(टूलपुरूष
रमण कौल से शैलेश भारतवासी की
बातचीत)
रमण
कौल
का नाम अंतरज़ाल पर हिन्दी प्रयोक्ताओं
के लिए नया नहीं है। हालाँकि यूनिकोड में लिखने वालों की
संख्या अभी भी हज़ार तक
नहीं पहुँची है,
फिर भी नये प्रयोक्ताओं को यूनिकोडविद् हमेशा इनके टूल
'यूनिनागरी'
से शुरूवात करने की सलाह
देते हैं। प्रस्तुत है उनसे हुई
शैलैश भारतवासी
की बातचीत के
कुछ अंश- संपादक
-आपने अंतरज़ाल पर मौज़ूद सैकड़ों हिन्दी-टंकण टूलों
में सरलतम टूल
'यूनिनागरी'
को डिज़ाइन किया है। इसकी प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?

रमण-
मैंने हिन्दी का टंकण इस से मिलते
जुलते टूल
छहरी
से आरंभ किया,
जो मूलतः नेपाली भाषा के लिए बनाया गया था। मुझे उस
कीबोर्ड की आदत पड़ गई,
पर मैं कोड को इस से सरल बनाना चाहता था। नेट पर खोजते हुए
मुझे यूनिकोड में एक ग्रीक (यूनानी) भाषा का टाइपराइटर
मिला,
जिस का कोड काफी सरल था। मैं ने उसे
अपने और कुछ मित्रों के प्रयोग के लिए परिवर्तित कर के
यूनिनागरी बनाया और फिर
उसे सब के प्रयोग के लिए नेट पर डाला। मुझे खुशी है कि कई
नए-पुराने प्रयोक्ताओं को इसे प्रयोग करना सुगम लगता है,
विशेषकर ऐसे कंप्यूटरों पर जहाँ कुछ डाउनलोड या इन्सटाल
करने में समस्या रहती है। परन्तु आरंभिक दौर से निकलने के
बाद मैं समझता हूँ कि सभी को इन्सक्रिप्ट जैसे मानक
कुंजीपटल अपनाने चाहिए। मैं स्वयं अब इंडिक
IME
का प्रयोग करता हूँ जिस का मूल संस्करण इन्सक्रिप्ट पर
आधारित है,
और यूनिनागरी का
इन्सक्रिप्ट संस्करण भी
मैं ने इसी उद्देश्य से उपलब्ध कराया है।
- आमतौर
पर विदेश चले जाने के बाद लोग मातृभाषा से अधिक सरोकार
नहीं रख पाते हैं। आप उनलोगों में से हैं जिन्होंने हिन्दी
से सम्पर्क साधे रखा। फिर भी मातृभाषा से कट जाने के
क्या-२ कारण देखते हैं आप
?
रमण-
हाँ मैं उन अल्पसंख्यक लोगों में से हूँ जिन्होंने हिन्दी
से संपर्क साधे रखा। पर ऐसा होने,
या न होने में मेरे अप्रवास की कोई भूमिका नहीं है। भारत
में भी हम आप जैसे लोग अल्पसंख्यक ही हैं। आम तौर पर लोग
आसान रास्ता अपनाते हैं,
और जो भाषा ज़रूरी है,
उसी में पढ़ते लिखते हैं। मेरा यह मानना है कि विदेश आने
पर भारतीयों की पहली पीढ़ी मातृभाषा का दामन नहीं छोड़ती,
जब तक कोई मजबूरी न हो। घरों में आम तौर पर मातृभाषा का ही
प्रयोग होता है। बल्कि हम लोग अप्रवास में भारत से और अधिक
जुड़ने की कोशिश करते हैं। अन्तर केवल इतना है कि सूचना
तकनीक में आई क्रान्ति से यह सब इतना सुगम हो गया है,
जितना पहले कभी नहीं था। हमारे लिए यह चुनौती है कि अगली
पीढ़ी भी हिन्दी के साथ जुड़ी रहे,
और इस के लिए भी यहाँ कई भारतीय प्रयत्नशील रहते हैं। हाँ
भारतीय टीवी चैनलों और भारतीय फिल्मों की लोकप्रियता और
उपलब्धता इस काम को थोड़ा और सरल बना देती है। और अब हमें
प्रयत्न यह करना है कि हिन्दी इंटरनेट की लोकप्रियता,
उपलब्धता और पहुँच भी उतनी ही हो।
-हिन्दी भाषा अब राजकाज,
उद्योग कार्य और प्रशासनिक कार्यों से विलुप्त हो रही हैं।
हम-आप जैसे चंद हिन्दी-प्रेमी इस भाषा को कितना आगे ले जा
सकेंगे?
रमण-
मुझे लगता है हिन्दी का भविष्य जन साधारण की भाषा के रूप
में ही है,
न कि काग़ज़ों और दस्तावेज़ों की भाषा के रूप में। और हम
यही उम्मीद कर सकते हैं कि जन साधारण में इस का उपयोग
बढ़ता रहेगा। ऐसा होने से एक साइक्लिक इफेक्ट होगा। जन
साधारण की भाषा होने से व्यवसाय इसे अपनाना शुरू कर देता
है,
जिस से फिर और लोग इस की तरफ खिंचते हैं। विभिन्न कंपनियों
का ग्राहकों को लुभाने के लिए हिन्दी में विज्ञापन बनाते
रहना,
वेबसाइटों का बढ़ता हिन्दीकरण,
मोबाइल फोन कंपनियों का हिन्दी समर्थित तकनीकों के लिए काम
करते रहना -- यह सब बातें इस ओर इंगित करती हैं कि हिन्दी
जी भी रही है और बढ़ भी रही है। मैंने भारत में या विदेशों
में कभी किसी रेस्तराँ का मेन्यू हिन्दी में नहीं देखा,
पर हाल की भारत यात्रा के समय कांटिनेंटल एयरलाइन्स का
मेन्यू हिन्दी में देखा।
-आपको
नहीं लगता कि अंतरज़ाल पर होने वाली हिन्दी-गतिविधियाँ
तकनीकी ज्ञान रखने वालों का टाइम-पास है?
रमण-
हाँ कई लोगों के लिए टाइमपास है,
पर कई लोग इसे गंभीरता से भी लेते हैं। और मेरा यह मानना
है कि किसी भी चीज़ को सुचारु रूप से चलाने के लिए कुछ ही
समर्पित व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। और फिर यदि कुछ
लोग टाइमपास के रूप में भी इंटरनेट पर हिन्दी का प्रचार
प्रसार करते हैं तो इस में बुरा क्या है - वे भी कुछ न कुछ
योगदान तो देते ही हैं।
-हिन्दी
बोलने-लिखने-पढ़ने वालों को लुभाने हेतु माइक्रोसॉफ़्ट,
लाइनक्स आदि साफ़्टवेयर कम्पनियों ने अपने
'OS'
को कुंजीपटल के साथ हिन्दी में ज़ारी किये हैं,
परन्तु इंग्लिश की भाँति हिन्दी का कुंजीपटल एक मानक या एक
क्रम का नहीं है। इस समस्या की तरफ आप लोगों ने कभी इन
कम्पनियों का ध्यान नहीं खींचा
?
रमण-
हिन्दी का कुंजीपटल एक मानक का नहीं है,
इस के लिए हम,
हिन्दी के प्रयोक्ता उत्तरदायी हैं,
साफ़्टवेयर कम्पनियाँ नहीं। सरकारी,
गैर सरकारी तौर पर रेमिंगटन और इन्स्क्रिप्ट कुंजीपट पहले
से उपलब्ध हैं। इन का टाइपराइटरों में उपयोग होता रहा है
और माइक्रोसॉफ़्ट ने भी हिन्दी आइ.एम.ई. का मूल संस्करण
(जो विंडोज़ एक्स-पी के साथ आता है),
इन्स्क्रिप्ट कुंजीपट पर ही आधारित रखा है। और यह कुंजीपट
बहुत ही तार्किक रूप से बनाया गया है। परन्तु यूनिकोड
हिन्दी के नए प्रयोक्ता जिन्हें अंग्रेज़ी में टाइप करने
का अभ्यास है,
या किसी पुराने फ़ॉण्ट पर आधारित कुंजीपट पर टाइप करने का
अभ्यास है,
अपनी आदत नहीं बदलना चाहते। वे एक मानक कुंजीपट को समझने
के स्थान पर ध्वन्यात्मक कुंजीपट चाहते हैं,
या शुषा आदि पर आधारित कुंजीपट चाहते हैं। ऐसे में मानक
कुंजीपट कैसे बनेगा?
फिर ऐसे प्रयोक्ता समुदाय की मांग पूरी करने के लिए
माइक्रोसॉफ़्ट ने आइ.एम.ई. 1 का विकास किया। मैं समझता हूँ
हम सभी को इन्स्क्रिप्ट कुंजीपट की आदत डाल लेनी चाहिए।
-यदि कोई हिन्दी को मान-सम्मान देना चाहे तो उसे स्वदेश
में रहकर यह लड़ाई लड़नी चाहिए या परदेश में रहकर?
रमण-
हिन्दी को मान सम्मान स्वदेश में रह कर भी दिया जा सकता है,
और विदेश में रह कर भी। हिन्दी को देश में अपनाए जाने की
ज़रूरत है,
और विदेश में पहचान दिलाए जाने की आवश्यकता है। परन्तु यह
प्रश्न शायद उन लोगों पर अधिक लागू होता है जिन के लिए
हिन्दी का प्रचार प्रसार ही मूल व्यवसाय है -- जैसे हिन्दी
के व्यावसायिक लेखक,
अध्यापक,
रेडियो प्रसारक,
समाचार संवाददाता,
आदि। हम लोग जो मूलतः अन्य व्यवसायों में लगे हैं,
किन्हीं और कारणों से अपना निवास चुनते हैं,
और जहाँ रहते हैं वहीं हिन्दी का प्रयोग करते हैं।