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संस्कार

परिवेश : बदलाव की प्रक्रिया- विजयदेव नारायण साही

साहित्य और मनोविज्ञान- मुंशी प्रेमचंद

 

अपने समय के महत्वपूर्ण लेखकों की आलोकित रचनाएं

 

परिवेश : बदलाव की प्रक्रिया

विजयदेव नारायण साही

 

                लेखक और उसके परिवेश की बातचीत में पहले मैंने सोचा था कि मैं साहित्यिक परिवेश का चर्चा करूँगा । फिर कुछ सोचने पर मैंने साहित्यिक शब्द को भी निकाल दिया है । इतिहास में हम न भी जायें कि ऐसा कब से हुआ तो भी इतना तो हम मान कर ही चलेंगे कि इस समय साहित्य का प्रमुख मुद्दा या परिवेश मनुष्य है । एक अर्थ में हम चाहें तो इसे बहुत पहले तक ले जा सकते हैं; पूरे साहित्य को ही इस में शामिल कर सकते हैं । एक विशिष्ट अर्थ में यह कहें कि मनुष्य ही साहित्य का परिवेश है तो एक विशिष्ट साहित्य को ही ध्यान में रख रहे होंगे जिसे सामान्यतः आधुनिक साहित्य कहा जाता है । इस में एक बात और जोड़ कर देख सकते हैं । परिवेश के इस चर्चा में मनुष्य वह मनुष्य है, जो बदल सकता है, बदलता है । मनुष्य मात्र कह देने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यह वह मनुष्य है जो बदल रहा है और जो बदलेगा ।

        

            वह कैसे बदलेगा, इसके सब आयाम भी इसमें जुड़ जाते हैं । और अब भी इस बात को लेकर चिंता या व्यग्रता है कि बदलाव का क्या स्वरूप है और कैसे वह घटित होता है, क्यों घटित होता है । मानव मूल्यों का समस्त विचार इस बदलाव की प्रकृति को ही समझने का और उसे कुछ तेज करने का या वांछित दिशा देने का प्रयास है । ऐसी धारणा हिंदी में भी है, अन्य भारतीय भाषाओं में भी रही है और दुनिया की लगभग सभी भाषाओं के साहित्य में मिलती है ।

    

            आदमी जैसा है वैसा ही न रहे; वह बदले, यह चिंता केवल आधुनिक साहित्य की ही चिंता नहीं है । प्राचीन साहित्य में भी वह रही, मध्यकालीन साहित्य में भी मिलती है पुराने यूनान-रोम में भी और भारतीय साहित्य में भी ।

 

         मनुष्य के बदलने के दो रूप हो सकते हैं । एक तो यह है कि जैसा भी हमारा जीवन चल रहा है, जो भी हमारी दृष्टि है, अनुभव की हमारी प्रणाली है, अपने अनुभवों को मूल्यवत्ता देने की, अपनी अनुभूति को मूल्यवान बनाने की जो भी हमारी क्षमता है, उसे अगर हम भीतर से बदल दें तो मनुष्य बदल जायेगा । यही चिंता अक्सर साहित्य में व्यक्त हुई है । किंतु फ्रांसीसी क्रांति का एक और असर हुआ, उससे ऐसा लगा कि यह जो मनुष्य को भीतर से बदलने का हमारा प्रयास रहा है वह अधूरा चला गया, कि बारंबार प्रयास करने के बावजूद भी मनुष्य नहीं बदला या कि केवल कुछ लोग भीतर से बदल जाते हैं, बाकी लोग नहीं बदलते ।

 

         यों तो यह चिंता या अंतर्विरोध भी ऐसा नहीं है कि केवल फ्रांसीसी क्रांति के समय ही पहले-पहल सूझा हो । उससे पहले भी सूझा था और धीरे-धीरे एक धारणा ऐसी बनती गयी थी कि हम कुछ ऐसा भी करें कि अगर हम मनुष्य को केवल भीतर से न बदल पायें या अभी तक यह प्रयास जितना हुआ है, अधूरा रहा है तो हम उन रिश्तों को ही बदल दें जो समाज को चलाते हैं, और यदि सामाजिक रिश्ते बदल गये तो मनुष्य भी बदल जायेगा । बजाय इसके कि हम उसे कमलवत् साधन करने को कहें, हम कीचड़ को ही बदल दें तभी कमल खिलेंगे । इस समय साहित्यकारों के सामने यह एक प्रमुख मुद्दा है और यहाँ के ही नहीं, अन्य देशों के लेखकों को, विचारकों को भी मथता रहा है । विचारकों का एक ऐसा दल पिछले सौ वर्षों में अवश्य खड़ा हुआ जिसकी खोज भीतर से बदलने वाले प्रयासों की असफलता के कारण इतनी अधिक हो गयी कि उन्होंने यह तक कह दिया कि यह भीतर से बदलने का प्रयास पाखंड है और इसकी ओर ध्यान ही नहीं देना चाहिए; कि कोई भी चीज़ भीतर से तभी बदलती है जब उसे बाहर से बदल दिया जाये । फ्रांसीसी क्रांति के बाद एक बहुत बड़ी क्रांति रुस में हुई जिसने यह माना कि अगर हम रिश्ते बदल देंगे तो मनुष्य अपने-आप बदल जायेगा, अलग से मनुष्य को भीतर से बदलने के प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं है ।

 

         आज हमारे युग में रूसी क्रांति को हुए इतने ही दिन हो चुके हैं जितने दिन फ्रांसीसी क्रांति के बाद तब हुए थे जब मार्क्स और एंगेल्स ने विचार करना शुरु किया था । मार्क्स और एंगेल्स ने जब फ्रांसीसी क्रांति की आलोचना की तो किसी ने उन पर यह आरोप नहीं लगाया कि तुम राजशाही के समर्थक मान लिये जाओगे । लेकिन आज ऐसी हालत है कि लगता है, आज यह आसानी से कहा जा सकता है कि यदि तुमने रूसी क्रांति की आलोचना की तो तुम पूँजीवादी व्यवस्था के प्रशंसक मान लिए जाओगे । लेकिन विचार तो कभी रुकता नहीं । रूसी क्रांति भी उसी तरह इतिहास की एक घटना है जिस तरह फ्रांसीसी क्रांति रही, उसके सुपरिणामों, कुपरिणामों या अधूरे परिणामों पर विचार करना आज हमारे लिए बहुत ज़रूरी है । आज रूसी क्रांति के कुपरिणामों या अधूरे परिणामों को गिनाना उतना ही आसान है जितना फ्रांसीसी क्रांति के अधूरे परिणामों को गिनाना आसान था । कम से कम मनुष्य को बदलने के सिलसिले में ऐसी ही विचारधारा फ्रांसीसी क्रांति के दिनों में उसके निर्माताओं के दिलों में थी कि जल्दी से जल्दी परिवर्तन हो जायेगा और हम एक आदर्श व्यवस्था तक पहुँच जायेंगे । और इस अर्थ में रेवाल्यूशन को एवोल्यूशन से अलग किया गया था । इस दृष्टि से रूसी क्रांति वालों ने और अधिक उग्रता से वह कहा जो मार्क्स के एक प्रसिद्ध वाक्य में कहा गया था कि द एंटायर स्ट्रक्चर इज मोर आर लैस रैपिडली ट्रांसफार्म्ड बहुत त्वरा के साथ पूरा ढ़ाँचा बदल जाये इसी को क्रांत कहते हैं । आज रूसी क्रांति को हुए सत्तर से वर्ष हो रहे हैं और यह दावा खुद रूसी समाज का भी नहीं है कि हमने पूरे स्ट्रक्चर को पूरा का पूरा बदल दिया है । क्योंकि जिसे अक्टूबर-क्रांति कहते हैं वह भी क्रांति की भूमिका मात्र दिखी और उसके बाद रूस के नेताओं ने भी कहना शुरू किया कि यह एवोल्यूशन से अर्थात् धीरे-धीरे सम्भव होगा । उसी प्रकार आज से लगभग तीस वर्ष पूर्व चीन में उन्हीं मुद्दों पर क्रांति हुई लेकिन अब वहाँ भी कहा जा रहा है कि यह धीरे-धीरे होगा, एकदम नहीं होगा । तो यह जो मोर आर लैस रैपिडली ट्रांसफार्म्ड की कल्पना थी, एक समाज में लगभग 70 वर्ष हो गये और दूसरे में 30 से ऊपर हो गये, यह अभी तक पूरी होती नहीं दिखती । और आगे कितने दिनों तक यह चलेगी, कहा नहीं जा सकता क्योंकि वर्गों का नितांत अभाव न रूस में हुआ है, न चीन में । वर्गों का नितांत अभाव धीरे-धीरे होगा, यह एवोल्यूशन की धारणा रूस में स्टालिन के ज़माने और चीन में माओं के ज़माने में ही व्यक्त की जाने लगी ।

        

            यह भी विचार हम करते हैं कि क्यो रूसी क्रांत से वह आदमी निकला जिसकी कल्पना हमने की थी या यहाँ कमल पर बैठा योगी करता है ? ऐसा आदमी जिस का व्यक्तित्व उसी योगी से मिलता-जुलता हो, जो संपूर्ण योगी की भाँति विचार करने वाला हो, जिसकी कल्पना ने रूस को हिलाया, चीन को हिलाया, जो आज हिंदुस्तान को हिला रही है कि जिसमें संपत्ति के बीच रहते हुए भी ऐसा लगाव न बने कि यह मेरी है । लगभग ऐसी ही एक आदर्श कम्यून की कल्पना मार्क्स के दिमाग में भी थी कि संपत्ति चारों तरफ बिखरी पड़ी रहेगी पर आदमी अपनी आवश्यकताओं के अनुसार ही उसमें से लेगा न जखीरा जमा करेगा और न अपने मन को ही उस संपत्ति के मोह से ग्रस्त होने देगा और न सुविधाओं के पीछे दौड़ेगा । और इस तरह मनुष्य में जो कृतित्व की, सर्जन की ऊर्जा है, वह प्रकट होकर सामने आ जायेगी । और यह केवल मार्क्स का सपना ही नहीं रहा, यह लेनिन का और उसके साथियों का भी सपना रहा ।

 

         प्रश्न जो हमारे लिए अब भी विचारणीय है, यह है कि क्या आज सत्तर वर्ष बाद भी रूस में ऐसा संभव हुआ कि मनुष्य ने केवल संपत्ति के रिश्ते से छूट गया बल्कि संपत्ति के मोह से भी छूट गया ? हममें से काफी लोग ऐसे हैं जो रूस हो आये हैं । मैं स्वयं भी रूस ही नहीं, अन्य कई कम्युनिस्ट देशों में भी हो आया हूँ । और मैं यह नहीं कह सकता कि सामान्य रूसी नागरिक संपत्ति के रिश्ते से छूट गया या अतिरिक्त सुविधा, अतिरिक्त संपत्ति का मोह भी उसको नहीं रह गया । और व वहाँ के नगरों के प्रसाधनों को देखकर यह कल्पना होती है कि ये प्रसाधन वस्तुतः एक योगी समाज के प्रसाधन हैं । बुद्धि यह नहीं मान पाती कि इन प्रसाधनों को बनाये रखने में जो इनके बीच रहता है उसके मन पर उनका प्रभाव नहीं है ; कि क्रेमलिन में जब जार रहता था तो मोहाविष्ट था और आज ब्रेझनेव रहता है तो वह मोहाविष्ट नहीं है । क्रेमलिन के पूरे तामझाम को देखकर मुझे तो यह नहीं लगा कि इसमें रहने वाले लोग व्यक्तिशः भिन्न प्रकार के हैं, कि जिस प्रकार हमारे यहाँ संपत्ति के बीच रहते हुए जनक की कल्पना की गयी थी वैसे ये आधुनिक जनक हैं । हमारे बीच भगवतीशरण सिंह जी हैं जिन्हें क्रेमलिन के भीतर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है और वहाँ के खाद्य पदार्थ देखकर उस पर जो प्रतिक्रिया हुई उसे भी उन्होंने देखा था । ऐसे औसत रूसी मनुष्य से मेरी भी मुलाकात हुई, औसत व्यक्ति से ही मुलाकात चेकोस्लोवाकिया में हुई, युगोस्लाविया में हुई, इंग्लैंड में हुई । सामाजिक रिश्तों को बदल देने से क्या कोई ऐसा नया मनुष्य निकला है जिसे देखकर मन में यह धारणा बने कि यह एक नया व्यक्ति हो गया ? ऐसा अभी तक प्रमाण कम से कम मुझे नहीं मिला । और भी लोग इन देशों में गये हैं, उन्हें भी नहीं मिला ।

 

         अब इस बहस में मैं इस रूप में नहीं जाता कि संस्मरण सुनाऊँ । लेकिन विचार के लिए मैं अपना मनुष्य संबंधी परिवेश या संदर्भ रूसी और फ्रेंच क्रांति दोनों को मानकर चलता हूँ और फिर देखता हूँ कि इसमें कितना अधूरापन रह गया यह सही है कि जो कमल की भाँति जीने वाला, भीतर से बदल जाने वाला योगी है उसे हिंदुस्तान में कम से कम दो हजार वर्ष दिये गये, और यह जो नया विचार है सामाजिक रिश्तों को बदल कर मनुष्य को भीतर से बदलने वाला इसको अभी इतना समय नहीं दिया गया सत्तर ही वर्ष हुए हैं, लेकिन यह कोई ज़रूरी नहीं है कि सत्तर वर्षों का आकलन करके यह समझने के लिए यह रास्ता कहाँ अधूरा रह गया, हम दो हजार वर्ष इंतजार ही करें । कुछ तो निष्कर्ष हम आसानी से निकाल ही सकते हैं ।

 

         जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं यह भी नहीं मानता कि मनुष्य को भीतर से बदल दो तो वह बदल जायेगा क्योंकि यह हमने 2000 वर्षों तक देख लिया । मैं यह भी नहीं मानता कि ऊपर से सब रिश्ते बदल दो तो मनुष्य अंदर से बदल जायेगा, उसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह भी मैंने 70 वर्ष देख लिया । तब ऐसी दशा में मैं यही मान सकता हूँ कि अंदरवाला और बाहरवाला दोनों साथ चलने चाहिए । ऐसा नहीं है कि कोई कार्य-कारण का ही संबंध इनमें बने कि भीतर से यदि महात्मा हो जायें तो सामाजिक रिश्ते अपने आप बदल जायेंगे या सामाजिक रिश्ते महात्मापन पर आधारित हो जायें तो आदमी अपने आप महात्मा हो जायेगा ;  अर्थात् संपत्ति का मोह नष्ट कर दो तो संपत्ति का इंस्टीट्यूशन नष्ट हो जायेगा या संपत्ति का इंस्टीस्टूशन नष्ट कर दो तो संपत्ति का मोह नष्ट हो जायेगा । ये दोनों प्रयास किया गया हो और मान लिया गया हो कि दूसरा अपने आप हो जायेगा ।

 

         मैं जब-जब यह सोचता हूँ तो इसी नतीजे पर पहुँचता हूँ कि शायद ये दोनों प्रयास साथ-साथ करने होंगे  चाहे उनके करना कितना भी कठिन क्यों न हो कि संपत्ति के रिश्ते भी नष्ट किये जायें पर साथ-साथ वह विचारधारा भी चलती रहे , वह आंतरिक अनुभूति भी चलती रहे जिसके द्वारा मनुष्य भीतर से बदलता है । इसलिए मैं इस राय का नहीं हो पाता कि अगर संपत्ति के रिश्तों को खत्म करने वाले गोली चलावें तो वह गोली क्षम्य है क्योंकि वह संपत्ति के रिश्तों को ख़त्म करने वाली गोली है और यदि संपत्ति के रिश्तों को ख़त्म करने के सिलसिले में गोलियाँ चलायी जायेंगी तो धीरे-धीरे संपति का मोह भी नष्ट हो जायेगा । क्योंकि मैं समझता हूं कि गोली चलाने की प्रक्रिया एक होती है चाहे वह संपत्ति के रिश्तों को ख़त्म करने वाली गोली हो चाहे उनकी जकड़बंदी और मज़बूत करने वाली गोली हो । इसलिए मैं चाहता हूँ कि कुछ ऐसा हो कि मनुष्य गोली न चलाये, यह भी अपने आप में एक इष्ट होना चाहिए चाहे वह संपत्ति के रिश्ते को नष्ट करने वाली गोली हो चाहे उसको समृद्ध करने वाली गोली हो ।

 

 

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, संजीव ठाकुर

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