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बालकथा

  बालकथाः फगनू का तोता- सिंधु देवी रथ

माह के बालकवि-  विष्णु कविरत्न

 
 

फगनू का तोता

सिंधु देवी रथ

   

            पहले ज़माने की बात है । एक गाँव में फगनू नामक गरीब किसान रहता था । खेती-बाड़ी थोड़ी-सी थी पर गाय-बैल खूब थे । वह रोज अपने गाय-बैल जंगल ले कर चराता था ।

 

            गाय-बैल चराते-चराते ऐसे ही एक दिन उसने एक पेड़ के नीचे छोटे-छोटे दो तोतों को देखा । वह तुरंत उनके करीब जा पहुँचा । वह इधर-उधर नज़रे दौड़ाने लगा । यह सोचकर कि उनकी माँ शायद यहीं-कहीं हो पर वहाँ कोई नहीं था ।

 

            दिन ढलने को आतुर था । दोनों तोते इतने छोटे थे की ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे । लगता था 2-4 दिन के होंगे । एक भी पंख नहीं उगा था । फगनू को उन पर दया आ गई । उसने मन ही मन सोचा - ऐसे असहाय बच्चों को छोड़ कर जाना पाप होगा । वह दोनों तोते को घर ले आया । फगनू उनको बड़े प्यार से पालने लगा ।  

 

            फगनू का एक लड़का था पाँच साल का । थोड़ा बदमाश, थोड़ा नालायक । एक दिन वह बहुत शैतानी कर रहा था । परेशान होकर उसकी माँ ने उसे कमरे के भीतर बंद कर दिया । कुछ ही देर के बाद लड़का चिल्लाने लगा- माँ, माँ, दरवाजा खोलो, मुझे घुटन हो रही है ।

 

            क्यों, अब समझ में आया ?”  माँ डाँटने लगी । पर माँ से बेटे की पुकार सुनकर उससे रहा नहीं गया । माँ की ममता जो जाग उठी थी । दरवाजा खुल गया । लड़का कुछ दिन के लिए तो चुप रह गया । अचानक उसे फितूर सूझने लगा । मन में बदमाशी करने का विचार आना लगा । जाने क्यों, पर उसे लगा कि ये दोनों तोते बदमाश हैं तभी पिताजी इन्हें पिंजरे में बंद करके रखे हैं । इन्हें भी तो घुटन होती होगी ।

 

            वह अपने पिता से बोला, आप इन्हें क्यों बंद कर के रखे हैं ? इन दोनों तोते को जब तक जंगल में नहीं छोड़ कर आओगे तब तक मैं खाना नहीं आऊँगा ।"

 

            फगनू बहुत समझाया कि ये दोनों बेसहारा हैं ऊपर से मूक पक्षी । मेरे मन में दया आ गई । मैं तुम्हें जैसे प्यार करता हूँ इन तोतों को भी प्यार करता हूँ । फिर बचपन से ये हमारे साथ हैं । अब जंगल में नही रह पायेंगे । सब पशु-पक्षी नोच-नोच कर इन्हें मार डालेंगे । मुझे पाप पड़ेगा बेटा ।

 

             वह लड़का भला कहाँ मानने को तैयार था । रोते-रोते अड़ गया । वह कहने लगा, पिता जी, आप इन तोतों को प्यार करते हैं पर क्या ये तोते भी आपको प्यार करते हैं ? जब आपसे इनका प्यार होगा तो ये जंगल से उड़कर वापस आ जायेंगे । तब मैं मानूँगा कि पशु-पक्षी भी प्यार की भाषा समझते हैं । मैं आज प्यार की परीक्षा देखना चाहता हूँ ।"

 

            फगनू ठीक है कह कर पिजंरा उठाया और जंगल की तरफ चल पड़ा । उसको भरोसा नहीं था की ये दोनों लौट आयेंगे । इस बात को लेकर वह बहुत दुखी था । उसे आज औलाद की जिद के सामने झुकना पड़ रहा था । आखिर न चाहते हुए भी वह दोनों तोता को पिजंरे से बाहर निकाल के छोड़ दिया और रोते-रोते घर लौट आया।

             फगनू को न देखकर दोनों तोते टें-टें करके रोने लगे । वे स्वयं को फगनू से आज पहली बार अलग  पा रहे थे । कुछ क्षण बाद छोटे ने कहा,  भैया, अब हम स्वतंत्र हो गये हैं । आराम से जंगल में रहेंगे ।बड़ा तोता समझाते हुए बोला, नहीं भाई, ये उचित नहीं है । हमने मालिक का नमक खाया है । फिर बचपन से उन्होंने हमको आश्रय दिया है । वे ही हमारे माँ-बाप हैं । पालनहार हैं । तुम्हें नहीं पता, मालिक का बेटा पक्षी जाति का प्यार जानना चाहता है । यह हमारी परीक्षा की घड़ी है । हम मालिक के पास जायेंगे । मालिक की इज्जत पर आन पड़ी है ।

 

            अंततः छोटा तोता भी बड़े भाई की बात मान गया ।

 

            दोनों तोते फिर से उसी पिंजरे में जाकर बैठ गये । पेड़ की आड़ में फगनू का लड़का सब देख रहा था । वह दंग रह गया । वह उन्हें घर ले आया । पिता के सामने वह शर्म से पानी-पानी हो रहा था, पिता जी, आपका प्यार सच्चा है । पक्षियों का प्यार तो और भी सच्चा है ।

 

            सच है बेटा”, फगनू ने अपने बेटे को समझाते हुए बोला, हर जीव में प्यार का खजाना होता है ।रअसल हम उसे पहचान नहीं पाते ।

 

फगनू का बेटा भी तोतों को बारी-बारी से सहलाने लगा था ।

 

 

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