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संपादकीय
।। लोक को स्पर्श करती वेबमीड़िया ।।
जयप्रकाश मानस
इंटरनेट मीडिया में
लोक से जुड़ी सभी विधाओं - गीत,
संगीत, साहित्य- लोक गीत, गाथा, कहावत, हाना, मुहावरा,
किवंदती, साक्षात्कार, लोकद्रव्य, लोकचित्र, फिल्म, आदि
निरंतर प्रतिष्ठित होते जा रहे हैं । और वेबमीडिया में लोक
की प्रतिष्ठा का प्रश्न लोकआश्रितों अर्थात् कलाकारों के
रातों-रात हीरो बन जाने से भी जुड़ सकता है । शोध, अध्ययन,
और लोक संरक्षण से इसका मतलब तो है ही । सबसे बड़ी बात कि
वैश्वीकरण के लाख बुराईयों के बाद भी हिंदी का मन लोक
विहीन नहीं हो सकता है । हिंदी जहाँ तक और जब बची रहेगी
लोक की दुनिया भी जुगुर-जागर करती रहेगी.......
            
।। पिछले अंको से ।।
ललित निबंधो में इस बारः
सनातन नदी : अनाम धीवर
कुबेरनाथ राय
कथोपकथन
इंटरनेट आधारित मीडिया अपनी स्वतंत्र पहचान बना चुका है-बालेन्दु शर्मा
संस्मरण में
डा. कमल कुमार
का संस्मरण
निर्मल
वर्मा को याद करते हुए

            
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