रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 11, अप्रेल, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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पुस्तकायन

 जलाशय की गहराई और हिमालय की ऊँचाई भी 

- गौतम पटेल

       वेदव्यास जी की वाणी को श्रीगणेश जी ने लिपिबद्ध किया है कि महाभारत के कुल श्लोक संख्या एक लाख दो सौ सत्रह में से आठ हजार आठ सौ श्लोक ऐसे हैं जिनका अर्थ मैं समझता हूँ, शुकदेव मुनि समझते हैं; संजय समझते हैं या नहीं इसमें संदेह है। सर्वोत्कृष्ट टीकाकार भल्लिनाथ जी ने स्वयं लिखा है कि कालिदास जी की वाणी के सारतत्त्वों को मात्र तीन व्यक्ति ने समझा है।  एक तो विधाता ब्रह्मा ने दूसरे वाग्देवी सरस्वती ने और तीसरे स्वयं कालिदास जी ने। मेरे समान अल्पज्ञ उनको ठीक-ठीक समझने में सर्वदा असमर्थ है। महाकवि भवभूति लिखते हैं कि संसार से निराले उन महापुरुषों के मन को कौन जान सकता है, जो वज्र से अधिक कठोर और फूल से भी अधिक कोमल होते हैं। यद्यपि महाकवि जौक ने क्या खूब कहा है कि

 हम जानते थे कि इल्म से कुछ जानेंगे,

जाना तो यह जाना कि न जाना कुछ भी।,

 

तथापि यह तो केवल भावाभिव्यक्ति है । विद्या, बुद्धि विवेक और ज्ञान विज्ञान के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना है। यदि हम भी ऐसा कुछ लिख दें तो यह विद्वान छायावादी कवि के प्रति  संभवतः अन्याय होगा।

 

     अनंत यात्रा नामक काव्य संग्रह,मूल्य-100रुपये, रहस्यवादी कविता संकलन है । संजय के इस संचय में जलाशय की गहराई भी है और हिमालय की ऊँचाई भी। इसमें गीता का ज्ञान भी है और नमक की खान भी। आधुनिक विज्ञान भी है और महासमर भी। इतिहास भी है और एहसास भी। समर्पण भी है और मन दर्पण भी। आमंत्रण भी है और मृत्यु नहीं मेरा अन्त भी है और मेरी यात्रा अनन्त भी ।

 

       इस कवि की संकल्पना में नेपोलियन का शब्दकोष विराजमान है, जिसमें केवल सम्भव ही सम्भव है और सम्भव के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। असम्भव नामक शब्द केवल मूर्खों के शब्द कोष में ही विद्यामान रहा है और रहेगा; अन्यत्र कहीं बिल्कुल नहीं, बिल्कुल नहीं । इस कवि के कवित्व मैं करो या मरो संग अंग्रेजी भारत छोड़ो प्रसंग का ओज भी है और भारत के सपूतों की ओजस्विता भी। किसी ने क्या खूब कहा है कि

 

गिरते हैं घूड़सवार ही मैदाने जंग मै,

 वे क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

 

       कवि की इस कृतित्व ने इस दृढ़ता पूर्वक साहस की बुलंदी को छुआ है। जापानी पतन और उत्थान को, धरातलीय तूफान और आसमानी उड़ान को, महासमरीय संधान और ब्रह्मण्डीय विधान को क्या खूब संजोया है इस संजय ने। जापानी नागरिकों की कर्मशील विलक्षणता और कुरुक्षेत्र की कर्त्तव्य परायणता को को बखूबी जोड़ा है इस कवि कुल महासमर के योद्धा ने । कवि की इस कृति में प्रस्तुत मानवीय संवेदनाओं को, रहस्यवाद की गहराईयों को, आदर्शवाद की ऊँचाइयों को और अध्यात्मिक मान्यताओं नेती-नेती अर्थात् इतना ही नहीं, इतना ही नहीं, भरण जीवन का अंत नहीं पुनर्जन्म का प्रारम्भ है। दूसरे शब्दों में कल, आज और कल की भाँति पुनर्जन्म,पनर्मरण और पुनर्जन्म नामक कालाचक्र को शत नमन । संग्रह निश्चित ही पठनीय है । कवि को साधुवाद कि वह कम उम्र में भारतीय दर्शन के मूल को आत्मसात करने में अग्रगामिता का परिचय देता है ।

 


n       समीक्षक: गौतम पटेल

n       पुस्तक:अनंत यात्रा

n       लेखक: संजय

n       प्रकाशक: प्रकाशन संस्थान,4715/91दरियागंज नयी दिल्ली

n       मूल्यः 100 रुपए

n       पृष्ठः


 

oगौतम पटेल

डी-37 पेंशनबाड़ा, रायपुर (छ.ग.)

  

 

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