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भाग्येन्द्र पटेल
जन्म-
१ मई १९६७, भीनार (दक्षिण
गुजरात)
शिक्षा-
बी॰ ए॰(अंग्रेजी), एम॰ ए॰(तुलनात्मक साहित्य), दक्षिण
गुजरात विश्वविद्यालय, सूरत (गुजरात)
रूचि-
चित्रकला, अभिनय, फ़ोटोग्राफी, संगीत, पठन-पाठन, समाज-सेवा
संप्रति -
- नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नई दिल्ली में सहायक संपादक (गुजराती)
पद पर कार्यरत (१९९४ से)
- आकाशवाणी गुजराती समाचार विभाग, नई दिल्ली में समाचार
वक्ता के रूप में संवारत (२००३ से)

सुरक्षाकर्मी की कविता
तुम
सब के सब आतंकवादी हो
दिनभर मुझको आतंकित रखते हो
बोर हो जाता हूँ
मैं थक जाता हूँ
सुबह से शाम तक तुमको तलाशते हुए
छूता हूँ तुम्हारे तनबदन को नहीं चाहते हुए।
पूछती है घर पहुँचते ही बीबी
क्या किसी को पकड़ा, इनाम-बिनाम लाए?
बच्चे पूछते हैं शोर मचाते हुए
पापा फोटू कब छपेगी पेपर में तुम्हारी?
टीवी पर कब आयेगी झलक तुम्हारी?
कब पकड़ोगे किसी आतंकवादी को?
कब कोई बड़ा-तगड़ा इनाम पाओगे?
कब तक यूँ खाली हाथ घर आके
दो पेग ले के सोते रहोगे?
सिर से पांव तक मैं तुम्हें टटोलता हूँ
जैसे भीख माँगने तुम्हारे पाँव पकड़ता हूँ
अभी कुछ मिलेगा- सोचकर रोमांचित होता हूँ
'ये पकड़ लिया' कहते शोर मचाने से पहले ही
अवाक् रह जाता हूँ
दो पल कभी इत्र की खुशबू सूंघकर
मान-सम्मान-पुरस्कार के सपनों में डूब जाता हूँ
जब हाथ खाली पाता हूँ, हाथ मलते हुए
अलग-अलग पसीने के बदबू से ऊब जाता हूँ।
तलाशी लेना महज रह गई है औपचारिकता
मेरे पास आ सकते ही नहीं तुम मौत का सामान लिए हुए
बड़े डरपोक हो, मुझसे बहुत डरते हो तुम
फिर भी मुझको हरदम भयभीत रखते हो तुम
संदिग्ध दिखते हो, झूठी तलाशी लिवाते हो
मिलता तो आखिर कुछ भी नहीं तुम्हारे पास में
बेकार मुझको तड़पाये रखते हो झूठी आस में
तुम कोई ऐसा काम नहीं करते हो
जिससे कि कभी मेरा भी काम बन जाए।
किन्तु निकम्मे, बड़े ही नादान हो तुम
तुम से तो वो आतंकवादी अच्छे
शायद जिनकी बदौलत मुझे यह नौकरी मिली
वे कभी मेरे पास से नहीं गुजरते
मुझे कोई आतंक नहीं पहुँचाते- मुझसे दूर ही रहते हैं वे।
आतंक का चेहरा तो तुम हो मेरे लिए
तुम्हें छूते-तलाशते हर बार मैं
बम विस्फ़ोट के झटके महसूस करता हूँ
बड़े ही खूंखार हो तुम, किन्तु बहुत बेकार हो तुम
बेमतलब परेशान करते रहते हो मुझे
दिनभर आतंकित रखते हो मुझे
तुम सब के सब आतंकवादी हो।
भाग्येंद्र
पटेल

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