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उत्तर-आधुनिक निहितार्थ डॉ. प्रभा दीक्षित भाषायी छल के विमर्श को उसके निहतार्थ के द्वारा ही समझा जा सकता है । इसीलिये उत्तर आधुनिक चिंतन जो अपने आपको चिंतन न मान कर एक प्रवृत्ति, मूड़, मिजाज या अंदाज के रुप में चिन्हित करता है, को भी हम उसके निहतार्थ के द्वारा ही समझ सकते हैं । उदाहरणार्थ जब किसी व्यक्ति का कोई धनी रिश्तेदार दिवंगत हो जाता है, और उस व्यक्ति के नाम बहुत सा धन या जायदाद छोड़ जाता है, तो उक्त व्यक्ति बेहद खुश होने के बावजूद भी एक दुःखपूर्ण शोक-संदेश प्रसारित करता है । वह सोचता है कि उसने भाषायी छल के द्वारा समाज अर्थात् अपने से जुड़े हुये लोगों को धोखा दे दिया है । किन्तु ऐसा होता नहीं है । समाज उस औपचारिक शोकसंदेश की अन्तर्वस्तु को समझ लेता है ।
उत्तर आधुनिक विमर्श के समर्थक चिन्तकों की दृष्टि में उत्तर आधुनिकता आधुनिकता का विस्तार भी है, और उसका अंतिम बिन्दु भी है । यह अनुपस्थित की उपस्थिति है । यह एक ऐसी वैश्विक अवस्था है, जो ज्ञान की अवस्था में बदल जाने की स्वीकृति है । कहीं यह महावृत्तान्त (इतिहास) का अन्त है, कहीं आधुनिकता के केन्द्रवाद का उपकेन्द्र है । कहीं राष्ट्र राज्यों की सांस्कृतिक सीमाओं का विगलन है कहीं देश राज्य के अन्त की घोषणा । कहीं बोध न होने की अबोधता, इसकी एक निश्चित व्याख्या और संरचनावादी ढंग का ऐतिहासिक सूचीकरण असम्भव है । यह कोई विचारधारा नहीं, यह स्वयं उत्तर की उत्तर संरचना है । यह कोई इतिहास नहीं है । कोई सामाजिक कल्याण का अंतिम विकल्प भी नहीं है । यह वैश्विक पूंजी के प्रभाव की या आधुनिक तकनीकी विकास की एक सामाजिक दशा या परिणति है, जो ईश्वरीय इच्छा की भांति मानव इच्छा के विपरीत आनी ही है । जहाँ तक विचारों का संबंध है, यह विचार अपने ही विचारों का विखण्डन है । और भी यह न जाने क्या-क्या ? और अन्त में कुछ भी नहीं है । तब क्या है ?
इस भ्रमवाद को स्थापित करने में आर्नल्ड टायनवी, ऐडोर्नो होर्श्विमार, ल्योटार, जैनेशन, बौद्रियां,देरिदा, ब्रियान, मैकट्रेल, टेरीइगलटन, मिशेलफूको आदि कोई दो दर्जन योरोपीय, अमेरिकी, फ्रांसीसी लेखक लगे हुये हैं । यह सब किसी ढंग से कुछ भी कहें, निष्कर्ष निकालें या घोषित करें, इनको पढ़ने के बाद इनके लेखकीय निहितार्थ को आसानी से तो नहीं, किन्तु समझा जा सकता है ।
उत्तर आधुनिक विमर्श अपनी दशा में पूंजीवाद का ऐतिहासिक विकास है, किन्तु अपनी दिशा (विचार) में एक वैचारिक षड़यंत्र है । अन्तर्विरोध-पूर्ण दो धारायें स्थिति के रुप में भी साथ-साथ चलती हैं । प्रायः चिन्तक इनमें से एक को चुन कर गलत निष्कर्षों के शिकार हो जाते हैं । सबसे सुखद आश्चर्य यह है कि उत्तर आधुनिकता के समर्थक अपने को मार्क्सवादी कहते हैं, और यह भी सच है कि इनमें से अधिकांश ने मार्क्सवाद का अध्ययन किया है । यह अपने अनुकूल मार्क्सवादी अवधारणाओं को सराहते भी हैं, और आलोचना भी करते हैं । अन्त में मार्क्सवाद के अन्त की घोषणा भी करते हैं । प्रश्न उठता है मार्क्सवाद से इतना लगाव या घृणा क्यों है ? इस बात का उत्तर मैं आगे दूंगी अभी मैं अपनी उपर्युक्त बातों को एक-एक उद्धरण के रुप में प्रस्तुत कर रही हूँ । उत्तर आधुनिकता के अधिकांश (सब नहीं) चिंतन अपने अंतरविरोधों के बावजूद यह मान कर चलते हैं कि मार्क्स न 1948 में ही पूँजीवाद (साम्राज्यवाद) के विकसित होते स्वरूप की परिकल्पना कर ली थी । उन्होंने लिखा है कि विश्व पूंजीवाद अपनी वित्तीय पूंजी के बल पर एक केन्द्रीय छवि बना लेगा । अविकसित पूंजीवाद की तुलना में विकसित पूंजीवाद में पैसे (बाजा) का महत्व अधिक होगा। पैसा संवाद के नियमों पर हावी हो जाएगा, और विश्व पूंजीवाद सारे विश्व को अपना आर्थिक उपनिवेश बनाने का प्रयास करेगा। आगे मार्क्स यह भी कहते हैं कि पूंजीवाद (साम्राज्यवाद) अपने अन्तर्विरोधों के कारण पराजित होगा। उत्तर आधुनिक लेखक इस अंतिम बात का उल्लेख नहीं करते, या सोवियत पराभव के बाद इस सम्भावना की गुंजाइश नहीं देखते । वे मार्क्सवाद की पूँजीवादी विकास की अवधारणा को अपने समय की उत्तर आधुनिक अवधारणा के रूप में व्याख्यायित करते हैं। और अन्त में यह कहते हुये कि मार्क्स अपने समय में आधुनिक समय के गुणात्मक परिवर्तन को समझ नहीं पाये कि मीडिया, तकनीक एवं बाजार के तालमेल से जी वस्तुस्थिति बनेगी उसे बदला नहीं जा सकता।
ये सब पैसा, बाजार या तकनीक का ऐसा मानवीयकरण करते हैं, जो मनुष्य को मशीन की भांति संचालित करेगा । इसके पीछे कुछ मनुष्यों की भूमिका और कुछ शोषकों के विरूद्ध आम जनता के संघर्ष को चिन्हित नहीं करते हैं । यह सारा तालमेल ये इतिहास की मदद से करते हुये अन्त में इतिहास के अन्त की घोषणा कर देते हैं।
उत्तर आधुनिक विमर्श वैश्विक स्थिति का घोषणा पत्र है, जिसके द्वारा साम्राज्यवादी चिंतक विश्व संस्कृति के नाम पर हर देश में एक उपभोक्ता अपसंस्कृति स्थापित करते हुये, एक सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक, साम्राज्यवादी उपनिवेश कायम करना चाहते हैं। राष्ट्र, राज्य या राजसत्ता को बाजार के नियमों से चुनौती देते हुये, अपनी राजसत्ता को स्थायी बनाना चाहते हैं। पिछले दिनों बहुराष्ट्रीय निगमों का यह वक्तव्य मीडिया के द्वारा उछाला गया कि जहाँ “युद्ध असफल होता है, वहाँ बाजार सफल होता है” । लेकिन पिछले दिनों देखने में या व्यवहार में कुछ और ही आया है। ईराक के तेल के कुओं पर अधिकार जमाने के लिये साम्राज्यवादी बाजार को अपनी राजसत्ता अर्थात् अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के नेतृत्व में युद्ध का सहारा लेना पड़ा है। अफगानिस्तान को भी इसी दृष्टि से देखा जा सकता है। हाँ दोनों देशों पर युद्ध थोपने कारण अलग-अलग बताये गये हैं, जो स्वाभाविक हैं और अन्य देशों पर अन्य कारणों से युद्ध थोपा जा सकता है।सच तो यह है बाजार के बरक्स राजसत्ता के कद को घटाना भी एक साम्राज्यवादी वैश्विक रणनीति है, और निजीकरण या उदारीकरण इस रणनीति को लागू करने के व्यवहारिक अस्त्र हैं। इन अस्त्रों के द्वारा साम्राज्यवाद बाजार के बहाने विश्व के राष्ट्रों की अस्मिता समाप्त करते हुये अपने सत्ता को स्थापित करना चाहता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि भूमण्डलीकरण, निजीकरण, उदारीकरण का साम्राज्यवादी सम्प्रभुता को लक्ष्य का वैचरिक निहितार्थ उत्तर आधुनिकनिता विमर्श में निहित है।
मानव सभ्यता के विकास का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है, और वैचारिक संघर्ष इसकी पूर्व शर्त रही है। आदिम कबीलों में युद्धों के पूर्व युद्धोन्मादी विचारों का अस्तित्व अवश्य रहा होगा । रूसी क्रांति सोवियत समाजवाद की स्थापना एवं विश्व समाजवादी रूपरेखा के काल तक विमर्श की दुनिया एक आकार ग्रहण कर रही थी। जहाँ साम्राज्यवादी शोषण के आधार पतनशील चिन्हित हो रहे थे। यूं तो इसके पूर्व से ही मार्क्सवादी चिंतन जो शोषणविहीन, वर्ग विहीन पूर्ण वैज्ञानिक मानववादी चिंतन था, और जिसकी वैचारिक पृष्ठभूमि ने समाजवादी व्यवस्था को जन्म दिया था, के स्थापना काल से ही मानवद्रोही सभ्यता के पोषक चिन्तित हो उठे थे वह मार्क्सवाद को मार्क्कवाद के नाम से विकृत करने का संस्थागत प्रयास कर रहे थे। कई प्रकार के नकली वामपंथी विचार उछाले गये। बूर्जुआ जनतंत्र के कथित मानवीय पक्षों को उजागर किया गया। राजनीति में पूंजीवादी प्रजातंत्र की स्थापना और साहित्य में अस्तित्ववाद का विमर्श 18 वीं शताब्दी का साम्राज्यवादी रणनीतिक प्रयास था, जिसके द्वारा सोवियत समाजवाद से टकराया जा सके।
सोवियत सत्ता जो पूंजीवाद के बाह्य प्रयास से कम अपनी आन्तरिक संरचना की कमियों से अधिक धराशायी हुई है। आज पूंजीवादी विचारकों के हौसले बढ़ चुके हैं। ये कुछ भी कह सकते हैं। यहाँ तक कि ये स्वयं अपनी आलोचना भी करते हैं, क्योंकि विमर्श का पक्ष और विपक्ष दोनों अपने हाथ में रखना चाहते हैं। यह आकस्मिक नहीं है कि ठीक सोवियत पराभव के बाद फूको पामा नामक एक जापानी पालतू विद्धान ने “इतिहास का अन्त और आखिरी आदमी” नामक पुस्तक लिख डाली। इस किताब के बारे में दोश ब्दों में इतना ही कहना चाहूँगी कि यह अपने सुंदर शब्द जाल के द्वारा पूर्ण औद्योगिक समाज की विकृतियों का वर्णन करते हुये भी वर्ग संघर्ष एवं विराट जनता की शक्ति को अनदेखा करती है एवम् एक नियतिवादी आशावाद की स्थापना करती है। कुछ कथित मार्क्सवादी भी पूँजीवादी ऐतिहासिक विकास का इन्तजार करना चाहते हैं। ये सब वैश्विक स्थिति में भूमण्डलीकरण का विरोध एवं सर्वाधिक पिछड़े नेपाल या भारत जैसे देशों के मार्क्सवादी वैचारिक अस्ल परीक्षणों की तात्कालिक सफलता को दृष्टिगत नहीं करते हैं।कुछ विचारक उत्तर आधुनिक विमर्श में नारीवाद पर्यावरण, आधुनिक विज्ञान या टेक्नालाजी की आलोचना या गैरश्वेतवाद के संदर्श में दलित उत्थान या उपनिवेशवाद के साहित्यिक सांस्कृतिक विचारों का खण्डन आदि पढ़ कर इसकी नूतन दृष्टि की सराहना करते हैं। उत्तर आधुनिक विमर्श स्वयं भी अपने सृजन को उदार मानववादी संस्कृति के रूप में प्रस्तुत करता है। इसी तरह कुछ लोग वैश्विक व्यापार में कुछ लोगों का लाभ देखकर अभिभूत हो उठते है। ये लोग यह नहीं सोच पाते कि उपर्युक्त विमर्श देश काल और समय के अनुसार उठने ही थे। तभी मैं कहती हूं कि उत्तर आधुनिक विमर्श के हर पहलू को देखने के बाद ही इसकी भाषायी नियति को समझा जा सकता है।
अन्त में समाजवादी (मार्क्सवादी) व्यवस्था के विरूद्ध साम्राज्यवादी व्यवस्था को वैचारिक एवं कथित नैतिक बैसाखियाँ प्रदान करने वाले उत्तर आधुनिकतावाद मूलतः पश्चिम की उपज है। जो भारतीय साहित्य चिंतन की बुनियादी अवधारणाओं से अलग है। अपने ही तर्कों के द्वारा अपने वैचारिक निर्णयों के विरूद्ध विखण्डन पैदा करने वाले इस विमर्श के विरूद्ध कुछ बुनियादी तर्क उठाये जा सकते हैं। पश्चिम औद्योगिक एवम् विज्ञान, तकनीक या मीडिया की उन्नति के कारण भले अपने को वैश्विक स्थिति में पा रहा हो, हालाँकि इस स्थिति को बनाने में दुनिया भर के अवकसित देशों से होने वाली लूट एक बड़ा कारण है।अविकसित देश खास तौर से भारत अपने बेहद पिछड़े समाजों की बुनियादी समस्यायें जैसे गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वस्थ्य आदि से आक्रांत हैं। इस देशों को अपना आर्थिक उपनिवेश बनाने वाला साम्राज्यवाद (अमेरिका) जिसका वैचारिक सांस्कृतिक अस्त्र उत्तर आधुनिक विमर्श है, का यह दावा है कि उसने आधुनिक स्थितियों से उत्तर आधुनिक स्थितियों में प्रवेश करते हुये, वैचारिक स्तर पर आधुनिकतावाद को पराजित कर दिया है। इस बारे में मैं कहना चाहूँगी कि भारतीय साहित्य की आधुनिकता एवं पश्चिम मार्डनिज्म में एक बुनियादी भेद है। हम भारतीय लेखक आधुनिकता को प्रगतिशीलता के अर्थों में ग्रहण करते हुये पाश्चात्य आधुनिकता के अनुकरण को कभी पसंद नहीं करते हैं। मूर्ख माडर्न युवक (विम्बो) युवतियाँ या पाश्चात्य जीवन शैली मे जीवन यापन करने वाले लोग कभी हमारे आदर्श नहीं रहे । हम अपने अर्थों में अभी आधुनिक भी नहीं हुये हैं । हमारा ग्रामीण समाज आज भी अर्ध सामन्ती जीवन शैली में जी रहा है। अशिक्षा हमारा सबसे बड़ा अभिशाप है। हमें अपने समाज को अपने अर्थों में आधुनिक बनाना है, लिहाजा अभी हमारे भारतीय समाज में उत्तरआधुनिक जीवन या दृष्टि की कोई प्रासंगिकता नहीं है। बल्कि उत्तर आधुनिक आयातित विमर्श, जो साम्राज्यवादी संस्कृति को पिछड़े देशों में फैलाने के साथ-साथ यथास्थिति बनाये रखना चाहता है कि निहितार्थ को हमें समझ लेना चाहिये। अन्यथा हम वैश्विक स्थिति के नाम पर अमेरिका के राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक उपनिवेश बन कर रह जायेंगे। क्या मजाक है कि फासीवादी सांप्रदायिकता जो एक प्रकार की राजनीति है, के सांप्रदायिक, धार्मिक मंदिर-मस्जिद जैसे गैर लोकतांत्रिक मुद्दों को कुछ भारतीय उत्तरआधुनिक के उत्तरआधुनिक विमर्श की संज्ञा दे रहे हैं।
विमर्श के नाम पर हर नये पुराने विचार को विखण्डित करना, और अन्त तक विकल्पहीनता के बोध को बनाये रखना, इसका सीधा अर्थ है कि लक्ष्य कुछ और है या भाषा का निहतार्थ कुछ और है। आज उत्तर आधुनिक विमर्श अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिये, हर भाषा का खिलवाड़ या कार्य-कारण संबंधों से इतर घोर अवैज्ञानिक तर्कों के शब्द जाल सम्प्रेषित कर रहा है। इन वाग्जाल के व्याख्यानों में बहुत कुछ वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न या तर्कसंगत भी हो सकता है। किन्तु इस भाषायी कौशल का अन्तिम निहतार्थ क्या है ? या उत्तर आधुनिक-विमर्श की अंतर्वस्तु को समझ सकते हैं।
अपनी कुछ असमर्थताओं, कमियों या मनुष्य द्वारा दिये गये दोहरे चरित्र के बावजूद आज भी अभिव्यक्ति के लिये भाषा से अधिक समर्थ कोई दूसरा माध्यम नहीं है।शब्दों के भ्रामक अर्थों का विखण्डता तात्कालिक रूप से चौंका तो सकता है, विकल्प नहीं देता । विश्व की किसी भी भाषा का विमर्श अपने निहितार्थ अधिक समय तक गोपनीय नहीं रख सकता है, क्योंकि भाषा मानव समाज के क्रियाकलाप, व्यवहार से जुड़े हुये ज्ञान को सम्प्रेषित करती है।
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