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सेठजी |
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कन्हैयालाल मिश्र
प्रभाकर’ |
“महात्मा
गाँधी आ रहे हैं, उनके पर्स के लिए आप भी कुछ दीजिए
सेठजी.......”
“बाबूजी,
आपके पीछे हर समय ख़ुफिया लगी रहती है, कोई हमारी रिपोर्ट
कर देगा, इसलिए हम इस झगड़े में नहीं पड़ते ।”
“मैं
रात-दिन चंदा माँग रहा हूँ, जब मुझे ही पुलिस न पा सकी तो
रिपोर्ट आपका क्या कर लेगी ।”
जरा सोचकर हाथ
जोड़ते हुए बोले,
“अजी,
आपकी बात और है । हम कलेक्टर साहब से डरते हैं । आपसे तो
उल्टा कलेक्टर ही डरता है ।”
प्रसन्नता से मैंने कहा,
“तो आप
ही डरने वालों में क्यों रहते हैं
?
कांग्रेस में नाम लिखा लीजिए, फिर कलेक्टर आपसे भी डरने
लगेगा ।”
सेठजी
ने दाँत निकालकर जो मुद्रा बनाई, उसकी ध्वनि थी
–
हें..... हें.....हें.....हें.....



मैं
सरकारी सूचना निदेशालय में कार्यरत हूँ । मेरा काम है,
जनता द्वारा माँगी गई विभिन्न जानकारियों को सरकारी तौर पर
उपलब्ध कराना। कल मेरे पास एक अजीब प्रार्थनापत्र आया है,
जिसमें पूछा गया है-हमारे देश में विभिन्न नीतियों के
निर्धारण और उनके क्रियान्यन में की जा रही बद्तमीजियों और
फ्राड्स के लिए कौन जिम्मेदार है
? और
मैं परेशान हूँ कि इसका सरकारी जवाब क्या दिया जाये
?



“भैया
वो देख, चंदा मामा कितना चमक रहा है
?”
“हट
पगली, मामा होगा तेरा।”
“फिर
तेरा क्या है
?”
“मेरे
लिए तो कंकड़-मिट्टी का ढेर है, जिस पर आदमी अपने पैरों
चलकर आ चुका है।”
“और वो
क्या है?”
अब उसकी अंगुली एक तेज चमकते तारे की ओर थी।
“वह भी
एक ग्रह है। वहाँ भी आदमी जाने की कोशिश कर रहा है।
धीरे-धीरे हम शुक्र, मंगल, वृहस्पति सब पर पहुँच जायेंगे ।
वहाँ के रहने वालों से परिचित हो जायेंगे ।”
“फिर
कभी तू भी जा सकेगा वहाँ
; है ना
“क्या
पता, सब हाथ की लकीरों और नक्षत्रों का फेर है।”
“हट
पगले
! वहाँ
जो भी गया है, मेहनत और लगन से ।”



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आजादी
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डॉ. बालेन्दुशेखर
तिवारी |
उन्होंने समूचे
घर में इमरजेंसी लगा दी थी। उनकी मर्जी के खिलाफ बोलने का
हक न उनके पति को था और न बच्चे कुछ बोलते थे । नौकर, आया,
ड्राइवर सबकी बोलती बन्द । ऐसे में एक दिन उनका दुलारा
कुत्ता कोनी पड़ोस में रहने वाली अपनी प्रेमिका छमिया से
मिला तो उसके स्वास्थ्य को देखकर अत्यन्त सन्तप्त हो गया
कि वह आवश्यकता से अधिक स्लिम हो गई थी । कोनी के पूछने पर
कुतिया छमिया ने बताया कि इन दिनों उसके मालिक ने
खाने-पीने पर कन्ट्रोल कर रखा है। अपना समाचार बताते हुए
कोनी ने फरमाया,
“हमारे
यहां खाने-पीने का तो बड़ा आराम है, लेकिन मेम साहब भौंकने
नहीं दे रही हैं।”



अल्शेसियन कुत्ते ने सूखी रोटियाँ सूंघकर जब मुँह बिचकाया
तो नये नौकर रामू को घोर अचरज हुआ ।उसी समय मालिकन
वहाँ आ पहुँचीं । उन्होंने रोटियाँ उठाकर गेट के बाहर खड़े
भिखारी की झोली में डाल दीं। वापस आकर रामू को हिदायत देते
हुए बोलीं
“टॉमी
को बासी रोटी मत खिलाया करो । बीमार हो जाएगा।”
उधर
भिखारी सूखी रोटी का कौर चबाते हुए मालकिन के दान-पुण्य से
कृतज्ञ हो रहा था।