रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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विशेषांक

 

।। लोक को स्पर्श करती वेबमीड़िया ।।

        श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था -

        लोक-संग्रहमेवापि संपश्यन् कर्त्तुमर्हसि

 

(और कुछ नहीं जानते-मानते तो, कम से कम, लोक-संग्रह को ध्यान में रखते हुए- संपश्यन् तुम्हें कर्म से नहीं भागना चाहिये । )

 

        अंतरजाल(इंटरनेट) की रंग-बिरंगी दुनिया की सैर करते वक्त गीता की यह पंक्ति बार-बार सुनाई देती है । संवेदनाहीनता के इस भयानक दौर और हर क्षण अत्याधुनिकता के लिए लपलपाती जीव्हा वाले युग के बीच छटपटाते हुए मन में धुंधली ही सही पर कुछ किरनें विश्वास जगाती हैं कि मनुष्य चाहे कितना भी उत्तरआधुनिक हो जाये वह लोक के प्रति अपने नैतिक दायित्वों को संपूर्णतः नहीं टाल सकता है । इसे लोक-चेतना का तकाज़ा ही कहें कि वैश्वीकरण के तमाम दबाबों के बावजूद मनुष्य अपने पुरावैभव को भूला नहीं पाया है । वह क्यों कर भी भूलाये ! वह एकदम से नैतिकताशून्य हो नहीं सकता । शायद उसे यह भी पता है कि लोक-चेतना वेद-शास्त्रों से भी पुरानी है । इस भूमिका की ज़मीन पर खड़े होकर इतना तो कहा ही जा सकता है कि वेबमीडिया यानी इंटरनेट की थाल पर सूचना तकनीक के नाम से जो भी परोसा जा रहा है वह मात्र कूड़ा-कर्कट नहीं है, उसे नीर-क्षीर विवेक के साथ देखने की गुंजायश है । उसे हम नागर और अति-नागर बोध की विकृति मान लेंगे तो शायद अन्याय होगा । वहाँ लोक की हरियाली भी यत्र-तत्र बिखरी पड़ी है । कहीं पनघट पर पनिहारिनों की चुडियों की लय में लोकगीत की मद्धिम धून है तो कहीं चौपाल पर बुजुर्गवारों की बतकही के बीच-बीच में उभरती लोककथायें भी । कहीं शोख और चटक परिधानों में सजे-सँवरे ग्राम्यबालाओं को गिद्धा या करमा की नृत्यमुद्रा में भी आत्मविभोर होकर देख सकते हैं और कहीं उस कलाकार की जीवटता को भी जो निहायत अनुपयोगी चीजों को एक जीवंत रूप दे देता है । आइये आप भी जऱा सैर करलें :

 

वेबपोर्टल में समृद्ध लोक-रंग

         भारतीय लोक की दुनिया अति समृद्ध रही है । सच तो यह है कि भारतीत जीवन जितना नागर रूप में है उतना ही लोक रूप में । यानी कि आधुनिकता और परंपरा से समन्वित जीवन शैली । सच यह भी है कि कोई भी देश या उस भू-भाग का कोई समाज केवल आधुनिक समय में नहीं जीता, उसमें लोक-परंपराओं की साँसे भी होती हैं । समृद्ध भारतीय लोक-रूपों का समृद्ध लोक-संग्रहण किया है - डिजटल सांस्कृतिक संपदा पुस्तकालय, इंदिरा गाँधी सेंटर कला एवं सस्कृति केंद्र ने । इन्होंने जाल स्थल का नाम रखा है- http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA पारम्परिक साहित्य वर्ग में जातक की कहानियाँ सहित, हितोपदेश, पंचतंत्र, सिंहासन बत्तीसी जैसे अनिवार्य लोकसाहित्य का भंडार है । यहाँ मौखिक महाकाव्य, ब्रज-वैभव, वैदह वैभव - मिथिला- वैभव , और मगध  का रसपान किया जा सकता है । वेब-पृष्ठ ब्रज-वैभव अपने नामकरण को सच्चे अर्थों में चरितार्थ करता है । यहाँ आप ब्रज को जिस किसी कोण से जानना-पढ़ना चाहते हैं, मिल जायेगा । बस्स, आप शीर्षकों पर अपना माउस क्लिक करते जाइये । यह एक तरह से ब्रज पर केंद्रित एवं सारगर्भित विशालतम वेब-स्थल है । एक मायने में ब्रज का इनसायक्लोपीडिया । यहाँ ब्रज की झीलें, सरोवरें, कुंड, ताल, पोखर, बावड़ी, कूप से लेकर रास नृत्य, सूखे रंगों की चित्रकला, सांझी कला, कलाकृतियों में प्रस्तुत कथा दृश्य, भाषा, संगीत को संपूर्ण आत्मीयता के साथ संजोया गया है । संगीत ब्रज-संस्कृति का अविभाज्य अंग रहा है । भारतीय संगीत को ब्रज की देन के रूप में हम आज भी जिस तरह ध्रुवपद- धमार, वृंदगानी विद्या, ग्वारिया बाबा, हरिदासजी, वल्लभाचार्य, संगीत शिरोमणि सूरदास आदि को जिस तरह याद करते हैं वह हमारे लोक जीवन को उज्जवल और मन को शांति प्रदान करने में सर्वोपरि है । ब्रज वैभव अध्याय में ही राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी  की महत्वपूर्ण लोक ग्रंथ धरती और बीज को समूची प्रतिष्ठित किया गया है जो नये ज़माने की तकनीक इंटरनेट के माध्यम से लोक साहित्य के वैश्वीकरण का ईमानदार प्रयास है । ज्ञातव्य हो कि यह कृति हजारों पृष्ठों की हैं एवं बहुमूल्य है । इसके अलावा बुंदेलखण्ड की लोक संस्कृति का इतिहास नामक पूरी किताब को भी रखा गया है जिसके लेखक है नर्मदा प्रसाद गुप्त  अन्य किताबों में बुन्देलखण्ड की लोक संस्कृति का इतिहास, परिव्राजक की डायरी, हजारी प्रसाद द्विवेदी के पत्र, युगान्तर (अन्तरंग-वार्त्ता), अक्षर-अक्षर अमृत (अन्तरंग-वार्ता) भी लोक के बहाने पठनीय हैं । इस तरह से यहाँ हजारों पृष्ठ की लोक-सामग्री संग्रहित है ।

 

        इतना ही नहीं यहाँ भारत के प्रतिष्ठित लोकविशेषज्ञों के शोधपूर्ण आलेख भी यहाँ हिंदी में समादृत हैं । इसमें 1. कला वह वस्तु है जो जीवन को परिपूर्ण बनाती है (अटल बिहारी बाजपेयी), 2. अतीत का अद्यतन अस्तित्व मथुरा (वीरेन्द्र बंगरु) 3. ॠग्वेद में सामाजिक जीवन (विजय शंकर शुक्ल) 4. जनपद सम्पदा (प्रोफेसर बैद्यनाथ सरस्वती) 5. राक पेंटिग पर केंद्रित शिलाओं पर कला (हिमानी पाण्डे) तथा भारतीय परम्परा में भाषा संस्कृति एवं लोक की अवधारणा तथा उनका परस्पर अन्त:सम्बन्ध और प्रक्रिया रूप में भाषा, संस्कृति और लोकः एक सतत् प्रक्रिया नामक महत्वपूर्ण लेख भी हैं जो लोकअध्येताओं के लिए किसी संदर्भ सामग्री से कम नहीं ।

 

               छत्तीसगढ़ जैसे लोक प्रदेश को व्यापक रूप से समझने के लिए भी इसी वेब-स्थल का भ्रमण किया जा सकता है । यहाँ छत्तीसगढ़ का लोकगीत, लोकनृत्य, लोक कथाएँ,  लोकगाथा, लोकोक्तियों (हाना), छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति के पहलुओं के कलाकार, लोक आभूषण, लोक खेल, लोक- वाद्य लोक-संस्कृति से जुड़ी हुई गतिविधियाँ आदि सभी लोक अवयवों को समाहित किया गया है । यहाँ कुछ बातें खटकने वाली भी हैं । उदाहरण के लिए- दिल्ली की पढ़ी-लिखी एक महिला को, जो सामजिक संस्था चलाती है, छत्तीसगढी संस्कृति का विशेषज्ञ बताने का प्रकारांतर से किया गया प्रयास । इतना ही नहीं, लोकसंस्कृति के क्षेत्र में अज्ञात संस्था को प्रमुख लोक आयोजक बताया गया है । यह छत्तीसगढ़ी संस्कृति के मर्मज्ञों के लिए आपत्ति जनक भी हो सकत है फिर भी भारत सरकार और इंदिरा कला केंद्र को साधूवाद, जिसके कारण छत्तीसगढ़ जैसे नवोदित प्रदेश और उसके लोकवैभव को कम से कम इतना तवज्जो मिला है । अन्यथा राज्य के इस लोक-संपन्नता को विश्वव्यापी बनाने की दिशा में किये जा रहे वादे और घोषणायें के बल पर तो कुछ भी संभव न हो पाता । बहरहाल यहाँ नारी मनोविज्ञान की प्रिय कला गोदना पर भी सामग्री दी गयी है जो और कहीं देखने को नहीं मिलती । कुछ लोकगीतों को आडियो फार्मेट में रखा गया है । सुआ, पंडवानी, भरथरी जैसे लोकगीत को इंटरनेट पर देखकर कोई भी प्रवासी छत्तीसगढिया आनंदित हुए बिना नहीं रह सकता जो विश्व में इस जनपद की पहचान हैं । यहाँ छत्तीसगढ़ी साहित्य  का भी विहंगावलोकन किया जा सकता है । जिसे वेब संपादक ने गाथा युग , भक्ति युग-मध्य काल, आधुनिक युग में बाँटकर प्रस्तुत किया है । यह बात अलग है कि छत्तीसगढ़ी साहित्य को बाँटने का क्या आधार है नहीं बताया गया है ।

 

      इसी तरह मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तराचंल आदि प्रदेशों की लोक-संपन्नता का आंकलन इसी जाल-स्थल से संभव है । उत्तराचंल को मेलों का अंचल कहें तो अतिशयोक्ति न होगी । शायद इस तथ्य का खयाल रखते हुए राज्य के सभी मेलों की विस्तृत और सम्यक जानकारी भी यहाँ रखी गयी है ।  इसमें राजस्थान में सूर्य प्रतिमाओं का रुपांकन , राजस्थानी गाथाओं में वेश-भूषा वर्णन व लोक विश्वास कुमाऊँ की आलेखन परम्परा, कुमाऊँ हिमालय की पारम्परिक प्रौद्यौगिकी-पद्धतियाँ, मृतक-कर्म की रीतियाँ  आलेख आदि अत्यंत रोचक और संग्रहणीय बन पड़ी हैं । राजस्थान की लोक संस्कृति को उसके जनपदों के आधार पर प्रतिष्ठित किया गया है जिसमें मेवाड़(उदयपुर),मारवाड़, झालावाड़,कोटा क्षेत्र, अलवर, भरतपुर आदि प्रमुख हैं । राजस्थानी चित्रकला के शोधार्थियों के लिए यह वेबपृष्ठ आँखों को चमक प्रदान कर सकती है । राजस्थानी चित्रकला की विशेषताएँ ,राजस्थानी चित्रकला का आरम्भ सहित मारवाड़ी शैली, किशनगढ़, बीकानेर, हाड़ौती शैली/बूंदी व कोटा, ढूंढ़ार / जयपुर, अलवर, आमेर, उणियारा, सहित डूंगरपूर, देवगढ़ उपशैली पर विशद् सामग्री यहाँ रखी गयी हैं । मेवाड़ और मारवाड़ समाज पर जितनी सामग्री है उसे देखकर कोई भी समाजशास्त्री अचम्भे में पड़ सकता है । इसी तरह मध्यप्रदेश के ग्वालियर के चितेरे एवं उनके बनाए भित्ति चित्र, ग्वालियर के अनुष्ठानिक भित्ति चित्र भी महत्वपूर्ण हैं जो पारंपरिक चित्रकलाओं की किसी ख़ास किताबों में भी कई बार नहीं दिखाई पड़ते । भारत सरकार को धन्यवाद देते हुए आइये ऐसे ही एक और व्यापक वेबपोर्टल की ओर जो केन्द्रीय सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार की इकाई सीडॉक (सेंटर फॉर डवलपमेंट आफ एडवांस कंप्यूटिंग) द्वारा एक अरब से भी अधिक बहुभाषी भारतवासियों को एक सूत्र में पिरोने और परस्पर समीप लाने में अहम् भूमिका के रूप में संचालित की जा रही है । विश्वप्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री गिजूभाई की दर्जनों लोककथाएँ आनलाइन पढ़ने और डाउनलोड करके अपने कंप्यूटर में स्थायी रूप से संजोकर रखने की ख़्वाईश इस वेबघर(mobilelibrary.cdacnoida.com/Books/KahaniKahunBhaiya.doc) में आकर की जा सकती है ।

 

        संस्कृति मंत्रालय नई दिल्ली द्वारा संचालित राष्ट्रीय संग्रहालय में लोक का अद्भूत संग्रह है उसे (www.nationalmuseumindia.gov.in) नामक वेबसाइट में प्रचारित करने का प्रयास किया जा रहा है । यद्यपि राष्ट्रीय संग्रहालय में चित्रकला प्रभाग के अंतर्गत प्राचीनतम ज्ञात लघुचित्र, पूर्वी भारत में 10वीं और 12वी शताब्दियों में ताड़-पत्र के वृंतों पर बनाए गये थे, की व्यापक जानकारी मिलती है । पाण्डुलिपियाँ नामक प्रभाग में विभिन्न भाषाओं और लिपियों में लिखित लगभग 14,000 पांडुलिपियों का अर्जन किया गया है ये प्राचीन काल की इतिहास, साहित्य, सुलेखन कला, चिकित्सा शास्त्र, जीवनियों आदि से संबंधित हैं, जिसके बारे में भी यह वेबपृष्ठ बखान करता है । मुद्रा एवं अभिलेख एक तरह से सिक्कों का वेब पर राष्ट्रीय संग्रहालय जैसा है । यहाँ भारतीय सिक्कों का समूचा इतिहास (6वीं शताब्दी ई.पू. से 19वीं शती ई. का समापन काल)भी निर्देशित है । इसके अलावा आभूषण वीथिका, नृविज्ञान, अस्त्र-शस्त्र और कवच, सुसज्जा कलाएं आदि खंड़ों में भी लोक आधारित प्रचुर सामग्रियों कें संदर्भ हैं ।

        

          लोक को चाहे विद्वान कितना भी जटिल मानते रहें और उत्तरआधुनिकवादी उसे अस्पृश्यभाव से देखते रहें, यह शब्द जब मस्तिष्क में घुलता है, सबसे पहले उसके अर्थ का जो रस मिलता है उसमें नानी-नाना की कहानी बरबस याद आने लगती हैं । हम लोककथा की दुनिया में पहुँच जाते हैं । ऐसे ही लोककथाओं की सुंदर-सी फुलवारी है चीन का जाल-स्थल- चाइना रेडियो इंटरनेशनल का हिंदी सेवा । इसका वेब-पता है-

 (http://in.chinabroadcost.cn/) ।

 

       यूँ तो यह चीन के समृद्ध लोक को प्रतिबिंबित करता हुआ वेबजाल है किन्तु यहाँ चीन की जितनी लोककथायें संजोयी गयी हैं उतनी संख्या में शायद ही किसी देश की लोककथाएँ अन्यत्र किसी वेबजाल पर होगीं । कम से कम हिंदी अनुवाद के रूप में तो यह बात सौ आने खरी उतरती है । यहाँ बाकायदा लोक कथाओं को कई भागों में बाँट कर रखी गयी हैं, इनमें कहावत से जुड़ी कथाएं, पौराणिक कथाएं, नीति कथाएं, दर्शनीय स्थलों से जुड़ी कथाएं, बुद्धि से जुड़ी कथाएं, सैनिक कहानी आदि विभेदों में अर्धशतक से अधिक लोककथायें संग्रहित है । इन कथाओं का बस आप बाँचते जाइये और देखिए आपका मन चीन के समृद्ध अतीत में कैसे विचरण करने लगता है । वही नदी, वही पर्वत, वही पशु-पक्षी वही लोग-बाग और उनसे जुडे मार्मिक और रोचक कथा संसार । कुछ लोककथायें तो वहाँ ऐसी है जिनमें पात्र का भारतीय नामकरण कर दें तो धीरे-धीरे हमारी अपनी लोककथायें स्मृति में उभरने लगती हैं । इससे पता चलता है कि भले ही चीन-भारत का वर्तमान सौहार्दपूर्ण न बन सके पर दोनों का अतीत मानवता के मूल्यों के मामले में कहीं न कहीं एक बराबर सोचते-विचारते थे ।

 

          यह जाल स्थल उन्हें खास तौर पर अपने घेरे में ले सकता है जो चीन के लोक साहित्य के बारे में शोध करना चाहते हैं । प्राचीन काव्य में प्रतिभाशाली कवि सू शी ,  महाकवि तु फू , महाकवित ली पाई,  चीन के थांग राजकाल की शानदार कविताएं ,  ग्रामीण जीवन पर लिखने में मशहूर महाकवि थो य्वान मिंग ,  छ्यु य्वान और उन की कविताएं , चीन का पहला काव्य ग्रंथ  यहाँ बडे मजे से संग्रहित किया जा सकता है । इसके अतिरिक्त नाटककार ली यू और मशहूर नाटककार क्वान हान छिंग का प्राचीन अपेरा साहित्य और फु सुंग लिंग और उन की भूत आत्माओं की कथाएं , पश्चिम की तीर्थयात्रा ,त्रिराज्य की कहानी,