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वरिष्ठ कवि |
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धर्मवीर
भारती
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(25 दिसम्बर जन्मदिवस पर विशेष)
।। नवम्बर की दोपहर ।।
अपने हलके-फुलके
उड़ते स्पर्शों से मुझको छू जाती है
जार्जेट के पीले
पल्ले-सी यह दोपहर नवम्बर की !
आयी गयी ऋतुएँ पर
वर्षों से ऐसी दोपहर नहीं आयी
जो क्वाँरेपन के
कच्चे छल्ले-सी
इस मन की उँगली पर
कस जाये और फिर कसी
ही रहे
नितप्रति बसी ही
रहे, आँखों, बातों में, गीतों में
आलिंगन में घायल
फूलों की माला-सी
वक्षों के बीच
कसमसी ही रहे
भीगे केशों में
उलझे होंगे थके पंख
सोने के हंसों-सी
धूप यह नवम्बर की
उस आँगन में भी
उतरी होगी
सीपी के ढालों पर
केसर की लहरों-सी
गोरे कंधों पर
फिसली होगी बन आहट
गदराहट बन-बन ढली
होगी अंगों में
आज इस वेला में
दर्द में मुझको
और दोपहर ने तुमको
तनिक और भी पका
दिया
शायद यही तिल-तिल
कर पकना रह जायेगा
साँझ हुए हंसों-सी
दोपहर पाँखें फैला
नीले कोहरे की
झीलों में उड़ जायेगी
यह है अनजान दूर
गाँवों से आयी हुई
रेल के किनारे की
पगडण्डी
कुछ क्षण संग
दौड़-दौड़
अकस्मात् नीले
खेतों में मुड़ जायेगी.......
।। आँगन ।।
बरसों के बाद उसीसूने- आँगन में
जाकर चुपचाप
खड़े होना
रिसती-सी
यादों से पिरा-पिरा उठना
मन का
कोना-कोना
कोने से फिर
उन्हीं सिसकियों का उठना
फिर आकर
बाँहों में खो जाना
अकस्मात्
मण्डप के गीतों की लहरी
फिर गहरा
सन्नाटा हो जाना
दो गाढ़ी
मेंहदीवाले हाथों का जुड़ना,
कँपना, बेबस
हो गिर जाना
रिसती-सी
यादों से पिरा-पिरा उठना
मन को
कोना-कोना
बरसों के बाद
उसी सूने-से आँगन में
जाकर चुपचाप
खड़े होना
!
।। टूटा पहिया।।
मैं
रथ का टूटा हुआ
पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको
मत !
क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह
में
अक्षौहिणी सेनाओं
को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी
अभिमन्यु आकर घिर जाय !
अपने पक्ष को असत्य
जानते हुए भी
बड़े-बड़े महारथी
अकेली निहत्थी
आवाज़ को
अपने
ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें
तब मैं
रथ का टूटा हुआ
पहिया
उसके हाथों में
ब्रह्मास्त्रों से
लोहा ले सकता हूँ !
मैं रथ का टूटा
पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको
मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले !
।। एक वाक्य ।।
चेक बुक हो पीली या लाल,
दाम सिक्के हों या शोहरत -
कह दो उनसे
जो ख़रीदने आये हों तुम्हें
हर भूखा आदमी बिकाऊ नहीं होगा है
!
।। उपलब्धि ।।
मैं क्या जिया
?
मुझको जीवन ने जिया -
बूँद-बूँद कर पिया, मुझको
पीकर पथ पर ख़ाली प्याले-सा छोड़ दिया
मैं
क्या जला ?
मुझको अग्नि ने छला -
मैं
कब पूरा गला, मुझको
थोड़ी-सी आँच दिखा दुर्बल मोमबत्ती-सा मोड़ दिया
देखो
मुझे
हाय
मैं हूँ वह सूर्य
जिसे
भरी दोपहर में
अँधियारे ने तोड़ दिया !
।। उत्तर नहीं हूँ ।।
उत्तर नहीं हूँ
मैं प्रश्न हूँ तुम्हारा ही
!
नये-नये शब्दों में तुमने
जो पूछा है बार-बार
पर
जिस पर सब के सब केवल निरुत्तर हैं
प्रश्न हूँ तुम्हारा ही
!
तुमने गढ़ा है मुझे
किन्तु प्रतिमा की तरह स्थापित नहीं किया
या
फूल
की तरह
मुझको बहा नहीं दिया
प्रश्न की तरह मुझको रह-रह दोहराया है
नयी-नयी स्थितियों में मुझको तराशा है
सहज
बनाया है
गहरा
बनाया है
प्रश्न की तरह मुझको
अर्पित कर डाला है
सबके
प्रति
दान
हूँ तुम्हारा मैं
जिसको तुमने अपनी अंजलि में बाँधा नहीं
दे
डाला !
उत्तर नहीं हूँ मैं
प्रश्न हूँ तुम्हारा ही
!
(सात
गीत-वर्ष से चयन)
