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आलेख

 
वेश्या

 गिरिराज जोशी

 

        नारी एक ऐसा शब्द है जिसके सामने इंसान तो क्या भगवान भी नत-मस्तक हो जाते हैं मगर यही नारी कभी-कभी रूढिवादिता के कारण अभिशाप बना दी जाती है। सामाजिक तौर पर यदि देखा जाए तो नारी के प्रति शुरूआत से ही समाज का दोहरा नज़रिया रहा है, कभी इसे देवी बनाकर मंदिरों मे पूजा की जाती है तो कभी कुल्टा या डायन बताकर सरेआम नंगा कर दिया जाता है। मैं नही जानता कि सही क्या है और नारी का सही स्थान क्या है मगर समाज का यह दोगलापन मुझे बचपन से अखरता रहा है ...

 

         समाज के इसी दोगलेपन को मैंने बहुत करीब से महसूस किया जनवरी २००६ में ...। उस समय मैं गुलाबी नगरी जयपुर में प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी मे जुटा था। मेरे एक मित्र ने मेरा परिचय अपनी सहपाठी कुमारी प्रियंका से करवाया। प्रियंका जितनी सुन्दर थी उतनी ही उलझी हुई । मैं ज्यों-ज्यों उसके बारे मे जानने लगा मेरी उत्सुकता बढती गई। उसका जन्म श्रीगंगानगर के समीप स्थित एक गाँव के साधारण किसान परिवार मे हुआ। पिताजी सिख धर्म से और माँ हिन्दु धर्म से होने के कारण वो दोनो ही धर्मों व संस्कारों से भली-भांति परिचित थी।  

 

        उसका जन्म उसके परिवार में खुशी कम और ग़म ज्यादा लाया थाउसका लड़की होना उसके परिवार वालों को नागवार गुजरा, शायद यही वज़ह रही कि उसका अधिकांश बचपन ननिहाल में ही गुजरा।  धीरे-धीरे ननिहाल वालों के व्यवहार में भी परिवर्तन होने लगा और उसके मन में जो अपनो के प्रति नफ़रत पैदा होने लगी उसने उसे होस्टल पहुँचा दिया। नफ़रत भरे माहौल में पली-बढ़ी वो मासूम अब बाहरी दुनिया में प्यार तलाशने लगी।

 

        यहीं से उसके एक नये जीवन की शुरूआत हुई जहाँ उसने बहुत कुछ सीखा भी और गंवाया भी... । आज वो अपना अस्तित्व बना चुकी है। लोग उसे उसके नाम से जानते है, उसके चाहने वालों की भी कमी नहीं है मगर कोई भी अपना नाम उसके नाम के साथ जुड़ा पसन्द नहीं करता क्योंकि वो एक वेश्या है। (यानी अब इंसान नहीं है)

 

         समय के साथ-साथ किस तरह इंसान अपने कार्य में पारंगत हो जाता है वो इसकी एक मिसाल है। सामान्य तौर पर नारी की आँखो में जो कशिश होती है, उसका इस कथित कुकर्म में उपयोग करते समय उसकी आँखों से वो शर्मोहया (जो कभी भारतीय नारी का सबसे कीमती गहना था) अचानक विलुप्त हो जाती थी। मैने उसकी मनोस्थिति को जानने का बहुत प्रयत्न किया मगर नारी के मनोभावों को समझ पाना आसान नहीं है। जब वो शरारतें करती और खिलखिलाकर हँसती थी तो लगता था मानो ४-५ बरस की नटखट बच्ची हो। उसकी सुन्दरता, मुस्कुराहट और सादगी किसी का भी मन मोह सकती थी। मगर किसी प्रियतम की प्रेयसी बनने का ख्वाब, उसके बचपन की कड़वी यादों तले दफ़न हो चुका था।

 

        उसके इस सफ़र का गर कोई साक्षी रहा है तो वह खुद, इसलिए वो खुद ही शायद ज्यादा अच्छी तरह से बता सकती है। मगर अपनों की जिस नफ़रत ने उसे इस मुकाम तक पहुँचाया, वो अब उसे परेशान नहीं करती। 

 

        अब वो मुस्कुराती है, लोगों का दिल बहलाती है मगर अकेले में आँसू बहाती है क्योंकि समाज के दोगलेपन को पहचान चुकी है।

 

 

आलेख

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