रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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विशेषांक

 

डॉ.लालित्य ललित

जन्मतिथि - २७ जनवरी १९७०- दिल्ल
शिक्षा - खेल व विज्ञान पत्रकारिता में सर्टिफिकेट कोर्स। 'साठोत्तरी हिंदी व्यंग्य साहित्य में युगबोध' में पी॰ एच॰ डी॰
प्रकाशित कृतियां -
●गांव का खत- शहर के नाम (कविता-संग्रह) ●यानी जीना सीख लिया (कविता-संग्रह) ●तलाशते लोग (कविता-संग्रह) ●कविता संभव (६१ कवियों की रचनाओं का संग्रह) आदि अनेक पुस्तकें।
अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक कार्यक्रमों में भागीदारी-
●चतुर्थ विश्व हिंदी सम्मेलन (१९९३), मॉरिशस में सबसे कम आयु के भारतीय प्रतिनिधि के रूप में भागीदारी।
●नेपाल में आयोजित (१९९६) एक कवि सम्मेलन में हिस्सेदारी।

सम्मान -
●वर्ष १९९१-१९९२ में लगातार दो वर्ष हिंदी अकादमी, दिल्ली सरकार से श्रेष्ठ कवि का सम्मान।
●वर्ष २००१ में प्रथम 'सद्‌भावना दर्पण' पुरस्कार से सम्मानित।
संपर्क-  संपादकीय सहायक (प्रौढ़ शिक्षा) नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया, ए-५, ग्रीन पार्क, नई-दिल्ली-११००१६
निवास - बी-३/४३, शकुंतला भवन, पश्चिम विहार, नई दिल्ली-११००६३

 

 

चुगल पुराण

बचपन में खेलते थे
गुड्डा-गुड्डी का खेल
फिल्म स्टार्स के फ़ोटो को एकत्र करना
माचिस की डिब्बियों को सम्भाल कर रखना
धीरे-धीरे बदल गए मायने
बदल गया जमाना
अब तो चुगली-चुगली का खेल
हर तरफ खेला जाने लगा है
सार्वभौमिक सत्य है। हर गली, हर छोर इसी से आबाद है
कब आपके नाम के सामने लग जाए
या कब मनोनीत हो जाए।
कब छिन जाए
आपकी लालबत्ती या कब मिल जाए सरकारी सवारी
सब आपकी प्रतिभा पर निर्भर है।
सरकारी कार्यालय के एक मित्र से पूछ बैठा
बंधु तुम कहाँ थे?
नज़र ही नहीं आए?
नहीं-नहीं मैं तो टाइम पर आता हूँ।
आज भी समय पर ही आया।
'साहब' के पास था
दर्शन पर गंभीर चर्चा छिड़ी थी,
वक्त का पता ही नहीं चला।
यह चर्चा रोज़ छिड़ती है।
चर्चा ऐसी छिड़ती थी
कि मित्र कब किस का तंबू उखाड़ दें
या शामियाने का टेंडर दिलवा दें
कोई नहीं जानता।
अब तो सास-बहू की चुगली
आफ़िस में चुगली, स्कूल-कॉलेज में चुगली
राजनीति में चुगली
प्रकाशन में चुगली, पुरस्कारों में चुगली
सर्वविदित सत्य हो गई है।
यानी हर जगह।
तभी आकाश में चमकी बिजली
एक उद्‌घोषणा सुनी गई
आप चुगलखोर वातावरण में हैं
आज़ाद भारत में आप स्वतंत्र हैं,
यह आपकी भूल है।
आप कुछ भी कर लीजिए
चुगलखोर नामक मित्र ये ऐसे कीट-पतंगे हैं
जो आपका रक्त चूस लेंगे पूरी तरह
और आपको पता भी नहीं चलेगा....
आपको जब होगा मालूम
तब तक आपकी स्थिति
इतनी खराब हो चुकी होगी
कि लगेगा ऐसा
तेरी दुनिया में दिल
लगता नहीं वापस बुला ले...
गीत गाने को बेचैन हो जायेंगे।
जय चुगली, जय चुगलखोरों
महा शांति !
इति समाप्तम् !
यह कभी न खत्म होनेवाला वह
अध्याय है जो कभी खत्म नहीं होगा।
आ इससे बच नहीं सकते
बिल्कुल भी नहीं।

लालित्य ललित

 

 

 

विशेषांक

घर में मेल होना पृथ्वी में स्वर्ग के समान है- टॉलस्टाय

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