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रसायन,
पौधे और मनुष्य |
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इला प्रसाद |

वनस्पति
जगत से हमारा नाता उतना ही पुराना है जितना हमारा खुद का
अस्तित्व
।
अपने अस्तित्व के लिए हम वनस्पति जगत पर पूर्णत:
आश्रित
भी हैं
।
हमारी तमाम जरूरत की चीजें,
भोजन से लेकर औषधियाँ
और आवास से लेकर आधुनिक उपयोग के उपकरण,
वनस्पति जगत से आती हैं
।
घास और पौधे क्या हैं?
कोयले और पेट्रोलियम का पूर्ववर्ती जीवन
।इस
पूरी सृष्टि में पौधे ही एकमात्र ऐसे जीवित प्राणी हैं जो
अपने
भोजन के लिए किसी पर आश्रित नहीं हैं. वे अपना भोजन
खुद,
अपने अन्दर ही,पैदा
कर लेते हैं
।
विज्ञान के आधुनिकतम शोधों से यह भी ज्ञात हो चुका है कि
पर्यावरण के सन्तुलन में वनस्पति जगत की हिस्सेदारी सबसे
बडी है
। लेकिन
यह भी एक कटु सत्य है कि जीवन के हर क्षेत्र में विकास के
साधन यद्यपि हम किसी न किसी रूप में वनस्पति जगत से ही
जुटाते हैं,
इस क्रम में बडी बेशर्मी से उन्हें नष्ट भी करते जाते हैं
।
यह स्थिति अमेरिका जैसे विकसित देशों में तो नियंत्रण से
बाहर है ही भारत जैसे विकासशील देश भी इस अंधी दौड में
शामिल हो गये हैं
।बचपन
में पढी पेड पौधों की गवाही की कहानियाँ
और
किताबों तक सिमट कर रह गयी हैं और हम अपने बच्चों को यह
भले ही बतलायें कि सर जगदीश चन्द्र बोस सबसे बडे वनस्पति
वैज्ञानिक थे,
पेड़ों
को काटते वक्त हम शायद ही उनका दर्द महसूस करते हैं
।
यह भी एक विचित्र बात है कि पर्यावरण प्रदूषण से परेशान
देश अमेरिका में पिछली शताब्दी में इस दिशा में जितने
अनुसन्धान हुए और जो चौंकानेवाले परिणाम सामने आए उनमें
से अधिकाशं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कपटजाल के शिकार हो
गये और उन तथ्यों को आम जनता तक पहु/चने से ही रोक दिया
गया
।
पौधों पर विभिन्न रसायनों के प्रयोगों का प्रभाव,
मनुष्य के साथ भावनाओं के आदान प्रदान की क्षमता एवं सहयोग
तथा उनकी परामानवीय शक्तियों से सम्बन्धित अनेक प्रयोग
पश्चिमी जगत में तथा रूस में किये गये
।
इन तमाम पहलुओं के अध्ययन का तत्काल परिणाम इस रूप में
देखने में आया कि उपज कई गुना बढा ली गई
।
अनाज एवं सब्जियों की अनजानी किस्में बाजार में आ गईं और
हमारे भोज्य पदार्थों की संख्या में कई गुना वृध्दि हो गई
।
इस क्षेत्र में व्यवसायरत कंपनियों ने खूब मुनाफा कमाया
।
आम आदमी अभी भी इन प्रयोगों के उन तमाम पहलुओं से अनभिज्ञ
है जो उसके स्वास्थ्य के लिये हानिकारक साबित किये जा चुके
हैं
।
यह अंधी दौड अभी जारी है
।
इससे पहले कि हम इस समस्या के विशद विवेचन में लगें,
हमें प्राकृतिक भोजन एवं कृत्रिम भोजन के अन्तर को समझना
होगा
।
वे भोज्य पदार्थ जो प्राकृतिक रूप से उपजाये जाते हैं या
प्रकृति में उपलब्ध हैं ज़हाँ
रसायनों का प्रयोग नहीं होता उन्हें हम प्राकृतिक भोजन
कहेंगे
।
जिनके निर्माण या उपज में रासायनिक प्रक्रियाओं का,
या रसायनों का प्रयोग होता है उसे हम कृत्रिम कह सकते हैं
।
अमेरिका में इसे
''जन्क
फूड
''
कहते हैं
।
हमें मालूम
होना चाहिये कि प्राकृतिक भोजन में जैव खनिज,
आर्गेनिक मिनरल, जैसे कि तमाम विटामिन सन्तुलित मात्रा में वर्तमान होते
हैं
।
विटामिन अपने आप में कोई पोषक पदार्थ नहीं वरन शरीर को
पोषण पहु/चाने के लिए आवश्यक तत्वों के निर्माण में सहायक
होते हैं. विटामिन वस्तुत: एक अत्यधिक जटिल,
परस्पर सम्बन्धित प्रक्रिया का अविभाज्य अंग हैं
।
''सन्तुलन''
का अर्थ है - वे तमाम पोषक तत्त्व ऊतकों के माध्यम से कोशा
को आवश्यक मात्रा में एक साथ उपलब्ध हों । आवश्यक विटामिन
जो अच्छे स्वास्थ्य और सन्तुलित पोषण का आधार हैं,
प्राकृतिक हों । यहाँ यह भी बतलाना आवश्यक होगा कि
प्राकृतिक और सिन्थेटिक विटामिन में बहुत अन्तर होता है ।
यह भेद रासायनिक न होकर जैविक है । सिन्थेटिक या
प्रयोगशाला में निर्मित विटामिन में जीवनदायक तत्त्वों का
अभाव होता है । इस तथ्य को यद्यपि आमतौर पर स्वीकार नहीं
किया जाता किन्तु यह प्रसिध्द जीवरसायनज्ञ डॉ. ई. फाइफर
द्वारा स्थापित एवं प्रमाणित तथ्य है.फाइफर की तकनीक से यह
उद्धाटित होना भी सम्भव है कि क्यों प्राकृतिक भोजन,
जिसे प्राकृतिक खाद एवं वनस्पति के माध्यम से उपजाया जाता
है,
विटामिन और एन्जाइम के माध्यम से जो पोषण हमारे शरीर को
प्रदान करते हैं वह रसायनों और रासायनिक विधि से तैयार
किये गये भोजन की तुलना में बेहतर है ।
इस सम्बन्ध में एक दिलचस्प घटना का बयान अप्रासंगिक नहीं
होगा.यह घटना साठ के दशक की है
।
डॉ फाइफर,द्वितीय
विश्वयुध्द के दौरान,
अपना देश स्विटजरलैंड छोड अमेरिका आ गये थे
।
एक वन अधिकारी ने डॉ फाइफर को एक जैसे दिखनेवाले दो बीज,
जो अलग-अलग
चीड क़े वृक्षों के थे,
भेजे कि क्या वह उन दोनें बीजों के माध्यम से यह बतला सकते
हैं कि दोनों वृक्षों में क्या अन्तर है?
डॉ फाइफर ने अपनी प्रयोगशाला में परीक्षण के दौरान पाया कि
जहाँ
एक चित्र सुडौल,
एकरूप पूर्णता को दर्शाता था वहीं दूसरे बीज का मणिभ चित्र
विकृत और कुरूप था
।
उन्होंने वनाधिकारी को लिखा कि एक वृक्ष स्वस्थ और सुरूप
होना चाहिए जबकि दूसरे में कोई गम्भीर खराबी है
। लौटती
डाक से उन्हें उस वनाधिकारी द्वारा भेजे गये दो विस्तृत
चित्र प्राप्त हुए जो उन दो चीड वृक्षों के थे,
जिनके बीज उन्हें मिले थे
।
वास्तव में पहला वृक्ष सीधे तनेवाला मजबूत वृक्ष था और
दूसरा इतना टेढा मेढा कि उसका उपयोग लकडी क़े कुन्दे या
जहाज की लकडी क़े लिए हो ही नहीं सकता था
।
वस्तुत: उसी काल में जीव रसायनज्ञों को यह ज्ञात हो चुका
था कि प्राकृतिक रूप से उपलब्ध और उपजाया गया भोजन मनुष्य
को सन्तुलित पोषण प्रदान करता है जो कि उसे स्वस्थ रहने और
बीमारियों से लडने की क्षमता देता है
।
दूसरी ओर डिब्बाबंद भोजन रसायनों का प्रयोग कर तैयार किया
जाता है
।
उसमें से तमाम विटामिन,
एन्जाइम और पोषक तत्त्व निकाले जा चुके होते हैं कि वह
अधिक समय तक तरोताजा रह सके
।
देखा जाय तो वह भोज्य पदार्थ
''मृत''
है
।
उससे जीवन का अंश हटाया जा चुका है कि वह जीवित भी न रहे
और बाद में पूर्णरूपेण मृत हो
।
हम अपनी रसोई में दिन प्रतिदिन व्यवहार में आनेवाले खाद्य
पदार्थों की सूची तैयार का सकते हैं जिन्हें विषैले
पदार्थों की संज्ञा दी गई है
।
आइये हम एक एक कर इनकी सूची बनायें और साथ ही उन कारणों पर
भी गौर फरमायें कि क्योंकर उन्हें इस सूची में शामिल किया
गया
।
हमारे भोजन की मेज़ पर रखा साधारण नमक वैसे तो बडा निर्दोष
सा दिखता है.नमक बनानेवाले कारखानों में उसका इतना
शुध्दिकरण हो चुका है कि वह बारिश के मौसम में नहीं पिघलता
और थायरायड की समस्या का ध्यान रखते हुए उसे आयोडीन युक्त
बनाया जा चुका है
।
विज्ञान की भाषा में यह सोडियम क्लोराइड है
।
लम्बे समय तक इसका प्रयोग हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोगों
को जन्म देता है
।
क्योंकि यह साधारण नमक जब शुध्दिकरण की प्रक्रिया से
गुजरकर हमतक पहुँचता
है तो इसमें से तमाम खनिज तत्त्व निकाले जा चुके होते हैं
जो अत्यल्प मात्रा में अन्यथा मौजूद होते
।
शुध्दिकरण की प्रक्रिया में इसे सोडियम सिलिकेट के साथ
उच्च तापक्रम पर गर्म किया जाता है जो इसे बारिश के मौसम
में सूखा रखता है और सफेद दानेदार बनाए रखता है. यह
प्रक्रिया हमारे हृदय की कोशाओं का वह सन्तुलन बिगाडती है
जो सोडियम और पोटाशियम के नाजुक सन्तुलन से स्थापित होती
है
।
विडम्बना यह है कि सोडियम और पोटाशियम क्लोराइड यदि अलग
अलग लिया जाय तो व्यक्ति की तत्काल मृत्यु हो जाय
।
यह सन्तुलन प्रकृति में उपलब्ध है और हमारी रासायनिक
प्रक्रियाओं ने उसे समाप्त कर दिया है
।
हमारे स्वस्थ जीवन में दूसरा खलनायक है ग्लूकोज एवं चीनी
।
चीनी के सफेद,
सुन्दर लुभावने रूप को तत्काल सामाजिक मान्यता मिली और
उसकी बडी क़ीमत चुकाकर भी लोगों ने उसे रोजमर्रा की जरूरतों
में शामिल कर लिया.जबकि वास्तविकता यह है कि गन्ने के रस,
जिससे चीनी बनती है,
का शुध्दिकरण मूलत: व्यावसायिक कारणों से किया जाता है
।
इस तरह उत्पादित चीनी को कपडे क़े बोरों में सुविधापूर्वक
बन्दकर वर्षों तक बिना किसी व्यावसायिक नुकसान के बेचा जा
सकता है जिसका पूर्ण लाभ व्यावसायिक कम्पनियाँ
उठाती हैं
।
इस प्रक्रिया का दूसरा पहलू यह है कि इस तरह साफ की गई
चीनी में कार्बोहाइड्रेट और कैलरी के सिवा कुछ नहीं होता
।
गन्ने के रस में उपस्थित सारे विटामिन और खनिज तत्व निकाले
जा चुके होते हैं
।
इस चीनी की अधिक मात्रा सीधे हमारे पैन्क्रिया,
पाचन रस और इन्सुलिन पैदा करनेवाली गिल्टी,
पर असर डालती है
।
उन्हें नुकसान पहुँचाती
और हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को घटाती है
।
तमाम बैक्टिरियल और वायरल इन्फेक्शन्स के हम अपेक्षाकृत
जल्दी शिकार बनते हैं.यही वजह है कि सारे सॉफ्ट ड्रिंक
विषैले भोजन की सूची में आते हैं
।
उनमें चीनी,
रसायनों और कृत्रिम रंग के सिवा कुछ नहीं होता
।
डिब्बा बन्द फलों का भी वही हाल है
।
चीनी के घोल में डूबे ये फलों के टुकडे हमें पोषण प्रदान
करने के बदले हानि ही पहुँचते
हैं।
हृदय की बीमारियों को जन्म देने वाला अगला अभियुक्त है
,
हाइड्रोजनेटेड फैट या वनस्पति घी
।
तेल के हाइड्रोजनेशन के दौरान निकेल धातु का उत्प्रेरक के
रूप में उपयोग होता है
।
यह गर्म निकेल हाइड्रोजन गैस के अणुओं को लिनोलिक अम्ल के
कार्बन अणुओं के बीच के रिक्त स्थान में ढकेलता है
।
इस तरह जो वसायुक्त तेल तैयार होता है वह दुर्गंध मुक्त
होता है और लम्बे समय तक वैसा बना रहता है किन्तु यह
क्रिया जरूरी वसीय अम्लों,
फैटी एसिडस,
को भी नष्ट कर डालती है.हमारे शरीर की कोशाओं द्वारा यह
वनस्पति तेल या घी शोषित नहीं होता
।
अंतत: यह रक्त वाहिनी नलिकाओं की दीवारों पर जमा हो जाता
है और हृदय की बीमारियों को जन्म देता है
।
खेतों में जब डीडीटी का या अन्य पेस्टीसाइड का छिडक़ाव किया
जाता है वे रासायनिक पदार्थ सीधे अनाज के बीजों में
प्रवेश कर जाते हैं
।
उन बीजों का कॉर्न का तेल बनाने के लिए इस्तेमाल होता है
।
हालाँकि
डीडीटी के बदले अब डायालड्रिन,
एलड्रिन और हेप्टाक्लोर का प्रयोग होने लगा है
,
इन रसायनों का प्रभाव भी कमोबेश उतना ही हानिकारक है
।
भोजन में इस तेल का उपयोग कैन्सर जैसी बीमारियों को जन्म
दे सकता है
।
इसीलिए सूरजमुखी के तेल या जैतून के तेल को भोजन पकाने के
लिये बेहतर माना गया है
।
गेहूँ
और चावल हमारे भोजन के मूल अंग हैं
।
किन्तु यदि हम गेहूँ
की रोटी के बदले मैदे की रोटी या मैदे से बनी पावरोटी खाते
हैं तो हम अनजाने में पेट की बीमारियों को दावत दे रहे हैं
।गेहूँ
से जब मैदा बनाया जाता है तो गेहूँ
का बाहरी हिस्सा निकाल दिया जाता है जो विटामिन बी
काम्पलेक्स का स्रोत है
।
रासायनिक क्रियाओं का इस्तेमाल इसे विटामिन ए विहीन भी बना
देता है
।
कालान्तर में मैदा या मैदे से बनी पावरोटी का अधिक उपयोग
हमारी पाचन प्रणाली को नुकसान पहुँचाता
है
।
यही स्थिति चावल के साथ है
।
चावल को विटामिन बी कॉम्प्लेक्स का सर्वोत्तम स्रोत माना
गया है
।
किन्तु जब इस चावल की मिल में छँटाई
कर,
इसे बाजार में साफ चमकीले रूप में प्रस्तुत किया जाता है
तो इसमें स्टार्च,
जो शुध्द कार्बोहाइड्रेट है,
के सिवा कुछ नहीं बचता
।
बेरी बेरी रोग या आँखों
की अन्य बीमारियों से बचने के लिए इस चावल का भोजन में
उपयोग न करना बेहतर है
।
मार्गरीन को तो शुध्द जहर ही समझिये
।
मक्खन के बदले इसका प्रयोग प्रचलन में है
।
इसमें न विटामिन ए होता है न विटामिन डी किन्तु व्यावसायिक
कम्पनियाँ
इसके पक्ष में खूब प्रचार करती हैं
।
अमेरिका में मूँगफली
का मक्खन भी खूब खाया जाता है. इसकी निर्माण विधि भी इसे
अखाद्य पदार्थों की सूची में ले आती है
।
देखा जाय तो सारी समस्या रसायनों के प्रयोग की देन है
।
रासायनिक खादों का अधिक प्रयोग मिट्टी को बीमार बनाता
है.बन्जर भूमि की समस्या भी रासायनिक खादों और रसायनों के
कारण पैदा हुई है
।
एक ओर जहाँ
प्राकृतिक खादों का प्रयोग मिट्टी की उर्वरता बढाता है और
कालान्तर में खाद की जरूरत को घटाता है वहीं रासायनिक खाद
शुरू में चमत्कारी रूप से उपज बढाकर बाद में मिट्टी की
उर्वरता को घटाती है
।
पौधे जिस तरह पर्याप्त एवं सन्तुलित मात्रा में मिट्टी एवं
पशुओं का पोषण करते हैं वह ध्यान देने योग्य बात है
।
मनुष्य तो सीधे मिट्टी से भोजन ग्रहण नहीं कर सकता
।
वह शाक सब्जियों,
अनाज,
फल और मांसाहार के रूप में भोजन से पोषक तत्व प्राप्त करता
है.मिट्टी में वर्तमान सूक्ष्म जीव मिट्टी में स्थित
रसायनों को विखंडित कर पौधों के लिए स्वीकार्य बनाते हैं
।
पौधे हवा,
वर्षा और धूप से कार्बेहाइड्रेट सिन्थेसाइज क़र सकते हैं
।
किन्तु ये कार्बोहाइड्रेट अमीनो एसिड और प्रोटीन में
परिवर्तित हो सकें इसके लिये मिट्टी का स्वस्थ होना जरूरी
है
।
न आदमी,
न पशु यह काम कर सकते हैं
।
प्रोटीन पैदा करनेवाले पौधे को मिट्टी से तमाम किस्म के
पोषण चाहिए
।
नाइट्रोजन
,सल्फर
और फॉस्फोरस प्रोटीन
अणु
के हिस्सों के निर्माण के लिये,
कैलशियम और लाइम भी
।
मैगनेशियम,मैंगनीज,बोरोन,
कॉपर,
जिन्क,
मॉलिबडेनम और कई अन्य तत्व भले ही अत्यल्प मात्रा में
।
अब यदि मिट्टी ही अच्छी न हो तो यह प्रक्रिया पूरी कैसे
हो! पौधे जब मरकर वापस मिट्टी में मिलते हैं और उसी तरह
जब पशु जंगलों में मरते हैं तो वे वापस मिट्टी को पोषण
प्रदान करते हैं
।
तब मिट्टी को किसी अतिरिक्त पोषण की आवश्यकता नहीं होती
।
मिट्टी का सन्तुलन बना रहता है और उससे पौधे फिर जन्म लेते
हैं
।
प्रकृति अपना चक्र पूरा कर लेती है
।
मिट्टी से पर्याप्त पोषण न मिलने के कारण पौधे कमजोर होते
हैं
।
उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है
।
उनको खानेवाले पशु कमजोर होते हैं
।
हमारे भोजन में शामिल शाक सब्जी,
अनाज और मांसाहार किसी से भी हमें पर्याप्त पोषण नहीं मिल
पाता
।
हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आती है
।
और रासायनिक तरीकों का इस्तेमाल कर इस तरह उपजाए गये अन्न
या मांसाहार को जब परिवर्ध्दित किया जाता है तो उसमें
कितने पोषक तत्व बचे होंगे यह विचारणीय तथ्य है
।