रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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विशेषांक

 

दीपक मंजुल

जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, नई-दिल्ली से लेखन में पी॰ जी॰ डिप्लोमा।
आकाशवाणी दिल्ली से कविताओं का प्रसारण।
राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।
एक काव्य संग्रह 'वक्त की शिला पर' प्रकाशित।
कला-संस्कृति और व्यंग्य विधा में भी प्रभूत लेखन।

नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया में संपादकीय पद पर कार्यरत।

 

 

दिल्ली, तुम कहाँ हो?

दिल्ली का हाल अच्छा नहीं है,
चारों ओर हाहाकार है
जबकि दो-दो सरकार हैं।

दिल्ली में मकान
मानो मुर्गों का दड़बा
इसमें दम घुटता है,
सड़क पर निकलो
तो यमराज बना प्रदूषण
हर ओर घूमता है;
चाहो तो दड़बे में मरो-
चाहो तो धुएं के जहर से मरो।

जहर सिर्फ हवा में नहीं घुला
दूध, पानी, अनाज
और तेल में भी घुला है।

रही होगी यमुना कभी 'नदी' यहाँ
अब नाला बन गई है।

खूब फल-फूल रही है मिलावट की संस्कृति
दिल्ली में-
राजनीति में संस्कृति की मिलावट है
संस्कृति में राजनीति की;
इस कदर जोर है मिलावट का यहाँ
कि कौन किसमें कितना मिला है
पता नहीं चलता।

सब कुछ गड्डमड्ड है यहाँ
पारदर्शी कुछ भी नहीं
सिवाय आधुनिकाओं के परिधानों के।

दिल्ली का हाल अच्छा नहीं है।

प्रधानमंत्री से लेकर संतरी तक
परेशान हैं यहाँ;
प्रधानमंत्री को गठबंधन के कीड़े
काटते हैं
संतरी को महंगाई के;
सब बेहाल और बदहाल हैं यहाँ
समृद्धि के टापू में
कुछ लोग बसते हैं
सिर्फ वे ही खुशहाल हैं यहाँ।

दिल्ली में सब कुछ अच्छा नहीं है।

यहाँ जरूरत से अधिक शोर है
जरूरत से अधिक भीड़ है
लोग इतने परेशान हैं यहाँ
कि शांति की तलाश में
मंदिर से कैबरे तक की
दौड़ लगा रहे हैं।

रोटी के चक्कर और दफ्तर के पेंच में
फँसा आदमी
खांसता-खांसता बेदम हो रहा है।

दिल्ली एक ऐसी खूबसूरत चक्की है
जिसमें गेहूँ नहीं, आदमी के सपने पिसते हैं
आदमी के मरने से अधिक भयानक होता है
आदमी के सपनों का मर जाना-
दिल्ली मरे हुए सपनों का
विशाल कब्रिस्तान है।

जितनी अट्टालिकाएँ हैं
उतनी ही झुग्गियाँ हैं यहाँ
अट्टालिकाओं में झोपड़ियों की
खूबसूरत पेंटिंग लगी हैं
और झुग्गियों में
अट्टालिकाओं के रंगीन कैलेंडर
झुग्गियों में जीते ख्वाब
दम तोड़ देते हैं एक दिन
अट्टालिकाओं के ख्वाब
कभी नहीं मरते।

दिल्ली का व्याकरण उलट-पुलट गया है।
कई चीजें अजीब हो रही हैं
कई चीजें असमय हो रही हैं
टीवी की दुआ से यहाँ बच्चे
असमय जवान हो रहे हैं
और प्रदूषण के प्रकोप से
जवान असमय बुढ़ा रहे हैं।

 

रिश्तों को दीमक खा रही है यहाँ
पत्नियों की अदला-बदली का चलन
धनाढ्य परिवारों में आम हो रहा है
आम परिवारों में रिश्तों को ढोते हैं लोग
गजब ये है कि रिश्तों में से 'रिश्ता' खो रहा है।

दिल्ली में
जो दीखता है, वो होता नहीं
जो होता है, वो दीखता नहीं
अजब रहस्य है,
विचित्र घालमेल है यहाँ।

दिल्ली में
अखबार खबरें नहीं देते
सनसनी फैलाते हैं
रहा होगा कभी अखबार मिशन
अब वह प्रोफेशन, उससे भी बढ़कर
सेंसेशन हो गया है।

यहाँ खबरों के ऊपर खबरें
इस तेजी से चढ़ती हैं
कि खबरों का विशाल कचराघर
बन गई है दिल्ली।

विज्ञापनों का इस कदर आतंक है यहाँ
कि वे टीवी के पर्दे से निकलकर
आगमी की जेबों पर वार करने लगे हैं;
दीवारों, पेड़ों, होर्डिंगों तक तो ठीक था,
विज्ञापन आदमी की जीभों और पीठों से
चिपक जाएँ,
य तो हद है
विज्ञापन की शोर में
सच गुम हो रहा है
दिल्ली में।

आदमी इतना व्यस्त है यहाँ
कि वह सड़कों से सपनों तक में
दौड़ता रहता है;
वाहनों के रुकने के लिए तो
सैकड़ों 'रेड लाइट' हैं यहाँ,
पर आदमी की पागल बदहवास
दौड़ को रोकने की
एक भी 'रेड लाइट' नहीं।

बच्चे वीडियो गेम में व्यस्त हैं यहाँ
माँएँ किटी पार्टी या चौके में
बाप दफ्तर या दूकान में
बेटे नौकरी का इश्तहार पढ़ने में
लड़कियाँ
घर का आर्थिक बोझ
हल्का करने की कोशिश में
बॉस की गोद में
बैठने को विवश हैं।

यहाँ विद्यालय में लड़के
पढ़ने नहीं जाते
प्रेम का 'गेम' खेलने जाते हैं,
लड़कियाँ अकसर
प्रेम की परिभाषा जानने से पूर्व ही
गर्भवती हो जाती हैं।

महाविद्यालय
ऊँची शिक्षा के केन्द्र नहीं रहे यहाँ
वे पप्सी और कोक वालों के
दलाल हो गये हैं
या फिर
सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के बहाने
व्यभिचार के अड्डे बन गये हैं।

अस्तपाल
अब रोग निदान के केन्द्र नहीं रहे यहाँ
वे गर्भपात केन्द्र में तब्दील हो रहे हैं
दिल्ली में एड्स का इतना शोर है
कि हर दीवार
कंडोम के विज्ञापनों से
पट गई है।

'मसाज पार्लरों' और 'फिल्मी बातों' की
आड़ में
इस कदर वेश्यावृति बढ़ रही है यहाँ कि
दिल्ली
एक विशाल चकलाघर में
बदल गई है।

दिल्ली में रात कभी नहीं होती-
दिन में चीखता है शहर
और रातों को
शराब और शबाब के
खामोश शोर में
डूबा रहता है।

काले धंधे, काला बाजार
काली कमाई, काले कारनामे
लगता है-
शहर के चहरे पर
कालिख पुत गई है।

आदमी
आदमी से अब बातचीत
बहुत कम करता है यहाँ
वह 'चैट बॉक्स' में
बैठकर बतियाता रहता है।

लगता है
यहाँ की गाड़ियों में ब्रेक नहीं होते
बेधड़क, बेरुके भागती रहती हैं गाड़ियाँ
रेड लाइट न हो तो शायद
सरहद पार जाकर ही दम लें।

यहाँ श्मशान घाट जाना भी
कोई संवेदना नहीं जगाता
पिकनिक की मानिंद
हँसते-बतियाते जाते हैं लोग
और चिता की आग बुझने से पहले ही
अपने-अपने घरों में लौट आते हैं।

इस तेज रफ्तार दिल्ली में
सब व्यस्त हैं
लस्त हैं, पस्त हैं
पूछो कि हाल कैसे हैं जनाब के
तो हँसेंगे फीकी हँसी
और बोलेंगे
भई, मस्त है!

दीपक मंजुल

 

 

 

 

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