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विद्यानिवास जी को याद करते हुए -मृदुला सिन्हा
नई दिल्ली स्थित 32, राजेंद्र प्रसाद रोड। राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत राज्य सभा सदस्य डॉ. विद्यानिवास मिश्र का आवास । पहले कमरे में ही बैठे थे पंडितजी। दूरभाष की घंटी बजी। उन्होंने ही उठाया। “बाबूजी ! 17 फरवरी को मैं दिल्ली आ रही हूँ। आपका दर्शन हो सकेगा क्या ?” “हाँ-हाँ ! मैं दिल्ली में ही रहूँगा, आ जाओ । पर पहले मार्च अंक (साहित्य अमृत) में छपने के लिए अपनी एक कहानी अवश्य भेजो।” “हाँ-हाँ मैं कहानी अवश्य भेज दूँगी। आपकी आज्ञा की अवहेलना कभी की है क्या ?” दूरभाष पर एक-दूसरे को विश्वास दिलाया गया। पर पंडितजी ने विश्वास नहीं निभाया । दिल्ली नहीं पहुँचे वे। क्रूर नियति ने उनके प्राण हरने के लिए 14 फरवरी की तारीख ही निश्चित की थी । देवरिया से वाराणसी आते हुए रास्ते में ही पार्थिव शरीर को क्षत-विक्षत करके छोड़ दिया। आत्मा का अंतिम प्रयाण हुआ। दो महीने भी तो नहीं बीते थे, जब सहधर्मिणी राधिका देवी का अंतिम संस्कार वाराणसी में किया था। उनकी पत्नी की मृत्यु की खबर सुनकर जो जहाँ था, राधिका देवी के लिए कम, पंडितजी के लिए अधिक रो रहा था- “अकेले हो गए पंडितजी।” आपस में पंडितजी के प्रति संवेदना का आदान-प्रदान करते हुए उनके आत्मीय यह भी कहते सुने गए, “अब पंडितजी भी ज्यादा दिन नहीं रुकेंगे।”
मात्र उनकी आयु और उनके स्वास्थ्य को देखकर यह अनुमान नहीं था । पत्नी पर पंडितजी की निर्भरता देखे-सुने लोग ही यह आशंका व्यक्त कर रहे थे । डेढ महीने में पंडितजी सँभल गए थे। अपने को सँभालने का वही पुराना तरीका - घूमते रहो, घूमते रहो। चरैवेति का संकल्प। कुमुद शर्मा( संयुक्त संपादक, साहित्य अमृत) मेरे अति व्यस्त प्रवास की जानकारी सुनकर कहती थीं, ‘बाबूजी और आप, दोनों के पाँवों में चक्र है। आप लोग कितनी घूमते हैं। थकते नहीं।’
पंडितजी का अस्वस्थ शरीर भी नहीं थकता था। 14 फरवरी के प्रवास में भी पंडितजी थके नहीं थे । यही तो रोना है । पिछले साल वाराणसी और फिर दिल्ली के आयुर्विज्ञान संस्थान में भरती होकर रीढ़ की हड्डी के असह्य दर्द को सहते रहे । कहते थे, “अब दर्द मेरा जीवन साथी हो गया ।” जाना ही था तो किसी बीमारी के कारण जाते । यह हादसे की मौत तो अपनों को दुगुना दर्द दे जाती है । देखते-देखते आँखों के आगे से उस काया का बिला जाना पीड़ादायी है ही । पर इस प्रकार बोलते-बोलते अबोल हो जाना कम दुःखदायी नहीं है। कठोरतम कलेजे को भी पिघला देता है। ‘वासांसि जीर्णानि तथा विहय....’ के ज्ञान-प्रवाह को अवरुद्ध कर देती है ऐसी मौत।
दिल्ली के अलावा पटना, लखनऊ, मेरठ, मुजफ्फरपुर और हैदराबाद से दूरभाष पर संवेदना के स्वर मेरे कानों तक पहुँचते रहे। आखिर फोन करके पंडितजी के निकटतम स्त्री-पुरुष मुझे ही क्यों सांत्वना दे रहे थे। सत्य तो यह है कि हम आपस में अपना दुःख बाँट रहे थे। दुःख बाँटने से हलका होता है। हर मनुष्य अपनी जिंदगी में संबंध बनाता है - कोई कम कोई ज्यादा । पर ऐसे बिरले ही होते हैं जिनसे मिलते समय हर व्यक्ति यह महसूस करता है कि वही उनका खासम-खास है।
पंडितजी एक साहित्यकार, मनीषी, चिंतक, विचारक, भाषाविद् और भारतीय संस्कृति के टीकाकार, व्याख्याता व संवाहक ही नहीं साहित्यिक नेता भी थे। साहित्य क्षेत्र में पदार्पण करनेवालों को नेतृत्व प्रदान कर उन्हें दिशा देनेवाले नेता की भी आवश्यकता होती है । स्वयं साहित्यकार होना और बात है, साहित्य और साहित्यकार को दिशा देना और बात । वे नवोदित लेखक और पत्रकारों के भी संबल थे । बात करते वक्त वे न जाने कितने दिवंगत वरिष्ठ साहित्यकारों, राजनेताओं और देश निर्माताओं के संस्मरण सुना जाते । शास्त्रीय ज्ञान के व्यवहारिक रुप, लोक-साहित्य में ढूँढ़ते रहने की उनकी विशेषता अतुलनीय व अनोखी थी । वर्तमान में वैदिक और लौकिक जीवन के रंगों को मिलाकर मनमोहक साहित्य रचनेवाला कोई साहित्यकार नहीं बचा ।
‘साहित्य अमृत’ में उनका संपादकीय एक साँस में नहीं पढ़ा जा सकता था। धीरे-धीरे रसास्वादन करते हुए ही सब कोई पढ़ते थे। सहज, सरल, सुमधुर और सारगर्भित भाषा में पंडितजी कितनी बड़ी-बड़ी बातें कह जाते थे। अपना हर संपादकीय लिखते समय वे सामाजिक, राजनीतिक और साहित्य जगत् के सामयिक विषयों को उठाते, अपने दार्शनिक अंदाज में उसे शाश्वत मूल्यों से जोड़ जाते थे। साहित्य का एक उद्देश्य - ‘कांता सम्मति उपदेश विघे’ को जीवंत बनाते हुए पंडितजी मीठे स्वर में बड़ी बातें कह जाते थे। संपादकीय पढ़ा नहीं, मानो सुना जा रहा हो। एक-एक शब्द मुखर हो उठता था। इसलिए सरल भाषा होते हुए भी पाठकों द्वारा बार-बार पढ़ा जाता था –हर संपादकीय। पाठक आपस में चर्चा करते नहीं थकते थे। जीवन के हर क्षेत्र में आ रही मूल्यहीनता के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए पंडितजी पाठकों को निदान भी बताते थे। साहित्य, राजनीति, शिक्षा, कला-जीवन के सभी क्षेत्रों मे पंडितजी, शुचिता लाने के आग्रही थे। इसलिए शास्त्र–पुराणों के साथ लोग-जीवन में भी बची हुई शुचिता ढूँढ़कर संपादकीय पृष्ठ को सजा देते थे।भारतीय जीवन-धारा में प्रभावित संबंधों के पारखी पंडितजी स्त्री-पुरुष, हिंदु-मुसलिम, सिक्ख-ईसाई, गाँव-शहर, राजा-प्रजा सभी संबंधों के ताने-बाने खोलते-बुनते रहते थे। इस संबंधों के बीच बढ़ रहे अंतराल के विरोधी थे । इनके बीच सहचर और पूरकता के सिद्धांत व व्यवहार के पोषक थे।
मैं अकसर अपने को सौभाग्यशाली अनुभव करती थी। पंडितजी के विशेष स्नेह की भागीदार समझती थी। पर मेरी तरह अनेक हैं। उन भाग्यशालियों के संस्मरण सुनकर इस माने में अपना सौभाग्य तो पानी भरता दिखता है। जीवन के किसी क्षेत्र में नेता ऐसे ही बना जाता है। राजनीति, साहित्य और समाज को एक–दूसरे के पूरक मानते थे पंडितजी, प्रतिद्वंद्वी नहीं । इसलिए उनकी लेखनी से निःसृत साहित्य में इतिहास से लिया चिंतन था, वर्तमान की चिंता, भविष्य के प्रति चेतावनी भी । भूत की वीथियों में घूमती उनकी लेखनी वर्तमान के सत्य को आँखों से ओझल नहीं होने देती थी। और उस सत्य के साक्षात्कार में वे भविष्य की राह तलाशना नहीं भूलते थे। राह गढ़ते थे। ऐसे दिशा-द्रष्टा ने राह में ही चलते-चलते विराम क्यों लिया । अल्प विराम होता तो चलता, उन्होंने तो पूर्ण विराम ले लिया इसीलिए तो हृदय विदीर्ण हुआ जा रहा है। उनका जाना उनके परिवार की नहीं, समाज की क्षति है।
तीन वर्ष पूर्व जयपुर में ‘साहित्य में महिलाएँ’ विषय पर सम्मेलन रखा था। ‘नारी सशक्तीकरण पर्व’ मनाया जा रहा था। श्रीमती सुषमा स्वराज, तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री उद्घाटन के लिए जाने वाली थीं। आखिरी वक्त पर उनका फोन आ गया- ‘मैं नहीं जा सकूँगी। मुझे पाकिस्तान के राष्ट्रपति के आगमन पर आगरा में रहना है।’ अब क्या होगा ? प्रश्न तो उभरा। पर साथ ही संकट से उबारने के लिए पंडितजी की आकृति भी सामने आ गई। साहित्य और महिला, महिला साहित्यकार, साहित्य में महिला, चाहे जितने विषय बनते हों, पंडितजी नारी के भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे में बोलने के अधिकारी थे। इस विषय में उनका चिंतन अनोखा है।
वे नारी के विकास के लिए ‘पुरानी नींव, नया निर्माण’ के प्रवक्ता थे। वे बनारस में थे । मैंने हिम्मत जुटाकर दुरभाष पर जयपुर चलने की प्रार्थना की । मेरी अपेक्षा के विपरीत तुरंत तैयार हो गए। इतना तो उन्हें भी अंदाज रहा होगा कि अंत समय में किसी और के स्थान पर उन्हें मैंने बुलाया था। पर न मैंने बताया, न मुझसे यह पूछकर ‘किसका स्टेपनी बना रही हो’ मुझे शर्मिंदगी का दंश भोगने के लिए उन्होंने मजबूर किया। चल पढ़े मेरे साथ जयपुर । मेरे आग्रह को कितना बड़ा सम्मान मिला। उनके साहित्य में अंकित नारी के प्रति सम्मान का व्यावहारिक रूप । रास्ते में अनेक प्रसंग सुनाए। मेरे सामने पचास वर्ष पूर्व हिन्दी, साहित्य सत्ता और समाज के जीवंत रूप उपस्थित हो गए। उनके प्रसंग वर्णन में रोचकता होती थी। बस, सुनते जाइए, सुनते जाइए। पाँच घंटे की यात्रा में बोझिलता ने स्पर्श तक नही किया । इतिहास-पुरुष थे, कथावाचक भी।
मैंने समय का फायदा उठाना चाहा । मेरा उपन्यास प्रेस में था। उपयुक्त नाम नहीं जँच रहा था। मैंने कथानक सुनाकर पूछा, “क्या नाम रखूँ ?” बहुत देर तक चुप रहे । मैंने सोचा, शायद मेरा आग्रह उन्होंने सुना नहीं। पर थोड़ी देर में ही बोले, “ ‘अतिशय’ नाम रखो। जीवन की अतिशयता को ही उकेरा है तुमने । अतिशयता का परिणाम दिखते हुए पाठक को आगाह भी किया है। हमारी संस्कृति में जीवन के किसी क्षेत्र में अतिशयता वर्जित है।”
नाम मुझे भी जँच गया ‘अतिशय’। मेरी श्रेणी के बहुत उभरते और स्थापित साहित्यकार हैं जो उनसे अपनी ऐसी उलझनें सुलझवा लेते रहे हैं। हमारे सभी प्रश्नों के जवाब थे उनके पास । चिंतक जो थे। जीवन को समग्रता में देखने के आग्रही थे।
वे अपने आत्मीय लोगों के आग्रह की अवहेलना नहीं कर पाते थे । इसलिए घूमते ही रहते थे। चलते-फिरते इन्साइक्लोपीडिया थे। कई विषयों के डिक्शनरी - मेरे जैसे बहुत से लोग जिसके पन्ने पलटते रहते थे। खान-पान रहन-सहन, वेशभूषा में पारंपरिक पंडितजी के विचार अधुनातन थे। पश्चात्य दर्शन और साहित्य के भी ज्ञाता थे। भारतीय दर्शन और जीवन-शैली के विशेषज्ञ पंडितजी पाश्चात्य दर्शन और साहित्य को नकारते थे। पर उन विचारों को अपनी मिट्टी, पानी और आवोहवा के अनुकूल बीज नहीं मानते थे। स्त्री-पुरुष संबंध और स्त्री संबंधितत उनके विचार अनुकरणीय थे और रहेंगे । अपने अंतिम संपादकीय मे उन्होंने अपनी सहचरी के बिना जीवन अधूरा तो माना ही, वर्तमान समय में दांपत्य जीवन के बारे में उठते प्रश्नों के जवाब भी चलते-चलते दे गए।
उन्होंने लिखा- ‘देश-विदेश में जहाँ गया वहाँ उन्होंने आत्मीयता का ऐसा विस्तार किया कि मुझे स्मरण है, उन स्थानों से आते समय हवाई अड्डों पर गाँव से कन्या की विदाई जैसा विचित्र हाहाकारी दृश्य उपस्थित हो जाता था । मनुष्य का सहज धर्म है अपने को बाँटते रहना । इस धर्म का संस्कार उन्होंने कहाँ से पा लिया था, राम जाने, पर उनके साथ रहते हुए मैंने अनुभव किया कि असली सुख बाँटने में है, सँजोकर रखने में नहीं है ।’
उन्होंने ‘नदी, नारी और संस्कृति’ लेख में नारी जीवन की तुलना नदी से की है-“जिस प्रकार नदी निरंतर बहती रही है और ऊँचाइयों के मोह को छोड़कर बहुत निचली ढलान की ओर बहती है, उसी प्रकार माँ धीरे-धीरे अपने पिता, अपने पति से संतान की ओर अधिक अभिमुख होती हुई उसी के सुख के लिए जीती है। इसी में नारी अपनी पूर्ण सार्थकता पाती है।”
नारी-जीवन को संस्कृति के साथ बैठाकर डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने कहा, “भारतीय संस्कृति अतीत की ओर नहीं देखती, वह वर्तमान और भविष्य की ओर देखती है। लड़की अपने पिता के घर अपेने छोटे बहन- भाइयों को दुलारती है, देखती है। ससुराल जाकर देवर व ननद पर न्योछावर होती है। फिर अपने बच्चों और तदंतर अपने बच्चों को देखती है।”
नारी-जीवन भी संस्कृति की तरह ही है। उनका कहना है- “भारतीय संस्कृति नए-नए अवतरण की, नए-नए जन्म की, प्रत्येक उत्सव में नए होने की कामना की संस्कृति है। इस अर्थ में नदी, नारी और संस्कृति तीनों एक-दूसरे में ओत-प्रोत हैं। इसीलिए भारत के बारे में समग्र आवधारणा बिना इन तोनों के जुड़ाव के संभव नहीं है।”
सबके लिए सहज और सरल थे पंडितजी । मेरे साथ साली का रिश्ता था, इसलिए मैं कभी-कभी मनोविनोद कर लिया करती थी। मुसकराने लगते थे । चेहरा सुर्ख हो जाता था। लोक-शैली में जीजा-साली के संबंध समझकर प्रसन्न होते थे। ज्ञान के साथ सरलता भी थी, हृदय में ममता भी, गुरु जैसी वत्सलता भी । इसलिए एक बार जो मिलता था, उनसे बिछुड़ता नहीं था। अकसर उस श्रेणी के व्यक्तित्व से मिलकर लोग अपने को छोटा महसूस करते हैं; पर पंडितजी अपने सम्मुख बैठे अल्पज्ञानियों में भी कोई विशेषता ढूँढ़कर उसके सामने रख देते थे। बड़े मानुष से मिलनेवाले व्यक्ति को ही अपनी नज़र में बड़ा बनाकर भेज देते थे । वे अपनी दादी और पत्नी से बहुत प्रभावित थे । उनका कहना था, “दादी, नानी और पत्नी से मैंने बहुत से अज्ञात रहस्यों का अर्थ पाया है, जो लोक के गर्भ में छुपे हुए हैं। मेरा किताबी ज्ञान उस अपरिचित वाचिक स्रोत के किनारे बराबर अपने को छोटा पाता रहा है।”
वे मकड़े की तरह मात्र अपने अंदर से जाला नहीं बुनते थे। मधुमक्खी की भूमिका में थे - घूमना और संचय करना। यायावर बनकर समाज की विभिन्न क्यारियों से पराग एकत्रित करते रहते थे। इसीलिए उनका साहित्य समाज के स्वास्थ्य के लिए हमेशा मधु कार्य करता रहेगा।
समाज, राजनीति, साहित्य और साहित्यकारों के लिए उनका जाना एक बड़ी क्षति है। आपके साथ मेरी भी व्यक्तिगत क्षति हुई है। मानो साहित्य में बढ़ावा देनेवाला, मेरे साहित्य के गुण-अवगुण बतानेवाला कोई आत्मीय कुछ बताते-बताते अंतर्धान हो गया हो। उठने और सँभलने में समय लगेगा । पर पंडितजी अब नहीं मिलेंगे । जितना दिया है उतना ही क्या कम है। उससे ही संतोष करना पड़ेगा समाज, साहित्य,राजनीति और हम सबको भी। o मृदुला सिन्हा पी.टी. 62/20,कालोकाजी, नई दिल्ली-1100019
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