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अभिव्यक्ति की आजादी की ठाकरे-शैली - विश्वनाथ सचदेव शिवसेना-प्रमुख लाल ठाकरे स्वयं को शेर कहलवाना पसंद करते हैं, लेकिन बुढ़ा शेर नहीं, अपनी इस छवि को बरकरार रखने के लिए वे कुछ भी बोलने की राजनीति में विश्वास करते हैं, या तो उन्हें कभी लगता नहीं कि वे कुछ गलत कह सकते हैं, या फिर वे यह मानते हैं कि कभी कुछ गलत कह भी दिया गया तो उसे बोलने की ठाकरे-शैली (या ठाकरेशाही ?) बताकर उस गलत को सही बताया जा सकता है, उनके ऐसे कई बयानों का शिवसेना के नेतागण इसी तरह बचाव करते रहे हैं, वैसे, बालासाहेब विवादास्पद बयान देने को राजनीति का एक उपयोगी दाँव मानते हैं, ऐसा ही एक दाँव उन्होंने अब चला है, राष्ट्रपति अब्दुल कलाम पर तीखी टिप्पणी करके, राष्ट्रपति की आलोचना नहीं हो सकती, ऐसा कोई कानून तो नहीं है। लेकिन जनतांत्रिक मर्यादाओं के चलते यह माना जाता है कि राजनीतिक दाँव-पेच में राष्ट्रपति को नहीं घसीटा जाना चाहिए, ऐसा भी नहीं है कि ‘दि किंग कैन डू नो रोंग’ की तर्ज पर हमारा राष्ट्रपति भी गलती नहीं कर सकता, इसलिए उसकी आलोचना नहीं की जा सकती, कुछ करने और कुछ न करने, दोनों के लिए पहले भी राष्ट्रपति पर टीका-टिप्पणी होती रही है। लेकिन, जैसी टिप्पणी बालासाहब ने एक आतंकवादी को फाँसी दिये जाने के मामले में निर्णय देने में विलंब के लिए राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के विरुद्ध की है। वह जनतांत्रिक व्यवस्था में मर्यादाशील आचरण को नकारती ही है। ठाणे की एक चुनाव सभा में श्री ठाकरे ने राष्ट्रपति के बालों की स्टाइल को अपना निशाना बनाया और यह आरोप लगा दिया कि उन्हें कुछ दिखता ही नहीं है। कांग्रेस की यह प्रतिक्रिया भी राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित हो सकती है, लेकिन जनतांत्रिक मर्यादाओं का तकाजा है कि इस तरह के तेवर और टिप्पणियों का विरोध किया जाए और जनतांत्रिक मर्यादाओं का ही तकाजा यह भी है कि राजनेता अपनी कथनी-करनी में संयम बरतना सीखें ।
मर्यादित आचरण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारे संविधान ने हमें दी है, लेकिन इस स्वतंत्रता का अर्थ कभी भी, कुछ भी कहना नहीं है, जनतंत्र में हमें अपनी लक्ष्मण रेखाएँ खुद खींचनी होती है और फिर यह दायित्व भी हमारा ही होता है कि किसी प्रलोभन अथवा भय के वशीभूत हम उनका उल्लंघन न करें । लेकिन, हमारे कितने नेता इस बात में विश्वास करते है ? धार्मिक भावनाओं को उभारकर राजनीतिक लाभ उठाने का सवाल हो या फिर जाति और भाषा के नाम पर वोट जुटाने की राजनीति हो, हमारी राजनीति में, दुर्भाग्य से, कोई राजनेता न तो दूरगामी परिणामों पर विचार करने की आवश्यकता समझता है और न ही यह सोचता है कि उसकी कथनी समाज़ को किस तरह प्रभावित करेगी, उत्तेजक और मर्यादाहीन भाषण तालियाँ जरूर बजवा सकते हैं, कभी-कभी उनका राजनीतिक लाभ भी मिल सकता है, लेकिन जनतांत्रिक व्यवस्था में जिस तरह के विवेकशील आचरण की अपेक्षा की जाती है, कुछ भी कह देने वाला नेतृत्व उसका उदाहरण नहीं प्रस्तुत करता मर्यादाहीन आचरण के उदाहरण हर राजनीतिक, दल में मिल जाएँगे । हमने सड़कों पर और संसद में भी अपने नेताओं को ऐसा आचरण करते देखा है। जिस पर सिर्फ शर्म ही आ सकती है और हमारे ऐसे नेता हर पार्टी में हैं। लेकिन, यदि इस तरह का व्यवहार और वाणी किसी पार्टी की पहचान बन जाए तो सिर्फ दुख ही नहीं होता, चिंता भी होती है - चिंता स्वयं अपने समाज के भविष्य के बारे में ।
राजनीति में अपने विरोधी की आलोचना जरूरी है । तथ्यों पर आधारित ऐसी किसी भी आलोचना पर कोई प्रतिबंध भी नहीं होना चाहिए, लेकिन, इतनी अपेक्षा तो की ही जानी चाहिए कि जो कुछ कहा जाए, यह स्वीकृत सामाजिक परम्पराओं के अनुकूल हो और सभ्यता के द्वार में आता हो । हमारी संसद में बहुत से शब्द प्रतिबंधित हैं, असंसदीय माने जाते हैं, लेकिन ऐसे शब्द बोले जाते हैं। भले ही पीठासीन अधिकारी बाद में उन्हें सदन की कार्यवाही से निकाल दें, लेकिन सीधे प्रसारण वाले इस युग में राजनेताओं के श्रीमुख से निकले वे शब्द तो जनता तक पहुँच ही जाते हैं और उनका जो प्रभाव पड़ना होता है, वह भी पड़ ही जाता है। इसलिए सदन की कार्यवाही से कुछ शब्दों का निकाना जाना कुछ अर्थ नहीं रखता । वैसे ही सार्वजनिक सभाओं में दिये गये भाषणों में यदि हमारे नेता असभ्य या उत्तेजक या मर्यादाहीन भाषा का उपयोग करते हैं, तो उसका कुप्रभाव पड़ता ही है। ऐसे शब्द वापस लने से या यह कहकर बचाव करने से कि मेरा वह मतलब नहीं था जो निकाला जा रहा है। या फिर यह कहने से कि ऐसा बोलना तो मेरी शैली है। इस तरह के वक्तव्यों का बचाव नहीं किया जा सकता, न ही किया जाना चाहिए ।
असंगत आलोचना जरूरत इस बात की है कि हर नेता अपने लिए एक आचरण संहिता बनाये, यह संकल्प ले कि मैं इस तरह की भाषा नहीं बोलूँगा जो अनुचित हों, अनुचित लगे, लेकिन, हमारे राजनेताओं को इस तरह के संकल्प रास नहीं आते, उन्हें वह हर बात उचित लगती है जो तात्कालिन लाभ देती हो। इस तात्कालिक लाभ में किसी सभा में बजने वाली तालियाँ भी हो सकती हैं और दमदार होने की छवि का निर्माण भी, लेकिन, यदि सब नेता ऐसा ही आचरण करते रहे तो स्वच्छ राजनीतिक परम्पराओं के निर्माण में हिस्सेदार बनने का दायित्व कौन निभायेगा ?जिन राष्ट्रपति महोदय की असंगत आलोचना शिवसेना-प्रमुख ने की है। कुछ ही दिन पूर्व वे उनकी प्रशंसा भी कर चुके हैं। एक टी.वी कार्यक्रम में उन्होंने श्री वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व का आकलन करते हुए कहा था कि यदि (अब्दुल) कलाम जैसे व्यक्ति साथ न होते तो वाजपेयी परमाणु परीक्षण नहीं कर सकते थे। एक तरह से यह हमारे समय के महान वैज्ञानिक अब्दुल कलाम की प्रशंसा ही है। उसी व्यक्ति के लिए यह कहना कि उसके बाल उसे आगे नहीं देखने देते, एक घटिया आलोचना ही मानी जाएगी, घटिया आलोचना भी स्वीकार्य हो सकती है। बशर्ते उचित शब्दों का इस्तेमाल किया जाए ।
जब तक उचित-अनुचित का यह निर्णय हमारी राजनीति और हमारी राजनीतिक शैली का जरूरी हिस्सा नहीं बनता, हम उस राजनीतिक अपसंस्कृति का शिकार बने रहेंगे, जिसके चलते जनतांत्रिक मूल्यों-मर्यादाओं का क्षरण ही होता है। आलोचना जनतांत्रिक पद्धति का अनिवार्य अंग है। लेकिन यह आलोजना तथ्यों पर आदारित होनी चाहिए। तर्कसंगत होनी चाहिए और मर्यादाहीन नहीं होनी चाहिए । स्वच्छ राजनीतिक वातावरण जनतंत्र की सफलता की शर्त है। ऐसा वातावरण तभी बन सकता है जब हम दूसरे के व्यत्तित्व-विचारों का सम्मान करना सीखें, तर्क और विवेक के आधार पर अपनी बात समझाने की कोशिश करें। अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए सामाजिक हितों की बलि न चढ़ाएँ। o विश्वनाथ सचदेव संपादक, नवनीत मुंबई, महाराष्ट्र
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