रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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इस अंक के में पढिए


।। कविताएँ ।।

वरिष्ठ कवि- धर्मवीर भारती

माह के कवि- डॉ. देवी प्रसाद वर्मा

समकालीन कविताएं

 

।। छंद ।।

गीत..........संतकवि 'पाददर्शी'

नवगीत......डॉ.तारादत्त 'निर्विरोध'

दोहे..........ठाकुर दास सिद्ध

हाइकु........राजेन्द वर्मा

माह के छंदकार-पद्मनाभ गौतम

 

।। भाषांतर ।।

असमिया- देवकांत बरुआ

उड़िया- सुचेता मिश्र

बांग्ला- समर सेन

छत्तीसगढ़ी- रसिक बिहारी अवधिया

गुजराती- सुरेश दलाल

जर्मन- एरिथ फ्रेड

अँगरेज़ी- मतेइ मोनिका

तुर्की-  ज़फ़र यतक़ीं

फ्रांसीसी-  पाल इल्यार

 

।। लघुकथा ।।

सेठजी- कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर

परेशानी- अनिल जनविजय

मेधा- प्रबोधकुमार गोबि

आजादी- डॉ. बालेन्दुशेखर तिवारी

उपयोगिता- चरणसिंह अमी

माह के लघुकथाकार-ख़लील जिब्रान

 

।। व्यंग्य ।।

मैया, मैं भी साहब पटायो - अशोक

कवियों के बारे में - लक्ष्मीकांत

जनता का समाधान- गिरीश पंकज

 

।। बचपन ।।

बालकथाःफगनू का तोता- सिंधु रथ

 

।। शेष- विशेष ।।

विचार...रोटी और लोकतंत्र

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

एक शब्द...पकड़

डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया

अध्यात्म...क्या लिखा है बॉयबिल में अशोक रहाटगाँवकर

विज्ञान...सायन, पौधे और मनुष्य

इला प्रसाद

संगीत...कथक का रायगढ़ घराना

डॉ.बलदेव

इतिहास...गाँधी जी छत्तीसगढ़ में

सुधीर सक्सेना

तकनीक...आइए मुफ्त की दुनिया में रविशंकर श्रीवास्तव

 

 

युवा विशेषांक

कविता

ललित लालित्यदीपक मंजुल

 भाग्येंद्र पटेलदेवेश त्रिपाठी 'देश' अनिल वत्स डॉ.सुरेखा भट्ट

गीतकार

अनिल कुमार त्रिवेदी के दो गीत

युवा छंदकार

पंकज तिवारी की रचनाएं

संस्मरण

मनीष वंदेमातरम्गिरिराज जोशी

कथोपकथन

प्रसिद्ध महिला कथाकार नासिरा शर्मा से लालित्य ललित की बातचीत

कथोपकथन

टूलपुरूष रमण कौल से

शैलेश भारतवासी की बातचीत

विशेषांक संयोजन- शैलेश भारतवासी

 

संपादकीय

।। लोक को स्पर्श करती वेबमीड़िया ।।

जयप्रकाश मानस

इंटरनेट मीडिया में लोक से जुड़ी सभी विधाओं - गीत, संगीत, साहित्य- लोक गीत, गाथा, कहावत, हाना, मुहावरा, किवंदती, साक्षात्कार, लोकद्रव्य, लोकचित्र, फिल्म, आदि निरंतर प्रतिष्ठित होते जा रहे हैं । और वेबमीडिया में लोक की प्रतिष्ठा का प्रश्न लोकआश्रितों अर्थात् कलाकारों के रातों-रात हीरो बन जाने से भी जुड़ सकता है । शोध, अध्ययन, और लोक संरक्षण से इसका मतलब तो है ही । सबसे बड़ी बात कि वैश्वीकरण के लाख बुराईयों के बाद भी हिंदी का मन लोक विहीन नहीं हो सकता है । हिंदी जहाँ तक और जब बची रहेगी लोक की दुनिया भी जुगुर-जागर करती रहेगी.......

।। पिछले अंको से ।।

ललित निबंधो में इस बारः

सनातन नदी : अनाम धीवर


कुबेरनाथ राय

 

कथोपकथन

 

इंटरनेट आधारित मीडिया अपनी स्वतंत्र पहचान बना चुका है-बालेन्दु शर्मा

 

संस्मरण में

  डा. कमल कुमार का संस्मरण

निर्मल वर्मा को याद करते हुए

 

 

ललित निबंधो में इस बारः

 मध्याह्न का काव्य


काकासाहब कालेलकर

           धूप पूरे जोश में लगती हो, उस समय आकाश की शोभा खास देखने लायक होती है। दूध दुहने के समय जैसे भैंस आँखें बंद कर निस्तब्ध खड़ी रहती है, उसी तरह आकाश धूप की छाया छोड़ता ही रहता है। नहीं दिखते बादल, नहीं दिखती चाँदनी ।

 ये रहीम दर-दर फिरैं


डॉ.विश्वनाथ प्रसाद

 

कहानी में इस बारः

 

लंबी लड़ाई  : कमलेश बक्षी

मौन प्यार  : अंजना सवि-

 

संस्कारित करने वाली रचनाः

 

परिवेश : बदलाव की प्रक्रिया

विजयदेव नारायण साही

साहित्य और मनोविज्ञान

मुंशी प्रेमचंद

संस्मरण मेः

बीस साल लम्बा सपना

अमृता प्रीतम

रेखाचित्र मेः

 

गुलाबा- चंद्रिकाप्रसाद वर्मा

 

आलोचना मेः

बालकविता का विषय- श्रीप्रसाद

 

कृति समीक्षा मेः

 

धुली-धुली शाम का उजाला/ प्रभा माथुर

अजनबी शहर में/ शंकर सक्सेना

कुछ और तरह से भी/ हस्तीमल हस्ती

 

ग्रथालय(आनलाइन किताबें)

 

रिपोर्टाज-चित्र-विचित्र-तपेश जैन

ग़ज़ल-तस्वीर ज़िंदगी के-मनोजभावुक

ललित निबध- संचयन- डॉ. शोभाकांत झा

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