
पंकज तिवारी
जन्म-
श्रीकांत का पुरवा,
(प्रतापगढ़, उत्तरप्रदेश)
।
शिक्षा-
राजकुमार गोएल तकनीकी एवं प्रबंधन संस्थान, गाज़ियाबाद से
इंजीनियरिंग ।
लेखन-
ग़ज़ल एवं कविता ।
संप्रति-
सॉफ़्टवेयर कम्पनी
''टीसीएस"
में सॉफ़्टवेयर इंजीनियर के पद पर कार्यरत ।
सम्पर्क-
पंकज तिवारी,
१,
जिया सराय,
हौज़ खास,
नई दिल्ली-११००१६
।
ई-मेल-
erpankajtiwari@gmail.com

पाँच ग़ज़लें
मंजिल
इस मंजिल के रस्ते में,
क्या-क्या छूटा कुछ याद नहीं।
ये भी नहीं लगता कि कोई मंजिल इसके बाद नहीं।।
रूह थकी सी लगती है,
ऐ यारो अब तो जिस्म के साथ,
दो पल चैन से कब सोया था यह भी ठीक से याद नहीं।।
माँ ने प्यार से समझाया था,
क्या करना,
क्या न करना,
क्या भूला क्या याद रखा,
कुछ याद नहीं अब याद नहीं।।
मैंने कितनी मंजिलें बदली,
रस्ते बदले,
साथी भी,
क्या जो बना हूँ,
वही बनना था कन्फ्यूजन है,
याद नहीं।।
बदलना होगा
मैं,
मुझे पसंद नहीं मुझको बदलना होगा।
वक़्त तेज चलता है साथ ही चलना होगा।।
ना तो सीखा ना सिखाया गर्दिशों में झुक जाना,
आँख मूँद,
सिर झुकाके अब तो गुज़रना होगा।।
एक चेहरा काफी नहीं गौर से सुन नासमझ,
चार-छः मुखौटे भी साथ में रखना होगा।।
अलग नज़र अलग सोच छोड़ दे तू फौरन,
भीड़ का हिस्सा बनके भीड़ में चलना होगा।।
बहुत हसीं दुनिया है सब तो यही कहते हैं,
बेवजह तू चीख रहा इसको बदलना होगा।।
लम्हें
ज़िन्दगी में चन्द लम्हे होते कितने असरदार।
जो बदलकर रक्ख देते हैं किसी जीवन की धार।।
जग में लाता एक लम्हा लेके संग खुशियां अपार।
एक लम्हा मौत लाता,
छूटते नाते हज़ार।।
प्यारा सा इक लम्हा आता,
ज़िन्दगी में लेके प्यार।
संग लाता दूसरा लम्हा जुदाई की बयार।।
एक लम्हा गुज़रा ऐसा ज़िन्दगी में नागवार।
मैं खड़ा देखा किया,
लम्हे ने छीना मेरा यार।।
था बनाया एक लम्हे ने कभी शायर,
गँवार।
एक लम्हे ने सिखाया,
ज़िन्दगी का कारोबार।।
जाने क्यूँ
'चूक'
हुई या
'खोट'
थी कोई आखिर क्यूँ नाकाम हुए।
नेक नीयत रखी थी हमने,
जाने क्यूँ बदनाम हुए।।
प्यार की पौध लगाकर हमने खाद वफ़ा की डाली थी,
आज दरख़्त वो मुरझाया है,
ऐसे क्यूँ अंजाम हुए।।
यूँ तो तेरी जानिब से भी प्यार ही प्यार मिला हमको,
बंजर आज हुआ क्यूँ रिश्ता,
गुलशन क्यूँ शमशान हुए।।
छोटी-छोटी बातें,
यादें,
सपने कहते-सुनते थे,
पहले जैसा हर मंजर है,
फिर हम क्यूँ अंजान हुए।।
प्यार मुहब्बत की बातें अब बेमानी सी लगती हैं,
हर सू जख़्म के ताने-बाने,
मंजर ये क्यूँ आम हुए।।
'चूक'
हुई या
'खोट'
थी कोई आखिर क्यूँ नाकाम हुए।
नेक नीयत रखी थी हमने,
जाने क्यूँ बदनाम हुए।।
ना रास आया
वक़्त बदलना मुझको कभी ना रास आया।
दूर हुआ वो जो भी मेरे पास आया।।
हमको कब नफ़रत थी इस तनहाई से,
दिल में मेरे इक दिन ये एहसास आया।।
राह का तकना भूल गये इस जीवन में,
याद नहीं कब दर पे कोई ख़ास आया।
काश कि मैं भी वक्त के साथ चला होता,
दीवाना ना कहते सब बिन्दास आया।।
थम जा वक़्त अगर मुमकिन हो दो पल को,
मिलने दे एक गुज़रा लम्हा पास आया।।
वक़्त बदलना मुझको कभी ना रास आया।
दूर हुआ वो जो भी मेरे पास आया।।
पंकज तिवारी