Category: कविता

सुशी सक्सेना की कविताएँ

शब्दों की महिमा मैं शब्द हूँ, अपनी महिमा तुमको क्या बतलाऊँ मैं, मीठा हूँ तो गैर भी अपने हैं, कड़वा बनके अपनों को दूर भगाऊँ मैं। खंजर, चाकू और कटार सब के सब धरे रह जायें, ऐसी गहरी चोट लगे मन में,…Read More »

रोहित ठाकुर की कविताएँ

 नदी  एक पुरुष का अँधेरापन  कम करती है औरत औरत के अँधेरेपन को  कम करता है पेड़ पेड़ के अँधेरेपन को  कम करती है आकाशगंगा तारों का जो अँधेरापन है उसे सोख लेती है नदी नदी के अँधेरे को मछली अपने आँख…Read More »

सुशांत सुप्रिय की कविताएँ

 रिक्शावाले का गीत  यह रिक्शा नहीं , देह मेरी का है विस्तार  यह चढ़ी सवारी , प्राण–वायु पर पड़ता भार  यह कुछ रुपयों के बदले पड़ी देह पर मार  आदमी पर आदमी चढ़ा , जनतंत्र का कैसा प्रकार                             काम वाली बाई का गीत                        झाड़ू–पोंछा करके अपना घर–बार चलाती हूँ                        यह भीख नहीं , मेहनत करके संसार चलाती हूँ   …Read More »

शशिबाला की कविताएं

By | June 15, 2018

कवि तो कहेगा जब जब सूरज को देखेगा उसके उगने की बात कहेगा समुद्र के गर्भ से शनैः शनैः ऊपर उठने की नरम गुलाबी रंगत से बदल कर गर्म अग्नि में बदलने की पूरे आकाश को लांघ कर धीरे धीरे नीचे उतरने…Read More »

सुबोध श्रीवास्तव की कविताएँ

चुका नहीं है आदमी..! बस, थोड़ा थका हुआ है अभी चुका नहीं है आदमी! इत्मिनान रहे वो उठेगा कुछ देर बाद ही नई ऊर्जा के साथ, बुनेगा नए सिरे से सपनों को, गति देगा निर्जीव से पड़े हल को फिर, जल्दी ही…Read More »