रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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संस्मरण

 

मनीष 'वंदेमातरम्'

कवि मनीष 'वंदेमातरम्' का जन्म उत्तर प्रदेश राज्य के ग़ाजीपुर जनपद के एक छोटे से गाँव नसीरपुर में हुआ।  मनीष ने दो उपन्यासों 'श्रद्धांजली' और 'वसुंधरा' तब ही लिख दिया था, जब वे १०वीं कक्षा के विद्यार्थी थे। रचनाएँ- उपन्यास- वसुंधरा एवम् श्रद्धांजलि, संस्मरण- अस्मनियां एवम् कानी, नाटिका- स्वर्ग में आरक्षण।

सम्पर्क-ग्राम एवं डाकघर- नसीरपुर, जनपद- ग़ाजीपुर (उ॰ प्र॰)-२३२३२६

 

 

अस्मनियां

मनीष वंदेमातरम

         ए! अस्मनियां मर गईल।' किसी ने आकर बताया। 'बक।' सबने समवेत स्वर में कहा।

               'बक का, सीरी चा अबहीनऽ सगड़ी पर ले के अइनऽहऽ।' उसने फिर बताया।

               'आऽऽ बेचारी।' फिर वही सामूहिक स्वर।

 

        अभी-अभी तो सुबह हुई थी। सब लोग बैठे-बैठे चाय का इंतज़ार कर रहे थे। मैं भी एक तरफ बैठा ऊँघता हुआ अभी-अभी टूटे मीठे सपने के बारे में सोच रहा था, कि किसी ने आकर यह मनहूस ख़बर सुनाई।

अस्मनियां मर गयी थी, ये सच था। क्योंकि उसके परिजनों का करूण-क्रंदन अब साफ-साफ सुनाई देने लगा था।परछाईयाँ सिमटी। लोगों ने उसे एक ठण्डी आह की श्रद्धांजलि दी और अपने-अपने कामों में लग गये। ठण्डी इसलिए कि उसमें शायद सुबह की सर्दी का असर था।

 

        मेरे पास कोई काम न था। बैठे-बैठे बोर ही होता, सो सोचा कि चलो एक चक्कर लगा आते हैं। कुछ 'दतुवन-पानी' का भी उधर ही जुगाड़ हो जायेगा। सच कहूँ तो मेरे वहाँ जाने का एक और भी कारण था। मैंने कभी किसी अपने या परिचित को मृत नहीं देखा था। मेरे बाबा, ७ साल पहले जब मरे थे, तब भी मैं उनको देख नहीं पाया था। सो मेरे मन में छुटपन से ही एक जिज्ञासा थी कि मरने के बाद लोग कैसे दिखते हैं? ख़ास तौर से वे जिनसे साथ हम खेले हैं, जिनसे झगड़ा किया है। फिर आज उस बहु-प्रतिक्षित घड़ी को व्यर्थ कैसे जाने देता। पनघट पर खड़ा मैं प्यासा कैसे लौट जाता। वो भी तब जबकि प्यास मिटाने के लिए बस अंजुलि बनाने की देर थी!

 

        आम के दो चार पेड़ों का बगीचा था। उसी बगीचे में आठ-दस बांसों की 'खूंटी' के नीचे अस्मनियां की लाश रखी थी। 'बेटी' घर आयी थी, पर उसे घर की दहलीज़ के बजाय घर के बाहर केवल ढाई गज़ गीली पराई ज़मीन नसीब हुई थी। माँ के आंचल के साये बजाय बांसों के पत्तों की चितकबरी छाया मिली थी। उसकी लाश के बगल में बैठी उसकी 'भऊजी' रो रही थीं। मैं उनका रोना देखकर अचम्भित था, क्योंकि आज से पहले मैंने उन्हें कभी उसके लिए रोते हुए नहीं देखा। इसलिए मेरे लिए ये फैसला करना मुश्किल हो गया था कि ये इनकी वास्तविक विरह-व्यथा है कि महज़ एक औपचारिकता।

 

        अस्मनियां के मृत शरीर से कुछ दूर मुहल्ले की दो-चार औरतें भी खड़ी होकर अपने 'लुग्गा' से मुँह ढाँपे नाक सुड़क रही थीं। उधर 'कलमीयवां' आम के नीचे एक टूटी खाट पर बैठे 'सीरी-चा' अपनी वीरगाथा लोगों से बयान कर रहे थे, कि कैसे वो अस्मनियां के ससुराल वालों से लड़-झगड़ कर, उन्हें पुलिस का भय दिखाकर उसकी लाश ले आये हैं।

 

        इधर मैं जिस मकसद से आया था, वो पूरा न हो सका। क्योंकि उसका चेहरा तो सफेद कफ़न से ढका था। अब कैसी दिखती थी ये तो मैं नहीं देख सका। लेकिन उसके बचपन का चेहरा अभी तक मुझे वैसे ही याद है। रंग काला था उसका, होंठ मोटे, उसकी चोटी जो गर्दन तक आती थी, उसमें एक गंदला सा लाल फीता बंधा रहता था, बाल एकदम 'लटियाये' हुए। ऐसा लगता था मानो महीने तक न उसे धोया गया हो और ना ही उसे संवारा गया हो। नाक और कान में नीम की सींक, पैर में गिलट की पायल, यही उसके गहने थे। मुझे याद है, एक बार उसका यही 'छाजल' कहीं खो गया था तो उसने दीया लेकर रातभर पूरे मुहल्ले ढूंढा था।

हम लोग जब छोटे थे। गर्मियों के दिनों में इसी बगीचे में 'घर-घरौना' खेला करते थे। मुझे घर बनाने नहीं आता था। अस्मनियां बड़ा सुन्दर घर बनाती थी। उसके घर में एक सोने का कमरा होता था, एक 'चूल्हानी' होती थी। एक दालान.........। वह उस घर को चूड़ियों के टूटे टुकड़ों, नीम की पत्तियों, जंगली घास के फूलों से खूब सजाती थी। उसका सुन्दर घर देखकर मुझे ईर्ष्या होती और मैं उसका घर बिगाड़ देता। वह चिल्लाती, तो मैं जलन व डाह से कहता, "खेलब नऽ खेलाइब खेलबेऽ विगाड़बऽ"। फिर वह मेरी माँ को गोहराती, "देख काकी ऽ हम मार देब हीनके ऽ"। माँ वहीं से डांटती पर मुझपे कोई असर न होता। निराश होकर वह फिर झल्लाती, 'लइकियन से का लागे ल होऽ' । फिर वह जैसे टोना पढ़ती, अपने तरकस का अन्तिम शर निकालती, "लईकिन में लईका गुलेल खेलेला, हथिया पर चढ़ के बियाह करेला"। इस कहावत का मतलब मुझे आज भी समझ में नहीं आता, उस वक्त भी नहीं आता था। किन्तु उस वक्त ये लड़कों के लिए काफी लज्जाजनक बात थी। फिर भी मुझपर इसका कोई असर नहीं होता। अन्त में वह हार जाती और वहाँ से चली जाती, फिर मैं अपनी जीत पर गौर्वान्वित होता।

 

        अस्मनियां।

        बेचारी अस्मनियां। ज़िंदगी के हर क़दम पे उपेक्षित रही। मेरी माँ बताती है कि इसका बाप रात में मरा। लोग 'परवाह' करने ले गये। सुबह उधर से लौटे तो देखा कि इसकी माँ भी मर गयी है, और ये उसकी छाती मर लेटी उसका दूध पी रही है। अभागिन।

 

        तीन भाई और चार बहनों में ये सबसे छोटी थी। तीन बहनों की ज़िंदगी कैसी थी ये मैं नहीं जानता, न माँ ही बताती है। बस इतना जानता हूँ कि उन तीनों की शादी हो चुकी है। सब अपने-अपने घर हैं। अस्मनियां के तीन भाई हैं। सबसे बड़े राधे, फिर सीरी, फिर चनबली। तीनों में बँटवारा हो गया था।

        मुझे तब से होश आता है जब ये अपनी 'चनबली भईया' में रहती थी। उस वक्त उसकी उम्र ७-८ साल की थी। ऐसा अक्सर होता था कि जब उसे बच्चों के साथ खेलने में देर हो जाती और वह पानी नहीं भर पाती, या फिर जब वो उन रोटियों में से एक रोटी खा लेती जो उसके भतीजों के लिए रखी गयी होती थी। तब ऐसा अक्सर होता था कि उसके भईया उसको 'झोंटा' पकड़कर घसीटते हुए कुएं पर लाते। वह उनसे चिपटी रहती, बार-बार पैरों पर गिरती और बिलखती 'आई होऽ भईयाऽ, अब नाऽ रोटिया खाईब, अब ना खेल्लबऽ होऽ भईया' और उसके भईया उस पर लातों, घूसों से प्रहार करते। फिर वह मेरी माँ को देखकर गिड़गिड़ाती 'आही रे काकीऽ, अरे जनवाऽ बचा ले रे काकी ऽ'। आज उसे देखकर फिर वह चीखें मेरे कानों को फाड़ने लगी हैं। जबकि मैं जानता हूँ कि वह मर चुकी है। अब उसे चाहे जितना मारो, काटो वह एक बार भी नहीं कहेगी, "जनवां बचा ले रे काकीऽ"।

        एक बार जोर की बारिश हो रही थी। सभी लोग बारामदे में बैठे थे कि अस्मनियां के चीखने की आवाज़ आयी। बाहर निकल के देखा तो उसकी 'छोटकी भऊजी' उसे बुरी तरह पीट रही थी। अन्त में उसको बारिश में धकेल कर अन्दर से किवाड़ बंद कर दी। वह बाहर रोते-रोते बेहोश हो गयी। सुबह पता चला कि उसके सिर में जोरों का दर्द था इसलिए उसने थोड़ा सा तेल सर पे रख लिया था। इसी पर उसकी भाभी कहने लगी, "रंडी तेलवा लगऊलू हऽ तऽ खनवा तोहरे भथिहनवा से बनी, सिंगार-पटार पर बड़ा मन जात ह, घटिही के अवहिन भतार चाहे लागल"।

        इस घटना के बाद अस्मनियां अपने 'सीरी भईया' में रहने लगी। कुछ दिन तो ठीक चला। लेकिन कुछ दिनों तक ही। एक दिन छोटी सी गलती पर उसके भईया ने 'लेवा' से उसका मुँह दबा दिया, उसका दम घुटने ही वाला था कि लोगों ने देख लिया।

        मुहल्ले भर में इस पैशाचिक कृत्य की आलोचना हुई। जब तीनों भाईयों की थू-थू होने लगी तो तीनों ने परस्पर मशवरा किया कि इसकी शादी कर दें। तब तीनों ने बराबर-बराबर चंदा दिया क्योंकि अस्मनियां किसी एक की बहन तो थी नहीं। खैर उसकी शादी हो गयी, उम्र थी १४ साल।

        अस्मनियां! जिसकी ज़िंदगी में सुख का एक भी पल आया ही नहीं, जिसने कभी जाना ही नहीं कि भगवान के बनाये इस खूबसूरत संसार में प्रेम जैसी कोई अनमोल चीज भी है। जिसे एहसास ही न था वह किसी के प्यार के काबिल है भी या नहीं। इसलिए पहली ही रात जब वह अपने ही पति के द्वारा 'बलत्कृत' हुई तो उसने सोचा कि शायद, यही प्यार है। १५ साल की उम्र में ही वह माँ बनने वाली थी। एक दिन अचानक वह पेट दर्द से छटपटाने लगी, रक्तस्राव शुरू हो गया तो उसके ससुर और पति उसे उठाकर डाक्टर के पास ले गये। पति फिर यहां खबर करने आ गया। उधर डाक्टर ने उसके ससुर से कहा, "यह इंजैक्शन लेते आइये।"
"
जेक्सन? ई केतना क मिली डागदर साहेब?"
"
मिलने को तो २५ रु॰ का भी मिलेगा और १७५ रु॰ का भी।"
"
त पचीस ऽ रुपया वाला, लगा द डागदर साहब"----------और अस्मनियां मर गयी।
वही आज उसके सीरी भईया उसे लड़-झगड़कर विदा करा लाये थे।
इधर फिर तीनों भाईयों में चंदा लग रहा था, दाह-संस्कार के लिए। मैंने सुना, राधे कह रहे थे, "सारे बकचोद ली का अइले ह रे, छोड़ देले रहते ओइजन ऽ, फूंक ताप गइल रहत। ई पईसवा त बचत। ए ही क पांच बाभन खिया देती जा.......।"

        अचानक एक हवा का झोंका आया। और फड़फड़ा कर अस्मनियां के चेहरे का कफ़न हट गया। मुझे उसका वो टोना याद आ गया, "लईकिन में लईका गुलेल खेलेला,
हथिया पर चढ़ के बियाह करेला"।

 

 

 

संस्मरण

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