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किताब खरीदने का कल्चर अभी विकसित नहीं |
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नासिरा शर्मा |
(प्रसिद्ध महिला कथाकार नासिरा शर्मा से लालित्य
ललित की बातचीत)
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वर्तमान के महिला
लेखन से आप सहमत हैं या नहीं?
नासिरा
शर्मा-
मैं इस चीज़ से सहमत नहीं हूँ कि महिला और पुरुष लेखन
हिन्दी के
अलावा और कहीं नहीं है। न उर्दू में हैं,
न ही बाहर की भाषाओं में हैं। मैं आज तक
समझ ही नहीं पायी कि ऐसा क्यों है?
मुझे जहाँ तक ख़्याल है कि थोड़ा-सा नयापन लाने
को प्रकाशक और सम्पादक ने थोड़ा-सा शीशा छोड़ा है। मैं यह
ज़रूर कहूँगी,
जब साहित्य
की बात चलती है तो मैं साहित्यकारों के साथ हूँ चाहे वे
मर्द हो या महिलाएँ।
क्योंकि मूल चिंतन है वह एक कृति।
लेकिन जब पीड़ित वर्ग की बात आयेगी तो मैं
निम्न वर्ग के लिए रिएक्ट करती। आप गौर से देखेंगे तो
पायेंगे कि हमारे पुरुष
लेखकों ने बहुत से जीवंत नारी किरदार दिये हैं।
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मसलन?
नासिरा शर्मा-
देखिए प्रेमचंद की धनिया अभी भी आपका
पीछा नहीं छोड़ती। लोग तो यहाँ तक कहते हैं जो बंकिम या
चट्टोपाध्याय ने चीज़ें लिख
दी है,
उन चीज़ों को दूसरा कोई लिख ही नहीं सकता। मतलब कुछ लोग
भावुक होकर ये बात कह
देते हैं।
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आज साहित्यिक राजनीति साहित्य पर हावी है। आपको
नहीं लगता कि साहित्य की इस राजनीति में किसी का भला नहीं
हो रहा?
नासिरा शर्मा-
पहले जो दौर था कमलेश्वर जी का, उसमें
साहित्यकार साहित्य से खिलवाड़ नहीं करता था,
बेशक निजी जीवन में वह कुछ भी करें।
किसी तरह के समझौते करे,
कैसी भी नौकरी करे। देखिए,
उर्दू और हिन्दी का सबसे बड़ा
जो राइटर माना गया है वह है सआदत हसन मंटो,
उसने दस रुपये के लिए भी कहानियाँ
लिखीं। लेकिन जो कहानियाँ लिखी हैं उसको हल्का नहीं किया
है। उसकी ज़िंदगी बेशक जैसी
भी गुजरी है। तो मुझे लगता है आज का बहुत ज्यादा दबाव है
यंग राईटर्स पर ज़िंदगी
जीने का। दूसरी तरफ यह भी है कि अगर मर गये तो किसी ने
क्या देखा?
तीसरी वह जो है
साधना,
वह खत्म होती जा रही है। ऐसा नहीं है कि पूरा वर्ग ही ऐसा
है। बहुत संजीदा
किस्म के यंग लोग हैं,
पर वे सतह पर नहीं हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि इस तरह का
माहौल ज़ल्दी गुजर जायेगा और संजीदा किस्म के लोग आगे
आयेंगे।
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आप अपने लेखन से आश्वस्त हो पाती
हैं?
नासिरा शर्मा-
देखिए,
अभी तक जो
लिखा है उससे मैं मुतमईन तो हुई हूँ पर यह नहीं कहूँगी कि
यहीं अंत नहीं है,
मैं
नये तरीके से लिखना चाहती हूँ,
जिसमें नये अनुभव हों और नयी बातें हों। अकसर कुछ
चीज़ें मुझे परेशान करती हैं कि ये रोने वाली कहानियाँ कब
तक लिखी जायेंगी?
ठीक है
किसी ने कहा है कि हमारे दुःख के गीत हैं वे बड़े मीठे गीत
हैं। मैं सोचती हूँ जो
मेरा समाज है वह एक अजीब तरह से करवट ले रहा है। अब मुझे
किरदार उठाने में थोड़ी
गहरी नज़रों से देखना पड़ेगा,
या मेरा अपना सिटी है इलाहाबाद,
वहाँ की ज़िंदगी हो।
जैसे जो गुंडे हैं वे किन हालात में ऐसा करने पर मजबूर हुए उनको बाहर उठाने में
मैं कुछ कर सकूँ।
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आपकी पहली
कहानी कब छपी और कौन-सी थी?
उसकी विषयवस्तु क्या रही थी?
नासिरा शर्मा-
मेरी पहली कहानी कमलेश्वर जी की पत्रिका
'सारिका'
के नवलेखन अंक में १९७५ में छपी थी। उसका नाम
'बुतखाना'
था। वह एक इंसान
की कहानी थी जो एक कस्बे से दिल्ली आया था। वह एक तनाव भरी
ज़िंदगी में एक
ताज्जुब-सा संबल था।
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समकालीन
साहित्यिक पत्रिकाएँ धीरे-धीरे बंद होती जा रही हैं। इसके
पीछे कौन सी ताकते हैं जो
पाठकों के अहित में लगी हैं?
नासिरा
शर्मा-
मुझे लगता है कि हमी लोग हैं जो लेग-पुलिंग करने में शुरू
से अंत
तक लगे हुए हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया का भी यह हाल रहा।
इसमें भी कोई शक नहीं है कि
अब अपने फायदे के लिए लोग पत्रिकाएँ या पत्र निकाल रहे
हैं।
'संडे
मेल'
के मालिक
डालमिया जी को जब तक फायदा हुआ चलाया,
फिर उसे बंद कर दिया।
लेकिन दूसरी तरफ जो
पत्रिकाएँ आ रही हैं उनकी जमीन पुख़्ता नहीं है।
'सारिका'
में आप छपते थे तो सब जगह
पता चल जाता था और अब एक पत्रिका है हंस कभी सेनसेशनल हो
जाती है,
कभी कुछ हो जाती
है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि
'हंस'
चीज़ों को दूर-दूर तक फैलाती है। अब
'हंस'
कितना फायदा कर रही है?
गंभीर साहित्य का और दीर्घ लेखन का,
यह एक अलग बहस का
मुद्दा है।
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इधर कुछ नई
पत्रिकाएँ आयी हैं,
उनका आप उल्लेख करना चाहेंगी कि वे पठनीय हैं या
अपठनीय?
नासिरा शर्मा-
जैसे
'सद्भावना
दर्पण'
है वह एक महत्वपूर्ण पत्रिका है। वह जहाँ से निकल रही है
उसने
अभी दिल्ली ही कैप्चर नहीं किया है। कायदे की बात तो यह थी
कि वे जितनी मेहनत कर
रहे हैं उसका हमको पता होना चाहिए था। हमें अफसोस है हम सब
की रचनाएँ उसमें क्यूँ न
छपीं?
'वागर्थ'
अच्छी है,
'अक्षरा'
है,
'साक्षात्कार'
है। लेकिन लगता है कि अब एक
नयी ज़मीन तैयार हो रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया या
हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की
पत्रिकाओं का जादू जब सिर से उतर जायेगा तब ये पत्रिकाएँ
उभरकर आयेंगी।
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कुछ सरकारी पत्रिकाएँ
भी है जिनमें साहित्य के प्रति संपूर्ण निष्ठा दिखाई देती
है?
नासिरा शर्मा-
'गगनांचल'
का भारतीय भाषा में प्रकाशित
केंद्रित अंक संग्रहनीय था,
जिसमें कितने ही रचनाकारों को लिया गया था।
'समकालीन
भारतीय साहित्य'
में हमें भारतीय भाषाओं में प्रकाशित भाषाओं में प्रकाशित
साहित्य
की जरूरी जानकारी मिलती है। अभी एक और पत्रिका निकली है
कला के ऊपर जिसके संपादक
प्रयाग शुक्ल हैं। होता यह है कि पत्रिकाएँ किसी स्टॉल पर
मुहैया नहीं होती। उससे
यह होता है कि एक पाठक है उसको ये सब चीज़ें नहीं मिल पाती।
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आप भी मानती हैं आज पुस्तकें महँगी हैं,
इसके
पीछे क्या कारण है?
नासिरा शर्मा-
मुझे लगता है कि इसके पीछे दो कारण हैं कि बाकी चीज़ें भी
महँगी होती जा रही हैं।
तकनीक भी हमने विकसित कर ली है। दूसरी बात यह है कि हमारे
यहाँ किताब खरीदने का
कल्चर अभी विकसित नहीं हुआ है। अमृतराय की किताब जब पाँच
रुपये में बिकती थी तब भी
बिकने में परेशानी आती थी।
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विदेशों में लिटरेरी एजेंट काफी सक्रिय है,
हमारे यहाँ इस तरह की अभी तक कोई
व्यवस्था नहीं हो पायी। इसमें आप किसको दोष देंगी?
नासिरा शर्मा-
मुझे लगता है लिटरेरी एजेंट होना चाहिए
ताकि रचनाएँ शीघ्रता से प्रकाशित हो सके और पाठकों तक
पहुँच सकें। फिर पांडुलिपियों
को तिजोरी में बंद नहीं होना पड़ेगा। बेहतर तरीके से काम
हो सकेगा।
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पुस्तक मेले की परिकल्पना आपको कैसी लगती
है?
नासिरा शर्मा-
मेले में सारी
किताबें मिल जाती हैं। कस्बों से आये लोग ही मेले की शक्ति
होते हैं। वे ही किताबें
खरीदते हैं। मेले में एक छत के नीचे असंख्य किताबें देख
मुझे हमेशा खुशी मिलती
है।
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अपनी किसी रचना को
मील के पत्थर का खिताब देना चाहेंगी?
नासिरा
शर्मा-
अपनी,
जी नहीं,
मैं सोच नहीं सकती,
क्योंकि अभी मैंने कुछ ज्यादा
नहीं लिखा है।
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वर्तमान दौर में
आपकी पसंद की महिला लेखिका कौन-सी है?
नासिरा
शर्मा-
मुझे कृष्णा दी
(सोबती)
अच्छी लगती हैं,
सूर्यबाला बहुत पसंद है,
मृदुला गर्ग,
उषा,
प्रियम्वदा,
मन्नू जी......उर्दू में इस्मत चुगताई,
कुरतुल-एन-हैदर और बहुत सारी लेखिकाएँ हैं
जो मेरी पसंद की हैं। जैसे महाश्वेता देवी के अनुवाद मुझे
पसंद हैं। सच पूछिए तो
बचपन में मैंने पुरुष लेखकों को ही ज्यादा पढ़ा है। गोर्की,
इनका ठंडा गोस्त,
लेडी
चबर्ली लवर चाहे समझ में आए या न आए। उस समय मेरे दिमाग
में न मर्द था न ही औरत। जो
मशहूर किताबें थीं मैंने पढ़ डाली थी।
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कोई ऐसी याद जो अक्सर आपको गुदगुदाती हो?
नासिरा शर्मा-
मेरी दूसरी या तीसरी कहानी मैं कह सकती
हूँ,
उसका नाम था
'खुश्बू
का रंग'
। उसका बहुत ही दिलचस्प बैकग्राउंड है। उसे मैंने
पहले कमलेश्वर जी को भेजा तो उस समय वे काफी टेंशन में थे
कि उनको
'सारिका'
छोड़ना
है। खैर,
मैंने उसका लम्बा इंतज़ार किया। फिर उसकी एक कॉपी मजबूर
होकर लल्ला जी
(योगेन्द्रकुमार
लल्ला) को धर्मयुग में भेजी और फिर एकदम से पता चला कि
'खुश्बू
के
रंग'
'सारिका'
में छप रही है,
मेहरबानी करके उसे मत छापें। तब मुझे बहुत ही दिलचस्प
जबाब आया तब मैं लल्ला जी को नहीं जानती थी। उनका नाम मेरे
जहन में तभी हुआ। देखिए
नासिरा जी,
अब आप
'खुश्बू
के रंग'
को भूल जाइए। इसके बाद जिसने भी सिलेक्टेड वह
कहानी पढ़ी,
सबने सराहा। सिलेक्ट कमलेश्वर जी ने की,
छापी नंदन जी ने (कन्हैयालाल
नंदन)। मजेदार बात यह रही कि पाठकों ने खूब चिट्ठियाँ
लिखीं। कहानी पढ़कर घर पर एक
साहब आये उन्होंने घंटी बजायी और कहा कि मैं नासिरा जी से
मिलना चाहता हूँ। उनको
स्टडी रूम में नौकर ले आया। उस वक्त मैं आपको बता नहीं
सकती,
मैं अपने सात-आठ साल
के बच्चे का कान उमेठे हुए थी और कुछ समझा रही थी कि तुम
बहुत शरारती हो और उसी वक्त
वह साहब आए और कहा- नमस्ते! मैंने कहा- आप कौन?
कहने लगे कि मैं आपका पाठक हूँ,
मैं
बस एक नज़र
'खुश्बू
के रंग'
की लेखिका को देखने आया था। आज तक मैं हँस देती हूँ कि
वे क्या देखकर गये?
इससे पहले मैंने बेटे का कान पकड़ा ही नहीं था। न उन्होंने
नाम
बताया,
न कोई बाते की,
बस आये और चले गये। मैं तो बस सन्न ही रह गई थी कि
उन्होंने
क्या सीन देखा?
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कितना समय आप
अपने लेखन को दे पाती हैं?
नासिरा
शर्मा-
मैं मूड को टुकड़ों में बाँट कर नहीं जीती। इच्छा होती है
तो सब
काम छोड़कर पूरा दिन केवल पढ़ती हूँ। मैं बहुत लेट उठती
हूँ। रात को लिखती हूँ।
तन्हाई मुझे पसंद है। सन्नाटा मुझे प्रेरित करता है।
कभी-कभी लिखती रहती हूँ तो पता
नहीं चलता कि सुबह हो गई।
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पाठकों की प्रतिक्रिया किस अंदाज़ में लेती हैं?
नासिरा शर्मा-
कुछ पाठक गंभीर किस्म के होते हैं। वे
बड़ी मेहनत से चीज़ को पढ़ते हैं। प्रतिक्रियाओं से मुझे
हमेशा बल मिलता
है।
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पुरस्कार की राजनीति पर
क्या कहेंगी?
नासिरा शर्मा-
देखिए
मुझे तीन पुरस्कार मिले,
अब जिन बुजुर्गों को नहीं मिले तो थोड़ी शर्मिंदगी होती
है। साहित्य में इस तरह की राजनीति नहीं होनी चाहिए। यह
हवस ठीक नहीं है। अच्छा
लेखक पुरस्कार,
राशि और राजनीति से हमेशा दूर रहता है,
फिर भी चर्चा में रहता
है।
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क्या आप जानती है सेटेलाइट
ने साहित्य पर सीधे-सीधे आक्रमण किया है?
नासिरा
शर्मा-
मुझे लगता है कि मैं इस माध्यम से बिल्कुल नाराज़ नहीं हूँ।
पाकिस्तानी ड्रामा क्यों अच्छे हैं?
ये मानकर चलिए वे खूब अच्छा लिखते हैं। अपने
यहाँ लोगों को चाहिए कि वे मीडिया को सहयोग करें ताकि उनकी
रचनाओं से पाठकों की
श्रीवृद्धि हो सके।