रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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अध्यात्म

 

क्या लिखा है बॉयबिल में ?

अशोक रहाटगाँवकर

            क्या लिखा है बॉयबिल में ? यह जानने के लिए किसी भी व्यक्ति को ईसाई बनने की आवश्यकता नहीं है । क्या लिखा है कुरान में ? यह जानने के लिए किसी को मुसलमान बनने की आवश्यकता नहीं । महागाथा रामायण जानने के लिये हिन्दु बनना आवश्यक नहीं । क्या हैगुरुग्रंथ साहिब में ? यह जानने के लिए सिक्ख बनना जरुरी नहीं । यदि मन में जिज्ञासा हो, प्रचंड इच्छा शक्ति हो तो कोई भी मनुष्य सहज रुप से किसी भी धर्म के मूल तत्वों को जान सकता है ।

                 

            जहाँ तक विश्व के भिन्न भिन्न धर्मों का प्रश्न है तो सभी धर्मों का उद्देश्य एक है ईश्वर को पाना उसकी भक्ति में मगन रहना । उस भक्ति को पाने के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं परंतु ईश्वर प्राप्ति के लिए जो मंजिल है वह सबों की एक ही है । सभी धर्मों में लगभग समानता है बस उसे निरपेक्ष हो कर जान लेने की आवश्यकता होती है । दिसंबर का यह महिना इसाईयों के लिए बहुत ही पवित्र होता है । 25 दिसंबर ले लेकर 31 तक जो सप्ताह मनाया जाता है वह बहुत ही पावन होता है । वे अपने परमेश्वर प्रभु यीशु की चमत्कारिक शक्तियों का स्मरण करते हैं उसके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं ।

     

            उसी प्रकार, मुसलामान भाईयों के लिए रमजान का महिना पाक माना जाता है। वे इस अवधि में सूर्योदय से सूर्यास्त तक उपवास रखते हैं।ऐसी मान्यता है कि रमजान भर रोजे रखने से इन्सान के जीवन के पापों का ग्राफ कम हो जाता है। हिन्दूओं के लिये तो अनेक अवसर है जिन्हें वे भगवान के साथ बाँट लेना चाहते हैं फिर भी दशहरा दीपावली ये पर्व महत्वपूर्ण होते हैं। प्रभु यीशु के जन्म की चर्चा भी बड़ो रोचक है। जिस दिन परमेश्वर ने पृथ्वी और आकाश  निर्मित की थी तब भूमि नहीं थी, झाड़ पौधे नहीं ये क्योंकि उसने पृथ्वी पर जल नहीं बरसाया था । उस समय खेती करने के लिये मनुष्य का जन्म भी नहीं हुआ था। अचानक परमेश्वर ने भूमि को मिट्टी से रचा । उसके नथूनों में जीवन का श्वास भर दिया फल स्वरूप आदम रूपी जीवित प्राणी प्रकट हुआ । आगे परमेश्वर ने सोचा कि यह आदम अकेले जीवन कैसे काटेगा ? तो उसने आदम को गहरी नींद सुना दिया ।

     

            उसी गहरी नींद में सोये आदम के शरीर से एक पसली निकाल कर उसमें मांस भर दिया उससे स्त्री उत्पन्न हुई । आदम को जब पता चला कि उसकी हड्डी, उसके ही मांस से स्त्री की उत्पत्ति हुई तो उसने उसको नारी की ओर ताकना शुरु किया । क्योंकि उसका निर्माण नर के तत्वों से हुआ था । परमेश्वर ने उन दोनों को वाटिका में रखा और वहाँ के फलों को खाने से उस नारी को मना किया । परंतु एक धूर्त सर्प के बहकावे में आकर नारी ने उस प्रतिबंधित फल को चखा और आदम को भी चखाया ।

 

            सर्प ने उस नारी से कहा था कि इस फल को जो चखेगा उसे बुद्धि और ज्ञान प्राप्त होगा। उसकी आँखें इस सृष्टि की सारी चीजें देख सकेगी। और सचमुच हुआ भी ऐसा ही आदम और हव्वा को सब कुछ दिखने लगा। ज्ञान और बुद्धि भी प्राप्त हो गई । दोनों ने यह महसूस किया कि वाटिका में वे दोंनो नग्न है। उन्होंने अंजीर के पत्ते के वस्त्र लपेटकर अपनी नग्नता दूर करनी चाही। यही से मानव सम्यता का जन्म हुआ। यीशु के जन्म की कथा में वह विवाह के पूर्व ही मरियम के कोख में पल रहा था। मरियम की सगाई युसुफ के साथ तय हुई थी । इसी बीच मरियम किसी पवित्र अरमा के जरिये गर्भवती हो गई । युसुफ को पता चला तो वह नहीं चाहता था कि मरियम की बदनामी हो या समाज उसे कुल्टा कहकर पुकारे । उसने इस सगाई को त्यागने का मन बना लिया । रात को जब वह निद्रा में ता तब उसे परमेश्वर का दूत दिखाई दिया जो कह रहा था कि मरियम को त्यागने का ख्याल छोड़ दे। उसके गर्भ में  जो पल रहा है वह पवित्र आत्मा है । वह एक पुत्र को जन्म देगी जो सारे मानव जाति का कल्याण करेगा। तू उसका नाम यीशु रखना। मरियम को लेकर कहीं दूर चला जा ।

     

            जब हम धर्म और संस्कृति की बात करते हैं तो उसमें समानता ढूढ़ने का भी प्रयास करते हैं। मरियम के विवाह पूर्व गर्भवती होने जैसी कथा महाभारत में भी आती है। कुंती सूर्य के प्रताप से गर्भवती हो जाती है जिसके कारण कर्ण जैसे तेजस्वी बालक को वह जन्म देती है। समाज ने उसे भलेही  सुत पुत्र कहा हो परंतु उसकी दानशीलता को तो इतिहास भी नहीं नकार सका। उसी प्रकार यीशु के प्रतापी अस्तित्व को समाज ने यीशु पर चढ़ा दिया कीलें ठोंकी परंतु उसकी कृति ही आज बायबिल के रूप में जीवित है।

     

             यीशु के जन्म की भविष्य वाणी से सारा यहुदी समाज जाग उठा । जो अन्यायी थे वे अपने अनिष्ठ को देखकर काँप उठे । उन्होंने यीशु के जन्म को रोकने का बहुत प्रयास किया परंतु वे सफल नहीं हुए। क्योंकि यीशु के रूप में स्वयं परमेश्वर अवतरित हो रहे थे उनको भला कौन मार सकता था। महाभारत में भी जब कंस के वध करने की आकाशवाणी होती है तो वह भी काँप उठता है। उसका वध करने के लिये साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण देवकी के गर्भ से जन्म लेने वाले थे । भविष्यवाणी से डरकर कंस ने देवकी के सात पुत्रों का वध कर डाला परंतु आठवे पुत्र को वह नहीं मार सका क्योंकि वह तो साक्षात परमेश्वर ही थे। सारे विश्व को तारनेवाला श्रीकृष्ण । उन्हें कंस जैसा नीच अधम और पापी इंसान भला कैसे मार सकता था। यीशु के लिये भी इसी प्रकार का प्रयास किया गया था परंतु वह सफल नहीं हो सका।

     

            यीशु के चमत्कारों से भरा बायविल प्राणी मात्र से प्रेम करने का संदेश देता है। घृणा को कहीं भी स्थान नहीं है। विश्व के सभी धर्म यही शिक्षा देते हैं। यीशु ने जब मार्ग से गुजरते हुये एक कोढ़ी को हाथ लगाया तो वह अच्छा हो गया ।  यह चमत्कार देखकर एक तबका यीशुको परमेश्वर मानने लगा तो दूसरा अपनी जमीन खिसकती देखकर उसे समाप्त करने का षड़यंत्र रचने लगा।

     

             धर्म, संस्कृति और समानता यह दर्शाती है कि परमेश्वर ने हमेशा से ही किसी न किसी रूप में अवतरित होकर पाप और पापियों का नाश किया है। भगवान श्रीकृष्ण ने तो पृथ्वीवासियों को यह विश्वास ही दिलाया था कि यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत जब जब इस धरती पर पाप बढ़ेगा मैं संहार करने कि लिये हर युग में जन्म लूँगा। यीशु भी मरियम की कोख से जन्म लेकर धन्य हो गये और सारे ईसाई समाज को धन्य कर गये । सूली पर लटकने वाला यीशु आज उनके जीवन का मार्गदर्शक कहलाता है।

     

             आज पूरा विश्व आतंकवाद की चपेट में हैं । आतंकवादी परमात्मा की इस अनुपम सृष्टि को तहस- नहस कर डालना चाहते हैं। मनुष्य ही मनुष्य की जान पर तुला हुआ है। दया और करूणा स्थान घृणा और ईर्ष्य ने ले लिया है। क्या कारण है कि जब मानव उत्पत्ति का आधार ही प्राणी मात्र से प्रेम करना था फिर एकाएक वह लुप्त क्यों और कैसे हो गया ? यदि हम सारी परिस्थितियों का चितंन करें - तो हमें स्पष्ट जान पड़ता है कि जब मानव ने पहिले पहल बुद्धि और ज्ञान को प्राप्त किया तो उसे मानवता का एहसास भी हुआ था। परंतु कालांतर में मनुष्य को एक और वस्तु प्राप्त हुई वह हैं विवेक जिसका उपयोग वह आजकल करता ही नहीं। बुद्धि इस विवेक पर इतनी हावी हो गई है कि वह उसका उपयोग करने से मनुष्य को रोकती है। इसीलिये आज चारों ओर कोहराम मचा है। पूरे विश्व में अशांति और अराजकता फैली हुई है। आज हम विश्व बंधुत्व को भूलकर अलग ही रास्ते पर भटक रहे हैं। यही भटकाव हमें विनाश की ओर ले जाने में सहायक सिद्ध हो रहा है।

     

            हम चाहें, बायबल पढ़े चाहें कुरान, चाहे रामायण पढ़े या फिर गुरुग्रंथ साहेब,  एक बात हमें अच्छी तरह जान लेनी होगी कि हमारे सोये हुये विवेक को हमें जगाना होगा। बुद्धि को उस पर हावी होने से रोकना होगा तभी हम विश्व बंधुत्व और शांति स्थापित कर सकेंगे अन्यथा क्या लिखा है बायबिल में यह जिज्ञासा सिर्फ जिज्ञासा बनकर ही रह जायेगी।

 

 

 

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