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रोटी और लोकतंत्र |
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मुरली
मनोहर
श्रीवास्तव |
यह
कैसा लोकतंत्र है जिसके लोक में एक लाख किसानों
ने
आत्मह्त्या कर ली और कोई हलचल नहीं हुई। अन्नदाता अन्न के
लिये विधान सभा के
सामने फ़ांसी लगा लेता है और लोकतंत्र के किसी पहरुये को
फ़ांस नहीं चुभती । क्या इसी
लोकतंत्र के लिये चुनाव होते हैं
?
क्या लोकतंत्र के प्रतिनिधि अपने लोगों के प्रति
इतने
संवेदन हींन होते हैं
?
क्या मौत का आज मौत के बस राजनैतिक निहितार्थ रह गये
हैं
?
यह
भी बस आंकडों का खेल बन कर रह गयी है
? बस
कागज रंगते रहो घोषणाओं के
अम्बार लगाओ और चिंता व्यक्त करते रहो!शर्म
से डूब मरने की बात है उन लोकतंत्र
के
प्रतिनिधियों के लिये जो बडी कम्पनी के व्यावसायिक हितों
के लिये लाबिंग तक कर
डालते हैं और उसके लिये उनके भीतर कोई दर्द नहीं होता जिसे
वे लोक कहते हैं
।
देश
की
जनता के प्रतिनिधि क्या इसीलिये हैं कि चुने जाने के बाद
किसी सेठ साहूकार या
व्यापारी की तरह मात्र अर्थ व्यवस्था के नफ़े और नुकसान के
तराजू पर देश को तौलें
।
वह
जो देश का पेट भरने का दम भरता है आज अपने परिवार का पेट
भरने में अक्षम है
और
आत्मह्त्या कर रहा है। किसान कोई भिखमंगा नहीं है कि उसकी
झोली में पैकेज की भीख
डाल
कर कर्तव्य बोध से मुक्त हो जायें। जो लोकतंत्र अपने
सम्मान जनक नागरिकों को
रोटी
नहीं दे सकता वह किस काम का। लोकतंत्र क्या अमरीका और बहु
राष्ट्रीय कम्पनियों
के
हितों को साधने का जरिया मात्र है। यदि लोकतंत्र का यही
अर्थ है तो यह लोकतंत्र
ले
लो
, ले
लो लोकतंत्र इस देश से विश्व के हर उस भाग से जो वहाँ के
गरीब अन्नदाता
को
आत्म हत्या के मुँख में झोक रहा है।
इस
लोकतंत्र से बेहतर तो राजशाही थी
जिसमें झूँठी नैतिकता का मुल्लम्मा नहीं चढा था और जिसमें
अत्याचार को अत्याचार के
रूप
में ही देखा जाता था। अत्याचार पर घडियाली आँसू बहाना ही
लोकतंत्र
का
चरित्र
है।
आज लोकतंत्र सामंतवादी प्रवृत्तियों के पोषण का आवरण बन
गया है। अब समय आ गया
है
कि इस आवरण पर से पर्दा उठा दिया जाये।
कोई
भी व्यवस्था किसी दूसरी व्यवस्था
से
बेहतर होंने पर लायी जानी चाहिये लेकिन निकृष्ट व्यवस्था
को बिना देर किये बदल
देना
चाहिये।आज लोकतांत्रिक व्यवस्था सर्वाधिक निकृष्ट व्यवस्था
बन कर उभरी है।
अमेरिका इंग्लैड और भारत सहित विश्व में हर जगह लोकतंत्र
की आड में कुत्सित खेल
खेला
जा रहा है।
नाम
है जनता द्वारा जनता की जनता के लिये सरकार लेकिन चुनने
तथा
बनने
के बाद सरकार पूंजीपति व व्यवसायियों के हाथ में खेलती है।
बडी बडी
लोकतांत्रिक सरकारें मल्टी नेशनल कम्पनियों का खिलौना बन
कर रह जाती हैं।आज
सम्पूर्ण लोकतंत्र पर बस पैसा हावी है। पैसे ग्लैमर और
सेक्स ने पूरी दुनिया को
कब्जे में ले लिया है। कुछ मुट्ठी भर साधन संपन्नलोगों
द्वारा पैसे के लिये पैसे से
ही
खेल खेले जा रहे हैं । पूरा का पूरा ग्लैमर जगत विज्ञापन
जगत सिनेमा टीवी और खेल
की
दुनियां इनके कब्जे में है। यह शिकंजा इतना जबर्दस्त है कि
कोई इसे तोड ही नहीं
सकता। इस शिकंजे को व्यवस्था का नाम दिया जाता है। पूरे का
पूरा लोकतंत्र और
सरकारें ब्लैकमेलिंग का शिकार हो रही हैं ।
यह
अकारण ही नहीं है कि किसी भी
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूर्ण बहुमत वाली मजबूत सरकार
नहीं है चाहे इंग्लैड
फ़्रांस जर्मनी या भारत कोई भी देश हो बस अमेरिका को छोड
कर। क्योकि मजबूत सरकार इन
कुत्सित स्वार्थो की पूर्ती नहीं होनें देती अत: आज
लोकतंत्र में मजबूत सरकारें
जन्म
नहीं ले रही हैं। इतना ही नहीं गौर से देखने पर पाते हैं
कि कहीं भी पैसे के
बिना
गठबंधन सरकार नहीं बनती और यह पैसा इन्हीं मार्केट की
ताकतों द्वारा अपने हित
साधने के लिये दिया जाता है।
मजेदार बात यह है कि इस तंत्र का कोई एक मुखिया
नहीं
होता। यह तंत्र पूरी तरह एक वैचारिक धरातल और सिद्धांत पर
काम करता है। इस
तंत्र में हर जगह हर स्तर पर शोषक बैठे हुये हैं जो दिखावा
तो आम आदमीं के सुख
सुविधा का ध्यान रखने और विकास का करते हैं विभिन्न
विज्ञापनों और अपने मीडिया के
द्वारा लेकिन इनका अंतिम लक्ष्य अपने बाजार और पूंजी का
विकास होता है। यही
ग्लोबलाईजेशन का फ़ैक्ट
( सच ) भी है।
यह
तंत्र सामंतवादी मानसिकता को मात करता है
और
अपनी मजबूरी तथा अय्याशी के चले लोकतंत्र इसे सपोर्ट करता
है इतना ही नहीं
लोकतंत्र इस बाजार का गुलाम बन गया है। लोकतांत्रिक
व्यवस्था में जनता को ढेंरों
सपने
बेच दिये गये हैं और अब इन सपनों को साकार करने के लिये इस
बाजार पर निर्भरता
बढ
गयी है ऐसे में कोई भी लोकतंत्र का पहरुआ इसका विरोध कर
लोकतंत्र में चुनाव जीत
ही
नहीं सकता। आज बाजार विरोध का अर्थ विकास विरोध हो गया है
,
जबकि विकास और बाजार
दो
अलग अलग धारणायें हैं यदि ऐसा न होता तो बढता हुया बाजार
किसानों को आत्महत्या
के
लिये मजबूर न करता। अभी मध्य वर्ग और नौकरी पेशा लोग चुप
इस लिये हैं कि इस
बाजार की आंच में वे नहीं झुलस रहे लेकिन वे इस बात को
नहीं समझ रहे कि आज नहीं तो
कल
अजदहे की तरह यह बाजार उन्हें भी लील लेगा।
लोकतंत्र बनाम रोटी की लडाई कोई
साधारण और आसान लडाई नहीं है यह डायनासोर बनाम गरीब इंसान
के सरवाईवल की लडाई है।
प्रश्न यह है कि डाईनासोर रहेगा या धरती पर इंसान । इंसान
केवल पैसों से नहीं पैदा
होता
और जो लोग केवल पैसे के संदर्भ में सोचते हैं वे इंसान न
रह कर बैंक के लाकर
में
बंद सिक्कों की तरह हो जाते हैं ।
दरअसल बहु राष्ट्रीय कम्पनियां मैटीरियल
या
निर्जीव हो कर भी ताकत रखती हैं । इसमें काम कर रहे आदमीं
इस अघोषित पावर के
गुलाम बन कर रह रहे हैं। सजीव आदमीं व्यवस्था में आ जा रहे
हैं जबकि व्यवस्थायें
निर्जीव हो कर भी मजबूत हो रही हैं । धीरे धीरे निर्जीव
व्यवस्था बाजार इंसान
और
इंसानियत को खा जायेगी।
जब
पैसा नहीं चलता था तब भी इंसान धरती पर था और
युद्ध के भयानक विनाश के बाद जब पैसे की अहमियत समाप्त
होगी तब भी तब भी धरती पर
इंसान रहेगा। यह जो कुछ लोगों द्वारा विकास के नाम पर
प्रगति का पैमाना पूरी तरह
बाजार वाद के अनुरूप तय कर दिया गया है वह वस्तुत: संपूर्ण
मानवता के विनाश का
सामान है। जहां एक खास वर्ग को विलासिता और स्वयं को सत्ता
संपन्न बनाये रखने के
लिये
करोडों डालर की जरूरत है वहीं धरती पर पूरी आबादी के लगभग
सत्तर प्रतिशत लोगों
की
आवश्यकता नितांत रोटी है।उसके लिये लोकतंत्र या कोई भी
अन्य तंत्र बेमानी है।
लेकिन उसे यह रोटी किसी भीख या दान की तरह नहीं चाहिये
बल्कि आत्म सम्मान के साथ
चाहिये । और आज बाजर वादी ताकतें लोकतंत्र में इस जनता का
आत्मसम्मान छींनती जा रही
हैं
कितना भी अधिक पैसा रख कर आदमीं आज भूखा और उपेक्षित है।
उसे हर समय असुरक्षा
की
भावना सता रही है उसे सदैव ही बाजार अपने विज्ञापन की ताकत
और अन्य माध्यमों से
हींन
भावन से ग्रसित कर रहा है और वह जीने की लालसा खोता जा रहा
है। यह मात्र
किसानों तक ही मामला नहीं है आने वाले समय में समाज के
अन्य तबके भी इस बाजार वाद
का
शिकार होंना प्रारंभ हो जायेंगे और लोकतांत्रिक व्यवस्था
इस बाजार की ताकत से
लडने
में पूरी तरह अक्षम साबित हो रही है ऐसे में प्रश्न यह है
कि यह लोकतंत्र आज
कितना प्रासांगिक है।
