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प्रकृति और मानव के पारस्परिक संबंधों के पक्ष में - संदीप राशिनकर
यह पूछना अप्रासंगिक
है कि ईश्वर ने प्रकृति का निर्माण पहले किया या मानव का!
पर यह तय है कि उसने इन
दोनों शक्तियों को मात्र सहोदर के रूप में ही नहीं वरन्
आदर्श संतुलन की दृष्टि से
सृजा है। उसे अपेक्षित था कि सृष्टि के ये दोनों घटक
परस्पर अनुराग व सहयोग से उसकी
कृति
'सृष्टि'
को सर्वश्रेष्ठ और अतुलनीय बनाएँगे। सृष्टि निर्माण के
वक्त उसकी इसी
मान्यताओं के अनुरूप प्रकृति और मानव ने संपूर्ण सौहार्द
एवं संवेदनाओं के परस्पर
अनुबंध से यह यात्रा शुरू की।
प्रकृति पर
थोपे अनाचारों के बावजूद उसमें निहित सदाशयता के दर्शन
जहाँ अंतरनिहित कथा के
पात्रों रामचरण,
नमिता,
निशा आदि में दृष्टिगोचर होते हैं,
वहीं आत्मघाती आततायियों
के अक्स अरविंद,
शालिनी,
विपिन जैसे पात्रों में तीव्रता से उभरकर घृणा पैदा करते
हैं।
n समीक्षक: संदीप राशिनकर n पुस्तक:अपना मन उपवन n लेखक: अभिमन्यु अनत n प्रकाशक: सामयिक प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली n मूल्यः 300 रुपए
oसंदीप राशिनकर 11, बी, राजेन्द्र नगर, इंदौर - 12, मध्यप्रदेश
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