रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 11, अप्रेल, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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कविता

 

सीताराम गुप्त की पाँच कविताएं

 

कटोरा

महुआ बीनता

या इकट्ठा करती तेंदुपत्ता

ऊबड़-खाबड़ साँवले हाथों की

उंगलियाँ नाज़ुक-नाज़कु-सी

मैले मटमैले-मटमैले-से लूगों में लिपटीं

तेल सनी चीकट देह वाली

लाई-मुर्रा भूनती केवटिनें

लहलहाते धान के खेतों के बीच

घुटनों तक की लूँगी में से झांकते

दरख़्तों की सूखी टहनियों से पाँव मिट्टी में उगाए

नंग-ध़ंग मज़दूर-किसान

बच्चे-बूढ़े, औरतें और जवान

पेट में दाना नहीं गया है अभी तक किसी के

यद्यपि बीत चुका है दिन का एक भाग

सब कुछ दिया है प्रकृति ने इन्हें वैसे तो

पर इन्होंने भरा है देश के कटोरे को

धान से

खुद मर कर भूखों

दिनो-महीनो-सालों-सदियों

तभी तो बना है छत्तीसगढ़

देश के धान का कटोरा

राइस बाउल ऑफ इण्डिया

लेकिन

दूसरों के कटोरों के भरने वाले के कटोरे में

कुछ तो बचना चाहिये

दोनों वक़्त

अब तो

दो-दो मुट्ठी भात

इस कटोरे में से

इनके लिए भी निकलना चाहिए

 

 

छत्तीसगढ एक्सप्रेस

बिलासपुर स्टेशन का

एक प्लेटफॉर्म

प्लेटफॉर्म पर पड़ी है

जूस की खाली थैली

थैली में लगा है स्ट्रॉ

एक लड़की आती है

कुछ खोजती-सी

और उठा लेती है थैली और नली

 नल पर जाकर भरती है उसमें पानी

और पीती हुई नली से शान से अकड़ती हुई निकल जाती है दूसरी ओर

 पर किसी का ध्यान है ही कहाँ

 उस शान से अकड़ती हुई जा रही अलहड़ लड़की की उस अदा पर

 छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस-सी

सब देख रहे हैं छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस को

जो गति पकड़ रही है

और जो हो रही है

लड़की से

लगातार दूर

और दूर

 

 

ख़ानाबदोशी बनाम हम्लबशिकमी

ख़ानबदोशी

सुरक्षित है मेरे देश मे, मेरे शहर में

और मेरे आसपास

अब भी हर जगह

वैसे तो बचा ही क्या है ढोने को

इधर से उधर बारबार

हर साल सिवाय मरियल-से बहुत सारे

रेंगते-घिसटते बच्चों के टंगे कंधों पर

पीठ पर और पेट में भी हर साल

एक नया बदस्तूर

पड़ती नहीं पेट में रोटी

हर रोज़ दोनों वक़्त

पर पेट

पेट फिर भी रहता है

ठसाठस भरा सारे साल न जाने कैसे

कभी होली से पहले कभी दीवाली के बाद

दे जाता है एक नई सौगात

हर साल ढोने के इधर से उधर

बचा नहीं है कुछ भी तो क्या

घर नहीं न सही

असवाब न सही

ढेर सारे बच्चे तो हैं

भूख तो है ढोने को

इधर से उधर

कंधों पर न सही

पेट में सही

ख़ानाबदोशी कर रही है

इख़्तियार एक और सूरत

शक्ल हम्लबशिकमी की

साथ ही शब्दावली में

समाजशास्त्र की

हो रही है वृद्धि

 

 

इन्ना लिल्लाहि......

अत्याचारी को

कातिल को

फाँसी पर चढ़ाओ न चढ़ाओ

शोषक को

एक भद्दी-सी गाली

दो न दो

पीड़ित के लिए

शब्द कुछ सहानुभूति के

कहो न कहो

तमाशबीनों की भीड़ को

आग्नेय नेत्रों से घूरो न घूरो

तटस्थदृष्ट्रा तमाशबीनों के लिए लेकिन

नपुंसकता के श्राप से

उनकी मुक्ति के लिए

अवश्य कह दो शब्द प्रार्थना के

जर्जर शरीरों में मृत आत्माओं के लिए

अवश्य कहोः

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना अलैहि राजिऊन

 

 

वो दिन दूर नहीं !

वो दिन दूर नहीं !

जब प्रमाण के अभाव में

बच नहीं पाएँगे बलात्कारी

बलात्कार के संभावित स्थलों पर फिट

संवेदनशील स्वचालित वीडियो कैमरे

उतारेंगे बलात्कार की प्रामाणिक तस्वीरें

सैटेलाइट के जरिये जिन्हें

प्राप्त किया जा सकेगा फौरन

निगरानी केंद्रों में

अदालतों में पेश की जाएँगी फिल्मं ये

बतौर सबूत

हाँ, प्रमाण की प्रामाणिकता के लिए

इन फिल्मों के अपेक्षित स्थिति में पहुँचने से पहले

डिस्टर्ब नही किया जाएगा बलात्कारी को

सबूत के लिए

पूरा होते ही अपेक्षित फिल्म के

तत्क्षण दबोच लिया जाएगा अपराधी को

(बलात्कारी अधिक संख्या में होने पर फिल्म की अवधि कुछ अधिक हो सकती है)

और सबूत के अभाव में

रिहा नहीं हो सकेंगे बलात्कारी

वो दिन दूर नहीं !

कठोर सज़ा मिलेगी जबा बलात्कारियों को

बलात्कृत बाद इस हादसे के

बयान देने के काबिल रहे न रहे

न भी रहे

तो भी सबूत के अभाव में

रिहा नहीं हो सकेंगे बलात्कारी

कठोर सज़ा मिलेगी जब बलात्कारियों को

वो दिन दूर नहीं.....

O सीताराम गुप्ता

ए.ड़ी. 106-सी, पीतमपुरा

दिल्ली 110034 

 

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 जहाँ बुद्धि जबाब दे दे दिल से काम लो - एक लोक-कहावत

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