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फगनू का तोता |
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सिंधु देवी रथ |
पहले
ज़माने की बात है । एक गाँव में फगनू नामक
गरीब किसान रह
ता था
। खेती-बाड़ी थोड़ी-सी थी पर गाय-बैल खूब थे । वह रोज अपने गाय-बैल जंगल ले कर चराता था ।
गाय-बैल चराते-चराते ऐसे ही एक दिन उसने एक पेड़ के नीचे छोटे-छोटे दो तोतों को
देखा । वह तुरंत उनके करीब जा पहुँचा । वह इधर-उधर नज़रे
दौड़ाने लगा । यह सोचकर कि उनकी माँ शायद यहीं-कहीं हो पर
वहाँ कोई नहीं था ।
दिन ढलने को आतुर था । दोनों तोते इतने छोटे थे की
ठीक से चल भी
नहीं पा रहे थे । लगता था 2-4 दिन के होंगे । एक भी पंख
नहीं उगा था । फगनू को उन पर दया आ गई । उसने मन ही मन
सोचा - ऐसे असहाय बच्चों को छोड़ कर जाना पाप होगा । वह
दोनों तोते को घर ले आया । फगनू उनको बड़े प्यार से पालने
लगा ।
फगनू का एक लड़का था पाँच साल का । थोड़ा बदमाश, थोड़ा
नालायक । एक
दिन वह बहुत शैतानी कर रहा था । परेशान होकर उसकी माँ ने
उसे कमरे के भीतर बंद कर दिया । कुछ ही देर के
बाद लड़का चिल्लाने लगा-
“माँ,
माँ,
दरवाजा खोलो, मुझे घुटन हो रही है ।”
“क्यों,
अब समझ
में आया
?” माँ
डाँटने लगी
। पर माँ से बेटे की पुकार सुनकर उससे रहा नहीं गया । माँ
की ममता जो जाग उठी थी । दरवाजा
खुल गया । लड़का
कुछ दिन के लिए तो चुप रह गया
। अचानक उसे फितूर सूझने लगा । मन में बदमाशी
करने का विचार आना लगा
। जाने क्यों, पर उसे लगा कि ये दोनों तोते बदमाश हैं तभी
पिताजी इन्हें पिंजरे में बंद करके रखे हैं । इन्हें भी तो
घुटन होती होगी ।
वह अपने पिता से बोला,
“आप
इन्हें क्यों बंद कर के रखे हैं
? इन
दोनों तोते को जब तक जंगल में नहीं छोड़ कर आओगे तब तक मैं
खाना नहीं आऊँगा ।"
फगनू बहुत समझाया कि ये दोनों बेसहारा हैं ऊपर से मूक पक्षी
। मेरे मन में दया आ गई । मैं तुम्हें जैसे प्यार करता
हूँ इन तोतों को भी प्यार करता हूँ । फिर बचपन से
ये हमारे
साथ हैं । अब जंगल में नही रह पायेंगे । सब पशु-पक्षी नोच-नोच
कर इन्हें मार डालेंगे । मुझे पाप पड़ेगा बेटा ।
वह लड़का भला
कहाँ मानने को तैयार था । रोते-रोते अड़ गया
। वह कहने लगा,
“पिता
जी, आप इन तोतों को प्यार करते हैं पर क्या ये तोते भी आपको
प्यार करते हैं
? जब
आपसे इनका प्यार होगा तो ये जंगल से उड़कर वापस आ जायेंगे
। तब मैं मानूँगा कि पशु-पक्षी भी प्यार की भाषा समझते हैं
। मैं आज प्यार की परीक्षा देखना चाहता हूँ ।"
फगनू
‘ठीक है’
कह कर पिजंरा उठाया और जंगल की तरफ चल पड़ा । उसको भरोसा
नहीं था की ये दोनों लौट आयेंगे ।
इस बात को लेकर वह बहुत दुखी था ।
उसे आज
औलाद की जिद के सामने
झुकना पड़ रहा था । आखिर न चाहते हुए भी वह दोनों तोता को
पिजंरे से बाहर निकाल के छोड़ दिया और रोते-रोते घर लौट
आया।
फगनू को न देखकर दोनों तोते
टें-टें करके
रोने लगे । वे स्वयं को फगनू
से आज पहली बार अलग पा रहे थे
। कुछ क्षण बाद छोटे ने कहा, “भैया, अब
हम स्वतंत्र हो गये हैं । आराम से जंगल में
रहेंगे ।”
बड़ा
तोता समझाते हुए बोला,
“नहीं
भाई, ये उचित नहीं है । हमने मालिक का नमक खाया है । फिर
बचपन से उन्होंने हमको आश्रय दिया है । वे ही हमारे
माँ-बाप हैं । पालनहार हैं ।
तुम्हें नहीं पता, मालिक का बेटा पक्षी जाति का प्यार जानना
चाहता है । यह हमारी परीक्षा
की घड़ी है । हम मालिक के पास जायेंगे । मालिक की इज्जत पर
आन पड़ी है ।”
अंततः छोटा तोता भी बड़े भाई की बात मान गया ।
दोनों तोते फिर से उसी पिंजरे में जाकर बैठ गये । पेड़ की
आड़ में फगनू का लड़का सब देख रहा था । वह दंग रह गया ।
वह उन्हें घर ले आया । पिता के सामने वह शर्म से पानी-पानी
हो रहा था,
“पिता
जी, आपका प्यार सच्चा है । पक्षियों का प्यार तो और भी
सच्चा है ।”
“सच
है बेटा”,
फगनू ने
अपने बेटे को समझाते हुए बोला,
“हर जीव
में प्यार का खजाना होता है ।
दरअसल हम उसे पहचान नहीं पाते ।”
फगनू का बेटा
भी तोतों को बारी-बारी से सहलाने लगा
था ।
