रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

छंद

दोहेःठाकुर दास सिद्ध गीतःसंतकवि 'पाददर्शी' नवगीतःडॉ.तारादत्त 'निर्विरोध' हाइकुःराजेन्द वर्मा

माह के छंदकारः पद्मनाभ गौतम

 
 

 

दोहे

भले-भले से बोल हैं, भली-भली मुस्कान ।

बड़े सलीकेदार हैं,  सिद्ध यहाँ शैतान ।।

 

ज्ञानी मूरख हैं हुए, बलशाली लाचार ।

सिद्ध धनी निर्धन हुए, अहंकार को धार ।।

 

कैसे दुबली हो रही, इत गरीब की गैल ।

सिद्ध रोज धनवान का, अँगना जाता फैल ।।

 

सिद्ध सबै दुख भोगना, खास रहे या आम ।

ताज तजा तज पादुका, वन-वन विचरा राम ।।

 

जो देखा उत्कोच तो, उसने बदला सोच ।

सिद्ध जरा हें-हें किया, परे किया संकोच ।।

 

देखा हमने फूलता, मानस-फुग्गा-फूल ।

पलक झपकते सिद्ध फिर, चाट रहे थे धूल ।।

 

ठाकुर दास सिद्ध

 

दो गीत

 

हम मानव हैं तिनके

 

ये संसार महासागर है, हम मानव हैं तिनके

इधर-उधर से बहकर आए, कौन यहाँ पर किनके ।

नदिया बनकर बहते जाओ, सागर में पहुँचोगे

उठते जितने ज्वार यहाँ पर, समझो हैं पल-छिन के ।

व्यर्थ गँवाया सारा जीवन, झूठ कपट कर सबने

उसका मानव जन्म सफल है, हृदय दया हो जिनके ।

नश्वर गोरा तन तू पाया, माल खिला मस्त बना

इस तन का मत करो भरोसा, कब मक्खियाँ भिनके ।

हर माँ का देखो दूध श्वेत, खून सबका लाल है ।

आपस के झगड़े हैं सारे, फूट रुप डाकिन के ।

 

महके घर का आँगन

 

कर्मो की खेती है सारी, हम सब माली-मालन

बच्चों की फुलवारी से ही, महके घर का आँगन ।

सर्वेश्वर की लीला न्यारी

समझ न पाते हैं संसारी ।

कहीं फूल पर फूल खिलाए

इक कली कहीं नज़र न आए ।

सुख-दुख पतझड़-हरियाली दे, करे पतित को पावन ।

 

खिलने से पहले मुरझाए

माँ का सीना फट-फट जाए ।

लाल बिना बेहाल हाल है

रहम न खाता क्रुर काल है ।

सूना-सूना लगता है यह, जीवन अपना साजन ।

 

सदा रहे ना काली छाया

सूखे को भी हरा बनाया ।

कर्म खेल अपना दिखलाता

सुख-दुख जग में आता-जाता ।

प्यासी धरती को सरसाता, बन सावन मनभावन ।

 

इक दिन गूँजेगी किलकारी

करें भरोसा सब नर-नारी ।

ईश-कृपा जब होगी प्यारी

तभी खिले जीवन फुलवारी ।

पारदर्शी लहराएगा फिर, तेरा उजड़ा कानन ।

 

संतकवि पारदर्शी

दो नवगीत

 

लहरों से छूट रहे कूल

 

देवदारु हो गए बबूल मितवा

लहरों से छूट रहे कूल मितवा ।

 

भीतर से बाहर तक

लील रहे दुख,

रंगों ने छीन लिए

रूपों के सूख ।

आँखों में चुभते हैं फूल मितवा 

गंध हुई फूलों की भूल मितवा ।

 

केसर की क्यारी ने

खुरच दिया मन,

हरी-हरी शाखों के

पिलियाए तृण ।

कटे हुए वृक्ष और मूल मितवा 

मलयज की बाहों में धूल मितवा ।

जाएँ कहाँ दूर भी,

कौन है वहाँ ?

एक भीड़, एक भीड़

सब तरह यहाँ ।

गीत-राम रहे न अनुकूल मितवा 

शब्दों तक रह गए उसूल मितवा ।

 

सब उड़ाने आँख भर हैं

 

यादें के फिर पंख खोले,

उड़ चला मन का विहग आकाश में ।

 

दूर जाते में कहीं से

देखना यों दूर मुड़ कर ।

सुखद होता है बिछुड़ कर,

प्राण का मिलना उजड़ कर ।

कौन जाने किस क्षितिज पर

हो मिलन, फिर से अलग आकाश में ।

 

करकते-से सपन टूटे,

मोतियों-से अश्रु लूटे ।

लौट पाते हैं नहीं क्षण,

मिल न पाते पंथ छूटे ।

सोचता पर, रुक न पाता,

चलता हुआ मन तो सजग आकाश में ।

 

सब उड़ाने आँख भर हैं,

नीड़ सारे शाख भर हैं ।

साँस के कच्चे घरौंदे -

आयु के पर लाख घर हैं ।

पक्षियों के साथ फिर भी

रूप उड़ता पवन के मग आकाश में ।

डॉ. तारादत्त 'निर्विरोध'

 

हाइकु

 

कर्म का फल

निकलकर रहेगा

आज या कल ।

 

खुली खिड़की

रोशनी भी देती है

और हवा भी ।

 

प्यार का रिश्ता

निभाने न आयेगा

कोई फ़रिश्ता ।

 

रतन-धन

व्यर्थ है, कीमती है

निश्छल मन ।

 

एक ही कर्म

लड़ना अँधेरे से

दीप का धर्म ।

 

बेशक टूटा

लेकिन दर्पण से

सच न छूटा ।

 

जीत या  हार

तय किकया करती

वक्त की धार ।

 

बाधाएँ आतीं

वीरों के सिर पर

हाथ फिरातीं ।

 

वेदना-पद

गा रहा निःशब्द मैं

मैं विशारद ।

 

बनो शंकर

दुनिया की खातिर

पी लो जहर ।

राजेन्द्र वर्मा

 

छंद

हमारा जीवन हमारे विचारों का प्रतिफल है- मारकस आरेलियस

आपकी प्रतिक्रिया

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, संजीव ठाकुर

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com