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-इस बार के लघुकथाकार- असगर वजाहत।अयोध्याप्रसाद गोयलीय।डॉ. उषा माहेश्वरी।डॉ. बालेन्दुशेखर तिवारी।अनिल जनविजय।रामेश्वर काम्बोज।अशोक कुमार खन्ना।सत्य शुचि।जसवीर सिंह चावला।सिमर सदोष। आजाद रामपुरी
-असगर वजाहत जैसा कि अक्सर होता है यानी राजा जालिम था । वह जनता पर बड़ा अन्याय करता था और जनता अन्याय सहती थी, क्योंकि जनता को न्याय के बारे में कुछ नहीं मालूम था ।
राजा को ऐसे सिपाही रखने का शौक था जो बेहद वफ़ादार हों । बेहद वफ़ादार सिपाही रखने का शौक उन्हीं को होता है, जो बुनियादी तौर पर जालिम और क़मीने होते हैं । और राजा को हमेशा ये डर लगा रहता था कि उसके सिपाही वफ़ादार नहीं है और वह अपने सिपाहियों की वफादारी का लगातार इम्तिहान लिया करता था ।
एक दिन उसने अपने एक सिपाही से कहा कि अपना एक हाथ काट डालो । सिपाही ने हाथ काट डाला । राजा बड़ा खुश हुआ और उसे वीरता का बहुत बड़ा इनाम दिया ।
फिर एक दिन उसने एक दूसरे सिपाही से कहा कि अपनी टाँग काट डालो । सिपाही ने ऐसा ही किया और वीरता दिखाने का इनाम पाया । इसी तरह राजा अपने सिपाहियों के अंग कटवा-कटवाकर उन्हें वीरता के इनाम देता रहा ।
एक दिन राजा ने देश के सबसे वीर सैनिक से कहा कि तुम वास्तव में कोई ऐसा बहादुरी का काम करो, जिसे कोई न कर सकता हो । वीर सैनिक ने तलवार निकाली, आगे बढ़ा और राजा का सिर उड़ा दिया ।
- अयोध्याप्रसाद गोयलीय एक घोड़ा सरोवर के किनारे जल पीने जाया करता था । उस सरोवर के किनारे रहने वाली मेढकी को घोडे के खुर में लगी हुई नाल बहुत भायी । घोड़ा जब भी पानी पीने आता, मेढकी उसकी नाल और चाल को ललचायी नज़रों से देखती रहती । नाल की चमकने और खट-खट की पगध्वनि ने उसे बहुत आकर्षित किया । धीरे-धीरे उसका विश्वास हो गया कि नाल की बदौलत ही घोड़ा इतनी अच्छी चाल चलता है । अतः एक दिन उसने साहस बटोरकर पूछा - "घोड़े भाई यह नाल तुमने कहाँ लगवाई ?" घोड़े ने आश्चर्यचकित होकर मेढ़की की तरफ देखा और उपेक्षा भरे स्वर में कहा - "बी मेढकी, यह तुम किसलिए पूछ रही हो ?" बी मेढकी पुलककर बोली - "मैं भी इसी तरह की नाल लगवाना चाहती हूँ ।" घोड़ा मेढकी की इस मूर्खता पर और उसके नन्हें से वजूद की तरफ हैरत से देखता रह गया । उसने कौतुहलवश पूछा -"तुम नाल कहाँ लगवाओगी ?"
मेढकी तिनककर बोली, "यह भी तुमने अजीब सवाल किया ? तुम्हें दिखाई नहीं देता कि मेरे पाँव इतने कोमल हैं कि घास पर चलते हुए भी छिलते हैं । सोचती हूँ कि मैं भी नाल जड़वा लूँ तो तुम्हीर तरह दुलकी चला करूँ ।" मेढ़की की इस शेखी से चिढ़कर घोड़े ने उस पर पाँव रख दिया तो मेढकी एक चीं की आवाज़ के साथ नाल के अंदर ही विलीन हो गई ।
-डॉ. उषा माहेश्वरी "ओह मम्मी ! इतनी सारी चीटियाँ ।" नीलू जोर से चिल्लायी । नीलू की मम्मी दौड़कर आयी । उसके हाथ से मिठाई का पुड़ा छीनकर ज़मीन पर पटक दिया । चीटियाँ इधर-उधर दौड़ने लगीं ।
मम्मी ने कहा - "अब इसे खाना नहीं बेटी, तुम्हें नई मगाँ देंगे । यह कमली की मुन्नी को दे देंगे ।" "नहीं मम्मी, मैं खाऊँगी ।" "नहीं बेटी, बीमार पड़ जायेगी । " "कमली की मुन्नी बीमार नहीं पड़ेगी, मम्मी ।" "अब ज्यादा सिर मत खा । कहा न, तुझे नई ला देंगे ।" " पहले बताओ न मम्मी, मुन्नी बीमार नहीं पड़गी, क्यों?" "चल भाग, खेल अब, नहीं तो मारूँगी ।"
और नीलू सहमकर भाग गयी ।
-डॉ. बालेन्दुशेखर तिवारी भरी सभा में नेताजी ने मंच से घोषणा की और श्रोतामंडली ने झूम-झूमकर तालियाँ बजायीं । नेताजी ने कहा कि अब वे अपने नाम के साथ जातिसूचक शब्द का उपयोग नहीं करेंगे । घोर जातिवाद की गंध आती है इस संबोधन में । अब वे सिर्फ रामसंजीवन रह गये हैं । तमाम पत्रकारों और लोगों से निवेदन है कि कोई अब उन्हें रामसंजीवन उपाध्याय न पुकारें । अब वे केवल रामसंजीवन हैं, राम संजीवन ।
मंच से उतरते ही नेताजी को चंद नए-पुराने लोगों ने घेर लिया और यह लोकर सवाल किया - "हे प्रभू, अब हम लोगों का क्या होगा ?" आप तो संबोधन तक छोड़ रहे हैं ।"
नेताजी ने फरमाया, "वे तो मंच की बात थीं प्यारे ।जातिसूचक संबोधन लगाने और छोड़ने से क्या फर्क पड़ता है? अपनी बिरादरी का ध्यान रखना तो हमारा पहला और आखिरी धर्म है ।"
-अनिल जनविजय रेल के डिब्बे में एक अंधा भिखारी चढ़ आया था । वह गाकर भीख माँगता था । कुल चार गाने उसने गाये । पहले में हिन्दू देवी-देवताओं से दया की प्रार्थना की थी तो दूसरे में खुदा और मक्का-मदीना का गुणगान । तीसरे में गुरू गोविंद सिंह की कृपा का अनुरोध था तो चौंथे में प्रभू इशु से शांति की प्रार्थना ।
जब वह चारों गीत गा चुका और लोगों से पैसे इकट्ठे करते हुए मेरे पास आया तो मैंने पूछा - "सूरदास, किस जाति के हो ? कौन से धर्म को मानते हो ?"
उसका उत्तर था - "बाबूजी, हमारे लिए तो हिंदु, मुस्लिम, सिख, इसाई सभी बराबर हैं । सभी दाता हैं । इसलिए बाबूजी, हम तो धर्मनिरपेक्ष हैं ।"
- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' मंदिर के प्रांगण में जागरण का कार्यक्रम था । औरत-मर्द, बच्चों को मिलाकर दो सौ की भीड़ । शहर के दूसरे छोर तक लाउडस्पीकर बिजूखे की तरह टँगे थे । गायक की तीखी आवाज़ से सिर भन्ना गया था ।
वह एकदम बाहरी सड़क पर निकल आया । सूखे ठूँठ के पास कोई बैठा था । ‘कौन’ उसने पूछा । ‘मै भगवान हूँ ।’ मरियल-सी आवाज़ आई । ‘भगवान का इस ठूँठ के पास क्या काम’ उसे तो किसी मंदिर में होना चाहिए । ‘मैं अब तक वहीं था,’ आकृति ने दुःखी स्वर में बताया- ‘शोर के कारण कुछ तबियत गड़बड़ हो गई थी । इसीलिए यहाँ भाग आया हूँ ।’
- अशोक कुमार खन्ना मैं आपको एक कहानी सुनाता हूं-एक आदमी ता, जनकी जिंदगी में कभी गम आते तो कभी खुशियां । गर्मी के वक्त भी वह स्वयं को इतना संतुलिक कर लो कि तनाव से छूटकर थोड़ी खुशी प्राप्त कर लेता.....और खुशी के वक्ति वह यकायक उदास हो जाता.....पुराने गम याद करके और भविष्य के बारे में सोच कर ! बस दुख और सुख के भंवर में पड़ा-पड़ा वह अखिर मर गया। -यह मेरे दादा जी की कहानी है सुनने वालों में से एक चिल्लाया। - नहीं, मेरे पिता की जीवनी है । -नहीं मेरे चाचा इसी तरह जिये और मरे ! गर्ज यह कि सबको यह कहानी अपने किसी रिश्तेदार की लगी, अपनी नहीं,.............क्योंकि आदमी सच से हमेशा दूर भागता है।
- अशोक कुमार खन्ना दोनों अपनी-अपनी गर्दन ऊँची किये चल रहे थे, अतः परस्पर टकरा गये। -ए तुम नहीं जानते मैं शहर का सबसे धनी युवक हूँ ! -लेकिन तुम्हारे पास पैसा ही पैसा है, मुझे देखो, मुझे सारे शहर का प्यार मिला है ! -पर पैसा तो नहीं है ना ?....मेरे पास पैसा है। -प्यार बिना पैसा किस काम का ! दोनों की गर्दन झुक गयी, तभी एक तीसरा उस रास्ते से गुजरा । वह भी गर्दन उठाये चला जा रहा था। -क्या तुम्हारे पास पैसा है ? पहले ने पूछा। दूसरे ने फौरन संवाद दागा-क्या तुम्हारे पास प्यार है। नहीं, दोनों नहीं है ! और वह दोनों की परवाह किये बगैर आगे बढ़ गया !
- सत्य शुचि -नानी, सो जाओ ना ! -नींद नहीं आ रही है बेटी। -सोने से आ ही जायेगी। -नहीं आयेगी। -तुम फिजूल ही रात भर करवटें बदलती रहती हो। -क्या करुं। -रात को डर लगता है ? -नहीं बेटी। -डर भी नहीं लगता है, फिर तु्म्हें खौन-सी तकलीफ़ है। -बहुत बड़ी तकलीफ है। -क्या तकलीफ़ है। -तुम्हारी, सिर्फ तुम्हारी.....! बुद-बुदाते-बुदबुदाते अंधेरे कोनों पर उहरी उसकी आँखों स्वतः ही मूंदती चली गयीं......!
- जसबीर सिंह चावला -न, हमारे परमीसन के बिना और थोडे कोई प्लेफार्म पर किताब बेंच सकता है !....ऐसे ही मुजफ्फरपुर में एक था। उसको कई बार मामा जी ने ठीक किया था। उसको कई बार बोला, भाई ! देख, स्टेशन पर किताब मत बेच। ग्राहक ट्रेन से उतरेगा। अपने स्टाल पर आयगा।
वह बोला- नहीं, हम तो बेचेंगे।....पुलिस वाले सब हमारे जान-पहचान के थे, बोले- जैन साब ! इसको ठीक किये देते हैं, दो-तीन बार किताबें छीनकर मामाजी को दे गये। दो-तीन बार पिटाई-की....लेकिन साला माना नहीं!
एक और था, वो तो छोड़ गया। लेकिन यह बहुत ढीठ था। दो-चार दिन बीतते फिर धंधा शुरू कर देता । अंत में उसको चलते ट्रेन से धकेल दिया । टाँगें टूट गयीं। महीना भर अस्पताल में रहा, बैसाखी के सहारे चलने लगा, तो फिर किताबें बेचना शुरू किया।
आखिर यही तय हुआ- वह गाड़ी में किताबें बिक्री करेंगा, फ्लेटफार्म पर नहीं !
-सिमर सदोष आज मैंने एक सेब खाया जिसमें से प्यार की बू आ रही थी ! अमृता की यह पंक्ति यह कभी नहीं भूल पाता शायद इसलिए कि रंगीन-मिजाजी उसकी लत बन चुकी है और इस लत के तहत हर बार उसे अपने खाये हुए सैंकड़ों सेबों में से हमेशा प्याज की बू आती रहती है और वह हर बार, और भी घृणा से भरता हुआ, और निर्लज्ज होकर, सेब खाने की संख्या बढ़ाता गया है।
उस दिन क्लब में वह एक ऐसा ही सेब खाकर चला आ रहा था कि उसे वह दिखायी दी ।
वह क्लब के द्वार पर खड़ी घबराई हुई-सी इधर-उधर देख रही थी, उसने उसे जी भर कर देखा और एक असमर्थ-सी आह भर कर उसकी बगल से गुजरने लगा, तो हतप्रभ रह गया । किसी अज्ञात देवालय से चुरा कर लायी गयी वह मूर्ति कह कही थी- सिर्फ दो रुपये। वह विश्वास नहीं कर पा रहा था कि सिर्फ दो रुपये में वह उर्वशी उसकी कैसे हो सकती है, चोरों के कपड़े, लाठियों के गज....!
-एक रुपया सही...रोटी खानी है ! वह सायद इनकार सुनने की स्थिति में नहीं थी।
वह संभला ....सहज हुआ और फिर न जाने उसेक्या-क्या सूझा कि उसने आगे बढ़ कर उसके होठों की गहरी चिप्सन निगल-सी ली और सौ का नोट उसके थमाता हुआ आगे बढ गया ।
लड़की खड़ी काँप रही थी और उसे लग रहा था कि आज उसने एक प्याज खा लिया है जिसकी सेब सी खुशबू उसकी नसों में से कभी नहीं नायेगी !
- आजाद रामपुरी -पंद्रह हजार रुपये भूखे-नंगे फटेहाल व्यक्तियों को बांटने के लिए, बीस हजार रुपये आपके आने-जाने के लिए, तीस हजार रुपये आपके साथ जाने वाले सेवकों पर होने वाले व्यय के लिए, और चालीस हजार रुपये एक अन्य मद में व्यय होने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
दानवीर सेठ के मुनीम ने उसके दान-दिवस समारोह की पूरी रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए जब सेठ की प्रतिक्रिया जाननी चाही, तो सेठ जिज्ञासा वश बोला - मुनीम जी, और व्यय तो सब ठीक है, किंतु ये चालीस हजार रुपये किस मद में खर्च होंगे....आखिर मैं भी तो जानूं ?
-हुजूर, यह मद तो सार्थक है, जो आपकी दानवीरता में हजार चाँद लगा देगी। -वह कैसे ? - हुजूर ! मुनीम ने बताया - आपकी जय-जयकार करवाकर !
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