रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 11, अप्रेल, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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पुस्तकायन

प्रकृति और मानव के पारस्परिक संबंधों के पक्ष में

- संदीप राशिनकर

यह पूछना अप्रासंगिक है कि ईश्वर ने प्रकृति का निर्माण पहले किया या मानव का! पर यह तय है कि उसने इन दोनों शक्तियों को मात्र सहोदर के रूप में ही नहीं वरन्‌ आदर्श संतुलन की दृष्टि से सृजा है। उसे अपेक्षित था कि सृष्टि के ये दोनों घटक परस्पर अनुराग व सहयोग से उसकी कृति 'सृष्टि' को सर्वश्रेष्ठ और अतुलनीय बनाएँगे। सृष्टि निर्माण के वक्त उसकी इसी मान्यताओं के अनुरूप प्रकृति और मानव ने संपूर्ण सौहार्द एवं संवेदनाओं के परस्पर अनुबंध से यह यात्रा शुरू की।

      मानव ने अपनी सहोदर प्रकृति से अनुशासन, नियमन, जिजीविषा, सौंदर्य, स्नेह, सदाशयता जैसे अनगिनत गुणों को आत्मसात करते हुए प्रकृति के कंधे से कंधा मिलाकर उससे हमकदम होते हुए मानवता की स्वर्णिम यात्रा का आगाज किया। नियति में लिखित प्रारब्ध से साक्षात होने के लिए वह प्रकृति का हरसंभव सहयोग लेते हुए अपनी विकास यात्रा पर अग्रसर होता गया। बढ़ते समय के साथ मानव न सिर्फ स्वार्थी होता गया वरन्‌ अपनी सहचर प्रकृति से भी विमुख होते हुए विनाश काले विपरीत बुद्धि को चरितार्थ करता चला गया।

      प्रकृति से मानव के विलगाव की इसी आत्मघाती यात्रा की दिशाहीनता पर उँगली रखती हुई कृति है मॉरीशस निवासी अभिमन्यु अनत की 'अपना मन उपवन।'

      अपने इस उपन्यास में लेखक ने न सिर्फ मॉरीशस की प्राकृतिक छटाओं के इंद्रधनुषी रंग बिखेरे हैं वरन्‌ रामचरण के प्रमुख पात्र के सृजन से मन की हरीतिमा का भी सजीव चित्रण किया है। नियति की क्रूर घटनाओं की पृष्ठभूमि में क्षत-विक्षत हुई मानसिकता के बावजूद रामचरण द्वारा अपने मन की हरीतिमा को जीवित रखने की जिजीविषा पर्णहीन हुए पेड़ों के फिर पल्लवित होने की याद दिलाती है। पर्यावरण के गंभीर प्रदूषण से उपजी विभीषिकाओं की भयावहता को गंभीरता से आँकती इस कथा में प्रकृति से अनुराग की मार्मिक अपील बड़ी शिद्धत से सुनाई देती है।

      प्रकृति पर मानव द्वारा आरोपित तमाम आपदाओं/चिंताओं के बावजूद सहोदर बने रहने की उसकी प्रामाणिक जिजीविषा के विराट दर्शन जहाँ इस कृति में किए जा सकते हैं, वहीं मानवोचित सद्गुणों की अनुगूँज इस कृति में लोकगीतों, मान्यताओं, परंपराओं की साक्षी बन कर उभरती है।

 

प्रकृति पर थोपे अनाचारों के बावजूद उसमें निहित सदाशयता के दर्शन जहाँ अंतरनिहित कथा के पात्रों रामचरण, नमिता, निशा आदि में दृष्टिगोचर होते हैं, वहीं आत्मघाती आततायियों के अक्स अरविंद, शालिनी, विपिन जैसे पात्रों में तीव्रता से उभरकर घृणा पैदा करते हैं।

लेखक ने रामचरण के रूप में एक ऐसे सशक्त पात्र का सृजन किया है, जो अपनी माँ से मिले संस्कारों और हो न सकने वाली पत्नी के प्राकृतिक अनुराग को अपने उर्वरित आयुष्य में न सिर्फ शिद्धत से जीता है, बल्कि परिवेश के पात्रों में भी अपनी कर्मठता तथा समर्पण की निर्मलता को प्रवाहित करता है। प्रकृति के प्रति अपने असीम अनुराग को पुष्पित/पल्लवित करते हुए पूरी कृति में यह एक सशक्त प्राकृतिक प्रवक्ता की प्रखर भूमिका अदा करता है।

अपनी समृद्ध फुलवारी के साथ-साथ धर्मा और निशा की संतानवत परिवरिश करता रामचरण न सिर्फ आने वाली पीढ़ी की मानसिकता को प्रकृति से समरसता का पाठ पढ़ाता है वरन्‌ उनमें मानवीयता को पल्लवित करते हुए उनमें सहजता, सदाशयता प्रेम के अद्भुत शाश्वत मूल्यों को प्रत्यारोपित करता है।

लगभग साढ़े तीन सौ पृष्ठों के इस उपन्यास से गुजरना प्रकृति और मानव के शाश्वत अंतर्संबंधों की सुरभित फुलवारी से गुजरने का एहसास देता है। प्रकृति और मानव के पारस्परिक संबंधों के शाश्वत सरोकारों से प्रेरित यह चिंतनपरक कृति निश्चित ही मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने में सफल सिद्ध होती है। पुस्तक का आवरण आकर्षक और छपाई सुरुचिपूर्ण है।
 


n       समीक्षक: संदीप राशिनकर

n       पुस्तक:अपना मन उपवन

n       लेखक: अभिमन्यु अनत

n       प्रकाशक: सामयिक प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली

n       मूल्यः 300 रुपए


 

oसंदीप राशिनकर

11, बी, राजेन्द्र नगर,

इंदौर - 12, मध्यप्रदेश

  

 

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