गाने का ताल तो टूटा
ही,
कच्चे गुल्ले का नाम सुनकर कई भूतों को उलटी तक आने लगी।
भूत ऐसी चीजों से बहुत
नफ़रत करते हैं,
इनका नाम तक नहीं सुनना चाहते। इसलिए मानिक के मुँह से यह
सब सुनकर
वे बहुत चिढ़ गए और दांत पीसते हुए वहाँ आकर बोले,
'अरे
कौन है रे तू असभ्य,
बेताला
हमारे गाने का मजा किरकिरा कर दिया। ठहर अभी बताते हैं।'
इतना कहकर उनलोगों ने
कन्हाई के कूबड़ को लेकर मानिक के कूबड़ से ऊपर ऐसे जोड़
दिया कि उसे अलग ही नहीं
किया जा सके।
अगले दिन मानिक के घरवाले वहाँ आए और उसे देखकर बहुत
आश्चर्य और दुखी
हुए पर गाँव वाले कहने लगे,
'उसके
जैसे बदमाश को ऐसी सजा होनी ही थी।'
एक
राजा था। उसका नाम था फ्रदी। उसकी एक चक्की थी,
उसे कहा जाता था ग्रन्ती। वह चक्की ऐसी-वैसी चक्की नहीं
थी। उसे चलाकर अपनी मनचाही
चीज चक्की में से निकाली जा सकती थी। पर उसे घुमाता कौन
चक्की तो पहाड़ जितनी बड़ी
थी। राजा के नौकर उसे हिला तक नहीं पाये। राजा के राज्य
में जितने भी नौजवान थे,
सबने हार मान ली। वह चक्की किसी भी तरह से चलाई नहीं जा
सकी। राजा बहुत दुखित हुआ।
उसने सोचा था चक्की चलाकर जितना चाहे हीरे-जवाहरात निकाल
लेगा। पर हाय! चक्की तो
घुमी ही नहीं। ऐसे ही समय बीतता रहा।
एक बार राजा विदेश गया। वहाँ उसने दो दानव
कन्याओं को देखा। वे दोनों बहनें थीं। एक का नाम था मेनिया
और दूसरी का फेनिया। वे
दोनों जब चलतीं थीं,
धरती कांपने लगती थी,
बैठती तो जमीन धंस जाती थी। उन्हें देख
राजा ने सोचा,'अब
अपनी चक्की चलाने के लिएमुझे आदमी मिल गए।'
मेनिया-फेनिया को खरीद
कर राजा प्रसन्नता के साथ अपने राज्य में लौट आया। आते ही
वह उन दोनों को लेकर
चक्की के पास पहुँचा और बोला,
'ठेल,
ठेल,
ठेल! सोना निकले चाँदी निकले,ठेल,
ठेल,
ठेल।'
मेनिया-फेनिया चक्की चलाने लगीं और साथ-साथ गाने भी लगीं -
'आओ
सोना - हंई
हो,
आओ रुपा - हंई हो,
फ्रदी के घर - हंई हो,
संदूक भर -हंई हो।'
देखते ही देखते
सोने चँदी से राजा का घर भर गया। पर राजा तब भी कहता - ठेल,
ठेल,
ठेल। रोज-रोज
चक्की चलाते-चलाते मेनिया-फेनिया थककर चूर हो गई,
उनकी पीठ अकड़ गई,
हाँथ-पाँव ढिले
पड़ने लगे,
पर राजा एक ही बात कहता- ठेल,
ठेल,
ठेल। मेनिया-फेनिया फिर से चक्की
चलाने लगतीं। क्या करें बेचारी,
उन्हें खरीदा गया था तो काम भी लिया ही जाएगा। पर
राजा को लेकर वे मन ही मन क्रोधित भी होती रहीं।
एक दिन भोजन करने के बाद राजा
विश्राम कर रहा था और मेनिया-फेनिया हमेशा की तरह चक्की
चला रहीं थी। अचानक उनलोगों
ने सोचा,
'रुको,
इसी समय राजा को मजा चखाया जाए!'
और दोनों गाने लगीं -
'आओ
डाकू -
हंई हो,
हजार-हजार - हंई हो,
मार-मार - हंई हो,
लगाओ आग - हंई हो।'
बस देखते ही
देखते हजारों की संख्या में डाकू आकर पूरे राज्य में फैल
गए। वे लोग जहाजों में
चढ़कर समुद्र पार कर देश-विदेश में डकैती करते थे उन्हें
'बोम्बेटे'
कहा जाता था -
उनसे कोई नहीं बच सकता था। राजा सोता रहा। डाकुओं ने उन सब
को मार कर रुपये-पैसे सब
लूट लिये। फिर मेनिया-फेनिया सहित उस चक्की को भी जहाज पर
चढ़ा लिया। फिर डाकुओं के
सरदार ने कहा,
'वाह,
यह बहुत अच्छा हुआ-चक्की में से जो चाहो निकाला जा सकता
है। धन
दौलत तो हमारे पास बहुत है केवल नमक नहीं है। अब हमारे लिए
नमक की भी कमी नहीं
रहेगी। ठेल,
ठेल,
ठेल। निकले नमक-नमक-नमक!'
मेनिया-फेनिया फिर से चक्की चलाने लगी
और नमक,
केवल नमक ही निकलने लगा। नमक,
नमक,
और सिर्फ नमक। आखिरकार नमक के बोझ से
जहाज डूब गया। सब डाकू भी डूबकर मर गये। वैसी भयानक चक्की
डूबते समय जो हुआ,
क्या
बताऊँ।
समुद्र के पानी में छेद होकर हड़-हड़ के शब्द के साथ चक्की
के इर्द-गिर्द
पानी चक्कर लगाने लगा - चक्की तब से लेकर आज तक चल रही है।
और उस नमक का क्या हुआ?
क्या होगा,
वही नमक समुद्र के पानी में घुल गया। दो दानव कन्याओं ने
मिलकर कोई
थोड़ी बहुत नमक तो नहीं निकाला था। समुद्र का सारा पानी
तभी से खारा हो गया। मेरी
बात का विश्वास नहीं तो खुद ही चखकर देख सकते है।
