बच्चों
को शिक्षकों के आपसी व्यवहार का भी पता है। वे नहीं चाहते कि स्कूल में शिक्षकों में आपस में तनातनी हो। बच्चे नहीं चाहते कि शिक्षक च्विंगम,पान-बीड़ी-तम्बाकू और मदिरा का सेवन करे। बच्चे चाहते हैं कि उनके शिक्षक उन्हें प्यार करें। उनके कॅरियर के बारे में सोचें। उन्हें दिशा दें। बच्चों की बातों को नज़रअंदाज़ न करें। अकारण सज़ा न दे। आगे पढ़िये...
रायपुर ।
पत्रकार और रंगकर्मी राजकुमार सोनी की पहली किताब ‘बिना शीर्षक’ का विमोचन आज विधान सभा के सभा कक्ष में होगा । वैभव प्रकाशन, रायपुर द्वारा प्रकाशित इस कृति में छत्तीसगढ़ के विशिष्ट व्यक्तियों के विषय में रोचक लेख संग्रहित हैं। आगे पढ़िये...
पत्रकार
तो विनोद जी को अपने ग्रुप के सीनियर की तरह देखते थे। बिना हिचक उनके घर रुक जाना, जो भी मदद हो माँग लेना, उनकी आदत बन गई थी। निर्मल मित्रा, कल्याण मुखर्जी तो विनोद जी के परिवार के सदस्य हो गए थे। दोनों सम्पादक, एसपी सिंह और एमजे अकबर विनोद जी को साधिकार फ़ोन कर देते थे और सूचनायें माँग लेते थे। यही विनोद जी का बड़प्पन था, वे अपने अख़बार के अलावा भी बाक़ी सब की भी मदद करते थे। आगे पढ़िये...
भारत को अगर सचमुच समावेशी विकास के रास्ते पर ले जाना है और क्षेत्रीय एवं सामाजिक-असंतुलन दूर या कम करना है तो उसके लिए भी भारतीय जनगणना में जाति-समुदाय की गिनती के ठोस आंकड़े जरूरी हैं। अमेरिका और यूरोप के अनेक देशों ने अपने यहां सामाजिक-सामुदायिक संतुलन बनाए रखने और आर्थिक विकास के बेहतर माडल के क्रियान्वयन के लिए भी अपनी जनगणना के दौरान विभिन्न समुदायों, एथनिक समूहों और नस्लों की गिनती का सिलसिला जारी रखा है। कम से कम इस वजह से उन देशों में कहीं भी न तो नस्ली दंगे हुए और न ही एथनिक झगड़े। आगे पढ़िये...
एक पेड़ जो फलदार होता है उसका मुआवज़ा सरकार बिना फल वाले पेड़ों से कई गुना अधिक देती है क्योंकि उस पेड़ का एक उत्पादक योगदान होता है। लेकिन इस देश को अगली पीढ़ी देने वाली, दुनिया भर के लिए कामगार देने वाली हिन्दुस्तानी माँ को बिना आमदनी वाला मानकर बीमा कंपनी कम मुआवज़ा दे और देश की जनगणना उसे भिखारियों, क़ैदियों और वेश्याओं की तरह अनुत्पादक गिने यह बहुत अपमानज़नक है। आगे पढ़िये...
प्रभाष जी
ने अपने देशज संस्कार और राष्ट्रीय सरोकार भले ही गांधी, विनोबा और जयप्रकाश नारायण से लिये हों, लेकिन उनके फक्कड़ और जुझारू व्यक्तित्व के निर्माण में भवानीप्रसाद मिश्र, कुमार गंधर्व, राहुल बारपुते, शरद जोशी जैसे अनेक लोगों के साथ रामनाथ गोयनका का नाम भी प्रमुखता से शामिल है। सभी को प्रभाष जी ने शिद्दत के साथ याद किया है। आपातकाल के दौर में जिन दिनों रामनाथ जी प्रेस की आज़ादी, लोकतंत्र और एक्सप्रेस समूह को बचाने के लिए जीवन-मरण की लड़ाई लड़ रहे थे, प्रभाष जी उनसे घनिष्ठता से जुडे़ थे। उनके संपादकीय तेवरों का निर्माण और निखार एक्सप्रेस समूह से जुड़ने के बाद ही हुआ था। वी.जी. वर्गीस की रामनाथ गोयनका पर पुस्तक आने के बाद भी प्रभाष जी की यह अंतिम इच्छा अधूरी रह गई कि वे उन पर एक बड़ी पुस्तक स्वयं लिखते।
आगे पढ़िये...
नई दिल्ली । जनगणना में जाति को शामिल करने के विरोध में "सबल भारत" द्वारा संचालित "मेरी जाति हिंदुस्तानी आंदोलन" ने 27 जुलाई को एक विशाल मार्च का आयोजन किया। सैकड़ों, छात्र, लेखकों, पत्र्कारों, बुद्घिजीवियों, उद्योगपतियों एवं किसानों ने 13, बाराखंबा रोड से जंतर-मंतर तक मार्च किया। इस मार्च का नेतृत्व आंदोलन के सूत्र्धार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने किया। आगे पढ़िये...
अगर
इस नज़रिए से राजगोपाल जी की ग़ज़लें सुनी जाएँ तो वे हमें एक ऐसे सफ़र परले जाती हैं जिसका अगला स्टेशन कौन-सा होगा; ये अंदाज़ा हम नहीं लगा सकते।या यूँ कहें कि किसी फ़कीर का फ़लसफ़ा है उनकी ग़ज़लें, जो ज़मीन से आसमान को, साकार से निराकार को जोड़ती चलती हैं। आगे पढ़िये...
जोधपुर । भारतीय दलित साहित्य अकादमी का 16 वाँ प्रादेशिक सम्मेलन 18 जुलाई को जोधपुर में पूर्व सांसद जमना बारुपाल के मुख्य आतिथ्य व अकादमी राष्ट्रीय अध्यक्ष सोहनपाल सुमनाक्षर की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। विशिष्ठ अतिथि के रूप में अकादमी के प्रदेशाध्यक्ष स्वामी आत्माराम उपाध्याय, भोपालगढ विधायक कसमा मेघवाल, लुणी प्रधान तुलसीराम मेघवाल थे। आगे पढ़िये...
अभी हम न तो इस भांडाफोड़ की नैतिकता या उसकी वैधानिकता पर जा रहे और न ही हम इस पर जा रहे कि इससे अमरीकी सेनाओं या सैनिकों पर दूसरे देशों में कौन से नए ख़तरे खड़े हो जाएँगे, हम अभी सिर्फ़ यह बात करना चाहते हैं कि इस भांडाफोड़ से अमरीका की जो विदेश नीति और सैनिक नीति सामने आ रही है वह किस तरह भारत जैसे अमनपसंद देशों के ख़िलाफ़ है और पाकिस्तान जैसे धर्मांध और तानाशाह और आतंकी देशों के साथ है। इससे यह भी पता लगता है कि अमरीकी फ़ौजें और अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियाँ किस तरह अफगानिस्तान जैसे देश में रूसियों के ख़िलाफ़ तालिबानों को खड़ा करने में मदद करती रही हैं। आगे पढ़िये...
गुजरात यूनिवर्सिटी
बिन शैक्षिक स्थापितों का मैदान बन जाय उसके सामने उमाशंकर जंग में कूद पड़े थे और उपकुलपति के पद पर रहे थे ? वह समय इसलिए भी याद है कि उस वक्त हम एम.ए. के भाषा भवन के छात्र थे । उमाशंकर जोशी उपकुलपति पद की कुर्सी पर से सीधे एम. ए. के वर्ग में पढ़ाने भी आते और "गांधीजी की आत्मकथा" का अनुशीलन भी करवाते । फिर तो आजोल के ज्ञानसत्र में साहित्य चर्चा में गांधी और सार्त्र के बारे में थोडा कुछ बोला था,
आगे पढ़िये...
छत्तीसगढ़
की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा प्रेमचंद जयंती के अवसर पर देश के दो मूर्धन्य रचनाकार अज्ञेय और शमशेर की जन्मशताब्दी वर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जा रहा है । यह आयोजन 30-31 जुलाई, 2010 को होटल गोल्डन ट्यूलिप, व्ही.आई.पी.रोड किया जा रहा है जिसमें देश और राज्य के 200 से अधिक साहित्यकार भाग ले रहे हैं । समारोह की शुरूआत 30 जुलाई की शाम 7 बजे राष्ट्रीय कविता पाठ से होगी। आगे पढ़िये...
महाराष्ट्र
राज्य हिन्दी साहित्य अकादेमी ने वर्ष 2008-09 के पुरस्कारों की घोषणा की है । जिसके अतंर्गत विधा पुरस्कारों में कहानी के लिए मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार श्री मनमोहन सरल को दिया जाना तय किया है । इसके लिए उन्हें रूपये 25,000 की राशि, प्रतीक चिन्ह, शाल आदि से 27 जुलाई को महाराष्ट्र राज्य के गेस्ट हाऊस सह्याद्रि में आयोजित समारोह में सम्मानित किया जायेगा । आगे पढ़िये...
सूचना और समाचार में एक फ़र्क होता है, सूचना एक चाकू या हँसिए की तरह की मुर्दा चीज़ होती है और समाचार ऐसी मुर्दा चीज़ों को मिलाकर, उनका एक सार्थक मतलब निकालकर उसे जनता के सामने रखता है। समाचारों में विचार नहीं होते लेकिन समाचारों को बनाने में विचारों का इस्तेमाल इस हद तक होता ही है कि उनकी सनसनी के साथ-साथ उनके मायने को भी समझा जाए और फिर व्यापक हित को देखते हुए उस जानकारी को जनता के सामने रखा जाए या न रखा जाए। यह किसी तरह की सेंसरशिप नहीं होती लेकिन यह एक क़िस्म का आत्मनियंत्रण ज़रूर होता है जो कि हाथ लगी सूचना के आनन-फानन बाज़ारूकरण और नगदीकरण से ज़िम्मेदार पत्रकारों को रोकता है। आगे पढ़िये...
कोटा ।
“हमारे जीवनचर्या में दिखावे का गणित अधिक है, जिससे किसी को भी अपने भीतर झाँकने की फुरसत नहीं मिल पा रही है । आने वाले पाँच सालों में हमें कलागुरुओं की कार्यशालाओं पर ज़ोर देते हुए कक्षा एक से पांच तक की पीढ़ी पर अपने काम को केन्द्रित करना होगा।एक और ग़ौरतलब बात कि समाज में संयुक्त परिवार आज़ादी के बाद से ही लगातार रूप में टूटते जा रहे हैं,वहीं घरों में पति-पत्नी के कामगार बन जाने पर टी.वी. ही संस्कार देने-लेने का एकमात्र साधन हो चला है,ऐसे में हम जैसे संकृतिकर्मियों और शैक्षणिक संस्थानों की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है।'' स्पिक मैके संस्थापक अध्यक्ष डॉ.किरण सेठ ने ये विचार राजस्थान इकाई के कोटा अधिवेशन में बाईस जुलाई को उद्घाटन के अवसर पर रखे। आगे पढ़िये...
लंदन ।
नेहरू सेटर, लंदन में 21 जुलाई 2010 के दिन कथा यूके और एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स द्वारा प्रकाशित ‘ब्रिटेन की उर्दू क़लम’ का लोकार्पण भारतीय उच्चायोग के मंत्री (समन्वय) आसिफ़ इब्राहिम ने किया । इसका संपादन तेजेन्द्र शर्मा एवं ज़कीया ज़ुबैरी ने किया है जिसमें ब्रिटेन में बसे 8 उर्दू कहानीकारों की 16 कहानियों का हिंदी अनुवाद प्रकाशित है। प्रो. अमीन मुग़ल ने कहा कि हिंदी और उर्दू बहुत नज़दीकी भाषाएँ हैं और दोनों के बीच आदान-प्रदान की लम्बी परम्परा है । आगे पढ़िये...
उसे
इस बात की पीड़ा हर समय मन ही मन खाती रहती कि वह चाहे कितनी ही अच्छी तरह कोई भी काम क्यूँ न कर ले चाहे घर का हो या राजनैतिक क्षेत्र का पर जयंत ने कभी अपना मुँह खोल कर उसकी तारीफ़ नहीं की । बाहर वाले लोग उसके काम की तारीफ़ करते नहीं थकते थे और उसके साथ-साथ हर कार्यक्रम में जयंत को पूरा मान सम्मान मिलता, पर सबके बावजूद जयंत हर समय गुमसुम सा ही रहता । आगे पढ़िये...
देश के कई राज्यों में ऐसे अपराधी गिरोह हैं जो क़ानून की पकड़ से बाहर रहते हैं और खुलकर बड़े-बड़े अपराध करते हुए पूरी ज़िंदगी ही सज़ा से परे गुज़ार देते हैं। समय आने पर राजनीतिक दल इन्हें भारी सम्मान के साथ अपनी पार्टी की टिकट देकर संसद या विधानसभा तक भी ले आते हैं। पाठकों को याद होगा कि कोई चौथाई सदी पहले बिहार के भागलपुर में गिरफ़्तार कुख्यात अपराधी की आँखें जेल या पुलिस हिरासत में फोड़ दी गई थीं क्योंकि लोगों का मानना था कि देश का क़ानून इन्हें किसी किनारे तक नहीं पहुँचा पाएगा। ऐसा और कई जगहों पर होता है जहाँ गाँव के लोग किसी कुख्यात बदमाश को पीट-पीटकर मार डालते हैं। आगे पढ़िये...
चंडीगढ़।
विगत दिनों पंजाब कला भवन सैक्टर- 16 में संस्कार भारती ने नटराज पूजन महोत्सव के अवसर पर कला के उस्तादों का सम्मान भी किया गया । जिन कलाकारों को सम्मानित किया गया उनमें गणेश प्रसाद शर्मा ( गायन ) गोपाल दास (वादन) डॉ. वीरेंद्र मेहँदी रत्ता (साहित्यकार), शिव सिंह (मूर्ति कला), डॉ. जोध सिंह (चित्र कला ), डोली गुलेरिया (लोक गीत), कमल अरोरा (नाट्य कला), शोभा कोसर (नृत्य कला )और सोम दत्त शर्मा (पत्रकारिता ) प्रमुख हैं । आगे पढ़िये...
अगर कोई कुदरत को देखे तो समझ आएगा कि वह तो ऐसी राह दिखाते ही चलती है। पतझड़ में पुराने पत्ते गिर जाते हैं और नई कोंपलों के लिए जगह बना देते हैं। फल गिरते हैं और ख़ुद ख़त्म होने के बाद बीजों से दूसरे पेड़ खड़े हो जाने की जगह बना देते हैं। आज श्रीलंका की टीम से टेस्ट क्रिकेट में एक बड़ा सफल खिलाड़ी कम हो गया है लेकिन इससे वहाँ के किसी एक नए खिलाड़ी को आगे बढऩे का मौक़ा मिलेगा। आगे पढ़िये...
बांदा ।
केदार शोध पीठ न्यास, बाँदा व सचिव, केदार सम्मान समिति नरेंद्र पुंडरीक के बताया है कि कवि अष्टभुजा शुक्ल को उनके कविता संग्रह "दु:स्वप्न भी आते है" के लिए वर्ष 2009 को का केदार सम्मान देने का निर्णय किया गया है। प्रति वर्ष दिया जाने वाला यह चौदहवाँ केदार सम्मान है। इस से पूर्व समकालीन कविता के चर्चित 13 कवियों को केदार सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है । इनके अब तक तीन काव्य संग्रह आ चुके हैं। कविता के अतिरिक्त ललित निबंधों व पदों की रचना के कारण वे अपनी विशेष पहचान हिन्दी जगत् में बना चुके हैं। आगे पढ़िये...
कुछ सामान्य सी लगती बातों से खंडनात्मक या सर्जनात्मक परिणाम मिलते हैं । परिवर्तन अनिवार्य है । वह सहज और सर्वस्वीकृत हो, यह ज़रूरी है । सवाल इतना ही है की उसमें हम कितने सहज हैं ? स्वीकृति में भी हमें अपनी समझ को जाँचना चाहिए, भेड़ों के प्रवाह की तरह जुड़कर मूर्खता साबित करना बुद्धिमानी नहीं है । संघर्ष किसको पसंद है? सच मानो तो प्रत्येक इंसान को शांति से जीना है, परिवार-समाज को चाहकर जीना है । तो फिर चारों ओर संघर्ष क्यों हो रहा है? आगे पढ़िये...
मीडिया में जब से कैमरों और माइक्रोफ़ोन का दख़ल बढ़ा है तबसे कई लोग अधिक बातूनी हो गए हैं और अपने चेहरे, कपड़ों के लिए अधिक चौकन्ने भी हो गए हैं। किसी महत्वपूर्ण अख़बार के मुक़ाबले किसी महत्वहीन टीवी न्यूज चैनल को समय देने वाले नेता और अफ़सर बढ़ते चल रहे हैं क्योंकि इंसान की अपने-आपको देखने की हसरत नार्सिसस के समय से अब तक कम नहीं हुई है।
आगे पढ़िये...
दिल्ली ।
पत्रकारिता के सम्मान की कड़ी में गुरुवार को एक भव्य समारोह में चौथे रामनाथ गोयनका अवार्ड्स फॉर एक्सलेंस पुरस्कार के विजेताओं के नाम का एलान किया गया। समारोह में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के वरिष्ठ रिपोर्टर विजय प्रताप सिंह को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। इलाहाबाद में बम विस्फोट में घायल होने के बाद सिंह का इसी हफ्ते निधन हो गया था। सिंह को सच्चाई की खोज में अप्रतिम साहस दिखाने के लिए मरणोपरांत इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आगे पढ़िये...
ये सच है
कि कलाकार की भूमिका का प्रभाव समाज पर पड़ता है परन्तु कलाकार भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता। जैसे रंग तो पहले से ही हैं न, कलाकार ने रंग तो नहीं बनाए पर उन रंगों का समन्वय कैसे करना है। समाज का कौन सा रंग प्रभावित करेगा, ये सारा कलाकार की पैनी दृष्टि का नतीज़ा होता है। आगे पढ़िये...
हम देखते हैं
कि किसी के दो-तीन दोस्तों से ज़्यादा दोस्त नहीं होते और दोस्ती भी दो-तीन साल चल गयी तो बहुत मानी गयी। यहाँ तो 30 साल क़ायम न रही तो दोस्ती क्या? (मेरी भी 1976 में इमरजेंसी के दौरान ही हुई थी)। और समुदाय के बाहर दोस्ती की यह लंबी अवधि और दोस्तों की क़तार की क़तार। जो भी चाहे इस चुनौती को उठा ले। कर के दिखाये। और उनकी विरासत का अलंबरदार बन जाये। ख़ुशी होगी जो कोई उनसे बड़ी रेखा खींच दे। आगे पढ़िये...
हैदराबाद । भारतीय भाषाओं और साहित्य की सेवा के लिए नवगठित संस्था ‘साहित्य मंथन’ के तत्वावधान में यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सभागार में आयोजित समारोह में हैदराबाद की चर्चित कवयित्री ज्योति नारायण की चौथी कविता पुस्तक ''ज्योति सागर'' का लोकार्पण समारोह संपन्न हुआ । मुख्य अतिथि डॉ. राधे श्याम शुक्ल ने कहा कि 'ज्योति सागर' में ज्योति नारायण का अब तक का सर्वश्रेष्ठ सृजन संकलित है। इन कविताओं में प्रेम की अभिव्यक्ति को संकोचहीन होकर ग्रहण करना आवश्यक है क्योंकि लौकिक प्रेम भी बड़े उदात्त भाव के साथ जुड़ा हुआ है। राग ही मानव मन का एकमात्र स्थायी भाव है तथा दूसरे सब भाव और रस उसी से उपजते हैं। आगे पढ़िये...
प्रख्यात आलोचक व जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवकुमार मिश्र ने कहा कि वर्तमान समय में साहित्य, कला व संस्कृति गहरे संकट के दौर से गुज़र रही हैं। इस दौर में आदमी की रचनाधर्मिता चुनौतियों के बीच खड़ी है। उन्होंने कहा कि ये निहायत ही रचना विरोधी समय है और साहित्य अभिव्यक्ति का इतना स्खलन पहले कभी नहीं हुआ था। मिश्र ने कहा कि यदि समय का चरित्र यही रहा तो फिर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आने वाले दिन में आदमी कितना आदमी रह जाएगा। देखा जाए तो आज आदमी का भी क्षरण हो रहा है और बाजारतंत्र हम पर हावी है। आगे पढ़िये...
लखनऊ । वरिष्ठ पत्रकार दयाशंकर शुक्ल सागर को अमेरिका की जोन्स हापकिंस यूनिवर्सिटी ने फ़ैलोशिप-2010 के लिए चयनित किया है। श्री शुक्ल को जुलाई मध्य में पंद्रह दिन के टोबैको कंट्रोल लीडरशिप प्रोग्राम के लिए अमेरिका की वालटीमोर एमडी स्थित जोन्स हापकिंस यूनिवर्सिटी में आमंत्रित किया गया है। श्री शुक्ल इस तरह की फ़ैलोशिप पाने वाले हिन्दी के पहले पत्रकार हैं। आगे पढ़िये...
जनयुद्ध
शुरू करने के पीछे जो भी कारण रहा हो, युद्ध तो आख़िर युद्ध ही है। युद्ध करने वाले हमेशा यही कहते हैं कि वे किसी पवित्र उद्देश्य से लड़ रहे हैं। युद्ध के आगे कही जानेवाली सारी बातें युद्ध के समय में गौण हो जाती हैं। मानव अधिकार, सार्वजनिक संपत्ति, आम लोग सब युद्ध के लिए बाधाएँ हैं। जितने वालों को तो जीतना है, चाहे जो करना पड़े। शायद गुरिल्ला युद्ध इसी को कहते हैं। मुझे तो ज़्यादा मालूम भी नहीं है। लेकिन यही गुरिल्ला युद्ध ने मेरी पूर्णिमा को मुझसे छीना।‘
आगे पढ़िये...
रायपुर । इंडिया टुडे के कार्यकारी सम्पादक जगदीश उपासने एवं भाजपा, छत्तीसगढ़ के प्रदेश उपाध्यक्ष सच्चिदानंद उपासने के पिता श्री दत्तात्रय उपासने (वर्ष 87) का सोमवार 19 जुलाई को निधन हो गया। वे प्रख्यात समाज सेवी थे, स्व. उपासने की धर्मपत्नी श्रीमती रजनीताई उपासने रायपुर शहर से विधायक भी रही हैं। उपासने परिवार का राजनीति एवं समाज सेवा में काफी योगदान रहा है। आगे पढ़िये...
दिल्ली । विगत तीन दशकों से जीवन निर्माण एवं युग निर्माण की दिशा-निर्देशिका संस्था मनीषिका (शोध-संस्कृति-संस्कार-सेवा संस्थान) द्वारा राष्ट्र की नई पीढ़ी के चरित्र की उज्ज्वलता तथा प्रतिभा को प्रखरता देने के बहुआयामी प्रयासों के संदर्भ में अखिल भारतीय स्तर पर सामाजिक चेतना कविता-प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। आगे पढ़िये...
हरिमती आज सचमुच आक्रोश से भर उठी।
बोली, ‘हाँ मझली! सही कहा तुमने। मैं क्यों किसी की चाकरी करूँ, किसी की चार बात सुनकर क्यों रोटी तोड़ूँ? मैं आज अपना हक लेने आई हूँ। अब जाँगर नहीं है खटने का। अब तो आराम करने का समय आ गया है।’ मझली की सारी हेकड़ी भूल गई। पर अब तो तीर हाथ से निकल चुका था। आगे पढ़िये...
राजस्थानी महिला हो या दुनिया की किसी भी संस्कृति की किसी दूसरे धर्म की महिला हो, उस पर चेहरे को ढाँके रखने की बंदिश बाक़ी समाज के साथ उसके सामान्य व्यवहार में आड़े आती है और उसके व्यक्तित्व विकास में भी रोक रहती है। अगर किसी समाज की महिला ख़ुद होकर भी अगर ऐसे परदे की हिमायती रहती है और उसे पसंद करती है तो भी हमारा यही मानना रहेगा कि ऐसी महिला सदियों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था से प्रभावित सोच के तहत ऐसे ख़्याल रखती है। लेकिन हमारी सोच एक सोच है, यह एक क़ानून के बारे में न होकर सामाजिक रिवाज के बारे में है। जब कभी किसी रिवाज को बदलने के लिए क़ानून बनाया जाता है तो उससे होने वाले नफ़े के साथ-साथ नुकसान को भी आँक लेना चाहिए। आगे पढ़िये...
उपन्यास की भूमि भी माओवाद तथा नक्सलवाद है।
'दिमाग़ में घोंसले’ का ब्रजराज जब जेल से निकल कर आता है तो उसके सामने वह आंदोलन नहीं है। आशुतोष ने कहा कि उपन्यास, उपन्यास न होकर 96 पृष्ठों का सिनाप्सिस है। यह उपन्यास बन नहीं पाया। उन्होंने कहा कि क्रांतिकथा में लेखक ने लेख प्रस्तुत किए हैं। कथा को गंभीर रूप से नहीं लिया गया। इसका फ़ार्मेट ऐसा है कि पाठक को कथा के साथ बहने नहीं देता। लेखक यह कहता प्रतीत होता है कि मैं उत्तर-आधुनिक लेखक हूँ। मेरा शिल्प अलग है। आगे पढ़िये...
दिल्ली । किताबघर, नई दिल्ली द्वारा आपने संस्थापक पं. जगतराम आर्य की जन्मतिथि 16 दिसम्बर को प्रतिवर्ष ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ के क्रम में वर्ष 2010 के लिए किशोरोपयोगी उपन्यास की श्रेष्ठ पांडुलिपि विचारार्थ 31 अगस्त 2010 तक आमंत्रित की गई हैं । इस बार आयोजक द्वारा दो किशोरोपयोगी उपन्यासों का चयन किया जायेगा । दोनों पांडुलिपियों के लेखकों को 21-21 हज़ार रुपये की सम्मान राशि प्रदान की जाएगी । सम्मानित पांडुलिपियों को प्रकाशित कर समुचित रॉयल्टी भी दी जायेगी । आगे पढ़िये...
"हमारा विवाह हो गया ।
हम हनीमून मनाने भी चले गये । फिर हम लोग दिल्ली आ गये । नील अपने पीएचडी में व्यस्त हो गये । मैं भी एक प्राइव्हेट कालेज में नियुक्त हो गई । हम दोनो ही एक सिद्ध योगी से योग की शिक्षा ले रहे हैं । मुझे अब तक सन्तान की कामना नहीं हुई है अतः हमारा शारीरिक सम्पर्क भी नहीं हुआ है । हम साथ रहकर भी अलग अलग हैं, एक दूसरे से मुक्त ।" आगे पढ़िये...
राइट इस किताब
में हमें एक ऐतिहासिक यात्रा पर ले जाते हैं और यह बताते हैं कि ईश्वर की अवधारणा का विकास किस तरह हुआ है और उसमें समय के साथ क्या बदलाव आये हैं। राइट अपनी यह खोज यात्रा मानवीय विकास की यात्रा के समानांतर चलाते हैं। प्रारंभ के आखेट जीवी लोगों के लिए प्रकृति से भी बड़ी चीज़ थी आत्मा, कबीलाई ज़िंदगी में बहुलदेव वाद आ गया और और उनके बहुत सारे देवता ज़िंदगी के तमाम पहलुओं पर नियंत्रण करने लगे। आगे पढ़िये...
नई दिल्ली ।
राजधानी की साहित्यिक संस्था ‘परंपरा’ द्वारा जाने-माने साहित्यकार विष्णु नागर और नरेश शांडिल्य को परंपरा ऋतुराज सम्मान देने की घोषणा की गई है। 2010 के "परंपरा सम्मान" उनके कविता संग्रहों के लिए दिया जाएगा। परम्परा विशिष्ट ऋतुराज सम्मान इस वर्ष जाने-माने संगीतकार एवं तुलसीदास, कबीर व स्वामी विवेकानन्द एकल नाटकों के प्रस्तुतकर्ता श्री शेखर सेन को देने की घोषणा की गई। यह सम्मान उनकी बहुमुखी प्रतिभा और मंचीय उपलब्धियों के लिए दिया जाएगा। निर्णायकों ने विष्णु नागर के काव्य संग्रह ‘कवि ने कहा’ और श्री शांडिल्य के काव्य संकलनों के आधार पर ऋतुराज सम्मान को इन दोनों साहित्यकारों में बाँटा है। आगे पढ़िये...
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को केंद्र सरकार की तरफ़ से अतिरिक्त मदद भी मिलनी चाहिए क्योंकि आरक्षित वनों को बचाए रखने के राष्ट्रीय नियमों के चलते छत्तीसगढ़ को देश के राष्ट्रीय हरियाली औसत से अधिक हरियाली बचाकर रखनी पड़ रही है जिससे कि उसकी ख़ुद की कई तरह की योजनाएँ धरी रह जाती हैं। हम ऐसी कटाई की उदारता की सिफ़ारिश नहीं कर रहे बल्कि केंद्र सरकार से यह मांग कर रहे हैं कि देश की धरती के लिए औसत से अधिक ज़िम्मेदारी निभाने वाले औसत से अधिक हरे-भरे राज्यों को एक मुआवज़ा-भत्ता मिलना चाहिए ताकि वे इससे राज्य के दूसरे हिस्सों में हरियाली बढ़ा सकें और पूरे देश के पर्यावरण को बेहतर बनाने में अपनी संभावनाओं का इस्तेमाल कर सकें। आगे पढ़िये...
सितारे तो चमकते हैं
मगर यहाँ उनके प्रदर्शन पर मानो ग्रहण लग गया था। क्या वजह है जो अर्जेंटीना के मैस्सी फ़ुटबाल ग्राउंड में लिटिल मैस्सी साबित हुए और जर्मनी के क्लाज व पुडॉस्की स्पेन के सामने बॉल पकड़ने के लिए नाचते से प्रतीत हुए। और इंग्लैंड का रूनी एक गोल के लिए रोता रह गया। एक तरह से महान खिलाड़ियों द्वारा दस नंबर जर्सी पहनने की परंपरा यहाँ धूमिल होती प्रतीत हुई। और शीर्ष स्थान खाली देख इस वर्ष के फीफा वर्ल्ड कप का सुपर सितारा ज्योतिष पॉल आक्टोपस बन गया। आगे पढ़िये...
यहाँ अज्ञेय
की वैश्विक भूमिका को आसानी से समझ सकते हैं। वैश्विकता की जो समझ आपमें थी, वह अपूर्व थी। किसी भी भाषा की जीवन्तता वैश्विक पहचान के बिना बनी नहीं रह सकती है, इस बात को आपने वैश्व विकता को नारें में बदलने से पहले ही पहचान लिया था और उसके लिए उपक्रम भी किया।Golden Wreath का सम्मान नोबेल पुरस्कार की तरह ही कड़े परीक्षण से गुजरता है, इसलिए यहाँ पर देशीय प्रभाव नहीं अपितु् क्षमता की आवश्यकता होती है। आगे पढ़िये...
दलित शब्द
की हमें ऐसी व्याख्या करनी चाहिये जो हमें गाँधी जी द्वारा बताये वर्गहीन समाज की रचना के लिये प्रेरित कर सके। मेरे ख़्याल से वर्गहीन समाज और सुन्दर भविष्य की रचना के लिये हमें एक ऐसा शब्द, ऐसा पद, खोजना होगा जो जाति, वर्ण, धर्म और सम्प्रदाय आदि की गूँज से मुक्त हो। विश्व के महान अर्थशास्त्रियों ने उसके लिये एक शब्द दिया है, सर्वहारा। यानी ऐसा सामान्य श्रमशील जन जिसके पास अपने श्रम को बेचने के सिवा और कुछ नहीं है। आगे पढ़िये...
रायपुर ।
द्वितीय
प्रमोद वर्मा स्मृति आलोचना सम्मान से प्रतिष्ठित कथाआलोचक मधुरेश और युवा आलोचक ज्योतिष जोशी को सम्मानित किया जायेगा । यह सम्मान उन्हें 31 जुलाई, प्रेमचंद जयंती के दिन रायपुर, छत्तीसगढ़ में आयोजित द्वितीय अखिल भारतीय प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में प्रदान किया जायेगा । उक्त अवसर पर शताब्दी पुरुष द्वय अज्ञेय और शमशेर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया है । यह सम्मान हिन्दी आलोचना की परंपरा में मौलिक और प्रभावशाली आलोचना दृष्टि को प्रोत्साहित करने के लिए 2 आलोचकों को दिया जाता है। संस्थान द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर देश के दो आलोचकों को सम्मान स्वरूप क्रमश- 21 एवं 11 हज़ार रुपये नगद, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह एवं प्रमोद वर्मा के समग्र प्रदान कर सम्मानित किया जाता है । इसमें एक सम्मान युवा आलोचक के लिए निर्धारित है। आगे पढ़िये...
वर्तमान लेखन
में कार्पारेट जगत का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। लेखन में भी भारतीय दृष्टिकोण पश्चिमी से भिन्न है। पश्चिम में भौतिक प्रगति पहले दर्ज़े पर है पर भारत में दूसरे दर्ज़े पर । हमारे यहाँ व्यक्ति पहले दर्ज़े पर है। पश्चिमी और पूर्वात्य का समन्वय कर लिखने वालों में एम. जे. अकबर और चन्दन मित्रा हैं। भारतीय परिस्थितियाँ बिल्कुल भिन्न हैं। भौगोलिक भिन्नता भी है। आबादी, पानी जैसी समस्या उनके यहाँ नहीं हैं। आगे पढ़िये...
आम तौर पर लोग महान बनने की संभावनाओं और महान बनने की सामाजिक ज़िम्मेदारी से अपने-आपको यह कहकर अलग कर लेते हैं कि हर कोई गांधी नहीं हो सकता या अगर उनकी फ़लां-फ़लां ज़िम्मेदारी नहीं होती तो वे भी कुछ करके दिखाते। लेकिन ऐसी बातें करने वाले लगभग तमाम लोग इस बात को भूल जाते हैं कि अपने दायरे में रहते हुए भी वे छोटे-छोटे ऐसे अच्छे काम कर सकते हैं और छोटे-छोटे ऐसे बुरे कामों से बच सकते हैं कि उनसे दुनिया एक बेहतर जगह बन सके। आगे पढ़िये...
रायपुर ।
मुक्तिबोध, परसाई और श्रीकांत वर्मा के समकालीन तथा हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक, कवि, नाटककार, विचारक और शिक्षाविद् श्री प्रमोद वर्मा की स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा वर्ष 2009 से दो राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार प्रारंभ किये गये हैं । यह सम्मान हिन्दी आलोचना की परंपरा में मौलिक और प्रभावशाली आलोचना दृष्टि को प्रोत्साहित करने के लिए 3 आलोचकों को दिया जाता है। वर्ष2010-11 के सम्मान हेतु निम्नानुसार प्रविष्टियाँ आमंत्रित हैः- आगे पढ़िये...
नाहन । भाषा एवं संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश ने नाहन मे दो दिवसीय राज्य स्तरीय चंद्रधर शर्मा गुलेरी जयन्ती समारोहों का आयोजन किया। इस समारोहों मे पदेश भर के क़रीब पचास कवियों व साहित्यकारो ने भाग लिया। इन कवियों व साहित्यकारो ने जहाँ चंद्रधर शर्मा के जीवन पर चर्चा की वहीँ अपनी कला की माध्यम से सामजिक आर्थिक व राजनैतिक बुराइयों पर भी कड़े तर्ज कसे। इस अवसर पर निदेशक भाषा एवं संस्कृति विभाग प्रेम शर्मा ने बताया कि भाषा एवं संस्कृति विभाग द्वारा साहित्य व कला के क्षेत्र मे अनेको कार्यक्रम आयोजित किये जाते है जिसका चंद्रधर शर्मा गुलेरी जयती भी एक हिस्सा है। आगे पढ़िये...
एक ओर शमशेर जी
जैसे शहरी संवेदना के और आधुनिक चेतना से संपन्न कवि से अपना संबंध बताना और होना, और दूसरी ओर इनका संबंध हरियाणा से है । और हरियाणा तो अपने गेहॅू के लिए जाना जाता है । कविता के लिए तो जाना नहीं जाता । तो इसलिए कविता संग्रह का नाम अन्त में इन्होंने ‘‘गेहूँ घर आया है’’ दिया है । यानी बताना चाहते हैं ये ज़मीन से जुड़े हुए हैं । खेती-बाड़ी से जुड़े हुए हैं। और एक कविता भी है ‘‘ गेहॅू घर आया है’’ और वह कविता इसलिए कविता लगती है कि, क्योंकि गेहॅू पर कविता क्या लिखी जाएगी या तो प्रकृति चित्रण लेकिन पहला ही शब्द है जिसमें एक थोड़ी सी नोक प्रकट होती है। आगे पढ़िये...
रायपुर ।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने 12 जुलाई को अपने निवास पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शेषनारायण चंदेले के शोध ग्रंथ 'गोपाल मिश्रा की कृतियों का आलोचनात्मक अध्ययन' का विमोचन किया। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ के प्रथम महाकवि गोपाल मिश्र पर केन्द्रित इस शोध ग्रंथ पर सन् 1974 में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय ने डॉ. चंदेले को पी.एच.डी. की उपाधि दी थी। लगभग 36 वर्ष बाद इस शोध ग्रंथ का प्रकाशन और विमोचन हुआ। आगे पढ़िये...
शर्मिला इरोम
पिछले दस साल से इसी क़ानून के विरोध में भूख हडताल पर है। नाक में नली डाल कर उसे ज़बरन तरल पदार्थ दिया जा रहा है, इसके अलावा पुलिस में यातना देने और शक़ की बिनह पर हिरासत में रखे जाने की ख़बरें सुर्खियों में रहती है जिसके चलते महिला अपनी शिकायत दर्ज़ करवाते हुये भी डरती है। अपने पिता द्वारा दी गई ज़मीन लडकी अपने भाईयों के नाम कर देती है ना चाहते हुये भी यह सोचकर की मायके से उसके संबंध ख़राब ना हो। आगे पढ़िये...
सरकार को सैम्पल जाँच की तरह तुरंत ही यहाँ भी यह जाँच करवानी चाहिए कि वैसी ही धोख़ाधड़ी इस राज्य में तो नहीं हो रही क्योंकि भ्रष्टाचार और बेईमानी एक-दूसरे से सीखने के मामले में कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत अक्सर एक साबित होता है, अच्छी बातों को सीखने के मामले में साबित हो या नहीं। सरकारों को इसे अपना एक नियमित तरीक़ा बना लेना चाहिए कि दूसरे देश-प्रदेश में जिस तरह की गड़बड़ी पकड़ाई है, वैसी गड़बड़ी की तलाश अपने राज्य में भी तुरंत ही कर ली जाए ताकि बड़े गबन, बड़ी चोरी और सरकारी खजाने को बड़े नुकसान के पहले मामला आगे बढऩा रूक जाए। आगे पढ़िये...
श्रीजगन्नाथ
की रथयात्रा या घोषयात्रा का महत्त्व सर्वजन-विदित है । ओड़िशा के सर्वत्र पुर-पल्लियों में भी इस महोत्सव की परिव्याप्ति रही है । आजकल केवल भारत में ही नहीं , बल्कि विदेशों में जगन्नाथ महाप्रभु की रथयात्रा महासमारोह में अनुष्ठित होती है । आकाशवाणी-दूरदर्शनादि विभिन्न माध्यमों से विशेष प्रसार के कारण श्रीजगन्नाथ का माहात्म्य आज के वैज्ञानिक युग में विश्वव्यापी बन चुका है ।
आगे पढ़िये...
पश्चिम के विकसित देशों में साल्वेशन आर्मी जैसे संगठन इस काम को करते हैं और वहाँ पर चर्च भी अमीरों से जुटाकर ग़रीबों को देने का काम करता है। भारत में धार्मिक संगठन अगर चाहते तो यह काम बहुत आसान हो जाता। यहाँ धर्म और आध्यात्म के नाम पर ही लोगों की जेब से आसानी से पैसा निकलता है और अगर इनसे जुड़े संगठन कोशिश करते तो कबाड़ भी आसानी से निकल जाता। आगे पढ़िये...
कितनी अच्छी बात है, किसी नदी की तरह, किसी लडक़ी का मनचली हो जाना और एक मनचली लडक़ी का बाज़ार में दही ख़रीदने जाना और दही ख़रीदते-ख़रीदते प्रेम-प्रसंग में दही की तरह जम जाना और जीवन की हर साँस प्रेम गंध से भरकर प्रेममय हो जाना कितनी सुखद घटना है यह। आगे पढ़िये...
की पूजा उड़ीसा के लोगों की भावनाओं से इस प्रकार गहराई से जुड़ गई है कि हर कोई व्यक्ति लगभग प्रत्येक गाँव तथा शहर में जगह-जगह जगन्नाथ मंदिर रथ महोत्सव को देख सकता है। भगवान जगन्नाथ तथा उनका रथ महोत्सव मिलन, एकता तथा अखंडता का प्रतीक है। यद्यपि वे पुरी में विराजमान हैं फिर भी वे इस संपूर्ण ब्रह्मांड के भगवान हैं तथा उनका प्रभावशाली चित्ताकर्षण सार्वभौमिक है। सभी लोग उनसे संबंधित हैं एवं वे सभी से संबंधित हैं। आगे पढ़िये...आज तमाम नामी गिरामी पत्रिकाओं को देखा जाए
तो उनमें गाडफ़ादर्स की देखरेख में पले बढ़े लेखकों का कूड़ा ही पढ़ने में आएगा। यहाँ गाडफ़ादर संपादक के भूमिका में अपने प्रिय लेखक, साहित्यकार को उपकृत करते देखे जा सकते हैं। यदि किसी भी ख्यात साहित्यिक पत्रिका के वर्ष भर के अंको का अवलोकन किया जाए तो उनमें 30 से 40 प्रतिशत लेखकों की किसी न किसी रूप में पुनरावृत्ति ही दिखाई देगी। क्या 70 करोड़ हिंदी जानने समझने वालों में सात-आठ सौ ऐसे लोग भी नहीं है जिनमे साहित्य की कुछ समझ है? आगे पढ़िये...
लंदन ब्रिटेन में
भारत के उच्चायुक्त नलिन सूरी ने ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में हिन्दी लेखक हृषिकेश सुलभ को उनके कथा संकलन ‘वसन्त के हत्यारे’ के लिये ‘सोलहवाँ अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान’ प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने ब्रिटेन में बसे हिन्दी लेखक महेन्द्र दवेसर और कादम्बरी मेहरा को ग्यारहवाँ पद्मानंद साहित्य सम्मान भी प्रदान किया। ब्रिटेन में लेबर पार्टी के सांसद बैरी गार्डिनर और वीरेन्द्र शर्मा ने सम्मान समारोह की मेज़बानी की। आगे पढ़िये...
पूरे उपन्यास में इस तरह के वाक़ये हैं
जो भले ही कथा के मूल विषय से परे हैं पर कथा सूत्र को आगे बढ़ाने में और कथा समय के यथार्थ को चित्रित करने में एक अलग ढंग का ट्रीटमेंट बनकर उभरे हैं। उपन्यास में तीन अलग-अलग ढंग के बिल्कुल अनछुए से प्रेम प्रसंग हैं। एक ओर डायना जो भले ही लंदन में पैदा हुई पर भारत आकर और चंडीदास से प्रेम करके बिल्कुल भारतीय हो गई। उसके भारतीय होने पर किसी का उस पर दबाव न था।
आगे पढ़िये...
भारत के अलग-अलग कई प्रदेशों में कुनबापरस्ती के चलते हुए क्षेत्रीय दलों ने और राष्ट्रीय दलों ने भी समय-समय पर अनुभवहीन लोगों को बिना मंत्रीपद के अनुभव के सीधे मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्री बनाया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के अपने आप पर इस काबू की हम तारीफ़ करेंगे कि पार्टी के संसदीय दल ने जब उन्हें भारत का प्रधानमंत्री बनाना तय कर लिया था तब भी उन्होंने उस ताज को उठाकर एक ऐसे व्यक्ति के सिर पर रखा जो विवादहीन था, जिसे देश-विदेश के मुद्दों की समझ थी और शासन-प्रशासन चलाने का अनुभव था। इसी तरह जब उनके लिए यह बहुत आसान बात थी कि वे अपने बेटे को दो-दो बार संसद का चुनाव जीत जाने के बाद प्रधानमंत्री बनाने की मनमानी कर सकती थीं तो उन्होंने फिर अपने आप पर काबू किया और यह तो देश में एक अलग तरह की मिसाल है कि कांग्रेसी राज्य में देश का भविष्य समझा जाने वाला राहुल गांधी एक मंत्री भी नहीं है। आगे पढ़िये...
पटना।
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी का कहना है कि माओवादी आतंकवाद से अब निर्णायक जंग लड़ने की ज़रूरत है क्योंकि यह देश के लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा संकट है। देश के सबसे ग़रीब 165 जिलों में क़ाबिज़ माओवादी प्रतिवर्ष दो हज़ार करोड़ की लेवी वसूलकर हमारे गणतंत्र को नष्ट करने की साज़िशों में लगे है। वे पटना (बिहार) स्थित बिहार उद्योग परिसंघ के सभागार में विश्व संवाद केंद्र द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला में “भारतीय लोकतंत्र में नक्सली हिंसा” विषय पर मुख्यवक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। आगे पढ़िये...
मैं आशुतोष।
न मैं संयुक्ता का पति न आम्रपालिका। जब संयुक्ता के साथ होता हूँ तो आम्रपाली याद आती रहती है। जब आम्रपाली के साथ होता हूँ तो संयुक्ता साथ नहीं छोड़ती। प्रमोद और नीलिमा भी बीच में घुसे रहते हैं। मैं कभी बाराही मंदिर, कभी बेगनास के बीच में जाकर दो समानांतर ज़िंदगियों के बीच उभर आए खोखलेपन को देखता हूँ, महसूस करता हूँ। मुझे लगता है मेरा वजूद कभी न मिलनेवाले समानांतर रेखाओं के बीच कहीं गुम हो गया है। आगे पढ़िये...
"नयी पीढ़ी के नाम पर किये गये घपले में निहित आत्मप्रचारात्मक व्यावसायिकता की गंध आगे आने वाले लेखकों को भी मिल गयी। उनमें से भी कुछ लोगों ने खुद को जमाने के लिए अपने से पहले वालों को उखाड़ने का वही तरीका अपनाया, जिसे ‘नयी कहानी’ वाले कुछ लोग आजमा चुके थे। पीढ़ीवाद का यह घटिया खेल आज भी जारी है और इसे कुछ नयी उम्र के लोग ही नहीं, बल्कि कुछ साठे-पाठे भी खेलते दिखायी दे सकते हैं। बदनाम भी होंगे, तो क्या नाम न होगा!" आगे पढ़िये...
डॉ. नूर
के इस कथन ने कार्यक्रम में पधारे कई वरिष्ठ पंजाबी लेखकों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि लेखक का किसी विचारधारा के साथ पूरी तरह जुड़ा होना कतई ज़रूरी नहीं। क्योंकि इसके कारण लेखक की स्वतंत्रता व कल्पनाशीलता में प्रभाव पड़ता है। इसमें कोई शक नहीं कि विचारधाराएँ दिशा तो देती हैं लेकिन साथ में आपके सोचने व समझने की शक्ति को सीमित भी कर देती हैं। आगे पढ़िये...
रायपुर ।
हिंदी के जाने माने साहित्यकार और कवि. श्री गजानन माधव मुक्तिबोध की धर्मपत्नी श्रीमती शांता मुक्तिबोध का निधन बीती रात रायपुर में हो गया। उनकी अंतेष्टि आज रायपुर में है। वे दैनिक भास्कर रायपुर के पूर्व संपादक और वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध की माँ थीं। आगे पढ़िये...
जयपुर का बोधि प्रकाशन कोई बड़ा संस्थान नहीं है.
लेकिन 100 रुपये में दस किताबें देने की उसकी योजना ‘बोधि पुस्तक पर्व’ इन दिनों पाठक, प्रकाशन और आलोचना जगत में काफी चर्चा में है. फेसबुक पर रामकुमार सिंह इस योजना में रायल्टी के सवाल पर बड़ी बहस कर चुके हैं. इसे पुस्तक जगत की नैनो क्रांति बताया है. इस योजना को आर्थिक व्यावहार्यता और रायल्टी जैसे सवालों के बीहड़ से निकलने के बाद सामग्री की गुणवत्ता के प्रश्न के तपते रेगिस्तान को लांघना होगा. आगे पढ़िये...
कांग्रेस पार्टी की रीति-नीति नेहरू और गांधी के धता बताकर जिस तरह से उदारवादी होने के नाम पर पूंजीवादी-साम्राज्यवाद की ओर देश को ले जा रही है वह भाजपा जैसे प्रमुख विपक्षी दल को भी माक़ूल लग सकती है और वामपंथियों की आवाज़ तो वैसे भी सीमित है। देश में इन तीन पक्षों से परे सिर्फ़ क्षेत्रीय पार्टियाँ हैं जो अपने-अपने तानाशाहों के राज की तरह चलती हैं और जिनकी देश और दुनिया को लेकर न कोई व्यापक समझ है न जिनकी व्यक्तिवाद से परे कोई नीति है। आगे पढ़िये...
जिनके पास धन है,
लक्ष्मी है, माना जाने लगा है कि उनके पास सरस्वती भी होंगी ही। वही विद्वत्जनों की गोष्ठियों का शुभारंभ करते हैं, वही इस युग के महान तपसपुत्रों के प्रवचन का प्रारंभ कराते हैं, वही विद्यालयों, विश्वविद्यालयों के कार्यक्रमों के प्रमुख अतिथि बनकर सुभाषित वचन कहते हैं। और आश्चर्य ज्ञान के महारथी, अपने विषय के पंडितों की जमात उनके बकवाद पर हर्षोन्मत्त हो तालियाँ बजाती है। पैसा हमारे जीवन को निगलता जा रहा है, हम लालच के भंवर में उघ-चुघ कर रहे हैं, हमारा स्वाभिमान तिरोहित होता जा रहा है और हम हैं कि मुंगेरीलाल बने अपनी सपन-सजीली नींद में मस्त हैं। आगे पढ़िये...
हमारे अंदर छिपा
सूक्ष्म अहंकार या किसी के प्रति रही कटुता हमारे व्यक्तित्व को निस्तेज कर देता है । किसी इंसान के अवगुण की और देखने बजाय उनके अंदर रही अच्छाई को देखकर उसे समाज के सामने रखनी चाहिए । हमारे गुरुओं को तो सिर्फ़ अंगूलि-निर्देश करके गढ़े हुए मूल्यों को हमारे सामने रखना होगा । इस सत्कार्य को करनेवाला शिक्षक सामाजिक-राष्ट्रीय चरित्रों का गढ़ने वाला मसीहा बन सकता है । आगे पढ़िये...
एक शब्द, वाक्यांश, या वाक्य अनेकार्थी है अगर इसके एक से अधिक अर्थ हैं। उदाहरण के लिए, शब्द 'light', का अर्थ ना तो बहुत भारी हो सकता है और ना ही अंधेरा। शब्द जैसे 'light', 'note', 'bear', और 'over' शाब्दिक रूप से अनेकार्थी हैं। ये वाक्यांश या वाक्य में अनेकार्थता लाते हैं जिसमें ये बनते हैं, जैसे 'light suit' और 'The duchess can't bear children'. हालांकि, वाक्यांश और वाक्य अनेकार्थी हो सकते हैं भले ही उनके मूल से कोई नहीं है। आगे पढ़िये...
वरिष्ठ कवि
चंद्रकांत देवताले का नया कविता संग्रह 'पत्थर फेंक रहा हूँ' उनके लंबे अनुभव और चिंतन से उपजी कविताओं का संकलन है। यहां चिंतन की ठोस जमीन तो है लेकिन वह विषय से इतना घुल-मिल गई है कि अंत में यहां एक मज़बूत कविता की शक्ल में ही रह जाती है। देवताले अपनी कविताओं में निरंतर राजनीतिक सजगता और सामाजिक संदर्भों के अछूते विषय उठाते रहे हैं। आगे पढ़िये...
उनके व्यक्तित्व एवं विद्वता का उल्लेख करते हुए स्व. डा. नगेंद्र लिखते हैं कि गुलेरी जी अपने युग में शुद्ध प्रथम श्रेणी के विद्वान थे पुरातत्व, इतिहास, दर्शन, ज्योतिष, साहित्य भाषा विज्ञान - सभी में उनकी अबाध गति थी। फिर संस्कृत के अलावा पाली, प्राकृत आदि प्राचीन भाषाओं हिन्दी वाङग़ला, मराठी, अँगरेज़ी आदि आधुनिक भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। लैटिन, जर्मन और फ्रेंच का भी उन्हें अच्छा ज्ञान था। नतीजतन, उन्होंने न सिर्फ़ कहानियाँ लिखीं वरन् निबंध, कविताएँ और अनेक टिप्पणियाँ आदि भी उनके कृतित्व का हिस्सा हैं। आगे पढ़िये...
केदारजी
की कविताओं की प्राणवान भाषा में मिट्टी की गंध होती है जिसे सुगंध के विशेषण की दरक़ार नहीं होती। आलोच्य कविता में प्रयुक्त ‘सन्नाटा’ हमारे आज के समय में कितनी शिद्दत के साथ चुभ रहा है, यह सभी संवेदनशील प्राण महसूस रहे हैं। यूँ तो कवि केदार कविता में छिपे गहरे अर्थों की तलाश में अधिक नहीं भटकाते पर ‘जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।’
आगे पढ़िये...
भारत के बहुत बड़े शहरी तबक़े में बच्चों को माँ-बाप अपने प्यार के घेरे में रखते हैं और उन बच्चों के विकास में माँ-बाप की सबसे बड़ी फ़िक्र बच्चों का सेहतमंद होना, घर पर ठीक से खाना-पीना, स्कूल में पास हो जाना और बुरी संगत में न फँसना रहती है। इन बुनियादी मुद्दों से परे माँ-बाप की फ़िक्र कम रहती है और हथेली पर रखे फूल की तरह बच्चों को ज़िंदगी की कड़वी हक़ीक़त से दूर रखने की कोशिश हर कोई करते दिखता है। गरीब परिवारों के अपेक्षाकृत आज़ाद बच्चे काफ़ी वक़्त अपनी मर्ज़ी से घूमकर और खेलकर जिस तरह स्ट्रीट-स्मार्ट हो जाते हैं वैसे चतुर वे बच्चे नहीं हो पाते जो घरघुस्सू रहते हैं। नतीज़ा यह होता है कि दुनियादारी की समझ जो कि ग़रीब बच्चों में बेहतर रहती है वह संपन्न परिवारों के बच्चों में कम होती है। आगे पढ़िये...
भोपाल । माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति प्रो. बी.के. कुठियाला ने वरिष्ठ पत्रकार श्री रामशंकर अग्निहोत्री के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। अपने शोक संदेश में श्री कुठियाला ने कहा कि वे राष्ट्रवादी पत्रकारिता के सशक्त हस्ताक्षर थे। उनके निधन से देश ने एक सच्चा देशभक्त और निष्ठावान पत्रकार खो दिया है। आगे पढ़िये...
एक बार तो यह पता चल ही जाना चाहिए कि आख़िर इस देश के अजायबघर में कितनी जातियाँ हैं। वैसे यह ठेका तो अभी तक इस देश के सभी राजनीतिक दलों के पास है, जो बच्चे के पैदा होते ही उसमें अपने वोटबैंक की संभावनाएँ तलाश करने लगते हैं। वे ढूँढ-ढूँढ कर जाति वाले उम्मीदवार को टिकट देने के लिए स्वतंत्र हैं। जातिवाले के जीतने की संभावना भरपूर रहती है। आगे पढ़िये...
रायपुर । वेब पत्रिका सृजन गाथा डॉट काम एवं प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के सहयोग से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के प्रेस क्लब में आयोजित एक गरिमामय व्याख्यान एवं सम्मान समारोह में आज हिन्दी ब्लॉग लेखन में उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रदेश के ब्लॉगर संजीत त्रिपाठी सहित साहित्यकारों व पत्रकारों का सम्मान किया गया। आगे पढ़िये...
एक मंच पर पाँच-पाँच आई.पी.एस. इकट्ठा होकर यदि हिन्दी की एक पुस्तक पर परिचर्चा कर रहे हों तो सोचिए नजारा कैसा रहा होगा। मजे की बात यह रही कि उस बहुत बड़े हाल में आमन्त्रित साहित्यप्रेमियों की संख्या से कहीं अधिक पुलिस के जवान दिखायी दे रहे थे। लेकिन वर्दी में नहीं, सादे कपड़ों में। पीछे की आधी सीटें तो प्रशिक्षु रंगरूटों से भर गयी थीं। आगे की सीटों पर शहर के प्रतिष्ठित आमजन, व्यापार मंडल के प्रतिनिधि, अधिकारी वर्ग और मीडिया आदि के लोग जमे हुए थे। लेकिन जब चर्चा शुरू हुई तो मुझे लगने लगा कि आज छुट्टी बेकार नहीं गयी है। आगे पढ़िये...
मैं छात्रा थी।
उनकी पुस्तकें पढ़कर उद्वेलित हुई और उनके चाणक्यपुरी वाले घर में जा पहुँची, उत्साह से भरी हुई। देखा एक व्यक्ति कुर्ता-पायजामा पहने पौधों की गुड़ाई कर रहा था। गेट की कुंडी से आवाज़ कर उसका ध्यान अपनी तरफ़ खींचा था। वह उठकर आया था। बचकानी उतावली से पूछा था--अज्ञेय जी यहाँ रहते हैं? मुझे उनसे मिलना है।’ उन्होंने ऊपर से नीचे तक मुझे देखा था। गेट खोलकर अंदर आने का इषारा किया था। आगे जाकर बाईं तरफ़ की ओर जाने का निर्देश दिया था--‘बैठो तुम।’ आगे पढ़िये...
शमशेर का मौन कविता का मौन नहीं है।
गंभीरता का मौन है। समाज के महातल का मौन है। जो अब खुलकर इतिहास के रूप में इन किरण जीवित है। इसलिए कवि भी कविता के माध्यम से जीवित है। आलोचना अप्रैल-जून-10 में शमशेर के मित्र नरेन्द्र शर्मा ने (उन चार मित्रों में वीरेश्वर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, नरेन्द्र शर्मा, शमशेर बहादूर सिंह) एक जगह लिखा है- “बोडिंग हाऊस में शमशेर का कमरा बड़ी सडक़ की ओर खुलता था। जाड़ों की रातों में सडक़ के सहारे सोते हुए बेसहारा किसी ग़रीब को शमशेर ने कभी अपना गरम कोट दे डाला, आगे पढ़िये...
भारतीय लोकतंत्र में जुलूस और बंद जैसे बहुत से विरोध-प्रदर्शन के तरीक़ों को लेकर जब-जब अदालतों ने असहमति जताई है तब-तब राजनीतिक दलों ने उसे अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ बताया है और अदालती आदेश मानने से इंकार कर दिया। लेकिन जैसा कि कल के भारत बंद में सामने आया, ऐसी उग्र अभिव्यक्ति का नतीज़ा देश की उस शांत जनता को भुगतना पड़ता है जो शायद अभिव्यक्ति के इस तरीक़े से सहमत न हो और जिसका कोई भी भला ऐसे बंद से न होता हो। कल हमारे अख़बार के कई छायाकार जो तस्वीरें लेकर आए उनमें छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बहुत से इलाक़ों में हज़ारों मज़दूरों के खाली हाथ-पैर दिख रहे थे और एक दिन की मज़दूरी मारे जाने से वे तकलीफ़ में थे। आगे पढ़िये...
भोपाल। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी 22-23 जुलाई को अलंकरण समारोह का आयोजन करेगा। इस साहित्यिक अलंकरण समारोह का आयोजन भारत भवन में होगा। प्रदेश के संस्कृति और जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा इस अलंकरण समारोह के मुख्य अतिथि होंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता लब्धप्रतिष्ठित कथाकार चित्रा मुदग्ल करेंगी। आगे पढ़िये...
प्रकाशक क्या सिर्फ़
इसलिए दलित आत्मकथाओं के प्रकाशन में तत्परता दिखाते हैं कि स्वानुभूति से प्रेरित होने के कारण उनका यथार्थ अधिक प्रामाणिक होता है? अथवा वे यह मानते हैं कि दलित साहित्यकारों की सृजनात्मकता उतनी परिपक्व नहीं हुई कि अन्य विधाओं के मौलिक लेखन के क्षेत्र में ग़ैरदलित या तथाकथित सवर्ण साहित्यकारों की बराबरी कर सकें? अथवा दलित साहित्यकार मानते हैं कि वे अपने सर्वश्रेष्ठ केवल आत्मकथा में दे सकते हैं? प्रकाशक कहेंगे कि दलित आत्मकथाओं का बाज़ार है। वे पढ़ी जाती हैं, इसलिए आसानी से बिक भी जाती हैं।
आगे पढ़िये...
पढ़े-लिखे और राजनीतिक रूप से समझदार, सामाजिक सरोकारों वाले लोगों के नक्सल समर्थक होने के बारे में बात कर रहे हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं जिनकी हिंसा पर आस्था नहीं है लेकिन वे भारत में लोकतंत्र के मौज़ूदा हाल को लेकर इतने अधिक निराश हैं कि वे नक्सलियों के उठाए गए कुछ मुद्दों को वैचारिक समर्थन देते-देते कब उनके साथ हो जाते हैं यह शायद उन्हें ख़ुद भी पता नहीं लगता। भारत में नक्सल आंदोलन अब वैचारिक प्रतिबद्धता या लोकतांत्रिक-राजनीतिक-शासन के एक विकल्प के रूप में काम करने के बजाए सिर्फ़ आतंकी और हिंसक संगठन के रूप में काम कर रहा है और इसलिए अब इसे कोई वाद कहना ठीक नहीं लगता।
आगे पढ़िये...
ज़िंदगी के
लिये मौत की छलांग!जी हां ये सच है और उस छलांग की कीमत भी कितनी?आप कल्पना भी नही कर सकते कि इंसान की ज़िंदगी इतनी सस्ती है।महज़ कुछ सौ रूपये,बस।एक छ्लांग के लिये इतना और छलांग सही हुई तो दूसरी छलांग की तैयारी और अगर एक बार भी चूक हुई तो फ़िर भगवान ही मालिक है।महंगाई के इस दौर मे जब हर चीज़ रोज़ और महंगी होती जा रही है,लगता है कि इंसान की ज़िंदगी सस्ती हो रही है।अगर ऐसा नही होता तो यंहा का मंगल सिंह आज़ाद मात्र पंद्रह हज़ार रूपये मे चालीस दिन के लिये मौत की छलांग लगाने का ठेका नही लेता। पंद्रह हज़ार मे चालीस दिन और एक रात मे दो छलांग।यानी हिसाब लगाया जाये तो 187रू 50 पैसे प्रति छलांग।छ्लांग भी मौत की,चुके तो सच मे मौत और छलांग किसलिये,ज़िंदगी के लिये। आगे पढ़िये...
अब कन्फुँकिया गुरूजी हैं ।
जो कान में ऐसे फूँक मारते है की जीवन भर पूरे परिवार को कई पीढ़ी का गुलाम बना लेते हैं । कुलगुरु बनकर । चेले का कान गुरु की एक ही फूँक से भर से भर जाता है बस उसके बाद चेले को किसी दुसरे की बात नहीं सुनाई देती क्योंकि कान में जगह ही नहीं है। अब वह कान उसका नहीं रहा गुरूजी का हो गया । अब कान में सिर्फ़ गुरूजी का ही आदेश सुनाई देगा। आगे पढ़िये...
रश्मि खेरिया
की इस जिजीविषा को उनके पहले कविता संग्रह ‘अपने होने का सच’ में देखा जा सकता है। उनकी कविताओं में जीवन से जूझने की जो ज़िद और जद्दोजहद है वह बहुत कम कवियों में पाया जाता है। उन्होंने भले छंदों, प्रतीकों, बिंबों और मुहावरों में बहुत ज़्यादा प्रयोग नहीं किया हो लेकिन उनकी कविताओं अपने समय और समाज से मुठभेड़ करती हुईं एक बेहतर दुनिया की वकालत तो करती ही हैं। आगे पढ़िये...
अज्ञेय
के रंग इतने ताज़े क्यों हैं, ज़ाहिर है, उनमें कालजयी शास्त्रीयता है। ऐसी शास्त्रीयता, ऐसी क्लॉसिकी, जो उनके बाद निरंतर दुर्लभ होती गई। उनकी छाया में जीने वाली हिंदी कविता का उत्तर संरचना-संसार अब वैसे तो उत्तर आधुनिकता के राग-आलाप तक तो पहुँच गया है, मगर सोच और शिल्प के महावृक्ष के नीचे बैठ कर अज्ञेय ने जो नयाबोध दिया था, वह अब लापता है। इसलिए अज्ञेय बेहद प्रासंगिक हो गए हैं और अब कुछ ज़्यादा ज़रूरी-से लगते हैं। जबकि हिंदी कविता में वह बौद्धिकता लापता है, जिसे अज्ञेय जैसे सुकवियों ने संभव किया था। आगे पढ़िये...
तहलका द्वारा साहित्य पर केन्द्रित अंक का स्वागत. साथ ही तहलका का आभार, जिसके जरिये हमें युवा कथाकारों की रचानाओं और रचनाशीलता पर हिन्दी कथाजगत के बुजुर्गों की महत्वपूर्ण राय तथा एक जैसे ‘सुविचार’ जानने को मिले. युवा पीढ़ी की आलोचना होनी चाहिये,अक्सर लोग यही करते हैं, पर क्या उस आलोचना की भाषा की कोई मर्यादा नही होनी चाहिये? बुजुर्गियत की अचूक और कुठाँव मार झेल रहे इन अग्रज कथाकारो की बात और भाषा को सच मान लें तो कोई तर्क नही बचता जिसे आधार बना कर युवा लिखते रहें. आगे पढ़िये...
गडकरी का सरकार का ऐसा अनुभव महाराष्ट्र जैसे एक बड़े राज्य में था और वे संगठन के नेता के रूप में चुनाव में चाहे सफल न हुए हों, मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल को सभी ने सफल देखा था। ऐसा नेता अपनी पार्टी की सरकारों में ठीक काम न करने वाले या गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए मंत्रियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहकर पार्टी की संभावनाओं को बेहतर ही कर रहा है। आगे पढ़िये...
तुम भी तो हम जैसे हाड़-मास के बने हो।
तुम्हारी भी मेरी जैसी भावनाएँ होंगी, चाहतें होंगी, तुम्हें भी स्नेह सताता होगा। तुम भी अपनों को सहलाना चाहते होगे। मैं भी क्या निकली, कल रात तुमसे पूछा भी नहीं – ‘दिव्य, ऋतुदान के बाद इतने दिनों तक तुम कहाँ रहे ? यादों की बौछारों से तुम भीगे या नहीं ? तुम कैसे जीए दिव्य ?’ आगे पढ़िये...
कोलकाता। हिंदी के
लब्ध प्रतिष्ठित कथाकार शेखर जोशी को मानिक दफ्तरी ज्ञानविभा ट्रस्ट के प्रथम चंद्रयान पुरस्कार-2010 से नवाजा जायेगा। प्रबंध न्यासी धनराज दफ्तरी ने यह जानकारी देते हुए बताया की नयी कहानी में सामाजिक सरोकारों का प्रतिबद्ध स्वर जोड़ने वाले श्री शेखर जोशी को पुरस्कार स्वरुप 31,000 रुपये की राशि भेंट की जाएगी। पुरस्कार समोराह कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद् में रविवार 18 जुलाई को आयोजित होगा। समारोह की अध्यक्षता भारतीय भाषा परिषद् के निदेशक डॉ. विजय बहादुर सिंह करेंगे जबकि प्रसिद्द विद्वान डाक्टर शिवकुमार मिश्र, अहमदाबाद मुख्य वक्ता बतौर उपस्थित रहेंगे। कार्यक्रम का सञ्चालन पूर्व सांसद सरला महेश्वरी करेंगी। आगे पढ़िये...
सेनाध्यक्षों
के विरोध के बावजूद आर्म्ड फ़ोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट में बदलाव की गंदी राजनीति से हमारे सुरक्षाबलों के हाथ बंध जाएँगें। हमारी सरकार इस माध्यम से जो करने जा रही है वह देश की एकता-अखंडता को छिन्न-भिन्न करने की एक गहरी साज़िश है। जिस देश की राजनीति के अफ़जल गुरू की फाँसी की फ़ाइलों को छूते हाथ काँपते हों वह न जाने किस दबाव में देश की सुरक्षा से समझौता करने जा रही है। यह बदलाव होगा हमारे जवानों की लाशों पर। इस बदलाव के तहत सीमा पर अथवा अन्य अशांत क्षेत्रों में डटी फौजें किसी को गिरफ़्तार नहीं कर सकेंगीं। दंगों के हालात में उन पर गोली नहीं चला सकेंगीं। जी हाँ, फौजियों को जनता मारेगी, जैसा कि सोपोर में हम सबने देखा। आगे पढ़िये...
सावन कई रूपों में हमारे सामने आता है।
किसान के सामने लहलहाती फसल के रूप में, व्यापारी के सामने भरे हुए अनाज के गोदामों के रूप में, अधिकारी के सामने नोटों से भरे बैग के रूप में और नेता के सामने चुनाव के पहले मतदाता के रूप में और चुनाव के बाद स्वार्थ में लिपटे धन के रूप में। सबसे अलग सावन होता है युवाओं का। प्रेयसी या प्रिय का दिख जाना ही उनके लिए सावन के दर्शन से कम नहीं होता। इनके सावन की मस्ती का मजा तो न पूछो, तो ही अच्छा! आगे पढ़िये...
अब दाग़ को छिपाने की जरूरत नहीं है।
लोकतंत्र के मंदिर में प्रवेश करते समय दाग़ों को ज़ाहिर करना पड़ता है। ये दाग़ लोकतंत्र के मंदिर के पुजारियों ने बड़ी मेहनत से कमाए हैं। पूरे जीवन को इन्होंने दाँव पर लगा दिया। इन दाग़ों पर इन्हें शर्म नहीं आती, बल्कि गर्व का अनुभव होता है। इनके संपर्क में जो आता है, स्वयं को धन्य अनुभव करता है। उसे ऐसा लगता है जैसे परमपद का स्पर्श कर लिया हो। ये दाग़ स्थानीय न होकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उजागर होते हैं। इसलिए इनकी ख्याति अखिल विश्व में फैल जाती है और इन्हें अपनी छाती चौड़ी करने का मौक़ा मिल जाता है। आगे पढ़िये...
जो केंद्रीय गृहमंत्री अपनी ही पार्टी के दिग्विजयी नेताओं के हमले झेल रहे हैं उनके साथ नक्सल मुद्दे पर देश के किसी राज्य का मुख्यमंत्री अगर सबसे अधिक सहमत है तो वह छत्तीसगढ़ है। यहाँ के पुलिस प्रमुख विश्वरंजन ने सीआरपीएफ के बारे में कही गई बहुत सी बातों के बीच एक सवाल के जवाब में यह कहा कि इस फ़ोर्स को छत्तीसगढ़ पुलिस चलना तो नहीं सिखाएगी, तो उसके आगे-पीछे की बातों को जोडक़र देखें तो यह साफ़ है कि यह आपसी तालमेल के बीच सवाल के जवाब में किया गया सवाल था कि सीआरपीएफ को चलना सिखाने की ज़रूरत तो है नहीं। इस एक बात को केंद्र और राज्य के सुरक्षा बलों के बीच टकराव की तरह पेश करके टीवी के चैनल अपनी ख़बरों के पल भर के अस्तित्व को अधिक सनसनीखेज तो बना सकते हैं लेकिन अपनी ऐसी ही हरक़तों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यह साबित करता है कि प्रिंट मीडिया जितना ज़िम्मेदार होना उसके मिज़ाज़ में नहीं है। आगे पढ़िये...
रायपुर । राज्य की पहली वेब पत्रिका तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित, साहित्य, संस्कृति, विचार और भाषा की मासिक पोर्टल सृजनगाथा डॉट कॉम (www.srijangatha.com) के चार वर्ष पूर्ण होने पर चौंथे सृजनगाथा व्याख्यानमाला का आयोजन 6 जुलाई, 2010 दिन मंगलवार को स्थानीय प्रेस क्लब, रायपुर में दोपहर 3 बजे किया गया है । जिसमें हिन्दी के चर्चित आलोचक, समीक्षक और संपादक,उन्नयन, इलाहाबाद श्रीप्रकाश मिश्र, “कविता क्या, कविता क्यों ?” विषय पर व्याख्यान देंगे। आगे पढ़िये...
फैज अहमद फैज उर्दू के प्रगतिशील रचनाकारों में सबसे प्रसिद्ध कवि हैं। जोश, जिगर और फिराक के बाद की पीढ़ी के कवियों में वह सबसे लोकप्रिय थे। नोबेल प्राइज छोड़कर उन्हें साहित्य जगत का सबसे बड़ा सम्मान और पुरस्कार मिला। फैज उन कवियों में थे, जिन्होंने अपने विचारों के लिए अग्नि-परीक्षा भी दी। मशहूर रावलपिंडी षड्यंत्र केस के वह आरोपी थे। सज्जाद जहीर और फैज साहब पर पाकिस्तान में मुकदमा चलाया गया था। उन्हें कोई भी सजा हो सकती थी। वे काफी दिनों तक जेल में रहे ही। फैज साहब के एक काव्य संकलन का नाम है - ‘जिंदानामा’। इसका मतलब होता है कारागार। आगे पढ़िये...
आधुनिक
रावण, शासन के दृष्टिकोण से, यहाँ समाज कहना उचित न होगा, राक्षस तो है, लेकिन यहाँ उसके राक्षस होने का कारण है। उसका स्पष्टीकरण फ़िल्म का मोड़ है। वह अपनों के बीच एक सीधा-सादा व सरल इंसान है। और अंत तक पहुँचते-पहुँचते तो उसके गुण देवताओं के समान उपस्थित होकर उसे नायक से भी ऊँचे स्थान पर उठाकर बैठा देते हैं। आगे पढ़िये...
उज्जैन । मालवा रंगमंच समिति, उज्जैन और कृतिका कम्यूनिकेशन, मुंबई द्वारा हिंदी दिवस के अवसर पर विगत वर्षानुसार अंतर्राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन 13 सितम्बर 2010 को उज्जैन में किया जाएगा, जिसमें दुनिया भर के अनेक साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी और हिन्दीसेवी भाग लेंगे। आगे पढ़िये...
लोकतंत्र और इंसानियत किसी को इस बात की इज़ाज़त नहीं देते कि वे दूसरों की ज़िंदगी को, उनके तौर-तरीकों को अपनी सोच के मुक़ाबिले घटिया मानकर उन पर ऐसे हमले करें जिनके लिए कि आज दुनिया जगह-जगह माफ़ी माँग रही है। दुनिया के माफ़ी के इतिहास को अनदेखा करके हैवानियत की ऐसी हरक़त अगर कोई करेगा तो यह जाहिर है कि वह नक्सलियों को एक नया प्रदेश सौंपने का काम भी करेगा। आगे पढ़िये...
भोपाल । अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के सहयोग से मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा साहित्यिक संवाद का आयेाजन किया जा रहा है। 30-31 अगस्त को आयोजित होने वाले इस संवाद समागम में दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधि भाग लेंगे। इस समागम में भारत के अलावा श्रीलंका, नेपाल, मॉरीशस, बंगलादेश, पाकिस्तान, यूएई और सिंगापुर से अनेक साहित्यकार शिरकत करेंगे। इस आयोजन में साहित्यकारों के अलावा चिंतक, विचारक, दार्शनिक और लेखक भी भागीदार होंगे। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी इस तरह का पहला आयोजन कर रही है। आगे पढ़िये...
`चर्चा हमारा’ में मैत्रेयी पुष्पा आधी आबादी की इसी जमात को स्वर देती हैं, जो सोच सकती है, सोचना चाहती है, उसका साहस रखती है, जो अघाई नहीं है, जिसने अपने विचारों को, आकांक्षाओं को दफन नहीं होने दिया, जो शुचिता और समर्पण के नाम पर हर शोषण सहने के लिए तैयार नहीं है। आगे पढ़िये...
बाक़ी तमाम पेशों की तरह चिकित्सा के मामले में भी इस पेशे के लोगों को अपने बीच घर कर गई बुराई के बारे में आत्ममंथन करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में ही बिलासपुर के करीब गनियारी नाम की जगह पर कुछ उत्साही समाजसेवी नौजवान डॉक्टरों ने ग़रीबों के लिए एक अस्पताल शुरू किया है और वे उसमें अविश्वसनीय ढंग से बहुत स्तर की चिकित्सा कर रहे हैं। ऐसे प्रयोगों से सरकार और समाज दोनों को कुछ सीखना चाहिए और डॉक्टरी के पेशे के लोगों को भी अपना कुछ वक़्त इस तरह के जनकल्याण में लगाना चाहिए जिससे उनका कोई निजी फ़ायदा जुड़ा हुआ न हो। आगे पढ़िये...
अगर आप इंटरनेट और ई मेल का इस्तेमाल करते हैं
तो आपको कभी न कभी इस आशय का ई मेल ज़रूर मिला होगा कि दूर किसी देश में कोई बेहद अमीर बहुत बड़ी दौलत छोड़ कर मर गया है और उसकी बेवा आपकी सहायता से वह दौलत देश से बाहर भेजना चाहती है। निश्चय ही आपको इस सेवा का पर्याप्त मोल चुकाया जाएगा। इतनी बड़ी रक की बात सुनकर अगर आप ललचा जाएँ और बाद के पत्राचारों में अपने बैंक खाते का विवरण भेज दें तो आपका ठगा जाना पक्का होता है। इस तरह की धोख़ाधड़ी का केन्द्र है नाइजीरिया। वहीं की लेखिका अडाओबी ट्रिशिया न्वाउबानी ने अपने पहले उपन्यास आई डू नॉट कम टु यू बाय चांस में इसी धोख़ाधड़ी को केन्द्र में रखकर एक दिलचस्प कथा कही है। आगे पढ़िये...
ये तब की बात है
जब मेरे पास वाहन नहीं था। अमृता शाम के पंजाबी प्रोग्राम के लिए रोज़ बस से आती थी और जहाँ आकर वह उतरती, मैं वहाँ पहले से ही खड़ा उसका इंतज़ार कर रहा होता। प्रोग्राम के बाद रेडियो स्टेशन की तरफ़ से अमृता को गाड़ी मिल जाया करती थी। एक बार यूं हुआ कि दफ़्तर की गाड़ी किसी को छोड़ने गई हुई थी और लेट हो गई। आगे पढ़िये...
‘अज्ञेय’ जी ने इतनी रुचि ली;
देखकर मन उनके प्रति कृतज्ञता से भर गया। इस समय तक, उनसे मिला तक न था। सूत्र मात्र रचनात्मक लेखन था; पत्राचार था। ‘अज्ञेय’ जी में, एक बहुत अच्छे मित्र के गुण थे। सहयोग करना; उपकार करना उनकी प्रकृति थी। खेद है, उनके और निकट न आ सका। आगे पढ़िये...
साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में
समान रूप से संचरण करने वाले जो शब्द- कर्मी उस युग ने हिन्दी को दिए, उनमें माधवराव सप्रे,गणेश शंकर ‘विद्यार्थी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी ‘एक भारतीय आत्मा’, लक्ष्मण सिंह चौहान, ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी-जैसे नाम सहज ही याद आते हैं। श्री स्वराज प्रसाद त्रिवेदी इसी परंपरा के विकास थे। मध्यप्रदेश के जिन तरुणों को उन्होंने विशेष रूप से स्फूर्त किया, उनमें स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी, विनय मोहन शर्मा, अब्दुल गनी-जैसे लोग थे।
आगे पढ़िये...
नाहिद,
विजयलक्ष्मी और नंदी नैनवाल को इसी सम्मेलन में देखा था। इन तीनों में कई समानताएँ थीं। पहली तो यह कि तीनों महिलाएँ थीं, तीनों का ताल्लुक उत्तराखंड से था और तीनों के अपने-अपने दुख थे। उन दुखों को साझा करते हुए उनकी आँखें भी भर आईं जो वहाँ मौज़ूद थे। इन तीनों की आंखों का तटबंध भी बार-बार टूटा। लेकिन आँसुओं के बीच भी उनके भीतर विश्वास की एक दपदपाती लौ धधक रही थी और पुरुष बहुल समाज में अपने वजूद को बचाए रखने की हिम्मत उनमें बची हुई थी। यह विश्वास और हिम्मत उस सभागार में बैठी सैकड़ों महिलाओं के अंदर भी था जो बार-बार नाहिद, विजयलक्ष्मी और नंदी नैनवाल का हौसला बढ़ाती रहीं। आगे पढ़िये...
आज़ादी
या स्वतंत्रता की लड़ाई इसी तरह निजी और सार्वजनिक स्तर पर लडी जाती है । डेमोक्रेसी में सर्व जन हिताय, बहु जन सुखाय का विशेष ध्यान रखा जाता है । हरेक स्वतन्त्र देश में इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि व्यक्ति और देश की स्वतंत्रता को आँच ना आने पाये फ़िर भी, इस प्रयास में कई रूकावटे और मुश्किलें भी आती ही हैं । आगे पढ़िये...
`चर्चा हमारा’ में मैत्रेयी पुष्पा आधी आबादी की इसी जमात को स्वर देती हैं, जो सोच सकती है, सोचना चाहती है, उसका साहस रखती है, जो अघाई नहीं है, जिसने अपने विचारों को, आकांक्षाओं को दफन नहीं होने दिया, जो शुचिता और समर्पण के नाम पर हर शोषण सहने के लिए तैयार नहीं है। आगे पढ़िये...
' राजन,
जो सत्ता आत्मा के सहारे चलती है, उसका भला भगवान भी नहीं करते। निर्मम हो कर व्यवहार करने वाले लोग लम्बे समय तक राज करते हैं। यही राजनीति है। जनता से कहिए कि देश गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। इसलिए आपातकाल स्थिति बन गयी है। इससे उबरने के लिए जनता को कुछ सहन करना पड़ेगा। इसका एक ही रास्ता है कर। राज्य की भलाई के लिए कर देना ज़रूरी है। बस,देखिए, कैसे राजकोष में आवक बढ़ जाती है।' आगे पढ़िये...
कोई रचनाकार कविता क्यों लिखता है?
यह सवाल भी हज़ारों साल से हमारे सामने हैं। अलबत्ता इसका एक उत्तर सभी युगों में समान रूप से आता रहा है। संस्कृत के काव्य शास्त्री कहते थे कि जब तक यह पृथ्वी अस्तित्व में रहे तब तक कीर्ति रहे, इस उद्देश्य से विद्वान पुरूष काव्य रचना करते थे। बहरहाल, यह तो हुई यश की कामना लेकिन आचार्य अभिनव गुप्त ने कहा है कि कविता का मुख्य प्रयोजन आनंद साधना है। कवि के लिए कीर्ति एक अतिरिक्त प्रयोजन है, और फिर कीर्ति का मुख्य प्रयोजन भी आनंद ही है। आगे पढ़िये...
स्वयं प्रकाश जी को दुःख है
कि भारतीय स्त्री अपनी कामेक्षा व्यक्त नहीं कर ‘सकती’। जहाँ तक मेरा ख़्याल है बात ‘सकने’ की नहीं, बात ‘चाहने’ की अधिक है। वह इसलिए कि ‘काम’ उसके जीवन का प्रमुख या एकमात्र लक्ष्य नहीं होता। वह पत्नी या प्रेमिका होने के साथ और बहुत सारे सामाजिक-पारिवारिक संबंधों को भी उसी स्तर पर जीती है। शायद भारतीय पुरुष भी उसे केवल अपने लिए नहीं चुनता वह इस बात को लेकर भी सजग रहता है कि उसकी पसंद को घर में भी सम्माननीय स्थान मिले और अपने परिजनों के प्रति इसी तरह के सेवा और सम्मान-भाव की अपेक्षा वह अपनी पत्नी या प्रेमिका से भी करता है।
आगे पढ़िये...
(1 जुलाई चिकित्सक दिवस पर विशेष)
चिकित्सा क्षेत्र के प्रति बच्चों के बढ़ते आकर्षण का पहला कारण है विष्व में डॉक्टर होना नोबल प्रोफ़ेशन माना जाता है। चिकित्सक ही है जिसने असाध्य रोगों पर विजय प्राप्त कर मृत्युदर को पीछे छोड़ दिया है और इंसानी ज़िंदगी को न केवल आसान बना दिया है, बल्कि उसे शतायु बनाने के प्रयास भी जारी हैं। डॉक्टर वह महापुरुष है, जिसके प्रति न केवल रोगी सम्मान प्रकट करते हैं बल्कि जब आपके परिवार का कोई सदस्य ज़िंदगी और मौत के साथ संघर्ष कर रहा होता है तो ईश्वर के बाद जिसके प्रति परिजनों की आस्था सर्वोपरि होती है। आगे पढ़िये...
प्रत्येक इंसान
को कोई न कोई आदत तो होती ही है । कुछ लोग सबकुछ याद रखतें है और कुछ लोग किसी भी समय भूल जातें है । कुछ लोग फ़ालतू बातें भूल जातें है तो कुछ उसी में उलझे रहते है । यह फ़ालतू क्या होता है? किसी के लिएँ राग-द्वेष? हाँ, इंसान का स्वभाव है, दूसरों की ग़लतियाँ ही याद रखना । बात अटकती नहीं बल्कि सही समय के इंतज़ार के बाद उससे बदला लेने को लोग उतावले हो जातें है.. । हमें क्या याद रखना है, क्या नहीं ! उस पर कभी आराम से कहाँ सोचतें है हम ! आगे पढ़िये...
जिस केंद्रीय सुरक्षा बल सीआरपीएफ के जवान कल बस्तर में शहीद हुए हैं उसके बारे में यह बात बहुत साफ़ है कि उसकी ट्रेनिंग ऐसे मोर्चे के लिए नहीं हुई है। लेकिन कुछ तो पापी पेट की मज़बूरी होती है कि लोग ख़तरनाक नौकरियों में भी आते हैं और कुछ बहादुरों का हौसला होता है कि वे देश के लिए और लोकतंत्र के लिए ऐसे हालात में भी जान देने को तैयार रहते हैं, जिनको लाने के लिए इस देश को चलाने वाली सरकारें ज़िम्मेदार हैं। देश-प्रदेश की सरकारों ने आज से पन्द्रह बरस पहले अगर नक्सल ख़तरे के बढ़ते चले जाने के बारे में एक अंदाज़ लगाया होता, देश में दूसरे तरह के आतंकी हमलों के बारे में अंदाज़ लगाया होता और उस हिसाब से योजना बनाकर सुरक्षा बलों को, सुरक्षा इंतज़ामात को मज़बूत किया होता तो आज ऐसी नौबत नहीं आती कि बिना तैयारी मोर्चे पर झोंके गए लोग थोक में शहीद होते। आगे पढ़िये...
ऑस्ट्रेलिया में कैदियों
के इतिहास को कैसे भुलाया जा सकता है जिनके जीवन में दर्द तो था पर उसकी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता नहीं थी। क़ैदियों पर ऐसी सख़्ती किउनके पास कागद का टुकड़ा भी निकल आये तो पीटा जाता था कि ज़रूर वह कोई संदेश भेजने के लिये रखा गया होगा। तो बहुत से अपराधियों ने अपने शरीर को कागद बनाया और उस पर न मिटने वाली स्याही से कुछ इस प्रकार से लिखा - “इंग्लैण्ड में कभी भी न उगने पायें गुलाब के फूल / …जब तक मैं बेचारा, सज़ा का मारा, आज़ादी न पा लूँ” फिर कोई आश्चर्य नहीं कि यहाँ पहला उपन्यास सज़ा प्राप्त हेनरी सावेरी ने बिना अपना नाम दिये प्रकाशित करवाया। नतीजा यह हुआ कि वह बहुत प्रसिद्ध गुमनाम लेखक (!) हो गया। आगे पढ़िये...
छत्तीसगढ़ के
लोक सागर में अपार सम्पदा है, बस ज़रूरी है अनुभवी गोताखारों की। जहाँ लोक जीवन और लोक संस्कृति के विविध पक्षों को सम्मुख रखने में सफ़र मुक्ताकाश मंच ने सार्थकता प्रदान किया है। वहीं लोक जीवन के इन्द्रधनुषी रंगों की सजल-तरल छटा ने इसे जीवंत बना दिया है। सचमुच आज औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, बहुमंजिली इमारतों के पसरते जाल से सामान्य जन, नाट्य कला जैसी सर्वसुलभ मनोरंजन से विस्थापित होता जा रहा है। विकास के नाम पर ध्वज लेकर चलने वालों ने कलाकारों के मनोभावों को पिछडऩे की निशानी समझकर मटियामेट कर दिया है। इस क्रम में सफ़र मुक्ताकाश मंच ने जनमानस में नाट्य विधा के प्रति विशेष लगाव एवं जागरूकता पैदा करने में अपनी एक वर्ष की सफल एवं अविस्मरणीय भूमिका निभाई है। आगे पढ़िये...
निहत्थों आदिवासियों
की हत्या पर आम जन को मौन और चुप्पी का चालीसा पढ़ाया जा रहा है। प्रजातंत्र के हत्यारों के पक्ष में अनुशंसा के अनुवाद किये जा रहे हैं। माओवादियों के भाषा कौशल और शिल्प की हुबहू नकल करते हुए उन्हीं लोगों द्वारा उस तंत्र को गरियाया जा रहा है, जिसे वे अब तक दुहते रहे या दुहते हुए देखकर भी अनजान बनने का स्वांग भरते रहे । इसे प्रगतिशीलता का मोह कहें या क्रांतिकारी कहाने का फ़ैशन कि माओवाद के प्रवक्ताओं के कोटेशनों से अपनी पुस्तकों का सोहल-श्रृंगार किया जा रहा है । आगे पढ़िये...
|
|