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व्यंग्य

मैया मोरी, मैं भी साहब पटायो - अशोक गौतम

कवियों के बारे में - लक्ष्मीकांत वैष्णव

जनता का समाधान- गिरीश पंकज

 
 
मैया मोरी, मैं भी साहब पटायो

 अशोक गौतम

 

            मैयां !सादर प्रणाम ! मैं इस शहर में नरक भोगता हुआ भी खुश है । आशा है तू भी गाँव में ठीक होगी । आगे माँ समाचार यह है कि जब तू डाकिए से इस चिट्ठी को पढ़वाएगी तो मुझे असीसें देती ही थक जाएगी ।

 

            माँ, तुझे यह मुझसे बराबर शिकायत रहती थी कि न मैं ऊपरली बेड़वाले रामलाल चपरासी चाचा के एलडीसी लड़के की तरह महीने में बीस-बीस दिन घर का काम करने को नहीं आता । मैं मिचली बेड़ वाले सीत्तू दादा के लड़के नन्दू की तरह शिमले नौकरी पर जाते-जाते दस-दस बार बस स्टेंड से घर क्यों नहीं लौट आता । माँ, तब यह मेरी मजबूरी थी । लेकिन मैंने अब इस मजबूरी पर विजय प्राप्त कर ली है । माँ, आज के बाद तुझे अपने लाडले से कोई शिकायत नहीं रहेगी । तेरी असीस से, अपने एक जिगरी देस्त के सहयोग से मैने भी बल्लू चाचा के गोरे बैल से भी खतरनाक साहब के नकेल डाल ली है । अब तो वह खेतीले दफ्तर में वैसे ही चलता है जैसे में हव्वा-हव्वा करता हूँ। अब मैं जितने करीब तेरे हूँ माँ उससे भी ज्यादा साहब के करीब हूँ।

 

            माँ, मैंने अब साहबों को पटाने के गुर लगभग पूरे सीख लिए हैं । तेरी सौगध माँ, अब चाहे साहब कैसा भी आए तेरी छाती का दूध पिया ये पूत उसे कंट्रोल करने में पूरी तरह बुजुर्ग हो गया है।

 

            माँ, शहर में आकर नौकरी करते हुए यह सीखना बहुत जरुरी भी था। खाना बनाना सीखने से पहले यह कला सीखना बहुत जरुरी था माँ। इसके बाद अब खाना बनाना भी सीख लूँगा । नौकरी में खाली पेट हफ्तों रह सकते हैं पर साहब की कृपा के बिना एक पल भी नहीं कट सकता ।

 

            माँ ! अब तो मैंने साहबों को पटाने के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सभी गुर सीख लिए हैं। धार वाले डाऊ की तरह साहब के हर ओपरेशन का इला है मेरे पास । साहब को पटाने में मेरी मास्टरी को देख मेरे साथ वाले भीतर ही भीतर जलकर कोयला हुए जा रहे हैं।

 

            माँ, जैसे तुम मेरे बिना अभी भी नहीं रह पाती, वही दशा साहब की भी हो गई है। मेरा साहब अब मेरे बिना एक पल भी नहीं रह सकता है, चाहे पानी के बिना महीनों जिंदा रह जाए तो रह जाए ।

माँ, जब मैं तेरे पास से नौकरी के लिए आता हूँ और तू मेरे लौट न आने तक बाट जोहती रहती है, वैसी ही दशा साहब की भी ही गई है। वह भी सुबह आठ बजे ही दफ़्तर आकर मेरे आने का पलकें बिछाए इंतजार करता रहता है।

 

            माँ, साहब को मैने अब इतना कंट्रोल कर लिया है कि वे जहाँ भी जाते हैं, मेरी टांगों पर ही चलकर । जो कुछ भी सोचते हैं मेरे ही दिमाग से । जो कुछ भी खाते हैं, मेरे ही मुँह से । जो कुछ भी पचाते हैं मेरे ही पाचन सिस्टम से । उनके कफ-बात-पित्त का कंट्रोल मेरे ही हाथों में है माँ ।

 

            माँ ! पिछली चिट्ठी में मैंने जो तुझे लिखा था कि किसी आने वाले के हाथ धार वाले डाउ से साहब को वश में करने के लिए धागा, जन्तर भेज देना, अब उसकी जरूरत नहीं। अगर धागा, जन्तर नहीं लाया होगा तो बेकार में मत दौड़ना। माँ तू अब तक मेरे लिए कहाँ-कहाँ नहीं भागी है। मैंने तो तुझे माँ कितनी बार कहा कि बाहर आजा पर तुझसे ही गाँव नहीं छूटता । पता नहीं माँ तू क्यों इस गाँव में हमारी बी तक चले आए हरिया दादा के लड़के किशोरी ये सब करने पर भी खुश है। जिए गाँव में पूरन चाचू  की घरवाली हर फसल पर निचले हाड़े के खेत का चार हाथ बन्ना बढ़ा देती है, उस गाँव में माँ अब रखा क्या है ? खैर माँ ! है तो शहर में भी कुछ नहीं, पर जब जहाँ कोई तंग करता है न तो दर्द नहीं होता, इसलिए कि यहाँ कौन सा गाँव की रिश्तेदारी है।

 

            माँ, साहबों को पटाने का मंत्र सिद्ध कर लिया है और अब तो मुझसे कई साहबों के मारे जन्तर, धागा ले जाने लगे हैं । अब तू धागा वाले से यही माँगना कि मैं साहब को यों ही पटाकर सजूं । कुलजा से यही मनौती करना कि मैं साहबों को उम्र भर पटाने में सफल होता रहूँ। मेरे रस्ते में जो भी कांटें बिछाए कुलजा उसका सर्वनाश कर दे । अपनी मंनौती पूरी होते की खुशी में माँ अबके देवी भी पुजूँगा और । तू थी जमा कर रखना ।

 

            माँ, मैं अगले हफ्ते ही बीस दिनों के लिए घर आ रहा हूँ। तू कहेगी तो दस-पन्द्रह दिन और रूक लूँगा, कोई चिन्ता नहीं, साहब को मैंने संकेत भर ही दिया तो उन्होंने कहा कि कोई चिन्ता नहीं,फसल काटकर ही आना। जब तक मैं इस दफ्तर में हूँ कोई मेरा बाल भी बांका नहीं करेगा।

 

            माँ, तेरे लिए एक खुशखबरी और ! अब मैं पटवारी चाचू की तरह से ऊपरी कमाई भी करने लग गया हूँ। अबके घर आकर घास की छत ठीक करवाऊँगा । तू छत के लिए अच्छे से घास की बात कर रखना और छाल छवाने वाले को भी बोल रखना।

 

            माँ, तू बेकार में हलके के पटवारी को गालियाँ देती थी कि कलम उठाने की भी कोड़ लेता है कोढ़ी। मैं भी कोड़ लेने के एक से एक फार्मूल सीख गया हूँ । साहब ने भी मुझे ऐसी सीट दी है कि---पैसे बरस रहे हैं माँ ! अब तो मुर्गी भी अपनी और अण्डे भी अपने । लोग भेंटें के लिए रात को आठ-आठ बजे तक लाइन में खड़े रहते हैं। बहुत थक जाता दूँ तेरी कसम माँ ! शहर आने वाले के हाथ किलो-दो किलो ताजा घी भिजवा देना । पर उस ताई से मत लेना, वह तो डालडा दही छोलते-छोलते ही डाल देती है। मैंने देखा है उसे । माँ, वैसे साहब को पटाने का काम है बहुत मुश्किल। नए-नए बछड़ों को हल में लगाने से भी मुश्किल । बहुत संभालना पड़ता है। जलील होना पड़ता है। शुरु-शुरु में साहब दुरकारता है, फटकारता है तो भी उसके पाँव नहीं छोड़ने पड़ते। ठीक अपने डब्बू कुत्ते की तरह । तेरे ईश्वर की भक्ति से बहुत भारी है साहब की भक्ति । बड़े नित नियम से करनी पड़ती है। हर कदम पर उपना ही सहयोगी कड़की लगाए छुपा होता है। सभी एक दूसरे की साहब भक्ति तो करनी ही पड़ेगी. गाँव में माँ है भी क्या ? फसल कुछ बंदर खा जाते हैं तो कुछ महाजन। गाँव में काम महाजनों के लिए होता है माँ तो नौकरी साहबों के लिए । पर व्यवस्था ही ऐसी है माँ। न तू कुछ कर सकती न मैं कुछ कर सकता हूँ।

 

            माँ, अपनी सेहत का ख्याल रखना और बन्ने सरकाने वालों का भी। मेरा फिक्र मत करना। अब मैं बहुत सुखी हूँ अब तो कई बार गाँव भी भूल जाता हूँ, पर तुझे नहीं। शेष आने पर माँ ----

 

 

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