रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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जनता का समाधान- गिरीश पंकज

 
 
जनता का समाधान

गिरीश पंकज

            विक्रमार्क बेताल के पीछे भागा। रास्ते में वह अपने हर बार के उबाऊ काम के बारे में सोचने लगा और थोड़ा-सा निराश भी हुआ । तभी उसके भीतर एक रचना कौंध गई और वह गुनगुनाने लगा -

 

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            बस, उसके मन में उत्साह जगा और वह हाथ में तलवार थामे फिर पहुँच गया श्मशान। उसने बरगद पर लटक रहे मुर्दे को फुर्ती के साथ कंधे पर लादा और महल की ओर चल पड़ा।

 

            शव में सवार बैताल ने हमेशा की तरह ठहाके लगाते हुए कहा - "हे, राजन, मैं अगले जन्म में तुम्हारे जैसा ही जिद्दी राजा बनना चाहता हूँ। और कोई होता, तो हताश-निराश होकर अपने दूसरे काम-धाम में लग जाता। जैसे सरकारी नौकरी से बोर होकर लोग स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लेते हैं। लेकिन तुम्हारी तो बात ही निराली है। तुम्हारा तो एक-सूत्री कार्यक्रम रह गया है, पहले मुझे कंधे पर लादो, फिर मेरे पीछे भागों । जैसे जनता नेताओं के पीछे भागती है। खैर, मुझे क्या। तुम अपना काम करो, मैं अपना काम करूँ। मैं फिर एक कहानी सुना रहा हूँ। तुम्हारा दिल बहल जाएगा।

 

            विक्रमार्क खामोश था । बेताल ने नेताओं-जैसी कुटिल मुसकान के साथ नई कहानी शुरू की-राजन्, नरकगढ़ नामक राज्य कभी आक्रंताओं के कारण गुलाम हुआ करता था । लम्बे संघर्ष के बाद वहाँ लोकतंत्र बहाल हो गया ।  लेकिन कुछ ही समय बीतने के बाद जनता को यह समझ में नहीं आ रहा था, कि नरकगढ़ आजाद है या गुलाम । पहले विदेशी आक्रांता राज करते थे । तब भी जनता पिटती थी । प्रताड़ित  होती रहती थी । कभी लाठी खाती तो कभी गोली । जिनको अपना समझ कर सत्ता सौंपी गई थी, वे लोग विदेशी लोगों से भी ज्यादा क्रूर साबित हुए । रोज इनके नये-नये घोटाले सामने आने लगे । जनता ने तय कर लिया कि पाँच साल बाद इन लोगों के खिलाफ अपना मत देंगे और नइ सरकार चुनेंगे । लेकिन अच्छे लोग तो जैसे लुप्तप्राय जीव की तरह हो गये थे। इन्हें कहाँ से खोज कर लाएँ इसलिए जनता ने तय किया कि इन शातिरों की जमात में से जो कुछ कम शातिर हैं, उन्हे ही कुरसी सौंपी जाए । दुख-दर्द, प्रताड़ना कुछ तो कम होगी ।

 

            हे राजन्,  चुनाव हुए और हिंसक-शांति के बीज पुराने शातिर लोग पराजित हो गए । उनकी जगह कुछ कम शातिरों का राज हो गया । लेकिन कुरसी को सुंदरी और अधिकार को शोषण का लाइसेंस समझने वाले नये शातिर भी बहुत जन्दी पुराने ढर्रे पर आ गए ।  लेकिन अब भ्रष्टाचार के साथ व्यभिचार भी बढ़ता गया । नेता राग-रंग में डूब गए । लूट-खसोट में ही दिन-रात बीतने लगे । जनता पर अत्याचार करने की पुरानी परम्परा भी जारी रही । जनता सोच रही थी कि जिसे आशीर्वाद दो, वहीं क्यों भस्मासुर बन जाता है ? क्या करें ।

 

            जनता ने बहुत सोचा-विचारा । बैठक की । एक ने सुझाव दिया-हमने मर्दों को आजमा लिया, क्यों न इस बार नामर्दों को यानी हिजड़ों को सत्ता सौंप कर देखते हैं । इनके न बीवी, बच्चे । किसके लिए कमाएंगे । ईमानदारी के साथ राज करेंगे । लोगों पर अत्याचार नहीं होगा । जनता सुखी रहेगी ।

 

            सबको बात जम गयी । जुनाव हुए तो हिजड़ों की सरकार बन गई । जनता ने चैन की साँस ली ओर सोचा, चलो अब दिन बहुरेंगे । लेकिन ऐसा बिलकुल ही नहीं  हुआ । कुछ  दिनों तक तो सरकार सात्विक तरीके से चली । लेकिन फिर वही चाल बेढंगी नज़र आने लगी । इस बार रिश्वतखोरी बढ़ गई । तरह-तरह के टैक्स लाद दिए गए । महँगाई आसमान छूने लगी । जनता ने जब आवाज उठाई तो उसकी पिटाई शुरू हो गयी । आंदोनलकारी जेलों में ठूसे जाने लगे । आश्चर्य यह था कि हिजड़े भी जमखोरी कर रहे थे । रिश्वत खा रहे थे । किताबों से ज्यादा आलमारियाँ खरीदी जा रही थीं । बड़े-बड़े निर्माण कार्य कराए जा रहे थे । कमीशनखोरी के चक्कर में । राजन्, कमीशनखोरी समझते हो कि नहीं ?  समझते हो शायद। लेकिन लोग समझ नहीं पा रहे थे, कि आखिर इस पैसों का ये हिजड़े करेंगे क्या । किसके लिए जोड़ रहे हैं पैसे ?जनता परेशान थी । खून के आँसू रो रही थी । मर्दों को आजमा लिया, नामर्दों को भी देखा लिया । सबके सब शोषक निकले । आब जाएँ तो किधर जाएं ? एक ने कहा- साधु-संतों के बी आजमा कर देख लेते हैं ।

इस पर दूसरे ने कहा- ये तो सबके बाप निकलेंगे । इनके पाप तो हम आए दिन देखते-सुनते ही रहते हैं ।

 

            इतना बोल कर बेताल ने प्रश्न किया कि हे राजन्, यह कहानी अनंत-सी लग रही है । मैं सुनाता चला जाऊँगा । इसलिए बेहतर है, कि यहाँ खत्म कर दूँ । अब तुम ठीक-ठीक बताओ कि आगे नाथ न पीछे पगहा वाले हिजड़े भ्रष्टाचार और जमाखोरी क्यों कर रहे थे ? और हिजड़ों से त्रस्त होकर जनता ने बाद में अपना नेता किसे चुना होगा  ?  क्या शातिर बदमाशों को, या किसी और को ?”

 

            विक्रमार्क बेचैन हो उठा था । उससे मौन रहा न गया । उसने कहना शुरू किया,जनता इस सत्य को पा चुकी थी कि जो भी नेता कुरसी पर विराजमान होगा, वह लूट-खसोट किए बगैर तो रहेगा नहीं । अत्याचार भी करेगा । इसलिए बेहतर यही होगा, कि अब हर पाँच साल के लिए अपने अत्याचारी ही बदलते रहें । जैसे जंगल में कभी खरगोशों ने ऐसी व्यवस्था की थी । वे रोज एक-एक खरगोश शेर राजा के पास भेज दिया करते थे, ताकि एक साथ ज्यादा खरगोश तो न मरें । जनता भी बारी-बारी से सरकार बदल रही थी, ताकि कुछ दिनों के लिए तो राहत मिले । ओर रही बाद हिजड़ों द्वारा भ्रष्टाचार करने की, तो यह जो कुरसी होती है न, वह बड़ी गजब की चीज होती है । महापुरुष कह गए हैं, कि कुरसी महा ठगिनी सब जानी । यहाँ हर घड़ी लक्ष्मी बरसती रहती है । इसलिए न चाहते  हुए भी आदमी उसका दीवाना हो जाता है । जरूरत न होने पर भी वह दो का दो, दो दूनी चार और चार दूनी आठ करता रहता है । इतिहास यही बताता है, वर्तमान में यही हो रहा है, और लगता है, कि भविष्य में भी यही सिलसिला जारी रहेगा ।

 

            विक्रमार्क ने बिल्कुल सटीक ज़वाब दिया था । उसका मौन भंग भी हो चुका था इसलिए चालाक बैतलवा गद्गद होकर हमेशा कि तरह फिर से बरगद पर जा कर लटक  गया ।

 

    

 

व्यंग्य

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, संजीव ठाकुर

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