रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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छंद

दोहेःठाकुर दास सिद्ध गीतःसंतकवि 'पाददर्शी' नवगीतःडॉ.तारादत्त 'निर्विरोध' हाइकुःराजेन्द वर्मा

माह के छंदकारः पद्मनाभ गौतम

 

            

माह के छंदकार

पद्मनाभ गौतम

पाँच ग़ज़लें

 

एक

m के मोती रहेंगे कब तलक ?

धुन्ध के साये बचेंगे कब तलक ?

 

धूप दस्तरखान लेकर    रही

भूख के सपने दिखेंगे कब तलक ?

 

दर्ज  तहरीरें  कभी  की हो चुकीं

गुमशुदा मंजर दिखेंगे कब तलक ?

 

धूल  में  लिपटी  पुरानी  निस्बतें

ज़िक्र पेड़ों पर लिखेंगे कब तलक ?

 

अब हमें भी पूर्ण आहुति मंत्र दे दो

होम आधे हम करेंगे कब तलक ?

       

दो

सोच समझ नादानी क्यों

छलनी रुकना पानी क्यों

 

घर के रस्ते पर लगती

मुश्किल हर आसानी क्यों

 

नयी सुबह के गीत नये

फिर भी तान पुरानी क्यों

 

मुरली का हर सुर राधे

फिर मीरा दीवानी क्यो

 

जीवन, तुम कहते कविता

चुभती हुई कहानी क्यों

 

जो है खुदमुख्तारी तो

सुबह शाम वीरानी क्यों

 

तीन      

पीठ पर असबाब लेकर चल रही है

वो नदी सैलाब लेकर चल रही है

 

रोशनी सूरज के हुक्मों से थकी है

बाजू ए महताब लेकर चल रही है

 

देखिये सब हंस रहे हैं इस अदा पे

ज़िदगी इक ख़्वाब लेकर चल रही है

 

उसका ये अंदाज़ भी चुभता हुआ है

क्यूं भला आदाब लेकर चल रही है

 

आप उससे ख़ौफ क्यूं खाने लगे हैं

जो नज़र में आब लेकर चल रही है

      

चार

शांति के आलाप में रणनाद कैसा

सन्धि ध्वज के शीर्ष पर उन्माद कैसा

 

भस्म हो यदि होलिका विस्मय नहीं है,

पर स्वतः जल जाये वह प्रहलाद कैसा

 

लो पिघल कर बह चली जलधार खारी

अश्रुओं को हर्ष क्या अवसाद कैसा

 

खो चुकी ध्वनि लौट कर आनी नहीं हैं

बीतरागी  शब्द  का  प्रतिसाद  कैसा

 

सूर्य अणु विस्फोट प्रतिक्षण कर रहा पर

नाद  जो हद में  बंधे  वह  नाद  कैसा

     

पाँच

सहरा की तपिश में वो ख्याबगाह आज तक

आखों में उलझती है इक निगाह आज तक

 

ये  मेरा  ख़ौफ़  था  के मैं न पार जा सका

दरिया को चीरती रही रही वो राह आज तक

 

बेशक  मिले  मुझे  कई  जहांपनाह  पर

ये अपनी ज़िद थी ली नहीं पनाह आज तक

 

सूरज की ज़्यादती पे सितारों ने दी दुआ

है रोशनी की पीठ जो सियाह आज तक

 

क्यूँ जाने मिल सका न मुझको एक चश्मदीद

हर बार तो लुटा हूँ सरे राह आज तक

 

वो दिल में है जेहन में है रगों में है मेरे

क्यों जाने फूटती नहीं वो आह आज तक

 

 

छंद

खाली पेट कोई बुद्धिमान नहीं हो सकता- महात्मा बुद्ध

आपकी प्रतिक्रिया

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