|
कवियों के बारे में
|
|
लक्ष्मीकांत वैष्णव
|
कवियों
के बारे में कहा गया है कि जहाँ न पहुँचे
रवि, यानी जहाँ
सूर्य भी प्रवेश नहीं कर सकता वहाँ कवि पहुँच जाता है।
अपनी इसी सामर्थ्य के तहत रीतिकालीन कवि सात पहरों के पीछे
कैद नायिका के स्नानागार तक पहुँच जाते थे और उनका कुछ
नहीं बिगड़ता था - न कवि का कुछ बिगड़ता था, न नायिका का।
वैसे भी उस ज़माने के कवि काफी शरीफ़ हुआ करते थे तथा वे
अपनी पहुँच का लाभ केवल कविता लिखने तक उठाते थे। वे देखे
हुए दृश्य का नख-शिख वर्णन अपने आश्रयदाता राजा
को सुनाते
थे, अपना पुरस्कार लेते थे और अलग हो जाते थे।
तभी से कहावत
निकली कि कलि का काम केवल रास्ता बताना है तथा उस पर चलने
न चलने का निर्णय लेना आपका काम है। कवियों को पुरस्कृत
करने की प्रथा
भी रीतिकाल से ही चली या उसके पहले या बाद
से - यह शोध का विषय है।
मैंने कहीं पढ़ा था कि कवि, लता तथा स्त्री - इन तीनों की
प्रतिभा तभी निखरती है, जब इन्हें किसी का संबल प्राप्त हो
जाए । अपने जमाने की एक लड़की को जानता हूँ, जिसकी प्रतिभा
विवाह के बाद इतनी
विकसित हुई कि आज वह तेरह बच्चों की माँ है, अब वह
काफी मोटी हो गई है तथा उसका पिता कहता है कि
पिछले वाईस-चौबीस सालों में ये तेरह बच्चे उस महिला में से
यों निकल आए हैं जैसे मूलधन में से ब्याज निकल आता है।
स्त्री के स्वास्थ्य की ओर इशारा करके उसने कहा था कि इस
बीच मूलधन भी बढ़कर दो गुना-तीन गुना हो गया है तथा अब
उसकी ओर कोई नज़र उठाकर देखने की हिम्मत भी नहीं करता ।
स्वाभाविक है, धनवानों से नज़र मिलाने में लोग
वैसे भी डरते
हैं । वैसे यही लड़की जब स्वास्थ्य की इतनी
धनी नहीं थी, लोग दूर-दूर से इसे देखने आते थे तथा देर तक
घूर-घूरकर देथा करते थे । लड़की के भावी संबल के रूप में इसके
माँ-बाप मुझे भी देखने आए
थे, मगर मुझमें उन्हें कोई ऐसी
संभावना नजर नहीं आई जिससे कि उनकी कन्या की प्रतिभा पूरा
विकास पा सके । लिहाजा उन्होंने मूँगफली के एक व्यापारी का
लड़का ढूँढ़ लिया था। कहते हैं मूँगफली में प्रोटीन बहुत
होता है और उस प्रोटीन के प्रभाव का उल्लेख मैं ऊपर कर
चुका है।
पिछले दिनों मुझे एक कवि-सम्मेलन कवि मिले । बोले कि मकान
की छत पड़ रही है और एक समूचा तिमंजिला मकान उन्होंने
कविता की कमाई से बनवाया है
। मैंने कहा कि मित्र, मैंने
बड़े-बड़े शायरों के बारे में सुना है जो सारी जिंदगी
कविता करने के बाद अपनी कब्र खुदवाने लायक पैसा भी नहीं
जुटा पाए थे। तुमने यह कैसे कर लिया
? उत्तर
में उन्होंने कहा कि कवि-सम्मेलन का मंच ज़मीन से काफी ऊपर
उठा हुआ होता है और उसकी आमदनी से जो मकान बनता है, वह मंच
से थोड़ा-बहुत उँचा हो ही जाता है। कारण यह कि मंचीय कवि
कविता के साथ-साथ कहीं पर नौकरी भी कर रहा होता है। उसने
कहा कि कवि-सम्मेलनी कवि के लिए मामूली मकान तो क्या,
एक समूचा ताजमहल खड़ा कर लेना असंभव नहीं है।
हालाँकि इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिलते कि शाहजहाँ ने
ताजमहल कवि-सम्मेलन की कमाई से बनवाया था, मगर फिर भी आज का
कवि चाहे तो ऐसा कर सकता है। उसने कहा था कि महत्व
‘मंच’
का है। उदित उदयगिरि मंच पर रघुवर बाल पतंग-यह लाइन सुनाकर
वह बोला था कि उदयगिरि के
‘मंच’
पर चढ़कर ही रामचंद्र सूर्य की तरह चमके थे। हालाँकि वहाँ
से उन्होंने कोई कविता नहीं पढ़ी थी। अतः महत्व कविता का
या प्रतिभा का नहीं है, मंच का है। जीवन के जिस भी क्षेत्र
में आदमी मंच पर पहुँच जाता है, पुजने लगता है।
उसने कहा कि सुनी जानेवाली कविता का पारिश्रमिक हमेशा से
ज्यादा रहा है । उसने बिहारी का उदाहरण दिया कि किस प्रकार
राजा उन्हें एक दोहा सुनाने का पारिश्रमिक एक सोने की मुहर
देता था। एक तोले की मुहर का मूल्य आज के हिसाब से पच्चीस
सौ रुपए हुआ । यानी दो लाइनों का पारिश्रमिक प्रति पंक्ति
साढ़े बारह सौ बैठा । उसने कहा कि इस बात की जानकारी
उपलब्ध नहीं है कि राजा दोहे का
कॉपीराइट भी खरीद लेता था
या नहीं, अन्यथा बिहारी उसी दोहे को दूसरे राजाओं को
सुनाकर ढाई-ढाई हजार उनसे भी वसूल सकते थे। वैसे भी बिहारी
एक राजा के खूंटे से बंधने के बजाए थोड़ा गतिशील रहते तो
ज्यादा कमा सकते थे।
जहाँ तक कवि-सम्मेलनों का सवाल है, उसने कहा कि इनमें
प्रतिभा की कम, गतिशीलता की अधिक जरूरत होती है। औसतन एक
व्यस्त कवि-सम्मेलनी कवि साल भर में उतनी रेल-यात्रा या
बस-यात्रा कर लेता है, जितनी एक रेलवे ड्राइवर या लंबे रूट
पर चलनेवाला बस कंडक्टर अपने समूचे सेवाकाल में भी नहीं कर
पाता । बात असंभव लग रही थी, पर उसने कहा कि ड्राइवर या
कंडक्टर दिन में केवल आठ घंटा ड्यूटी करता है जबकि कवि
सम्मेलनी कवि चौबीस घंटे ड्यूटी पर रहता है।
ड्राइवर-कंडक्टर साल में कुछ दिन छुट्टियाँ भी मनाते हैं,
जबकि कवि के लिए
रामकाज कीन्हें बिना मोहिं कहाँ विश्राम
की हालत रहती है। गणेशोत्सव, दुर्गोत्सव आदि के समय अनेक
संयोजकों को
उधो तन नाहीं दस-बीस
कहकर असमर्थता बतानी पड़ती है। उसने कहा कि कृष्ण भगवान
में यह क्षमता थी कि वे सोलह हजार एक सौ आठ रूप एक साथ धर
लेते थे । यदि द्वापर युग में कवि सम्मेलन हो रहे होते तो वे उत्सवों के टाइम
पर एक रात में भारत भर में होनेवाले सोलह हजार एक सौ आठ
कवि-सम्मेलन एक साथ कर सकते थे । उसने कहा कि कई बार उसे
लगा है कि अगर वह कृष्ण भगवान होता तो अनेक रूप धर कर वह
हापुड़, खुर्जा, बुलंदशहर, नांदेड़,
धमतरी, हजारीबाग,
शुजालपुर मंडी और सूरत के कवि-सम्मेलन एक साथ कर सकता था।
इतना कहकर वह फिर बिहारी पर आ गया था कि वह बिहारी को
आदर्श कवि नहीं मानता । लगता है बिहारी सीधा आदमी था और
सीधा आदमी कभी अच्छा कवि नहीं होता । प्रति पंक्ति इतनी
आकर्षक पारिश्रमिक की दरों पर थोड़ा-सा भी समझदार आदमी
राजा को रोज एक खंड-काव्य लिखकर सुनाता । दूसरी बात यह कि
कवियों के लिए, फेरीवाले व्यवसायिकों के लिए तथा पेशेवर
स्त्रियों के लिए एक ठिए से बंधकर रहना घाटा पहुँचाता है।
तीसरी बात यह कि किसी भी दरबार से बंध जाने पर उसी सुर
में गाना पड़ता है। जिसमें कि दरबारी आर्केस्ट्रा बज रहा
होता है। जैसे ही आपकी कविता के बोल उनकी धुन से मेल खाने
बंद हुए, वे आपको धक्का मारकर बाहर कर देते हैं।
इसके बाद वह अपने तिमंजिले मकान की ओर बढ गया था। आदमी कवि
सम्मेलनी जरूर था मगर काफी बातें कवि-सम्मेलन से हटकर कर
गया था। उसकी इस बात से मैं सर्वाधिक प्रभावित हुआ कि जीवन
के किसी भी क्षेत्र में मंच पर आने के लिए प्रतिभा की कोई
खास जरूरत नहीं होती और एक मंच पर स्थापित हो जाने के बाद
आदमी की पूजा निश्चित रूप से होने
लगती है।
